जब सद्दाम हुसैन का कुवैत पर हमला करने का दांव पड़ा भारी

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दो अगस्त, 1990 को तड़के क़रीब एक लाख इराक़ी सैनिक टैंकों, हेलिकॉप्टरों और ट्रकों के साथ कुवैत की सीमा में घुस गए.
उस समय इराक़ की सेना दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सेना थी.
एक घंटे के अंदर वो कुवैत सिटी पहुँच गए और दोपहर होते-होते इराकी टैंकों ने कुवैत के राजमहल दसमान पैलेस को घेर लिया.
तब तक कुवैत के अमीर भाग कर सऊदी अरब पहुँच गए थे. अपने पीछे वो अपने सौतेले भाई शेख़ फ़हद अल अहमद अल सबह को छोड़ गए थे. इराक़ी सेना ने शेख़ को देखते ही गोली से उड़ा दिया.
एक प्रत्यक्षदर्शी इराक़ी सैनिक के अनुसार, उनके शव को एक टैंक के सामने रख कर उस पर टैंक चढ़ा दिया गया.
कुवैत पर हमला करने से पहले बाथ क्रांति की 22वीं सालगिरह के मौक़े पर सद्दाम हुसैन ने कुवैत के सामने अपनी माँगों की एक फेरहिस्त रखी थी.
इन माँगों में शामिल था- अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल के मूल्य को स्थिर करना, खाड़ी युद्ध के दौरान कुवैत से लिए गए कर्ज़े को माफ़ करना और मार्शल प्लान की तरह एक अरब प्लान बनाना जो इराक़ के पुनर्निर्माण में मदद दे.
राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने इराक़ी टीवी पर धमकी भरे स्वर में ऐलान किया था, "अगर कुवैतियों ने हमारी बात नहीं मानी तो हमारे पास चीज़ों को सुधारने और अपने अधिकारों की बहाली के लिए ज़रूरी क़दम उठाने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा."

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सद्दाम को मनाने की सारी कोशिशें नाकाम
सऊदी राजनयिक और शाह फ़हद के नज़दीकी सलाहकार डॉक्टर ग़ाज़ी अलगोसैबी ने एक इंटरव्यू में बताया था, "दरअसल, सऊदी अरब और कुवैत दोनों उम्मीद छोड़ चुके थे कि खाड़ी युद्ध के दौरान इराक़ को दिया गया कर्ज़ उन्हें वापस मिल पाएगा."
"लेकिन दोनों देशों ने सोचा कि अगर वो सार्वजनिक रूप से ये ऐलान करेंगे कि उन्होंने कर्ज़ माफ़ कर दिया है तो इससे ग़लत संदेश जाएगा."
"शाह फ़हद ने सद्दाम को कर्ज़ माफ़ी की जानकारी दी, लेकिन सद्दाम आभास दिया मानो वो सऊदी अरब की इस पहल से खुश नहीं हैं. उसी पल शाह फ़हद को अंदाज़ा हो गया कि कुवैत के ख़राब दिन आ गए हैं."
लेकिन कुवैत के सामने माँगों की फेरहिस्त रखने से पहले ही सद्दाम हमला करने का मन बना चुके थे.

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21 जुलाई तक इराक के क़रीब 30 हज़ार सैनिकों ने कुवैत की सीमा की तरफ़ बढ़ना शुरू कर दिया था.
25 जुलाई को दोपहर एक बजे सद्दाम ने बग़दाद में अमेरिका की राजदूत एप्रिल गिलेस्पी को तलब कर लिया था. सद्दाम कुवैत में उनके अभियान के बारे में उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते थे.
इससे पहले अमेरिकी राजदूत की फ़रवरी में सद्दाम हुसैन से वॉएस ऑफ़ अमेरिका के एक प्रसारण के बारे में कूटनीतिक भिड़ंत हो चुकी थी जिसमें सद्दाम के इराक की तुलना चाचेस्कू के रोमानिया से की गई थी.
गिलेस्पी ने सद्दाम से उस प्रसारण के लिए माफ़ी माँगते हुए कहा था कि अमेरिका का इराक़ी सरकार के घरेलू मामलों में दख़ल देने का कोई इरादा नहीं था.
सद्दाम ने उस बैठक का अंत ये कहते हुए किया था कि अगर कुवैत से समझौता नहीं हो पाया तो ये लाज़मी है कि इराक़ मौत तो स्वीकार नहीं करेगा.

