'कभी-कभी मम्मी-पापा प्रदर्शन में जाते हैं और वापस नहीं आते', ईरान में मारे गए लोगों की कहानियां

8 जनवरी को काशानी, तेहरान की ओर मार्च करते प्रदर्शनकारी

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    • Author, सराह नामज़ू और रोज़ा असदी
    • पदनाम, बीबीसी फ़ारसी

8 जनवरी को तेहरान में एक प्रदर्शन में शामिल होने के बाद जब रज़ा घर लौट रहे थे, तो उन्होंने सुरक्षा के ख़याल से अपनी पत्नी मरियम को बांहों में लेकर ढकने की कोशिश की. बाद में उन्होंने परिवार के एक सदस्य को बताया, "अचानक मुझे लगा जैसे कि मेरा हाथ बहुत हल्का हो गया, मेरे हाथों में सिर्फ़ उसकी जैकेट रह गई थी."

मरियम को गोली लग चुकी थी और उन्हें कोई अंदाज़ा नहीं था कि गोली किसने चलाई, कहां से आई.

रज़ा डेढ़ घंटे तक मरियम के शव को लेकर चलते रहे. थकान से चूर होकर वह एक गली में बैठ गए. थोड़ी देर बाद पास के एक घर का दरवाज़ा खुला. वहां रहने वाले लोग उन्हें अपने गैराज में ले गए, एक सफ़ेद चादर लाए और मरियम के पार्थिव शरीर को उसमें लपेट दिया.

कुछ दिन पहले एक प्रदर्शन में जाते हुए मरियम ने अपने सात और 14 साल के बच्चों को बताया था कि देश में क्या हो रहा है. उन्होंने कहा था, "कभी-कभी मम्मी-पापा प्रदर्शन में जाते हैं और वापस नहीं आते."

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उन्होंने आगे कहा था, "मेरा और तुम्हारा ख़ून, किसी और से ज़्यादा क़ीमती नहीं है."

रज़ा और मरियम के नाम सुरक्षा कारणों की वजह से बदल दिए गए हैं.

पूरे ईरान में तेज़ी से फैलते प्रदर्शनों के जवाब में अधिकारियों ने निर्दयतापूर्वक दमन की कार्रवाई की और इसकी वजह से मरियम जैसे हज़ारों प्रदर्शनकारी, जिन्हें घर लौट जाना चाहिए था, कभी नहीं पहुंच पाए.

अमेरिका स्थित ईरानी ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी (एचआरएएनए) का कहना है कि उसने पिछले तीन हफ़्तों में कम से कम 2400 प्रदर्शनकारियों के मारे जाने की पुष्टि की है, जिनमें 12 बच्चे भी शामिल हैं.

'हमारे मोहल्ले में ख़ून की गंध फैली है'

नजफ़ में प्रदर्शनकारी

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इमेज कैप्शन, 8 जनवरी को नजफ़ अबाद में एक धार्मिक संस्थान होज़े एल्मिये के बाहर हो रहा प्रदर्शन
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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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ईरान ने गुरुवार रात लगभग पूरी तरह इंटरनेट बंद कर दिया था, इसलिए मौतों की वास्तविक संख्या बताना बेहद मुश्किल है और आने वाले दिनों में यह आंकड़ा बढ़ने की आशंका है.

मानवाधिकार संगठनों की देश तक सीधी पहुंच नहीं है और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की तरह बीबीसी भी ज़मीन पर जाकर रिपोर्टिंग नहीं कर पा रहा है.

ईरानी अधिकारियों ने अब तक कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं दिया है, लेकिन स्थानीय मीडिया के अनुसार 100 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं. उनकी रिपोर्टों में प्रदर्शनकारियों, जिन्हें वे 'दंगाई और आतंकवादी' कह रहे हैं, उन पर कई शहरों में मस्जिदों और बैंकों को आग लगाने का आरोप है.

29 दिसंबर को राजधानी तेहरान में प्रदर्शन तब शुरू हुए, जब ईरानी करेंसी की क़ीमत डॉलर के मुक़ाबले तेज़ी से गिर गई. जैसे-जैसे विरोध देश के कई दूसरे शहरों और क़स्बों तक फैला, लोगों के ग़ुस्से के केंद्र में ईरान का धार्मिक नेतृत्व आ गया.

जल्द ही सुरक्षाबलों ने हिंसक दमन शुरू कर दिया. विरोध प्रदर्शन के 11वें दिन यानी 7 जनवरी तक, कम से कम 34 लोगों के मारे जाने की ख़बर थी. लेकिन ऐसा लगता है कि सबसे ज़्यादा रक्तरंजित कार्रवाई पिछले गुरुवार और शुक्रवार को की गई, जब देश के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के शासन को ख़त्म करने की मांग को लेकर हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए.

बीबीसी फ़ारसी को ईरान के भीतर से दर्जनों बयान मिले हैं. ख़तरों की आशंका के बावजूद इस दमन के गवाहों ने बताया कि वे चाहते हैं कि दुनिया को प्रदर्शनकारियों पर हो रही हिंसा के बारे में पता चले.

