ग़ज़ा: सदियों से आबाद एक शहर जिसने सहे हैं कई सितम

फ़्रांसिस फ्रीथ ने ग़ज़ा शहर की ये तस्वीर वर्ष 1858 में खींची थी

इमेज स्रोत, Sepia Times/Universal Images Group via Getty Images

इमेज कैप्शन, फ़्रांसिस फ्रीथ ने ग़ज़ा शहर की ये तस्वीर वर्ष 1858 में खींची थी
    • Author, ओमेमा अल-शाज़ली
    • पदनाम, बीबीसी अरबी सेवा, काहिरा (मिस्र से)

"इतिहास के सबसे पुराने शहरों में से एक… ये किसी एक सदी या एक युग का शहर नहीं है बल्कि तमाम पीढ़ियों का चश्मदीद है.. और सभी बीते युगों का हमराज़ है. जिस दिन से इतिहास दर्ज होना शुरू हुआ, ये तभी से मौजूद है."

इन शब्दों के साथ, यरूशलम के फ़लस्तीनी इतिहासकार आरिफ़ अल-आरिफ़ ने 1943 में प्रकाशित एक किताब में ग़ज़ा शहर का जिक्र किया था.

इस किताब में उन्होंने अरबी, अंग्रेजी, फ्रेंच और तुर्की साहित्य में जो कुछ इस तटीय शहर के बारे लिखा गया है, उसका एक सारांश संजोया था.

साल 1907 में छपी अमेरिकी रब्बी मार्टिन मेयर की ग़ज़ा के बारे में किताब में अमेरिकी ओरिएंटलिस्ट रिचर्ड गोथिल ने लिखा था कि ये "इतिहास के अध्ययन में रुचि रखने वालों के लिए एक रोमांचक शहर है."

गॉथिल ने इसके रणनीतिक महत्व को समझाते हुए लिखा था, "ग़ज़ा उन कारवां के लिए एक मिलन स्थल रहा है जो दक्षिणी अरब और सुदूर पूर्व से भूमध्य सागर तक सामान पहुंचाते थे. ये शहर चीज़ों को सीरिया, एशिया माइनर (तुर्की) और यूरोप तक पहुंचाने का केंद्र भी था. ये शहर फ़लस्तीन और मिस्र के बीच की कड़ी है."

ग़ज़ा शहर के तीन नाम

ग़ज़ा

यह दिलचस्प है कि 13 वीं सदी के लेखक और ट्रैवलर याक़ूत अल-हमावी के विश्वकोश 'किताब मुजम अल-बुलदान' (डिक्शनरी ऑफ कंट्रीज़) में इस इलाक़े में ग़ज़ा नाम से जाने जाने वाले तीन शहरों का उल्लेख है.

पहला नाम था जज़ीरा अल-अरब. इस शहर के बारे में अरबी के मशहूर कवि अल-अख़्तल अल-तग़लीबी ने एक कविता भी लिखी थी.

अल-हमावी इसका दूसरा नाम 'इफ्रिकिया' बताते हैं, जो ट्यूनीशिया का भी पुराना नाम है. अल-हमावी का कहना है कि इसके और काहिरा के बीच तीन दिन की यात्रा करनी पड़ती है.

अल-हमावी ग़ज़ा का वर्णन करते हुए लिखते हैं, "मिस्र की दिशा में लेवंत के सबसे दूर के हिस्से में एक शहर के रूप में बसा है ग़ज़ा. ये शहर अश्कलोन के पश्चिम में फ़लस्तीन इलाक़े में पड़ता है."

1898 में ग़ज़ा शहर

इमेज स्रोत, Sepia Times/Universal Images Group via Getty Images

इमेज कैप्शन, 1898 में ग़ज़ा शहर

प्राचीन काल से ही अरब जगत इसे ग़ज़ा कहता आया है. इस्लामी युग में इसे पैगंबर मोहम्मद के दादा 'हाशिम बिन अब्द मनाफ़' के संदर्भ में 'हाशेम का ग़ज़ा' कहा जाता था. उनकी मृत्यु वहीं हुई थी.

