ईरान और पाकिस्तान की दुश्मनी की चपेट में क्या भारत भी आएगा?- प्रेस रिव्यू

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इसी सप्ताह ईरान ने पाकिस्तान में मिसाइलों से हमला किया, जिसके बाद पाकिस्तान ने भी पलटवार करते हुए ईरान में मिसाइलें दाग दीं.
हाल के दिनों में लाल सागर में भारतीय जहाज पर हुए हमले के बाद ईरान और पाकिस्तान के एक दूसरे पर हमले ने इस उपमहाद्वीप और खाड़ी की सुरक्षा के आपस में जुड़े होने की बात को सामने ला दिया है.
इंडियन एक्सप्रेस ने अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार सी राजा मोहन के एक विश्लेषण को अख़बार में जगह दी है, जिसमें वो कहते हैं कि लंबे वक़्त से भारतीय उपमहाद्वीप और खाड़ी के बीच की भू-राजनीति आपस में जुड़ी रही है, लेकिन ईरान और पाकिस्तान के इन हमलों के बाद अब ये दोनों क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से एक दूसरे के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएंगे.
इस लेख के अनुसार, चाहें या न चाहें, भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान मध्य-पूर्व में आए इस अस्थिरता के भंवर में और गहराई तक फँस सकते हैं.
उपमहाद्वीप और खाड़ी की सुरक्षा चिंताएं आपस में किस तरह जुड़ी हैं, इस लेख में इसके पाँच कारक गिनवाए गए हैं.
पहला, जहाँ ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान हिस्से में सीमा के पास रहने वाले बलोच समुदाय के लोगों को निशाना बनाया है, वहीं पाकिस्तान ने ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में इसी समुदाय के लोगों को निशाना बनाया है.
ईरान और पाकिस्तान, दोनों से नाराज़गी रखने वाले इस अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े विद्रोही गुट दोनों मुल्कों की सीमा के आरपार फैले हुए हैं. इस हमले ने ये बात सामने ला दी है कि पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा में स्थिरता नहीं है. इसने ईरान और पाकिस्तान दोनों की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है.
दूसरा अहम कारक ये कि ये विद्रोही गुट द्विपक्षीय मुद्दों में तो उलझे हैं ही, बल्कि इस इलाक़े में ताक़त के लिए चल रही अरबों, इसराइलियों और ईरानियों के बीच लड़ाई का भी हिस्सा हैं.
ये इलाक़े, जिनमें से कहीं-कहीं सरकार की पहुंच है तो कुछ स्वायत्त हैं, नशे का कारोबार, तस्करी और किसी तीसरे के समर्थन से सीमा पार आतंकवाद के पनपने के लिए उपजाऊ ज़मीन की तरह बन गए हैं. पाकिस्तान भारत को इस मुद्दे में घसीटता रहता है, वो भारत पर बलोचों से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाता है.
इसराइल हमास जंग से और मुश्किल हुई स्थिति
एक तरफ़ ईरान और उसके अरब पड़ोसियों के बीच तनाव गहरा होता जा रहा है तो दूसरी तरफ़ इसराइल-हमास की जंग ने भी सीमा पार से हस्तक्षेप के लिए मौक़े बना दिए हैं.
सी राजा मोहन तीसरा अहम कारण बलूचिस्तान की भौगोलिक स्थिति को बताते हैं. ये इलाक़ा ओमान की खाड़ी के पास उस जगह पर है, जहां से गुज़रने वाले समुद्री रास्ते से तेल उत्पादक देश अपना सामान दूसरे मुल्कों में भेजते हैं. इसकी स्थिति भू-राजनीतिक तौर पर इसे अहम बनाती है.
बलूचिस्तान में स्थिति को पूरी तरह काबू में रखना पाकिस्तान के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि चीन की मदद से पाकिस्तान के ग्वादर में बन रहा बंदरगाह और सड़क इसी इलाक़े में पड़ता है. ये चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर का हिस्सा है.
ग्वादर के ज़रिए चीन की मौजूदगी खाड़ी देशों के पास होगी और इसके ज़रिए चीन हिंद महासागर और अरब सागर के रास्ते की बजाय सड़क मार्ग से सीधे ओमान की खाड़ी के पास तक सामान पहुंचा सकेगा.
बीते साल सितंबर में पाकिस्तान के लिए अमेरिकी राजदूत डेविड ब्लूम ने ग्वादर का दौरा किया था, जिसके बाद से ही ये चर्चा छिड़ गई थी कि चीन और अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वार में बलूचिस्तान के इस इलाक़े की अपनी अलग अहमियत होगी.
