ईरान की इस ताक़त की वजह से क्या ट्रंप ने क़दम पीछे खींचे?

- Author, रौनक भैड़ा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाल ही में ऐसा लग रहा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर सैन्य कार्रवाई का मन बना चुके हैं. इसकी आशंका तब और बढ़ गई जब अमेरिका ने ईरान को लेकर एडवाइज़री जारी की.
क़तर के अपने अल-उदैद एयर बेस, जो कि मध्य पूर्व में अमेरिका का सबसे बड़ा एयर बेस है, वहां से कुछ सैनिकों को हटने के आदेश जारी कर दिए.
ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि अगर ईरान प्रदर्शनकारियों को फांसी देता है तो अमेरिका कड़ी कार्रवाई करेगा, हालाँकि गुरुवार की शाम तक ईरान से फांसी को मुल्तवी करने की ख़बर आ गई.
फिर ट्रंप ने भी कहा, "हमें बताया गया है कि ईरान में हत्याएं रुक गई हैं. फांसी देने की कोई योजना नहीं है."
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गुरुवार शाम होते-होते यह स्पष्ट होने लगा कि मध्य पूर्व में चढ़ा पारा ठंडा हो रहा है. अमेरिका ने क़तर में स्थित अपने अल-उदैद एयर बेस पर सुरक्षा अलर्ट का स्तर घटा दिया. इस सैन्य अड्डे पर बुधवार को सुरक्षा अलर्ट जारी किया गया था.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक सूत्र के हवाले से बताया था कि बुधवार को जिन अमेरिकी सैन्य विमानों को इस बेस से हटा लिया गया था, वे अब धीरे-धीरे वापस लौट रहे हैं.
लेकिन अंग्रेज़ी अख़बार 'द टेलीग्राफ़' की एक ख़बर ने सबको चौंका दिया जिसमें दावा किया गया कि हमले के लिए अमेरिकी सेना तैयार नहीं थी.
बीबीसी फ़ारसी ने ब्रिटेन के अख़बार द टेलीग्राफ़ के हवाले से लिखा है, "अमेरिकी अधिकारियों को गोपनीय रूप से चेतावनी दी गई कि सीमित विकल्पों और क्षमताओं के कारण देश की सेना ईरान पर हमला करने के लिए तैयार नहीं है."
इस ख़बर के मुताबिक़, "कहा जा रहा है कि ट्रंप ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम को निर्देश दिया था कि वे तभी कार्रवाई करें, जब वे शासन के ख़िलाफ़ निर्णायक प्रहार की गारंटी दे सकें."
लेकिन अधिकारियों ने एनबीसी न्यूज़ को बताया कि वे ऐसी कोई गारंटी नहीं दे सकते और चेतावनी दी कि सैन्य कार्रवाई से एक बड़ा संघर्ष शुरू हो सकता है, जो हफ़्तों तक चल सकता है और ईरान की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया आ सकती है.
लेकिन कार्रवाई होने न होने के असमंजस के बीच टाइम मैगज़ीन की 11 जनवरी की रिपोर्ट में भी कुछ ऐसे ही संकेत दिए गए थे.
यह रिपोर्ट कहती है कि बयानबाज़ी को हटा दें तो सीधी बात यह है कि कोई भी सैन्य विकल्प ट्रंप की ओर से किए जा रहे वादों को पूरा नहीं कर सकता.
अगर अमेरिका कोई प्रतीकात्मक हमला भी करता है, तो वह इतना कमज़ोर होगा कि उसका कोई महत्व नहीं है.
फ़िलहाल ये संकट भले टल गया हो, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की भौगोलिक स्थिति भी उस पर किसी सैन्य कार्रवाई का 'डिटरेंस' मुहैया कराती है.
इसके अलावा ईरान ने बीते कुछ महीनों में अपने रक्षा तंत्र में आमूल-चूल बदलाव भी किए हैं.
ईरान कितना मज़बूत

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ईरानी सेना के कमांडर-इन-चीफ़ मेजर जनरल अमीर हतामी ने कई मौक़ों पर बताया है कि ईरान ने पिछले संघर्ष के बाद ख़ुद को कितना मज़बूत कर लिया है.
रूस की सरकारी न्यूज़ एजेंसी तास के अनुसार, अमीर हातामी ने कहा, "जून 2025 में हुए 12 दिनों के युद्ध की तुलना में आज ईरानी सशस्त्र बल बहुत ज़्यादा तैयार हैं. वह युद्ध ईरानी सेना के लिए एक अलग अनुभव था, जिसने हमारी ताक़त बढ़ाई, सैनिकों की ट्रेनिंग का स्तर ऊंचा किया और अलग-अलग यूनिट्स के बीच तालमेल बेहतर किया."
"ईरान ने अपने सशस्त्र बलों की क्षमता को मज़बूत किया है ताकि वे किसी भी तरह के संभावित हमले को रोक सकें और ईरान की सुरक्षा व संप्रभुता की रक्षा कर सकें."
मध्य पूर्व मामलों के जानकार और आईसीडब्ल्यूए के सीनियर फ़ेलो डॉ फ़ज़्ज़ुर रहमान ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "यह बात सही है कि ईरान की भौगोलिक स्थिति उसके लिए हमेशा से फ़ायदेमंद रही है. पहले भी इसके चलते ईरान को रणनीतिक तौर पर फ़ायदा हुआ."
"हालाँकि, आधुनिक युद्ध के दौर में ज़मीनी हमले की आशंका कम है. अमेरिका के पास बी-2 बॉम्बर और कई ख़तरनाक मिसाइलें हैं, जिनके ज़रिये हवाई हमले हो सकते हैं. यह ज़रूर है कि ज़मीनी हमला करने की योजना बनाते समय ईरान की भौगोलिक स्थिति को अनदेखा नहीं किया जा सकता."
ईरान पर हमला करना मुश्किल क्यों?

