50 साल पहले जब अरब देशों ने तेल को बनाया हथियार

सउदी अरब के राजा फैसल बिन अब्दुल अजीज

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इमेज कैप्शन, सऊदी अरब के शासक फ़ैसल बिन अब्दुल अज़ीज़ ने अमेरिका पर पाबंदी लगाने की घोषणा की थी.
    • Author, गिलर्मो डी. ओल्मो
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पेरू

इसराइलियों और फ़लस्तीनियों का पुराना संघर्ष एक बार फिर शुरू हो गया है.

ताज़ा संघर्ष सात अक्तूबर को इसराइल पर हमास की ओर से किए गए हमले के बाद शुरू हुआ है. आशंका जताई जा रही है कि यह मध्य पूर्व के अन्य देशों को भी अपने प्रभाव में ले सकता है.

इस घटना के बीच उस तथाकथित तेल संकट के पचास साल हो चुके हैं, जब एक ऊर्जा संकट ने तेल साम्राज्य की नींव रखी थी और अमेरिका के पतन की चेतावनी दी थी.

यह 1948 में इसराइल की स्थापना के बाद से उसे उसके अरब पड़ोसियों के ख़िलाफ़ खड़ा करने वाले कई युद्धों में से एक कारण था.

अमेरिका ने योम किप्पुर युद्ध में इसराइल को समर्थन और हथियार देने का फ़ैसला किया था. इसने इसराइल को मिस्र और सीरिया के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया. इसके बाद सऊदी अरब के नेतृत्व में तेल निर्यातक अरब देशों ने अमेरिका और उसके सहयोगियों पर तेल प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला किया.

तेल निर्यातक देशों के इस फ़ैसले से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गईं और अमेरिका और दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं हिल गईं.

अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (बीच मेें), इसराइल की प्रधानमंत्री गोल्डा मीर और अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर.

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इमेज कैप्शन, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (बीच मेें), इसराइल की प्रधानमंत्री गोल्डा मीर और अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर.

कैसी थी 1973 में दुनिया

साल 1973 में दुनिया अमेरिका और सोवियत संघ के शीत युद्ध में फंसी हुई थी. हालांकि दोनों देश कभी भी सैन्य रूप से आमने-सामने नहीं हुए. लेकिन उन्होंने दूसरे देशों में स्थानीय विवाद में अलग-अलग पक्षों का समर्थन किया.

यह एक ऐसी दुनिया थी जो दो महाशक्तियों के बीच परमाणु युद्ध की आशंका से डरती थी. वह पूरी तरह से तेल पर निर्भर थी.

उस समय तक, तेल पश्चिमी देशों के लिए अपेक्षाकृत सस्ता और सुलभ था. कंपनियां इसे मुख्य रूप से मध्य पूर्व के उत्पादक देशों से सस्ती कीमत पर हासिल कर रही थीं.

दुनिया का प्रमुख तेल सप्लायर होने की इस भूमिका की वजह से इस क्षेत्र का महत्व बढ़ता चला गया. साल 1948 में इसराइल बनने के बाद पैदा हुए अरब-इसराइल संघर्ष का पहला अध्याय वहां पहले ही अनुभव किया जा चुका था.

योम किप्पुर युद्ध

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क्यों शुरू हुआ था तेल संकट?

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साल 1973 में दुनियाभर में चल रहे आंदोलन यहूदी अमेरिकी राजनयिक हेनरी किसिंजर का ध्यान खींचना चाह रहे थे.

किसिंजर को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने विदेश मंत्री बनाया था. वो उनके ज़रिए वियतनाम युद्ध में हो रही हार को रोकना चाहते थे. लेकिन अचानक से शुरू हुए एक दूसरे युद्ध ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा.

मिस्र और सीरिया के नेतृत्व में अरब गठबंधन ने 6 अक्टूबर, 1973 को यहूदियों के पवित्र दिन योम किप्पुर की छुट्टी के दिन इसराइल पर हमला शुरू कर दिया.

मिस्र के राष्ट्रपति मोहम्मद अनवर सादात और उनके सीरियाई समकक्ष हफ़ीज़ अल असद उस ज़मीन को वापस पाना चाहते थे, जिसे इसराइल ने 1967 के छह दिन के युद्ध में कब्ज़ा कर लिया था.

सीरिया और मिस्र के पास सोवियत संघ से हथियारों की खेप आने लगी. इसके बाद निक्सन ने इसराइल के लिए एक सहायता पैकेज की घोषणा की और सैन्य सामग्री भेजना शुरू किया. अमेरिका के इस क़दम से अरब जगत नाराज़ हो गया.