चौथा कारक वो अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के बीच के रिश्तों को बताते हैं. वो लिखते हैं कि दोनों के बीच तनाव हमेशा रहा है, जो अफ़ग़ानिस्तान तालिबान के एक बार फिर सत्ता में आने से बढ़ गया है.
दोनों के बीच धार्मिक विचारधारा, अल्पसंख्यकों के हक़, सीमा पर नियंत्रण, सीमा पार जा रही नदियों से जल के बँटवारे जैसे मुद्दे हमेशा से रहे हैं.
अब तक तालिबान सरकार पाकिस्तान के साथ बातचीत करने में इच्छुक दिखी है लेकिन वो दृढ़ भी दिखी है. अगर वो खाड़ी में अपने पैर पसार कर, अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए वहां नए दोस्त बनाने की कोशिश करे तो इसमें आश्चर्य नहीं होगा.

भारत के लिए क्यों अहम हे ये इलाक़ा
सी राजा मोहन के अनुसार, इस पूरे मामले में पांचवा कारक खुद बलूचिस्तान का पूरा इलाक़ा है जो खाड़ी देशों और दक्षिण एशिया के बीच अहम कड़ी का काम करता है. इस इलाक़े में चीन की मौजूदगी भारत के लिए चिंता का विषय है.
वो लिखते हैं कि पारंपरिक तौर पर भारत यहां दो पक्षों से जुड़े मामलों में तटस्थ रहने की कोशिश करता रहा है लेकिन वक्त के साथ मध्य-पूर्व में भारत के आर्थिक और सुरक्षा लिहाज से हिस्सेदारी बढ़ी है, ऐसे में वो हमेशा तटस्थ रहने का रुख़ नहीं अपना सकेगा.
इसका एक उदाहरण इस बात से मिलता है कि हाल के दिनों में जब लाल सागर और अरब सागर में समुद्री मार्ग पर हूती विद्रोहियों के हमले हुए तो भारत ने अपने जहाज़ों की सुरक्षा के लिए अपने युद्धपोत अरब सागर में तैनात किए.
मध्य-पूर्व के लिए भारत की नीति में भी हाल के वक्त में बदलाव आया है, इसराइल उसका अहम मित्र बना है, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ उसके रिश्ते पहले से गहरे हुए हैं. साथ ही उसने आतंकवाद के विरोध को लेकर भी स्प्ष्ट रुख़ अपनाया है.
उपनिवेशवाद के दौर में ये अविभाजित उपमहाद्वीप खाड़ी में सुरक्षा और राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता था. लेकिन आज़ादी के बाद से दशकों में स्थितियां बदली हैं और इस इलाक़े में पाकिस्तान की हिस्सेदारी बढ़ी है. लेकिन पाकिस्तान अगर कमज़ोर हुआ तो वो खाड़ी में बढ़ रहे संघर्ष में खिंचता चला जाएगा. इसका सीधा असर भारत पर पड़ना तय है.
पाकिस्तान और ईरान का एक-दूसरे के इलाक़ों में हमला करना, इस पूरे इलाक़े के बदलते हालात की तरफ इशारा है. ऐसे में मध्य-पूर्व में सुरक्षा को लेकर भारत को भी पहले के अपने रुख़ को बदलने की ज़रूरत पड़ सकती है.

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जेल से क़ैदियों की रिहाई को लेकर दिल्ली के उपराज्यपाल का अहम फ़ैसला
दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने दिल्ली प्रिज़न रूल्स 2018 में अहम संशोधन को मंज़ूरी दे दी है जिसके बाद अब दिल्ली की जेलों में बंद वो क़ैदी जिसकी उम्र 70 साल से अधिक है और जिन्होंने अपनी सज़ा का आधे से अधिक हिस्सा जेल में काट लिया है, उन्हें समय से पहले रिहा किया जा सकेगा.
हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक ख़बर के अनुसार इस संशोधन का उद्देश्य दिल्ली की जेलों (तिहाड़, मंडोली और रोहिणी जेल) में कैदियों की संख्या कम करना है. इन जेलों की कुल क्षमता लगभग 10 हज़ार है लेकिन इनमें इससे दोगुना यानी 20 हज़ार से अधिक कै़दी बंद हैं.