इसी जगह प्रसिद्ध इस्लामिक स्कॉलर और लेखक इमाम अल-शफ़ीई का जन्म हुआ था.

हिब्रू भाषा में इसे 'अज़ा' कहा जाता है क्योंकि हिब्रू में इसे अरबी के अक्षर 'ग़ैन' (ग़) के बजाय 'ऐन' (अ) या 'हमज़ा' से लिखा जाता है.

अल-आरिफ़ ने अपनी किताब 'द हिस्ट्री ऑफ़ ग़ज़ा' में लिखा है कि इसे कुछ समुदाय 'हज़ाती' कहा करते थे, जबकि प्राचीन मिस्रवासियों ने इसे 'ग़ज़ातु' या 'गदातु' कहा.

ग्रीक शब्दकोश में भी इस बात का उल्लेख है कि ग़ज़ा को हर युग में अलग-अलग नाम दिए गए थे. इन नामों में 'आयनी', 'मिनोआ', और 'कॉन्स्टेंटिया' शामिल थे.

ग़ज़ा का अर्थ

मानचित्र

इमेज स्रोत, GAZA HISTORY BOOK

इमेज कैप्शन, ये मानचित्र (दाईं ओर) वर्ष 1943 में प्रकाशित पुस्तक द हिस्ट्री ऑफ़ ग़ज़ा में छपा है.

चौथी सदी में वर्तमान इसराइल के क़ैसरिया इलाक़े में जन्में ईसाई थियोलॉजियन यूसेबियस ने ग़ज़ा का अर्थ गर्व और शक्ति बताया था.

मशहूर स्कॉटिश लेग्सिकोग्राफ़र (शब्दकोश का लेखन करनेवाला व्यक्ति) सर विलियम स्मिथ ने 1863 में प्रकाशित अपनी 'डिक्शनरी ऑफ द ओल्ड टेस्टामेंट' में भी ग़ज़ा का ज़िक्र है.

साल 1910 में प्रकाशित 'डिक्शनरी ऑफ़ द न्यू टेस्टामेंट' के लेखक सोफ्रोनियस ने कहा था कि 'ग़ज़ा' एक फ़ारसी शब्द है, जिसका अर्थ है शाही ख़ज़ाना. लेकिन कई इस शब्द का उत्पति ग्रीक भाषा से मानते हैं. ग्रीक में इसका अर्थ धन या ख़ज़ाना. कई मायनों में फ़ारसी और ग्रीक में ग़ज़ा का अर्थ करीबी मामला है.

ऐसा कहा जाता है कि एक ईरान के एक राजा ने ग़ज़ा में अपना धन छिपा दिया था. उसके बाद राजा ईरान लौट गया था.

बताया जाता है कि ये घटना रोमन युग के दौरान हुई थी.

याक़ूत अल-हमावी ने ये भी उल्लेख किया कि 'ग़ज़ा' टायर नाम के व्यक्ति की पत्नी का नाम था. इन्ही के नाम पर फ़ीनीशियन शहर टायर का निर्माण किया था. टायर इस वक्त लेबनान में स्थित है.

ग़ज़ा का निर्माण किसने किया?

ग़ज़ा

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ये पेंटिंग विक्टर गोरिन ने 1875 में बनाई थी. इसके बैकग्राउंड में ग़ज़ा शहर को देखा जा सकता है.

अंग्रेजी पुरातत्वविद्, सर फ्लिंडर्स पेट्री को मिस्र और उसके आस-पास की आर्कियोलॉजी का माहिर माना जाता है.

उन्होंने कहा था कि प्राचीन ग़ज़ा की स्थापना ईसा से तीन हज़ार साल पहले 'हिल अल-अजवाल' नामक पहाड़ी पर हुई थी. उनके मुताबिक उस दौरान एक आक्रमण के कारण इसके निवासियों ने शहर छोड़ दिया था.