एक व्यक्ति ने बीबीसी फ़ारसी को कहा, "हमारे मोहल्ले में ख़ून की गंध फैली है, उन्होंने बहुत सारे लोगों को मार डाला है."

एक अन्य ने बताया कि सुरक्षा बल "ज़्यादातर सिर और चेहरे पर निशाना लगा रहे थे."

'18 साल के छात्र को दिल में गोली मार दी'

18 साल के सोरेना गोलगुन विश्वविद्यालय के छात्र थे

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प्रदर्शन देश के सभी 31 प्रांतों में फैल चुके हैं. और जो भी जानकारी धीरे धीरे बाहर आ रही है, उससे पता चल रहा है कि छोटे शहरों और क़स्बों में हो रही मौतें भी बड़े शहरों जितनी ही भयावह हैं.

उत्तर में स्थित 50,000 की आबादी वाले शहर टोनेकाबोन में, शुक्रवार को सोरेना गोलगुन की मौत हो गई. परिवार के एक सदस्य के मुताबिक़ 18 साल का विश्वविद्यालय छात्र सोरेना सुरक्षा बलों के अचानक किए गए हमले से बचकर भाग रहा था, जब उसे "दिल में गोली" मार दी गई.

सोरेना की तरह मारे गए कई और प्रदर्शनकारी युवा थे और बड़े सपने देखते थे. गुरुवार को 23 साल की रोबिना अमीनियन को तेहरान में गोली मार दी गई. वह फ़ैशन डिज़ाइन की छात्रा थीं और उनका सपना मिलान में पढ़ने का था.

उनकी मां पश्चिमी ईरान के शहर केरमानशाह से छह घंटे का सफ़र करके अपनी बेटी का पार्थिव शरीर लेने तेहरान तक पहुंचीं थीं. लौटते समय उन्होंने अपनी प्यारी बेटी को अपनी बांहों में थाम रखा था. लेकिन शहर पहुंचने पर सुरक्षा बलों ने उन्हें मजबूर किया कि वह रोबिना को शहर से बाहर एक सुनसान क़ब्रिस्तान में दफ़ना दें, जहां न परिवार के बाक़ी लोग मौजूद थे, न दोस्त.

मारे गए लोगों में सभी प्रदर्शनकारी नहीं थे. केरमानशाह में 24 साल के नर्स नाविद सालेही गुरुवार को अस्पताल से काम ख़त्म करके बाहर निकले थे उस समय उन्हें कई गोलियां मारी गईं.

'2000 से ज़्यादा शव पड़े थे'

ईरान के सरकारी टीवी ने एक जली हुई बस को दिखाया है और कहा है कि इसे 10 जनवरी को फ़िल्माया गया था

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कई प्रदर्शनकारियों के शव तेहरान के काहरिज़क फ़ॉरेंसिक मेडिकल सेंटर भेजे गए.

वहाँ के हालात कितने भयावह थे यह बताने के लिए सहानंद (जो अपना असली नाम बताना नहीं चाहते) ने लगभग 1,000 किलोमीटर का सफ़र तय किया ताकि वह पड़ोसी देशों के मोबाइल नेटवर्क का इस्तेमाल करके वीडियो फ़ुटेज बाहर भेज सकें. उन्होंने बताया कि शनिवार को उन्होंने वहां ज़मीन पर 2,000 से ज़्यादा शव पड़े देखे थे.

एक बार फिर बीबीसी के पास दावे की पुष्टि के लिए संसाधन नहीं हैं. लेकिन काहरिज़क से आए नए वीडियो में, बीबीसी वेरिफ़ाई और बीबीसी फ़ारसी ने कम से कम एक वीडियो में 186 और दूसरे में 178 शव गिने हैं.

हो सकता है कि दोनों वीडियो में नज़र आ रहे कुछ शव एक ही हों, इसलिए अंतिम संख्या बताना मुश्किल है, लेकिन यह साफ़ है कि असली आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा बड़ा हो सकता है.

पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर बीबीसी फ़ारसी से बात करते हुए एक युवती ने पिछले हफ़्ते की घटनाओं को 'जंग जैसा' क़रार दिया. वह कहती हैं कि प्रदर्शनकारी 'पहली बार इतने एकजुट' थे, लेकिन हिंसा ने उन्हें इतना डरा दिया कि इस हफ़्ते वह देश छोड़कर चली गईं- और भी कई लोगों की तरह, उन्हें डर है कि सरकार जल्द ही नई गिरफ़्तारियों और हत्याओं का एक नया दौर शुरू कर सकती है.

उन्होंने कहा, "मुझे सच में डर लग रहा है कि जो लोग अभी ईरान में हैं, उनके साथ क्या होगा."

अतिरिक्त रिपोर्टिंगः फ़रज़ाद सेयफ़ीकरन और हसन सोल्हजु

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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