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सद्दाम की मंशा के बारे में अंदाज़ा ग़लत निकला
सद्दाम के जीवनीकार कॉन कफ़लिन सद्दाम की जीवनी 'सद्दाम द सीक्रेट लाइफ़' में लिखते हैं, "उस बैठक से गिलेस्पी ये सोचकर बाहर निकली थीं कि सद्दाम महज़ कोरी धमकी दे रहे हैं और उनका कुवैत पर हमला करने का कोई इरादा नहीं है."
"पाँच दिन बाद वो राष्ट्रपति बुश से सलाह मशविरा करने वॉशिंगटन चली गई थीं. जब कुछ दिन बाद गिलेस्पी सद्दाम के साथ बैठक का विवरण बग़दाद में प्रकाशित किया गया तो अरब मामलों का बहुत अनुभव रखने वाली 48 वर्षीय राजनयिक पर नादान होने का आरोप लगाया गया. ये भी कहा गया कि उन्होंने सद्दाम के कुवैत अभियान को हरी झंडी दिखा दी थी."
गिलेस्पी ने इस आरोप का ज़ोरदार खंडन किया. 1990 के दशक में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने साफ़ किया, "न तो मैंने और न ही किसी दूसरे ने सोचा था कि इराक़ पूरे कुवैत पर कब्ज़ा करने का इरादा रखता है."
इस मामले में हर कुवैती, सऊदी और पश्चिमी जगत की सोच बिल्कुल ग़लत निकली. मिस्र के राष्ट्पति होस्ने मुबारक ने निजी तौर पर वॉशिंगटन और लंदन को आश्वस्त किया था कि सद्दाम का कुवैत पर हमला करने का कोई इरादा नहीं है और अरब कूटनीति से इस संकट का हल निकाल लिया जाएगा.

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इराक़ी सेना निर्विरोध कुवैत में घुसी
दो अगस्त, 1990 को रात दो बजे एक लाख इराकी सैनिकों ने 300 टैंकों के साथ कुवैत की सीमा पार की.
कुवैत की 16 हज़ार सैनिकों की सेना उनका मुक़ाबला नहीं कर सकी. कुवैत की सीमा पर उनका तनिक भी विरोध नहीं हुआ.
जब इराक़ी सेना राजधानी कुवैत सिटी पहुँची तब उन्हें कुवैती सैनिकों के मामूली प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन उन पर जल्द की क़ाबू पा लिया गया.
कुवैती युद्धक विमान हवा में उड़े ज़रूर लेकिन इराक़ियों पर बमबारी करने के लिए नहीं बल्कि सऊदी अरब में शरण लेने के लिए. कुवैती नौसेना भी अपनी जगह पर खड़ी तमाशा देखती रही. सद्दाम के लिए एकमात्र धक्का था कुवैत के अमीर और उनके सभी मंत्रियों का सुरक्षित सऊदी अरब भाग जाना.
रिपब्लिकन गार्ड की एक इकाई को आदेश थे कि वो कुवैत सिटी में घुसते ही सबसे पहले दसमान राजमहल जाकर शाही परिवार को बंदी बना लें.
कॉन कफ़लिन लिखते हैं, "शाही परिवार के एकमात्र सदस्य शेख़ फ़हद ने सऊदी अरब न भागने का फ़ैसला किया. जब इराक़ी सेना राजमहल पहुँची तो वो कुछ कुवैती सैनिकों के साथ राजमहल की छत पर एक पिस्टल लिए खड़े थे. एक इराक़ी सैनिक ने उन्हें गोली मार दी."

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ब्रिटिश विमान पर सवार लोगों को बंधक बनाया
सात घंटे के अंदर इराक़ी सेना का पूरे कुवैत पर कब्ज़ा हो चुका था. सरकार के साथ-साथ कुवैत के क़रीब तीन लाख नागरिक देश छोड़कर भाग चुके थे. तभी सद्दाम को अचानक ब्रिटिश एयरवेज़ के एक विमान पर कब्ज़ा करने का मौक़ा मिल गया.
हुआ ये कि जैसे ही कुवैत पर आक्रमण शुरू हुआ इससे बेख़बर लंदन से दिल्ली जा रहा ब्रिटिश एयरवेज़ का विमान ईंधन लेने के लिए कुवैत हवाई अड्डे पर उतरा.
पश्चिमी ख़ुफ़िया एजेंसियों को अंदाज़ा लग गया था कि इराक़ ने कुवैत पर हमला कर दिया है लेकिन किसी ने विमान को सचेत करने की ज़रूरत नहीं समझी.