ग्यारह दिन बाद अरब के तेल निर्यातक देशों ने तेल उत्पादन में कटौती की और अमेरिका और उसके सहयोगी देशों नीदरलैंड्स, पुर्तगाल और दक्षिण अफ्रीका पर पाबंदी लगा दी. अरब देशों ने इन पर इसराइल की मदद करने का आरोप लगाया. सऊदी अरब ने ओपेक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस वजह से अमेरिका को लंबे समय तक आर्थिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक परिणाम भुगतने पड़े.

सऊदी अरब के शासक फ़ैसल बिन अब्दुल अज़ीज़ ने इस कदम का समर्थन किया. वहीं कुछ लोग मिस्र के राष्ट्रपति सादात को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं. उन्होंने हमले से कई महीने पहले सऊदी अरब को आश्वस्त किया था कि यदि अमेरिका युद्ध में इसराइली सेना का समर्थन करता है तो योजना बनाई जानी चाहिए.

ग्रीम बैनरमैन अमेरिकी विदेश मंत्रालय में मध्य-पूर्व विश्लेषक के रूप में काम कर चुके है. बैनरमैन ने कहा, "अगर सादात और फ़ैसल सहमत नहीं होते तो यह प्रतिबंध नहीं लगाया जाता."

वहीं कनाडा के वाटरलू विश्वविद्यालय में मध्य-पूर्व मामलों के विशेषज्ञ बिस्मा मोमानी ने कहा, ''उस समय अरब एकता की भावना आज की तुलना में अधिक थी, जो देश फलस्तीनियों को आज़ादी देना चाहते थे. उनके पास मिस्र के सैन्य रास्ते के अलावा और भी रास्ते थे. उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि तेल इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.''

दरअसल, अरब देशों के पास अमेरिका के साथ तनाव के कई कारण थे. निक्सन ने 1971 में स्वर्ण मानक को त्याग दिया, जिसका अर्थ था कि एक डॉलर एक औंस सोने के बराबर था. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत विश्व आर्थिक व्यवस्था इसी आधार पर खड़ी हुई थी.

इससे तेल निर्यातकों को नुक़सान हुआ. वे इसे डॉलर में बेचते थे. उन्हें लगा कि इस क़दम से इसका मूल्य कम हो गया है. इसके मूल्य का अनुमान लगाना कठिन हो गया क्योंकि अमेरिकी मुद्रा में उतार-चढ़ाव हो सकता है.

अरब देश अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी धाक जमाने के लिए सालों से तेल को एक हथियार के रूप में प्रयोग करने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन उस समय तक सऊदी अरब खुद इस मुद्दे पर चुप था. उन्हें शायद डर था कि अमेरिका तेल का दूसरा आपूर्तिकर्ता खोज लेगा.

स्पेन में अरब और इस्लामी अध्ययन के प्रोफेसर इग्नासियो अल्वारेज़ असोरियो कहते हैं, "शाह फैसल ने प्रतिबंध लगाने का जानबूझकर निर्णय लिया." वह मौजूदा हालात से दबाव में थे. अल्जीरिया जैसे सोवियत संघ के करीबी देशों ने और अधिक कड़े उपायों की मांग की.

जब निक्सन प्रशासन ने इसराइल को सैन्य सहायता देने की घोषणा की, तो अरब देशों के लिए तेल को हथियार के रूप में उपयोग करना ज़रूरी हो गया.

सउदी अरब के राजा फैसल बिन अब्दुल अजीज (बाएं) और मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात (बीच में).

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तेल संकट के प्रभाव क्या थे?

अरब देशों की पाबंदी का अमेरिका पर तात्कालिक और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा. उस साल जुलाई में कच्चे तेल की प्रति बैरल कीमत 2.9 डॉलर थी, जो दिसंबर में 11.65 डॉलर तक पहुंच गई.

पेट्रोल पंपों पर तेल खत्म हो गया, वाहनों की कतारें लग गईं और पेट्रोल भरवाने के लिए महीनों का लंबा इंतज़ार आम बात हो गई. कई राज्यों ने तेल की खपत की सीमा तय कर दी.

अमेरिका में कारों के बहुत शौकीन थे. कारों को स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता था. कारें अमेरिकी सपने का हिस्सा थीं. तेल की कमी ने अमेरिकी जनता को व्याकुल कर दिया. यह एक अभूतपूर्व संकट था. इसका भारी आर्थिक नुकसान हुआ.

इससे 1975 तक अमेरिका का सकल राष्ट्रीय उत्पाद छह फीसदी तक गिर गया था, बेरोज़गारी दोगुनी हो गई थी. इस संकट का लाखों नागरिकों पर प्रभाव पड़ा.

विश्लेषक ब्रूस रिडल अमेरिकी जांच एजेंसी सीआईए के एजेंट रह चुके हैं. वो कहते हैं कि 1815 में ब्रिटेन द्वारा वाशिंगटन को जलाने की घटना के बाद जिस घटना ने अमेरिका पर सबसे अधिक प्रभाव डाला वह थी, सऊदी अरब की ओर से लगाए गए प्रतिबंध.

