ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने अपने पड़ोसी देशों से अभी क्यों माफ़ी मांगी?

ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान

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इमेज कैप्शन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने पड़ोसी देशों पर हमले को लेकर माफ़ी मांगी है
    • Author, अमीर आज़िमी
    • पदनाम, बीबीसी फ़ारसी
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने पड़ोसी देशों पर हमले करने के लिए उनसे माफ़ी मांग कर कई पर्यवेक्षकों को चौंका दिया है.

उन्होंने देश के अंतरिम नेतृत्व के तौर पर शनिवार सुबह को एक सार्वजनिक भाषण में माफ़ी का ज़िक्र किया.

देशों के बीच माफ़ी मांगने की घटना बहुत दुर्लभ बात है, वो भी संघर्ष के दौरान. नेता आम तौर पर 'खेद' जताते हैं या ज़िम्मेदारी से खुद को अलग कर लेते हैं.

इसकी बजाय पेज़ेश्कियान ने सीधे इस बात को स्वीकार किया कि पड़ोसी देशों को निशाना बनाया गया और कहा कि ईरानी सेना से कहा गया है कि जब तक किसी देश से ईरान पर हमला न हो उन पर हमला न किया जाए.

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उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि जिन पड़ोसी देशों पर हमला हुआ, उनसे माफ़ी मांगना ज़रूरी है. हमारा इरादा पड़ोसी देशों पर हमला करने का नहीं है."

सिर्फ़ यही बात पहला सवाल खड़ा करती है कि क्या यह सचमुच माफ़ी है और है तो अभी क्यों?

पड़ोसियों को संदेश देने की कोशिश

ईरान के ऑयल डिपो पर हमला

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इमेज कैप्शन, शुक्रवार रात को इसराइली-अमेरिकी हमले में तेहरान में एक ऑयल डिपो में भीषण आग लग गई

एक संभावना यह है कि अंतरिम नेतृत्व, क्षेत्र में बढ़ते असर को कम करने की कोशिश कर रहा है.

शनिवार 28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल की ओर से किए गए हमलों के बाद क्षेत्र के कुछ देश भी इस संघर्ष की चपेट में आ गए हैं.

पेज़ेश्कियान ने संकेत दिया कि शुरुआती हमलों में ईरान के वरिष्ठ कमांडर मारे जाने और केंद्रीय कमांड ढांचे के बाधित होने के बाद ये हमले "फ़ायर ऐट विल" के निर्देश के तहत किए गए.

माफ़ी मांगकर वह शायद यह संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं कि तेहरान युद्ध को व्यापक क्षेत्रीय टकराव में बदलना नहीं चाहता.

यह संदेश परोक्ष रूप से एक राजनीतिक हक़ीक़त को भी स्वीकार करता है. अगर कुछ पड़ोसी देशों ने अपनी ज़मीन पर मौजूद अड्डों से अमेरिकी बलों को कार्रवाई करने की इजाज़त दी हो, तब भी ईरान अगर खुले तौर पर उन्हें निशाना बनाता है तो वह ख़ुद को और ज़्यादा अलग-थलग करने का जोखिम उठाता है.

लेकिन क्या यह माफ़ी किसी नीति में बदलेगी, यह साफ़ नहीं है.

माफ़ी के बाद भी हमलों का क्या है अर्थ

यूएई पर ईरान का हमला

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इमेज कैप्शन, 28 फ़रवरी के बाद ईरान ने कई पड़ोसी देशों पर हमला बोला है
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इलाक़े से आ रही रिपोर्टें बताती हैं कि ईरान या उससे जुड़ी ताक़तों के हमले अभी रुके नहीं हैं. क़तर और यूएई दोनों ने शनिवार दोपहर कहा कि उन्होंने अपनी ओर आ रहे मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया है.

अगर इस तरह के हमले जारी रहते हैं तो यह ईरान के नेतृत्व में नियंत्रण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है.

हमलों की पहली लहर में सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई सहित कई अहम हस्तियों के मारे जाने के बाद फ़ैसले लेने की प्रक्रिया एक अंतरिम नेतृत्व परिषद के हाथ में चली गई है.

सैद्धांतिक तौर पर यह ढांचा पेज़ेश्कियान जैसे नेताओं का पहले के मुक़ाबले प्रभाव बढ़ा देता है, क्योंकि पहले की व्यवस्था एक ही सर्वोच्च निकाय के अधीन थी.

लेकिन व्यवहार में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स जैसी शक्तिशाली सैन्य और सुरक्षा संस्थाओं को काबू में रखने की क्षमता अब भी अनिश्चित बनी हुई है.

अगर राष्ट्रपति के बयान के बावजूद पड़ोसी देशों पर ईरान की ओर से हमले जारी रहते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि या तो संचार ढांचा ढह गया है या तनाव कम करने के अनिच्छुक ग्रुपों की ओर से विरोध हो रहा है.

सुरक्षा तंत्र के भीतर मौजूद कट्टरपंथी तत्व लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि क्षेत्रीय दबाव ही अमेरिका और इसराइल की सैन्य ताक़त के ख़िलाफ़ ईरान की सबसे मज़बूत ढाल है.