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जैसे ही विमान ने कुवैत में लैंड किया सभी विमान कर्मचारियों और यात्रियों को बंदी बना लिया गया. उन्हें बग़दाद ले जाया गया ताकि महत्वपूर्ण स्थानों पर हमले से बचने के लिए उन्हें मानव कवच की तरह इस्तेमाल किया जा सके.
हमले के कुछ घंटों के अंदर ही राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इराक़ पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे और विमानवाहक पोत 'इंडिपेंडेंस' को हिंद महासागर से फ़ारस की खाड़ी में आने का आदेश दिया था.
इराक़ का सारा पैसा अमेरिका ने ज़ब्त किया
अमेरिकी बैंकों में जमा इराक़ के सारे धन को ज़ब्त कर लिया गया था. उस समय ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर अमेरिका की यात्रा पर थीं.
उन्होंने कुवैत पर इराक़ी हमले की तुलना तीस के दशक में चेकोस्लवाकिया पर जर्मन हमले से की थी. एक दूसरे के ख़िलाफ़ परस्पर विरोधी लाइन लेने वाले अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने संयुक्त बयान जारी करके इराक के हमले की निंदा की थी.
संयुक्त राष्ट्र और अरब लीग ने भी इराक़ के इस क़दम की निंदा की थी. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इराक़ पर पूर्ण आर्थिक और व्यापार प्रतिबंध लगा दिया था.
तुर्की और सऊदी अरब से गुज़रने वाली इराक़ की तेल पाइपलाइन को काट दिया गया था. सऊदी सीमा पर इराकी सैनिकों के जमावड़े को देखते हुए सऊदी अरब ने अमेरिका से सैनिक सहायता की माँग की थी.
इराक़ को कुवैत से निकालने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए अगले छह महीनों में करीब 60 हज़ार सैनिकों को एयरलिफ़्ट करते हुए सऊदी अरब की धरती पर पहुँचाया था.
सात अगस्त को राष्ट्रपति बुश ने देश के नाम टीवी प्रसारण में कहा कि वो 82वीं एयरबॉर्न डिवीजन को सऊदी अरब भेज रहे हैं.
ये आपरेशन 'डेज़र्ट स्टॉर्म' की शुरुआत थी और वियतनाम युद्ध के बाद विदेशी भूमि पर की गई अमेरिकी सैनिकों की सबसे बड़ी तैनाती थी.

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सद्दाम हुसैन को अराफ़ात और मितरां का समर्थन
इस बीच सद्दाम हुसैन ने अपने चचेरे भार भाई अल हसन अल माजिद को कुवैत का गवर्नर नियुक्त कर दिया था. ये वही माजिद थे जिन्होंने 1988 में हलाब्जा में गैस छोड़कर हज़ारों कुर्दों को मरवा डाला था.
सद्दाम का समर्थन करने वाले इक्का-दुक्का लोगों में फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात भी थे, उनके इस समर्थन पर विश्लेषकों को आश्चर्य हुआ था क्योंकि एक समय सद्दाम ने अराफ़ात के शक्ति केंद्र को कुचलने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी.
सितंबर में सद्दाम के लिए एक और जगह से परोक्ष समर्थन आया. फ़्रांस के राष्ट्पति फ़्रांस्वा मितरां ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए अपने भाषण में कहा कि वो कुवैत में इराक के भूमि संबंधी कुछ दावों को वैध मानते हैं.
कुछ महीनों पहले सद्दाम हुसैन ने कुवैत में काम कर रहे फ़्रांस के 327 मज़दूरों को रिहा कर फ़्रांस की सहानुभूति अर्जित कर ली थी.
उन मज़दूरों को ठीक उसी दिन छोड़ा गया जिस दिन अमेरिका के विदेश मंत्री जेम्स बेकर इराक के ख़िलाफ़ रणनीति बनाने के लिए बातचीत करने पेरिस आए हुए थे.

