इसराइल-हमास संघर्ष: क्या ज़मीनी हमले के लिए तय मक़सद हासिल कर पाएंगे नेतन्याहू?

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- Author, पॉल किर्बी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
इसराइल ने एलान किया है कि हमास का दुनिया से ख़ात्मा हो जाएगा और ग़ज़ा कभी भी पहले जैसा नहीं रहेगा.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने हमास के ख़िलाफ़ ‘जंग’ का एलान किया और कहा, “हमास का हर सदस्य मारा जाएगा.”
हमास ने बीती सात अक्टूबर को इसराइल पर हमला किया था. इसमें करीब 1400 लोग मारे गए थे.
नेतन्याहू ने दावा किया कि हमास की ‘टेरर मशीन’ और राजनीतिक ढांचे को मटियामेट कर दिया जाएगा.
इसराइल ने कहा है कि वो ग़ज़ा में ज़मीनी अभियान को विस्तार दे रहा है. ये माना जा रहा है कि इसराइल अपने मक़सद को हासिल करने के लिए सीमा पार जा सकता है. इसराइल का जो जाहिरा मक़सद है, उसके मुताबिक एक बार ये संतुष्टि होने पर कि हमास की हार हो गई है, वो ग़ज़ा से पूरी तरह अलग हो जाएगा.
इसराइल के रक्षा मंत्री योआव गैलेंट ने वहां ‘नए सिक्यूरिटी तंत्र’ की बात है और तब रोज़मर्रा की ज़िंदगी को लेकर इसराइल की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी.

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सेना को मिली ज़िम्मेदारी
इसराइल ने अपने अभियान को नाम दिया है ‘ऑपरेशन सॉर्ड्स ऑफ़ आयरन’. इसका मक़सद इसराइल की सेना की ओर से ग़ज़ा में चलाए गए पहले के किसी भी अभियान से कहीं ज़्यादा महत्वाकांक्षी लगता है. ये कई महीने तक चल सकता है.
लेकिन क्या ये मक़सद वास्तविक है और इसे इसराइल के कमांडर कैसे पूरा कर सकते हैं?
ग़ज़ा पट्टी में दाखिल होने के अभियान में शहरी इलाके में घर-घर में होने वाला संघर्ष शामिल है. ये यहां की 20 लाख से अधिक की आबादी को बड़े जोखिम में डाल सकता है. ग़ज़ा पर हमास की हुकूमत है और उसके अधिकारी बताते हैं कि अब तक आठ हज़ार से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा है.
इसराइल डिफेंस फोर्सेज़ (आईडीएफ़) के जिम्मे एक और काम है. उन्हें इसराइल के 230 बंधकों को भी छुड़ाना है जिन्हें ग़ज़ा में किसी अज्ञात ठिकाने पर रखा गया है.

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हमास का ख़ात्मा मुमकिन?
इसराइल आर्मी रेडियो के सैन्य विश्लेषक आमिर बार शलोम कहते हैं, “मुझे नहीं लगता है कि इसराइल हमास के हर सदस्य का सफ़ाया कर सकता है क्योंकि ये अतिवादी इस्लाम का विचार है. ”
वो आगे कहते हैं, “लेकिन आप इसे जितना संभव हो उतना कमज़ोर कर सकते हैं ताकि इसमें अपने अभियान चलाने की क्षमता ही नहीं बचे. ”
हमास को कमज़ोर करना कहीं ज़्यादा वास्तविक मक़सद हो सकता है, बजाए इसे पूरी तरह ख़त्म करने के.
इसराइल पहले ही हमास के साथ चार बार संघर्ष कर चुका है और रॉकेट हमले को रोकने की हर कोशिश नाकाम रही है.
आईडीएफ़ के एक प्रवक्ता ने बताया कि मुख्य उद्देश्य है कि हमास के पास ‘इसराइल के नागरिकों को डराने या फिर मारने’ की सैन्य क्षमता न बचे.

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हमास की ताक़त
तेल अवीव यूनिवर्सिटी में फ़लस्तीनियन स्टडीज़ के प्रमुख मिशेल मिल्स्टीन भी मानते हैं कि हमास को ख़त्म करना बहुत ही जटिल काम है.
वो कहते हैं कि आप उस विचार को ख़त्म कर देंगे जिससे हमास ने आकार लिया, ये बात कल्पनाशीलता की इंतहा लगती है. हमास मुस्लिम ब्रदरहुड से निकला है जिसने पूरी दुनिया में इस्लामी संगठनों को प्रेरित किया है.
वो कहते हैं कि हमास की मिलिट्री विंग की क्षमता 25 हज़ार से ज़्यादा लोगों की है. इसके अलावा उसका एक सोशल वेलफ़ेयर (समाजिक कामकाज देखने वाला) ढांचा भी है. इसे दावा कहते हैं. इसमें अस्सी से नब्बे हज़ार तक सदस्य हैं.
इसराइल के रक्षा मंत्री कहते हैं कि इसराइल के अगले 75 साल का भविष्य बहुत हद तक इस जंग के नतीजे पर निर्भर करता है.