आक्रमण के कारण शहर से उजड़े लोग तीन मील दूर जाकर बस गए और नए ग़ज़ा शहर की स्थापना की.

वर्तमान ग़ज़ा उसी स्थान पर मौजूद है. माना जाता है कि ये हमला मिस्र की हिक्सोस वंश के कार्यकाल के दौरान हुआ था. हिक्सोस वंश ने मिस्र पर ईसा पूर्व 1638-1530 तक 108 साल राज किया था.

माना जाता है कि इस दौरान ग़ज़ा पर इसी वंश का नियंत्रण रहा होगा.

प्राचीन ग़ज़ा

19वीं सदी में ग़ज़ा शहर

इमेज स्रोत, Universal History Archive/Universal Images Group via Getty Images

इमेज कैप्शन, 19वीं सदी में ग़ज़ा शहर

लेकिन कुछ लोग हैं जो इस कहानी को खारिज करते हैं और कहते हैं कि ग़ज़ा आज भी अपने उसी प्राचीन स्थान पर है, जहां पहली बार आबाद हुआ था.

इस विचार के अनुसार, 'ताल अल-अजौल' ग़ज़ा की वाणिज्यिक बंदरगाह थी. कुछ लोगों का मानना है कि प्राचीन ग़ज़ा को सिकंदर महान ने नष्ट कर दिया था और आधुनिक ग़ज़ा दूसरे स्थान पर बसा, जैसा कि सर पेट्री का भी मत है.

अल-आरिफ़ ने अपनी किताब में लिखा है कि ग़ज़ा शहर को मेनाइट्स कबीले ने बसाया था. मेनाइट्स लोगों को अरब जगत के सबसे पुराने बाशिंदे माना जाता है. इन लोगों ने 1000 ईसा पूर्व सभ्यता का झंडा उठाया था.

अल-आरिफ़ के मुताबिक ग़ज़ा शहर को एक केंद्र के रूप में स्थापित करने का श्रेय इन्हीं लोगों को जाता है.

अरबों के लिए ग़ज़ा का महत्व इस तथ्य से भी था कि ये मिस्र और भारत के बीच एक अहम व्यापारिक कड़ी थी. ये शहर लाल सागर में नेविगेशन की तुलना में उनके लिए सबसे अच्छा व्यापार मार्ग था.

अरब जगत और भारत

साल 1886 में बनी ये पेंटिंग ईसा पूर्व 312 में हुई 'ग़ज़ा की लड़ाई' का चित्रण करती है

इमेज स्रोत, bildagentur-online/uig via getty images

इमेज कैप्शन, साल 1886 में बनी ये पेंटिंग ईसा पूर्व 312 में हुई 'ग़ज़ा की लड़ाई' का चित्रण करती है

इस क्षेत्र में व्यापार अरब प्रायद्वीप के दक्षिण में यमन में शुरू हुआ. वहां अरब जगत और भारत के बीच व्यापार कभी ख़ूब फल-फूलता था.

यमन के बाद व्यापार का ये रूट दो शाखाओं में विभाजित होने से पहले उत्तर में मक्का, मदीना और पेट्रा तक चला गया.

दूसरी शाखा ताइम, दमिश्क और पालमायरा की रेगिस्तानी सड़क के रास्ते भूमध्य सागर पर स्थित ग़ज़ा पहुँची.

कुछ इतिहासकारों का निष्कर्ष है कि मेएन और शीबा साम्राज्य ग़ज़ा शहर की स्थापना करने वाले पहले अरब शासक थे.

अल-आरिफ़ के अनुसार, एविइट्स और अनाकिट्स ग़ज़ा में बसने वाले पहले दो लोग थे. इन्हें प्राचीन फ़लस्तीनी भी कहा जाता है और इनका उल्लेख ओल्ड टेस्टामेंट की किताबों में किया गया है.