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सद्दाम की ब्रिटिश बंदियों से मुलाक़ात
अमेरिका के बाद इस मुद्दे पर इराक का सबसे बड़ा विरोधी ब्रिटेन था. इस बीच सद्दाम हुसैन ने इराक में बंदी बनाए गए ब्रिटिश लोगों से मिलने का फ़ैसला किया.
कॉन कफ़लिन लिखते हैं, "सद्दाम ने उनसे मिलने के बाद दोहराया कि इराक में इन बंधकों की उपस्थिति शांति के लिए ज़रूरी है. उनका मानना था कि वो जब जक वहाँ रहेंगे मित्र देश इराक पर बमबारी करने के बारे में नहीं सोचेंगे."
"उनसे मिलने के दौरान जिसे पूरी दुनिया में टेलिविजन पर लाइव दिखाया जा रहा था, सद्दाम ने एक सात साल के ब्रिटिश बच्चे स्टुअर्ट लॉकवुड से अरबी में पूछा, 'क्या स्टुअर्ट को आज उसका दूध मिला?'

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बच्चे के चेहरे पर भय के भाव ने उन सभी लोगों की स्थिति को बयान कर दिया जो उस समय सद्दाम के कब्ज़े में थे.
इस बीच सद्दाम को मनाने के लिए पूर्व विश्व हेवीवेट बॉक्सर मोहम्मद अली और जर्मनी पूर्व प्रधानमंत्री विली ब्राँड और ब्रिटेन के पूर्व पीएम एडवर्ड हीथ भी बग़दाद पहुँचे लेकिन सद्दाम पर उनकी अपील को कोई असर नहीं हुआ.

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कुवैत में नए पहचान पत्र जारी हुए
कुवैत के तीन लाख लोगों ने यानी उसकी एक तिहाई आबादी ने देश छोड़ दिया.
इकॉनॉमिस्ट पत्रिका ने अपने 22 दिसंबर, 1990 के अंक में लिखा, 'सद्दाम के ख़ुफ़िया एजेंटों ने ख़ाली किए राजमहलों के तहख़ानों को विरोधियों को यातना देने का चेंबर बना दिया. कई सड़कों के नाम बदल दिए गए और नागरिकों को नए पहचान पत्र और लाइसेंस प्लेट लेने के लिए कहा गया.'
'बग़दाद और कुवैत के बीच के समय के अंतर को समाप्त कर दिया गया. एक आदेश पारित कर कुवैत वासियों के दाढ़ी रखने पर पाबंदी लगा दी गई और इसका विरोध करने वालों की दाढ़ी प्लायर से खींच ली गई.'
कुवैत अभियान के समय सद्दाम हुसैन की मनोदशा का वर्णन उनके एक जनरल वाफ़िक अल समुराई ने किया है.

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समुराई कहते हैं, "सद्दाम ने हमें आदेश दिया कि हम अमेरिकी सैनिकों को पकड़ लें ताकि उन्हें इराकी टैकों के आसपास खड़ा कर मानव कवच के रूप में इस्तेमाल किया जा सके."
"उनको ग़लतफ़हमी थी कि इस तरह हज़ारों अमेरिकी सैनिकों को पकड़ कर मानव कवच के रूप में उनका इस्तेमाल किया जा सकता है. मुझे और दूसरे जनरलों को सद्दाम की इस नादानी पर तरस भी आया और आश्चर्य भी हुआ."
अमेरिकियों के लंबे समय तक लड़ने पर संदेह
अटलांटिक पत्रिका के मई 2002 के अंक में दिए गए इंटरव्यू में समराई ने कहा था, "जब मैंने सद्दाम को ये बताने की कोशिश की कि हम बर्बादी की तरफ़ बढ़ रहे हैं तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या ये तुम्हारे निजी विचार हैं या वास्तविकता है?"
"मैंने जवाब दिया कि मैंने अपने सामने मौजूद तथ्यों के आधार पर ये राय बनाई है. इस पर सद्दाम ने कहा, अब तुम मेरी राय सुनो. इस लड़ाई में ईरान हस्तक्षेप नहीं करेगा. हमारी सेनाएँ तुम्हारी सोच से कहीं अधिक मुकाबला करेंगी. वो अमेरिकी हवाई हमलों से बचने के लिए बंकर खोद सकते हैं."
"वो लंबे समय तक लड़ेंगे और दोनों तरफ़ से बहुत से लोग हताहत होंगे. हम इस नुक्सान को सहने के लिए तैयार हैं लेकिन अमेरिकी नहीं. वो लोग बड़ी संख्या में अपने सैनिकों के हताहत होने को स्वीकार नहीं करेंगे."