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ज़मीनी अभियान के ख़तरे
सैन्य अभियान की कामयाबी कई वजहों पर निर्भर करती है. ये ऐसी वजह हैं जो इसे बेपटरी कर सकती हैं. हमास की आर्म्ड विंग (सशस्त्र शाखा) अल क़ासम ब्रिगेड भी इसराइल के हमले के लिए तैयार होगी. विस्फ़ोटक लगा दिए गए होंगे और छापेमार कार्रवाई की योजना तैयार कर ली गई होगी.
इसराइल की सेना पर हमले के लिए ये अपने कुख्यात और व्यापक टनल नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकता है. साल 2014 में इसराइली सेना को एंटी टैंक माइन्स, स्नाइपर्स और छापेमारी के जरिए बड़ा नुक़सान उठाना पड़ा था. ग़ज़ा शहर के पड़ोस के उत्तरी इलाके में हुई लड़ाई में सैंकड़ों नागरिकों की मौत हो गई थी.
ये भी एक वजह है कि इसराइल ने ग़ज़ा पट्टी के उत्तरी हिस्से को खाली करने को कहा. इसराइलियों को आगाह कर दिया गया है कि वो लंबी लड़ाई के लिए तैयारी करें और तीन लाख 60 हज़ार रिज़र्व सैनिकों को ड्यूटी पर आने को कहा गया है.

अब सवाल ये है कि इसराइल अपने अभियान को कब तक खींच सकता है. सीज़फ़ायर के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार बढ़ रहा है. मरने वालों की संख्या बढ़ने, पानी, बिजली और ईंधन की सप्लाई की कटौती के बीच संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि यहां बहुत बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो सकता है.
सुरक्षा और ख़ुफिया मामलों के इसराइल के प्रमुख पत्रकारों में से एक योसी मेलमैन कहते हैं, “सरकार और सेना को लगता है कि उनके पास अंतरराष्ट्रीय समुदाय का समर्थन है. कम से पश्चिमी देशों के नेताओं के समर्थन उनके साथ है. उनकी सोच है कि इस अभियान को आगे बढ़ाते हैं, हमारे पास बहुत वक़्त है. ”
लेकिन वो मानते हैं कि हाल में या फिर आगे इसराइल के सहयोगी उस दशा में हस्तक्षेप कर सकते हैं जब वो भूख से मरते लोगों की तस्वीरें देखेंगे. और मरने वाले आम लोगों की संख्या बढ़ेगी तो दबाव भी बढ़ेगा.
वो कहते हैं, “ये बहुत जटिल है क्योंकि इसमें वक्त की ज़रूरत है और अमेरिकी प्रशासन आपको ग़ज़ा में एक या दो साल नहीं रहने देगा. ”

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अग़वा किए गए लोगों की हिफ़ाज़त
गजा में ले जाए गए अधिकतर होस्टेज इसराइली हैं. लेकिन इनमें एक ख़ासी संख्या विदेशी नागरिकों की भी है.
जिसका अर्थ है कि इस ज़मीनी अभियान में अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस जैसे देशों का भी हित है और ये देश अग़वा किए गए लोगों की जान ख़तरे में नहीं डालना चाहेंगे.
फ़्रांस के रणनीति विशेषज्ञ कर्नल मिशेल गोया कहते हैं कि इसराइली सेना के पास दो ही रास्ते हैं - या तो अग़वा किए गए लोगों को सुरक्षित रखा जाए या हमास को जितना संभव है उतना नुकसान पहुँचाया जाए.”
साल 2001 में इसराइल ने गिलाड शलित नामक एक सैनिक के बदले 1,000 फ़लस्तीनी क़ैदियों को रिहा किया था. शलित पांच साल से गज़ा में थे.
लेकिन एक बार फिर से यही करने से पहले इसराइल दो बार सोचेगा क्योंकि जिन लोगों को शलित के बदले रिहा किया गया था उनमें से एक था याह्या सिनवार. अब सिनवार गजा में हमास का राजनीतिक प्रमुख है.

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पड़ोसियों की नज़र
ज़मीनी जंग की अवधि और तीव्रता इसराइल के पड़ोसियों की प्रतिक्रिया पर भी निर्भर करेगी.
मिस्र की रफ़ाह क्रॉसिंग गजा के मानवीय संकट का केंद्र बन गई है. इस रास्ते से केवल सीमित मात्रा में ही सहायता सामग्री गजा में दाख़िल होने दी जा रही है.
इसी क्रॉसिंग पर हज़ारों विदेशी नागरिक और विदेशी पासपोर्ट वाले फ़लस्तीनी गज़ा छोड़ने को बेताब बैठे हैं.
इसराइल के इंस्टीट्यूट ऑफ़ नेशनल सिक्यूरिटी स्टडीज़ के ऑफ़िर विंटर कहते हैं, “इसराइली हमले से जितना गजा निवासी प्रभावित होंगे, मिस्र पर उसी अनुपात में दवाब बढ़ेगा. मिस्र ये अहसास तो बिल्कुल नहीं देना चाहेगा कि वो फ़लस्तीनियों को अपने हाल पर छोड़ रहा है."
लेकिन इसका ये मतलब तो बिल्कुल नहीं कि मिस्र गजा के लोगों को अपने यहां बेरोक टोक आने देगा.
मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़ताह अल-सिसी ने चेतावनी दी है कि अगर गजा के लोगों को अगर सिनाई के रेगिस्तान में बसाया गया तो लाख़ों की तादाद में मिस्र वासी विरोध प्रदर्शन करेंगे.