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अंग्रेज़ी अख़बार द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक़, "वेनेज़ुएला के नेता निकोलस मादुरो को 'पकड़ने' के बाद ट्रंप ने उत्साहित होकर ईरान पर सख़्ती बरतने की बात कही."
"लेकिन असल में अमेरिका ने कोई सैन्य तैयारी नहीं की है. बल्कि पिछले कुछ महीनों में ईरान के आसपास अमेरिकी सेना कम हुई है, जिससे विकल्प सीमित हो गए हैं. अक्तूबर 2025 से मिडिल ईस्ट में अमेरिका का कोई एयरक्राफ्ट कैरियर तैनात नहीं है."
इसका मतलब है कि ईरान की सरकार के ठिकानों पर या ईरान के नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई पर अमेरिका अकेले अपने दम पर हमला नहीं कर सकता.
ऐसा करने के लिए अमेरिका को मध्य पूर्व के देशों में मौजूद हवाई अड्डों का इस्तेमाल करना पड़ेगा. हालाँकि, ईरान इन्हें पहले ही चेतावनी दे चुका है.
अमेरिका के पास दूसरा तरीक़ा 'बी-2 बॉम्बर' वाला है, जो वह जून 2025 में अपना चुका है. लेकिन ईरान का दावा है कि उससे भी उसके परमाणु ठिकाने पूरी तरह तबाह नहीं हुए थे.
डॉ फ़ज़्ज़ुर रहमान भी कहते हैं, "अमेरिका ने अक्तूबर में अपने एयरक्राफ्ट कैरियर हटा लिए थे, जिस कारण ईरान ने कुछ राहत की सांस ली थी. लेकिन अब अमेरिका अपने एयरक्राफ्ट कैरियर फिर से मध्य पूर्व की ओर भेज रहा है. ज़रूरी नहीं कि हमला हो तो इन्हीं का इस्तेमाल हो. अमेरिका ईरान के पड़ोसी देशों के सैन्य हवाई अड्डों का भी इस्तेमाल कर सकता है."
ईरान की भौगोलिक स्थिति अमेरिका के लिए चुनौती

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ईरान की भौगोलिक स्थिति उसके लिए सबसे बड़ी ताक़त रही है.
एटलस ऑफ वॉर के अनुसार, ईरान ऐसी मज़बूत प्राकृतिक सीमाओं से घिरा हुआ है जो दुश्मन के लिए बहुत बड़ी रुकावट बन जाती है. ईरान के चारों तरफ़ प्राकृतिक सुरक्षा है.
उत्तर में कैस्पियन सागर, दक्षिण में फ़ारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी, पूर्व और पश्चिम में रेगिस्तान और पहाड़ हैं. पश्चिमी सीमा पर ज़ाग्रोस पर्वत श्रृंखला और उत्तर में एल्बुर्ज़ पर्वत है.
ये किसी भी दुश्मन सेना के लिए बहुत बड़ी मुश्किल पैदा करते हैं. इतिहास में भी इन पहाड़ों ने कई बार आक्रमण करने वाली फ़ौजों को रोका है.
1980 के दशक में ईरान और इराक़ के बीच युद्ध हुआ. सद्दाम हुसैन की सेना ने 1980 में ईरान पर हमला किया. लेकिन ज़ाग्रोस पहाड़ों की वजह से इराक़ी सेना ईरान के अंदर तक बहुत आगे नहीं बढ़ पाई.
सद्दाम हुसैन का प्लान था कि पहले अहवाज़ (जो तेल का महत्वपूर्ण इलाक़ा है) पर क़ब्ज़ा करेंगे और फिर पहाड़ पार करके ईरान के अंदर और आगे बढ़ेंगे. लेकिन यह योजना पूरी तरह नाकाम रही.
यहाँ प्रकृति बहुत बड़ी रुकावट बन गई और युद्ध 8 साल तक खिंच गया. आख़िर में इस युद्ध में कोई भी जीत नहीं सका, बस दोनों पक्षों के बीच गतिरोध बना रहा.
इसी तरह अगर कोई पूर्व से ईरान पर हमला करना चाहे, तो उसे 'दश्त-ए-लूत' और 'दश्त-ए-कवीर' जैसे बड़े रेगिस्तान पार करने पड़ेंगे. बड़े सैन्य अभियान के लिए ये रेगिस्तान मुश्किलें पैदा कर सकते हैं.
पहाड़ों और रेगिस्तान के अलावा, ईरान समुद्र से भी जुड़ा हुआ है. फ़ारस की खाड़ी में होर्मुज़ जलडमरूमध्य बहुत संकरा है और ईरान इस पर नियंत्रण रखता है.
यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है. दुनिया का लगभग 20% तेल इसी संकरे रास्ते से गुज़रता है. इसलिए किसी भी बड़े विवाद में ईरान के पास यह बहुत बड़ा हथियार है.
होर्मुज़ पर कंट्रोल से ईरान दुनिया के तेल की सप्लाई रोक सकता है. इस आशंका के कारण ईरान के दुश्मन उस पर हमला करने से पहले कई बार सोचते हैं.
ईरान का मिलिट्री पावर