उस दौरान किसिंजर ने अरब देशों का बार-बार दौरा कर पाबंदियां हटाने के तरीके तलाशे. यह मार्च 1974 में ही संभव हो सका जब योम किप्पुर युद्ध खत्म हुआ. इससे कई अमेरिकी परिवारों और कंपनियों को राहत मिली. उन्हें उम्मीद थी कि इससे दैनिक जीवन सामान्य हो जाएगा.

कैंप डेविड समझौता

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तेल संकट के बाद क्या हुआ?

हालांकि मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात इसराइल पर हमला करने के अपने लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रहे, लेकिन युद्ध के कारण अमेरिका की मध्यस्थता से बातचीत का दौर चला.

इसराइल ने 1978 में कैंप डेविड समझौते के तहत सिनाई पेनिनसुला को मिस्र को वापस कर दिया.

ग्रीम बैनरमैन का मानना है कि पाबंदियों की वजह से ही अमेरिका ने अपनी नीति में बदलाव किया, इस वजह से ही कैंप डेविड समझौता हो पाया.

इस फैसले के बाद मिस्र इसराइल को मान्यता देने वाला पहला अरब देश बन गया. इस फैसले की वजह से अनवर सादात को अरब जगत में आलोचना का सामना करना पड़ा, वहीं पश्चिम में उन्हें शांतिवादी के रूप में देखा और सराहा गया.

अनवर सादात सोवियत संघ की जगह अमेरिका के साथ फिर से रिश्ते बनाने के भी इच्छुक थे. इस उद्देश्य में वो सफल भी रहे.

तेल संकट के पांच महीने बाद, वाटरगेट घोटाले के कारण रिचर्ड निक्सन ने इस्तीफा दे दिया. सऊदी अरब के शासक फैसल की रियाद में उनके एक भतीजे ने गोली मारकर हत्या कर दी. उनका हत्यारा कुछ समय से अमेरिका में रह रहा था. इससे इस हत्याकांड में सीआईए के शामिल होने का संदेह पैदा हुआ.

अरब देशों की पाबंदी की वजह से अमेरिका में तेल संकट पैदा हो गया था.

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तेल संकट के दूरगामी परिणाम

सस्ते तेल का युग हमेशा के लिए खत्म हो गया. तेल की कीमतें मध्य पूर्व में स्थिरता का प्रतीक बन गईं.

इस क्षेत्र में जब भी कोई संकट आया, जैसे कि 1979 की ईरानी क्रांति या 1991 का इराक़ युद्ध, तेल की कीमतें बढ़ीं और इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई.

इस संकट के बाद ओपेक ने नए सदस्य बनाए और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार में एक ताकत के रूप में उभरा. उसने तेल उत्पादन की मात्रा तय की. इस वजह से पश्चिम के देशों के लिए उसे नज़रअंदाज़ कर पाना मुश्किल हो गया.

अमेरिकी जनता में कम ईंधन खाने वाली कारों की मांग बढ़ी. इस तरह दुनिया में छोटी और सस्ती कारों का चलन शुरू हुआ. वहीं दूसरी ओर अरब जगत पर निर्भरता के खतरों को देखते हुए दुनिया भर में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की खोज भी शुरू हुई.

हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग तकनीक की मदद से अमेरिका 2005 के बाद कच्चे तेल के आयात को कम करने में सक्षम हुआ. इसका परिणाम यह हुआ कि 2020 में, अमेरिकी तेल निर्यात उसके कुल तेल आयात से अधिक हो गया.

हालांकि दुनिया का वह क्षेत्र जो सबसे अधिक बदला, वह था मध्य पूर्व, खासकर फारस की खाड़ी, जहां 1960 और 1970 के दशक में तेल की बढ़ती कीमतों ने कुवैत, सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात को समृद्ध से और समृद्ध बना दिया.

इस संकट के बाद से, अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे हैं. यह ओपेक की उत्पादन में कटौती की योजना पर ब्रेक के रूप में काम करता है, वरना तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं.

रिडल का कहना है कि अमेरिका और सऊदी अरब के बीच दोस्ती भी इसी संकट के कारण है. हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने तेल की आपूर्ति को बनाए रखने के लिए सऊदी के साथ अच्छे संबंध बनाए रखा है.

वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब इस्लामी दुनिया में एक नई शक्ति के रूप में उभरा. वह धीरे-धीरे ईरान के साथ प्रतिस्पर्धा करने लगा.

आज 50 साल बाद सऊदी तेल कंपनी अरामको 2023 में 161 अरब डॉलर के सालाना मुनाफे के साथ एप्पल के बाद दुनिया की दूसरी सबसे मूल्यवान कंपनी है.

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