शरणार्थियों को लेकर क्या है सोच
जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला ने भी एक रेड लाइन की बात की है जिसके आगे गज़ा से निकलने वाले शरणार्थियों नहीं धकेला जा सकता.
उन्होंने साफ़ कहा है - मिस्र और जॉर्डन को और शरणार्थी बिल्कुल नहीं चाहिए.
लेबनान से लगी इसराइल की उत्तरी सरहद भी कड़ी निगरानी में है.
पहले ही लेबनान में मौजूद हिज़्बुल्लाह मिलिटेंट ग्रुप इसराइल पर कई घातक हमले कर चुका है.
सरहद के दोनों ही और नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है पर अब भी इसराइल के लिए ये मोर्चों की जंग नहीं बनी है.
ईरान हिज़्बुल्लाह का प्रमुख स्पांसर है. वो इसराइल के ख़िलाफ़ नए फ़्रंट खोलने की चेतावनी दे चुका है.
जो बाइडन ने इस चेतावनी का जवाब भी दिया है.
उन्होंने कहा है, "कोई भी ऐसी संस्था या देश जो इन हालात का फ़ायदा उठाना चाहता है उसके लिए मेरा एक ही संदेश है - ऐसा करने की भी न सोचें."
अमेरिकी के दो एयरक्राफ़्ट करियर - यूएसएस जेराल्ड फॉर्ड और यूएसएस आइज़नहॉवर, भूमध्य सागर में 2000 अमेरकी सैनिक के साथ तैनात हैं.
ये किसी भी कार्रवाई के तैयार बैठे हैं.

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इसराइल ग़ज़ा में करना क्या चाहता है?
अगर हमास को बिल्कुल तबाह करना ही इसराइल का मकसद है तो सवाल ये है कि उसकी जगह ग़ज़ा में कौन सा संगठन लेगा?
इसराइल ने 2005 में गज़ा से हज़ारों यहूदियों और सेना को बाहर निकाल लिया था. ये तो साफ़ है कि इसराइल वापिस इन लोगों को गजा में बसाना चाहता है या अपनी सेना को वहीं रखना चाहता है.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन भी कह चुके हैं कि ऐसा करना एक बहुत बड़ी चूक होगी.
लेकिन गजा पर किसी भी संगठन का नियंत्रण न होना एक ख़तरनाक जोखिम है. मिल्स्टीन कहते हैं कि ये एक समस्या हल करके 10 समस्याएं और खड़ी करने जैसा होगा.
ऑफ़िर विंटर मानते हैं कि गजा की सत्ता में धीरे-धीरे परिवर्तन आएगा और 2007 वाली स्थिति बहाल होगी जब वहां फ़लस्तीनी प्राधिकरण का राज था.
प्राधिकरण का फ़िलहाल वेस्ट बैंक के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण हैं लेकिन वो काफ़ी कमज़ोर है. उसे गजा में लौटने के लिए मनाना भी कम जटिल नहीं होगा.
अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस समस्या का अंतरिम समाधान निकाल सकता है. संयुक्त राष्ट्र ने कोसोवो में सर्बियाई सेना के हटने के बाद 1999 में प्रशासन की बागडोर संभाली थी. लेकिन इसराइल यूएन पर बिल्कुल भरोसा नहीं करता है.

एक और विकल्प भी है. मिल्स्टीन कहते हैं कि गज़ा के चुने हुए मेयर, कबायली नेताओं और एनजीओ को मिलाकर एक प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें मिस्र, अरब देशों और अमेरिका का सहयोग हो.
लेकिन मिस्र के राष्ट्रपति ने ग़ज़ा पर नियंत्रण की कोई इच्छा नहीं जताई है. ये ज़रूर कहा है कि ‘अगर बिना सेना के एक फ़लस्तीनी देश बना दिया जाता तो ये समस्या वार्ताओं से ही सुलझ जाती और अब कोई युद्ध भी नहीं होता.”
युद्ध के बाद इसराइल गजा पर और अधिक सख़्त नियंत्रण चाहेगा जिसमें इस इलाके में दाख़िल होने वाली हर चीज़ पर निगाह रखी जाएगी.
वो नहीं चाहेगी कि किसी तरह के हथियार गजा में न पहुँचें.
इसके अलावा इसराइल और गजा के बीच मौजूद बफ़र ज़ोन को बड़ा करने की भी बात चली रही है ताकि इसराइली बस्तियों को सुरक्षित रखा जा सके.
युद्ध का परिणाम जो भी हो, इसराइल एक मकसद एक ही है - 7 अक्टूबर जैसे हमले दोबारा न हों.
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