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ग्लोबल फ़ायर पावर के अनुसार, ईरान विश्व स्तर की शीर्ष 20 सैन्य शक्तियों वाले देशों में शामिल है. 145 सैन्य शक्तियों में ईरान का 16वां स्थान है.
ईरान में 6.10 लाख सक्रिय सैनिक और 3.50 लाख रिज़र्व फ़ोर्स के सैनिक हैं. इनकी कुल संख्या 9.60 लाख के क़रीब होती है.
जबकि ईरान में रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) अलग यूनिट है, जिसे ग़ैर-पारंपरिक लड़ाई लड़ने में महारत हासिल है. ईरान के पास 551 लड़ाकू विमान हैं.
अनमैन्ड एरियल व्हीकल के मामले में तो ईरान दुनिया के टॉप देशों में शामिल है. ईरान के पास नौसेना में 147 एसेट हैं, जिनमें 25 सबमरीन भी शामिल हैं.
ईरान वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक़, ईरान का मिसाइल ज़खीरा मिडिल ईस्ट में सबसे बड़ा है.
साल 2022 में यूएस सेंट्रल कमांड के जनरल केनेथ मैकेंज़ी ने कहा था, "ईरान के पास तीन हज़ार से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें हैं. इसमें क्रूज़ मिसाइलों की संख्या शामिल नहीं है."
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, 2024 में ईरान का रक्षा बजट 7.9 अरब डॉलर था, जो जीडीपी का लगभग 2.0% है. जबकि 2023 में ईरान का सैन्य ख़र्च लगभग 10.3 अरब डॉलर था.
सेना पर ख़र्च करने वाले देशों में ईरान दुनिया में 34वें नंबर पर रहा. ईरान ने साल 2025 के आंकड़े जारी नहीं किए हैं, लेकिन उसने डिफ़ेंस बजट में 200% वृद्धि के साथ इसे 16.7 अरब डॉलर तक ले जाने की योजना बनाई थी.

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हालाँकि अमेरिका और ईरान की सैन्य ताक़त में काफ़ी फ़ासला है. अमेरिका दुनिया का सबसे ताक़तवर देश है, जो ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स में पहले स्थान पर है.
अमेरिका के पास 13.28 लाख सक्रिय सैनिक और 7.99 लाख रिज़र्व सैनिक हैं. इस तरह उसके कुल सैनिकों की संख्या 21 लाख के क़रीब है. साल 2005 से अब तक अमेरिका लगातार ग्लोबल फायर पावर इंडेक्स में पहले स्थान पर बना हुआ है.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रैंकिंग में भी अमेरिका पहले स्थान पर है. इसके अनुसार, साल 2024 में अमेरिका का रक्षा बजट 997 अरब डॉलर था.
यह अमेरिका की जीडीपी का 3.4% है. दुनिया के कुल सैन्य ख़र्च में अमेरिका का हिस्सा 37% है.
भले ईरान और अमेरिका की सैन्य ताक़त में ज़मीन-आसमान का फ़र्क हो, लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि ईरान पर हमला करना इतना भी आसान नहीं है.
नेवल पोस्टग्रेज़ुएट स्कूल में राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के एसोसिएट प्रोफ़ेसर अफशोन ओस्तोवर ने साल 2024 में कहा था, "ईरान पर हमले न करने का एक कारण यह नहीं है कि ईरान के विरोधी ईरान से डरते हैं. बल्कि यह है कि वे समझते हैं कि ईरान के ख़िलाफ़ कोई भी युद्ध एक बहुत गंभीर युद्ध होगा."
रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी मानते हैं, "ईरान के पास अमेरिका से लड़ने के लिए सबसे अच्छे हथियार के रूप में मिसाइलें और ड्रोन हैं. ईरान के लड़ाकू विमान लंबे समय से नॉन फ़ंक्शनल हैं. उसकी नौसैनिक ताक़त भी औसत है."
वो कहते हैं, "यदि हमला होता है और ईरान जवाबी कार्रवाई करता है तो मुमकिन है कि वो मिसाइलों का इस्तेमाल करे. जबकि दूसरी ओर अमेरिका के पास अच्छी-ख़ासी सैन्य ताक़त है और इसराइल का भी साथ है. इसराइल मध्य पूर्व के इलाक़े से भली-भांति वाक़िफ़ है, वह हर तरह से अमेरिका की मदद कर सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
















