ग़ज़ा के वे धार्मिक स्थल जो इसराइली बमबारी में तबाह हो गए, बीबीसी ने पड़ताल में क्या पाया

- Author, रेहा कांसारा और अहमद नूर
- पदनाम, डब्ल्यूएस ग्लोबल रिलीजन रिपोर्टर और बीबीसी मॉनिटरिंग
ग़ज़ा में दुनिया के कुछ सबसे पुराने गिरजाघर और मस्जिदें हैं, लेकिन इसराइली सैन्य अभियान के दौरान व्यापक तबाही से इनमें से कई इमारतें बच नहीं पाईं.
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस बीते अक्टूबर में शुरू हुई जंग के बाद से क्षतिग्रस्त या पूरी तरह नष्ट हो गए धार्मिक स्थलों की संख्या की पुष्टि कर रहा है.
स्थानीय रिपोर्टों, सोशल मीडिया से मिली जानकारी और सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल करते हुए हमने 117 धार्मिक स्थलों की गिनती की है, जिन्हें सात अक्टूबर से 31 दिसम्बर के बीच क्षतिग्रस्त या नष्ट बताया गया था.
इनमें से 72 मस्जिदों और दो चर्च के आंशिक या पूरी तरह नष्ट होने की हम पुष्टि कर पाए हैं हालांकि हमास के आंकड़ों के अनुसार यह संख्या बहुत अधिक है.
हमने जिन स्थलों की गिनती की है उनको हुए नुकसान की पुष्टि करने की सीमाएं भी हैं. सैटेलाइट तस्वीरों में आंशिक क्षति की बजाय धार्मिक इमारतों की पूरी तबाही दिखती है और कुछ मामलों में तो साक्ष्य की कमी के चलते हमारे निष्कर्ष अधूरे ही रहे.
हमास ने एक बयान में कहा है कि जबसे युद्ध शुरू हुआ है, तबसे 378 मस्जिदें और तीन चर्च को निशाना बनाया गया है.
बयान के अनुसार, “ऐसा पहली बार नहीं है कि इसराइली कब्ज़ाधारियों ने मस्जिदों को बमबारी और तबाही का निशाना बनाया है, बल्कि यह अबतक सबसे अधिक हिंसक है.”
इसराइल डिफ़ेंस फ़ोर्सेस (आईडीएफ़) का कहना है कि हमास के लड़ाके धार्मिक स्थलों को छिपने और हमले करने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
चर्च पर हमले

दुनिया के सबसे पुराने गिरजाघरों में माने जाने वाले सेंट पोर्फिरियस चर्च, ग़ज़ा पट्टी में मौजूद कुछ चंद चर्चों में से एक है. पांचवीं सदी के बिशप की कब्र इसी के नीचे है और उन्हीं के नाम पर इसका नाम रखा गया है.
ग़ज़ा में ईसाई आबादी बहुत छोटी है और जंग शुरू होने से पहले उनकी संख्या क़रीब 1,000 थी, जिनका चर्च के आसपास की ज़मीन से बहुत मज़बूत रिश्ता है.
अन्य फ़लस्तीनी ईसाइयों की तरह मैरियन सबा और उनके परिवार ने भी युद्ध की वजह से चर्च को सुरक्षित मानते हुए वहां शरण ले रखी थी.
लेकिन 19 अक्टूबर को जैसे ही रात घिरी, चर्च की एक बाहरी इमारत पर इसराइली मिसाइल गिरी. इसमें 18 लोग मारे गए और कई घायल हो गए.
मैरियन ने कहा कि 34 साल के उनके बहनोई सोलिमन इस हमले में एक गिरती दीवार से अपने बेटे को बचाने के दौरान मारे गए.
वह कहती हैं, “यह बहुत भयानक दृश्य था. मैंने पहले किसी को मरते हुए नहीं देखा था. मैं नहीं जानती क्या कहूं. उनकी तुरंत ही मौत हो गई थी.”
जिस समय धमाका हुआ रामी तराज़ी, चर्च के एक हॉल में मौजूद थे, “यह रॉकेट मिसाइल इतना बड़ा था कि जो लोग अन्य हॉल में मौजूद थे, वे भी सफेद धूल में लिपटे निकले.”
वह याद करते हैं, “हमने 16 लोगों को टुकड़ों में मलबे से बाहर निकाला जबकि दो की साबुत लाश मिली.” इन मरने वालों में रामी के 36 साल के चचेरे भाई भी थे. रामी के अनुसार, ‘एक घंटे पहले तक वह मेरे साथ बात कर रहे थे और ठहाके लगा रहे थे.’
इसराइली सेना ने अपने एक हमले में चर्च के एक हिस्से के नुकसान होने के बारे में पुष्टि की है लेकिन उसका कहना है कि पास में हमास के एक मिलिटरी कमांड सेंटर पर हमला किया गया था.

अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के अनुसार, संघर्ष के दौरान धार्मिक इमारतों को जानबूझकर निशाना बनाना युद्ध अपराध है. हालांकि अगर ऐसी जगहों का सैन्य इस्तेमाल किया जा रहा है तो इस क़ानून में छूट भी दी गई है.
इसराइली सेना ने सोशल मीडिया पर जो वीडियो अपलोड किए हैं, उसमें दिखता है कि जिन धार्मिक इमारतों को निशाना बनाया गया है उसमें सैनिक प्रवेश कर रहे हैं और भूमिगत सुरंगों को दिखा रहे हैं. उनका दावा है कि हमास इन सुरंगों का इस्तेमाल करता है.
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कुछ वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे हैं जिसमें दिखता है कि इसराइली सैनिक धार्मिक स्थलों का अनादर कर रहे हैं और तबाही का जश्न मना रहे हैं.
सोशल मीडिया पर एक तस्वीर है जिसमें एक गिरी हुई मीनार के सामने एक इसराइली सैनिक को तस्वीर खिंचवाते हुए दिखाया गया है, जिसकी दीवार पर हिब्रू में लिखा है, “मंदिर का निर्माण और अच्छे से होगा.”
बीबीसी ने आईडीएफ़ से इस तस्वीर के बारे में पूछा तो उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की.
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में इंस्टीट्यूट ऑफ़ आर्कियोलॉजी के प्रोफ़ेसर जॉर्जिया एंड्र्यू ग़ज़ा पट्टी में धरोहर स्थलों के विनाश पर क़रीबी से नज़र रखे हुए हैं. वह कहती हैं कि इनमें से कई पवित्र स्थलों का ऐतिहासिक महत्व है.
वह कहती हैं, “इन स्थलों से लोगों के जो संबंध विकसित हुए हैं, उसे ख़त्म करने का एक व्यापक प्रयास के रूप में इन हमलों को देखा जाना चाहिए.” उन्होंने कहा, “ग़ज़ा में पवित्र और धरोहर स्थलों की तबाही ऐसी है, जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था.”
ग़ज़ा में मस्जिदें ज़मींदोज़

ग़ज़ा में कई मस्जिदें तबाह की जा चुकी हैं और शायद यही वजह है कि चर्च में शरण लिए जाने से उलट फ़लस्तीनी मुसलमान अपने धार्मिक स्थलों से दूर शरण लेना चाह रहे हैं.
ख़ान यूनिस में ख़लील अल-रहमान मस्जिद की क्षति का हमने सत्यापन किया है, जिसके बारे में कहा गया था कि हवाई हमले में यह क्षतिग्रस्त हुआ है.
एक नमाज़ी मुस्लिम के तौर पर रेनाद अला अल-बाटा अक्सर इस मस्जिद में जाती थीं और क़ुरान पढ़ती थीं. लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद से वह वहां नहीं गईं.
वह कहती हैं, “पहले इसराइली सेना तब तक मस्जिदों को निशाना नहीं बनाती थी जबतक कि कथित रूप से चरमपंथी टार्गेट न हों, लेकिन इस बार उन्होंने कई ख़ूबसूरत मस्जिदों को नष्ट कर दिया जिन्होंने हमें पाला पोसा और हमारे धर्म के बारे में शिक्षित किया.”