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हवाई हमलों से इराक में भारी तबाही
राष्ट्रपति बुश ने 16 जनवरी, 1991 को इराक पर हवाई हमले करने का आदेश दिया. पूरे इराक में इससे भारी तबाही तो हुई ही, चार हफ़्तों के अंदर इराक के चार परमाणु शोध संयंत्रों का नामोनिशान मिटा दिया गया.
इराक के सभी सामरिक और आर्थिक महत्व के ठिकाने जैसे सड़कें, पुल, बिजलीघर और तेल भंडार नेस्तानुबूद हो गए.
इराकी वायुसेना के मनोबल को उस समय बहुत बड़ा धक्का लगा जब उसके 100 से युद्धक विमानों ने उड़कर ईरान में शरण ले ली. इस तरह की ख़बरे थीं कि इराकी वायुसेना ने सद्दाम के ख़िलाफ़ नाकाम सैनिक विद्रोह के बाद ये कदम उठाया था.
ये विद्रोह उस समय किया गया था जब अमेरिकी हवाई हमलों को न रोक पाने के कारण सद्दाम ने वायुसेना अधिकारियों को मौत की सज़ा सुना दी थी.
सद्दाम के सैनिकों ने सऊदी सीमा के 12 किलोमीटर अंदर खाफ़जी कस्बे पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन कुछ ही दिनों के अंदर मित्र सेनाओं ने वो कस्बा इराकी सैनिकों से दोबारा छीन लिया.

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58,000 इराकी सैनिक युद्धबंदी बने
इस दौरान जब सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव के विशेष दूत येवगनी प्राइमाकोव सद्दाम से मिलने बग़दाद आए तो वो ये देख कर दंग रह गए कि उनका वज़न लगभग 15 किलो कम हो गया था.
18 फ़रवरी को इराक के विदेश मंत्री तारिक अज़ीज़ मॉस्को गए और उन्होंने सोवियत संघ का कुवैत से बिना शर्त इराक के हटने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. लेकिन तब तक विश्व नेताओं के बीच सद्दाम की विश्वस्नीयता इतनी घट चुकी थी कि महज़ आश्वासन से काम चलने वाला नहीं था.
इराक पर ज़मीनी हमले की आशंका को देखते हुए सद्दाम हुसैन ने आदेश दिया कि कुवैत के सभी तेल कुओं में आग लगा दी जाए.

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आख़िरकार राष्ट्रपति जार्ज बुश ने सैन्य कमांडर जनरल नॉर्मन श्वार्ज़कॉप्फ़ को आदेश दिया कि अगर 24 फ़रवरी तक इराकी सेना कुवैत नहीं छोड़ती तो उसे बलपूर्वक वहाँ से हटा दिया जाए.
अमेरिकी हमले के 48 घंटे के अंदर इराकी सेना ने हार मान ली. छह हफ़्ते तक लगातार चली बमबारी के बाद इराक सैनिक लड़ने के मूड में नहीं थे.
हमले के दूसरे दिन की समाप्ति तक इराक के 20 हज़ार सैनिकों को बंदी बनाया जा चुका था और 370 इराकी टैंक बरबाद किए जा चुके थे.
आख़िरकार सद्दाम हुसैन को अपने सैनिकों को आदेश देना पड़ा कि वो एक अगस्त, 1990 को जिस स्थान पर थे, वहाँ वापस लौट जाएँ.

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26 फ़रवरी को कुवैत में इराक का एक भी सैनिक नहीं बचा था. वो या तो युद्धबंदी बनाया जा चुका था या इराक वापस लौट चुका था.
इराक के युद्धबंदियों की संख्या बढ़कर 58 हज़ार हो गई थी और करीब डेढ़ लाख इराकी सैनिक इस युद्ध में या तो घायल हुए थे या मारे गए थे.
इराकी सैन्य अधिकारियों ने सिर्फ़ एक अनुरोध किया था कि उनको हैलिकॉप्टर से उड़ने की अनुमति दी जाए क्योंकि अमेरिकी बमबारी में इराक की सभी सड़के और पुल बरबाद हो गए थे. अमेरिकी जनरल श्वार्ज़कॉप्फ़ ने उनके इस अनरोध को स्वीकार कर लिया था.
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