अख़बार के अनुसार बीमारी के जूझ रहे कैदी या वो कैदी जो अपना दैनिक काम भी खुद ठीक से नहीं कर पाते उन्हें इसके तहत रिहा किया जा सकता है.
हालांकि मौत की सज़ा पाए क़ैदी, राजद्रोह, आतंकवाद या पोक्सो के तहत जिन्हें सज़ा मिली है उन्हें इस संशोधन का लाभ नहीं मिलेगा.
रिपोर्ट के अनुसार इसके लिए एक मूल्यांकन कमिटी बनाई जाएगी जो ये तय करेगी कि कौन रिहा किए जाने योग्य हैं और कौन नहीं.
मूल्यांकन कमिटी की सिफारिश पर 70 साल से अधिक की उम्र के कैदी या खुद का काम न कर पाने पाले कैदियों को सज़ा पूरी होने से पहले भी रिहा किया जा सकता है. हालांकि इसके लिए मेडिकल बोर्ड की सिफारिश चाहिए होगी.
इस मूल्यांकन कमिटी में डीआईजी रैंक के अधिकारी, सुपरिन्टेन्डेंट, जेल के रेज़िडेन्ट मेडिकल ऑफ़िसर शामिल होंगे. इसके अलावा दो और डॉक्टर शामिल होंगे जिन्हें डीजी (प्रिज़न) नामांकित करेंगे.
रिपोर्ट के अनुसार ज़रूरत पड़ने पर डीजी (प्रिज़न) किसी मामले में एम्स के डॉक्टरों की सलाह भी ले सकते हैं.
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कोचिंग सेंटर में 16 साल से कम उम्र के बच्चों को नहीं मिलेगा दाखिला
देश के शिक्षा मंत्रालय ने बच्चों की पढ़ाई को लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए हैं जिसने अनुसार अब कोचिंग सेंटर 16 साल से कम उम्र के छात्रों को दाखिला नहीं दे सकेंगे.
अख़बार बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार अब कोचिंग सेंटर छात्रों से अच्छे नंबर या रैंक दिलाने की गारंटी जैसे भ्रामक वादे भी नहीं कर सकेंगे.
अख़बार लिखता है कि देश में बेतरतीब तरीक़े से निजी कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संख्या को देखते हुए उनके नियमन के लिए और उन्हें क़ानूनी ढांचे में लाने के लिए सरकार ने ये दिशानिर्देश जारी किए हैं.
हाल में छात्रों में आत्महत्या के मामले बढ़े हैं, कोचिंग सेंटर में आग लगने जैसी घटनाएं सामने आई हैं जिससे कोचिंग सेंटर और छात्रों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है. साथ ही कोचिंग सेंटर के पढ़ाने के तरीकों को लेकर भी शिकायतें की जा रही थीं.
दिशानिर्देशों में कहा गया है कि, "कोई भी कोचिंग सेंटर ऐसे टीचरों को नियुक्त नहीं करेगा जिनकी योग्यता ग्रैजुएशन से कम हो. कोचिंग संस्थान अच्छा रैंक दिलाने जैसे भ्रामक वादे छात्रों के अभिभावकों से नहीं कर सकते. 16 साल से कम की उम्र के बच्चों को कोचिंग सेंटर दाखिला नहीं दे सकते. सेकंडरी स्कूल की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद ही कोचिंग सेंटर छात्रों का दाखिला ले सकेंगे."
अख़बार के अनुसार दिशानिर्देशों में कहा गया है, "कोचिंग सेंटर पढ़ाई की क्वालिटी या सेंटर में सुविधाओं से जुड़े भ्रामक दावे न तो प्रत्यक्ष तौर पर और न ही परोक्ष तौर पर करेंगे."
इसके अलावा दिशानिर्देशों में ये भी कहा गया है कि कोचिंग सेंटर किसी भी ऐसे टीचर या व्यक्ति की सेवाएं नहीं ले सकते, जो नैतिक तौर पर भ्रष्टाचार से किसी भी अपराध के लिए दोषी करार दिए गए हों.
इसके अलावा कोचिंग सेटर को अपने टीचरों की योग्यता, कोर्स के बारे में पूरी जानकारी, पाठ्यक्रम की अवधि, होस्टल की सुविधा, फीस की जानकारी वेबसाइट पर अपलोड करनी होगी.
साथ ही ये भी कहा गया है कि कोई भी कोचिंग संस्थान तब तक पंजीकृत नहीं होगा जब तक कि वो इन दिशानिर्देशों को पूरा नहीं करेगा.
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