वह कहती हैं कि नवंबर में एक सप्ताह लंबे संघर्ष विराम के दौरान, मुअज़्ज़िन (अज़ान देने वाला) ने एक अस्थायी मीनार बनाई और ख़लील अल-रहमान मस्जिद का जो कुछ बचा था उसके ऊपर से दिन में पांच बार अज़ान देना शुरू किया.
उन्होंने कहा कि इससे उनमें सुरक्षा का अहसास पैदा हुआ लेकिन यह थोड़े दिन तक रहा और हमास के ख़िलाफ़ इसराइल ने फिर से लड़ाई शुरू कर दी.
तबाही की सबसे हिला देने वाली तस्वीरें ख़ान यूनिस के एक वीडियो की हैं, जिसमें दिखता है कि ख़ालिद बिन अल-वालिद मस्जिद पल भर में ज़मींदोज़ हो गई. इसे एक्स पर 1.5 करोड़ बार देखा गया.
बीबीसी के लिए वीपन एनालिस्ट क्रिस पार्ट्रिज के अनुसार, वीडियो में दिखता है कि मस्जिद पर प्रिसीज़न गाइडेड बम से निशाना साधा गया था जिसे विमान से दागा गया था. निशाने की सटीकता को देखते हुए हथियार के चुनाव का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
हालांकि ये साफ़ नहीं है कि हमारे द्वारा पुष्टि किए गए धार्मिक स्थलों में कितने इसराइली सेना द्वारा नष्ट किये गए हैं या इनमें से कितने हमास द्वारा इस्तेमाल किए जाते रहे हैं.
हालांकि इसराइली सेना का कहना है कि वह हमास की सैन्य और प्रशासनिक क्षमता को नष्ट करने के लिए अंतरारष्ट्रीय क़ानूनों के अनुसार काम कर रही है और नागरिक नुकसान को कम करने के लिए पर्याप्त एहतियात बरत रही है.
ख़ालिद बिन अल-वलीद मस्जिद और ख़लील अल-रहमान मस्जिद की तबाही पर आईडीएफ़ ने कोई टिप्पणी नहीं की है.

ग़ज़ा के अधिकांश धार्मिक स्थलों की तबाही के बीच, मौत से बचने के लिए भाग रहे अधिकांश फ़लस्तीनियों के लिए धार्मिक विश्वास एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच बन चुका है.
मैरियन सबा और उनका परिवार अभी भी सेंट पोर्फिरियस चर्च में 300 लोगो के साथ शरण लिए हुए हैं और रविवार को साप्ताहिक सामूहिक प्रार्थना में शामिल होता है.
इस पर हुए हमले के नौ दिन बाद उनकी बेटी का बपतिस्मा हुआ. उन्होंने इसे दुख के बीच खुशी का पल बताया. जो खुशी का मौका होना चाहिए, उस पर ये चिंता छा गई कि उनकी बच्ची भी मारी जा सकती है.
रफ़ाह में विस्थापित फ़लस्तीनियों के लिए बने कैंप में रह रही रेनाद आला अल-बाटा ख़ान यूनिस के अपने घर और मस्जिद से बहुत दूर हैं.
इंस्टाग्राम ही अब उनकी डायरी है और जब अपनी पुरानी तस्वीरें पोस्ट करती हैं, जिसमें उनके छात्र जीवन की तस्वीरें भी शामिल होती हैं, तो बीते दिन का एक नॉस्टैल्जिया सा होता है.
लेकिन वह कहती हैं कि क़ुरान रोज़ पढ़ती हैं और यहीं से उन्हें सांत्वना मिलती है, “यह रात के बोझ को कम करता है. काश आपको पता हो कि ग़ज़ा की रातें कितनी मुश्किल होती हैं.”
अतिरिक्त रिपोर्टिंगः मेहदी मुसावी
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