घरेलू प्रतिक्रियाएं भी इसी तनाव को दिखाती हैं. कुछ कट्टरपंथी नेताओं ने पहले ही पेज़ेश्कियान की टिप्पणी को कमज़ोर बताते हुए उसकी आलोचना की है.

ईरान में मौजूदा राजनीतिक स्थिति ठीक नहीं है. व्यवस्था के शीर्ष पर मौजूद कई सबसे शक्तिशाली कट्टरपंथी नेता अब नहीं रहे, लेकिन नीचे के स्तर पर मौजूद कई अधिकारी और कमांडर किसी भी नरम लहजे को लेकर गहरी शंका से देखते हैं.

उनके लिए विदेशी सरकारों से माफ़ी मांगना राष्ट्रीय संकट के समय झुकने जैसा दिख सकता है.

अमेरिका कैसे देख रहा है?

अमेरिका

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इमेज कैप्शन, कुवैत में मारे गए छह अमेरिकी सैनिकों के शव शनिवार को डोवर एयर फ़ोर्स बेस पर पहुंचे. इस दौरान ट्रंप और अन्य शीर्ष नेता भी मौजूद थे

ईरान के बाहर प्रतिक्रिया एक बिल्कुल अलग नैरेटिव से प्रभावित रही है.

डोनाल्ड ट्रंप ने तुरंत ट्रुथ सोशल पर दावा किया कि ईरान ने अपने पड़ोसियों से "माफ़ी मांग ली और आत्मसमर्पण कर दिया" और दावा किया कि इससे साबित होता है कि अमेरिका और इसराइल का सैन्य दबाव काम कर रहा है.

यह भाषा यह भी दिखाती है कि वॉशिंगटन तेहरान के संकेतों को किस तरह ले सकता है. ट्रंप बार-बार कहते रहे हैं कि उनके लिए स्वीकार्य नतीजा सिर्फ ईरान का "पूरी तरह आत्मसमर्पण" है.

यह मांग एक कूटनीतिक विरोधाभास पैदा करती है.

ऐतिहासिक रूप से ऐसा कम ही हुआ है कि सिर्फ हवाई हमलों के सहारे कोई देश बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दे, चाहे बमबारी कितनी भी तीव्र क्यों न हो. ज़मीनी सेना के बिना ऐसा नतीजा हासिल करना बेहद मुश्किल होता है.

इसलिए पेज़ेश्कियान की माफ़ी को आत्मसमर्पण के रूप में पेश करना वॉशिंगटन के लिए एक राजनीतिक कलाबाज़ी जैसा काम कर सकता है. यानी इससे वह औपचारिक तौर पर आत्मसमर्पण की अपनी मांग छोड़े बिना भी प्रगति का दावा कर सकता है.

पेज़ेश्कियान का संकेत

ईरानी रिवोल्यूशनरी गॉर्ड कॉर्प्स के कमांडर

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इमेज कैप्शन, ईरानी रिवोल्यूशनरी गॉर्ड कोर के कमांडरों के बीच ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान (फ़ाइल फ़ोटो)

पेज़ेश्कियान और अंतरिम नेतृत्व परिषद के लिए यह गणित अलग हो सकता है.

कोई नया स्थायी नेता सामने आए उससे पहले, अभी युद्धविराम हासिल करना हालात को स्थिर कर सकता है.

अगर ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में अगला प्रमुख चेहरा कोई कट्टरपंथी धर्मगुरु बनता है, तो कूटनीति की संभावनाएं और भी सीमित हो सकती हैं.

यह संभावना एक और रणनीतिक सवाल खड़े करती है. क्या पेज़ेश्कियान ख़ुद को ऐसे नेता के रूप में पेश कर रहे हैं जिनसे बातचीत की जा सके, यानी ऐसा व्यावहारिक नेता जिससे पश्चिमी सरकारें बात करना पसंद करें?

अपने संबोधन में उन्होंने चुनौती और खुलापन, दोनों के बीच संतुलन साधने की कोशिश की. उन्होंने आत्मसमर्पण को ख़ारिज किया, लेकिन पड़ोसी देशों के प्रति संयम बरतने का संकेत भी दिया.

साथ ही, ईरान के भविष्य के नेतृत्व को लेकर खींचतान भी सामने आने लगी है.

विभिन्न राजनीतिक और धार्मिक हस्तियां, साथ ही इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर और सुरक्षा बलों के भीतर मौजूद कमांडर, मौजूदा संकट को अपनी स्थिति मज़बूत करने के मौके के रूप में देख सकते हैं.

कुछ लोग असेंबली ऑफ़ एक्सपर्ट्स से यह मांग कर रहे हैं कि वह जल्द से जल्द अगले नेता का चुनाव करे.

अगर पेज़ेश्कियान स्थिरता ला पाने में नाकाम रहते हैं या सशस्त्र बलों पर नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाते तो उनके प्रतिद्वंद्वी यह तर्क दे सकते हैं कि इससे ज़्यादा कड़ा रुख़ अपनाने की ज़रूरत है.

फिलहाल सबसे तात्कालिक परीक्षा ईरान की सीमाओं के बाहर है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.