मान्यता ये भी है कि पैगंबर इब्राहिम के वंशज डायनाइट्स और एडोमाइट्स जो दक्षिणी जॉर्डन की एक बद्दू जनजाति थी, वो भी ग़ज़ा में बसे थे.

कनानी सभ्यता के लोग

पुराने ग़ज़ा शहर में एक पुरातन चर्च
इमेज कैप्शन, पुराने ग़ज़ा शहर में एक पुरातन चर्च

पुस्तक 'द हिस्ट्री ऑफ ग़ज़ा' में उल्लेख किया गया है कि बुक ऑफ़ जेनेसिस (हिब्रू बाइबल और ईसाइयों की ओल्ड टेस्टामेंट की पहली किताब) के मुताबिक ग़जा दुनिया के प्राचीन शहरों में से एक है.

बुक ऑफ़ जेनेसिस के अनुसार, इसमें नोआ के पुत्र हाम के वंशज कनानी सभ्यता के लोगों ने बसाया था. लेकिन एक अन्य उल्लेख में कहा गया है कनानी लोगों ने इसे एमोरियों जनजाति से जीता था.

ट्यूनिशिया में 14वीं सदी में जन्मे इतिहासकार इब्न ख़ल्दून के मुताबिक कनानी लोग अरब ही थे जो अपने वंश को अमालेकिया जनजाति से जोड़ते थे.

लेकिन कुछ का मानना ​​है कि कनानी लोग दरअसल फ़ारस की खाड़ी से आए थे. इतिहासकारों का अनुमान है कि वे 5,000 साल पहले इस क्षेत्र में रहते थे.

ब्रितानी पुरात्तवविद् सर पेट्री का मानना ​​है कि शहर की दीवार के जिस बड़े हिस्से में अवशेष पाए गए थे, उन्हें कनानियों के युग के दौरान बनाया गया था. वहां खुदाई करने वालों को कनानियों के बाद इस आकार के विशाल पत्थर दोबारा नहीं मिले.

वर्णमाला का अविष्कारक

ग़ज़ा शहर, साल 1839

इमेज स्रोत, Sepia Times/ Universal Images Group via Getty Images

इमेज कैप्शन, ग़ज़ा शहर, साल 1839

ग़ज़ा पट्टी के तेल अल-अजुल शहर के दक्षिणी छोर पर एक कनानी शहर के खंडहर भी पाए गए, जो जाहिर तौर पर मिस्र के हिक्सोस वंश के कब्जे में था. वहाँ कब्रें भी मिलीं हैं. इन्हीं में से कुछ 4000 वर्ष ईसा पूर्व में कांस्य युग बताई जाती हैं.

अल-आरिफ़ का कहना है कि कनानी लोग ग़ज़ा के इलाक़े में जैतून की खेती करते थे. इन लोगों का कारोबार मिट्टी के बर्तनों से लेकर खनन तक फैला हुआ था.

कनानी सभ्यता को ही वर्णमाला का अविष्कारक माना जाता है. कहा जाता है कि यहूदियों ने इन्हीं लोगों के कई कानून और सिंद्धात अपनाए थे.

इतिहास में ग़ज़ा पर मिस्र, बेबीलोन, असिरियन, यूनानी, ईरानी और रोमन साम्राज्य ने राज किया है. फ़लस्तीनी इतिहासकार आरिफ़ अल-आरिफ़ ने ग़ज़ा के इतिहास को "गौरवशाली" बताया है.

वे इसका कारण कुछ यूँ बताते हैं, "ग़ज़ा ने अपने जीवनकाल में हर तरह की आपदाओं और ख़तरनाक स्थितियों का सामना किया है. या तो इस पर हमला करने वाले ने मात खाई या वो ख़ुद यहां से उखड़ गया. इस मिसाल का कोई अपवाद नहीं."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)