सऊदी अरब और इसराइल के बीच संबंध बहाली के समझौते में फ़लस्तीनियों ने रखीं ये शर्तें

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- Author, टॉम बेटमैन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, यरूशलम
अमेरिकी मध्यस्थता में सऊदी अरब और इसराइल के बीच संबंध सामान्य करने को लेकर होने वाले एक ऐतिहासिक समझौते में फ़लस्तीनियों ने अरबों डॉलर और वेस्ट बैंक में इसराइल के पूर्ण कब्ज़े वाली ज़मीन पर नियंत्रण की मांग रखी है.
बीबीसी को मिली जानकारी के अनुसार, बुधवार को रियाद में फ़लस्तीन अथॉरिटी (पीए) और सऊदी अरब के अधिकारियों के बीच वार्ता हुई.
जल्द ही अमेरिकी अधिकारियों से उनकी मुलाकात होने वाली है.
लंबे समय से अमेरिका, सऊदी अरब और इजराइल के बीच संबंधों को सामान्य करने पर जोर दे रहा था. वॉशिंगटन इसकी मध्यस्थता करेगा और इसमें एक बड़ा सुरक्षा समझौता भी शामिल है जिसे सऊदी अरब अमेरिका से पाना चाहता है. हालांकि इस तरह के समझौतों में काफ़ी अड़ंगे हैं और इनका अमल अभी भी दूर की कौड़ी बना हुआ है.
मंगलवार को व्हाइट हाउस के नेशनल सिक्युरिटी एडवाइज़र जेक सुलिवन ने कहा, “निकट भविष्य में किसी बड़ी घोषणा या महत्वपूर्ण प्रगति के बारे में ऐलान करने की हम अभी उम्मीद नहीं करते.”
हालांकि पश्चिमी एशिया में सहयोगियों के बीच पाला बदलने की संभावना को देखते हुए किसी भी समझौते की रूपरेखा को लेकर अनुमान लगाए जा रहे हैं.
क्योंकि इसी गर्मी में रियाद, अम्मान और यरूशलम में अमेरिकी अधिकारियों के दौरों ने अमेरिकी कूटनीति को फिर से सक्रिय किया है.
ऐसी संभावना है कि अगले साल होने वाले आम चुनावों से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन वोटरों के बीच सऊदी-इसराइल समझौते को अपनी विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता के रूप में ले जाएं.

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बदले में सऊदी अरब क्या चाहता है?
सऊदी अरब अरब और इस्लामिक जगत का लीडर है. 1948 में गठन के बाद से ही इसने कभी भी औपचारिक रूप से इसराइल को मान्यता नहीं दी.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने पिछले महीने इसकी संभावनाओं के बारे में बात की थी और दावा किया था, “हम जल्द ही एक ऐतिहासिक बदलाव के गवाह बनेंगे.”
हालांकि कोई भी समझौता बहुत ही विवादास्पद होने वाला है.
बताया जाता है कि इसराइल को मान्यता देने के बदले सऊदी अरब ने अमेरिका निर्मित अत्याधुनिक हथियारों और सबसे अधिक विवादास्पद नागरिक परमाणु कार्यक्रम पर आगे बढ़ने की अमेरिकी गारंटी मांगी है जिसमें घरेलू यूरेनियम संवर्धन भी शामिल है.
इस समझौते में इसराइल को खाड़ी की इस महाशक्ति के साथ व्यापार और रक्षा सहयोग में फ़ायदा मिलेगा और इस इलाके में ऐतिहासिक एकीकरण का भी लाभ मिलेगा, क्योंकि 2020 में अरब देशों के साथ संबंध सामान्य करने के समझौते के बाद वो इसका बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था.
इसराइल के साथ शांतिवार्ता में आधिकारिक फ़लस्तीनी वार्ताकार टीम की पूर्व क़ानूनी सलाहकार डायाना बुट्टु ने कहा, “ये ज़्यादातर सुरक्षा और व्यापारिक समझौते हैं. लेकिन 2023 में हम देखते हैं कि सऊदी अरब भी अब इसमें शामिल होना चाहता है.”
लेकिन इस समझौते की सफलता के लिए इसराइल को फ़लस्तीनियों को काफ़ी कुछ रियायतें देनी होंगी.
सउदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को अपनी जनता का भी ख्याल रखना है जोकि इसराइल की ऐतिहासिक रूप से विरोधी और फ़लस्तीनी मुद्दे के प्रति गहरे तौर पर सहानुभूति रखती है.
साथ ही साथ, राष्ट्रपति बाइडेन को भी ये साबित करने की ज़रूरत है कि उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थन की वजह से फ़लस्तीनियों के लिए उन्होंने काफी कुछ हासिल किया है.
हालांकि उनकी पार्टी के कई लोगों ने, सऊदी अरब का मानवाधिकार रिकॉर्ड और यमन के युद्ध में उसकी भूमिका को देखते हुए, रक्षा उपकरण देने के विचार का विरोध किया है.
लेकिन ये लोग इसराइल की मौजूदा कट्टर राष्ट्रवादी सत्तारूढ़ गठबंधन को कोई ईनाम देने के विचार का भी विरोध करते हैं और इसे वेस्ट बैंक (पश्चिमी तट) में तनाव बढ़ाने वालों के रूप में देखते हैं, जिससे इसराइल में खुद अभूतपूर्व अस्थिरता पैदा हो गई है.

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फ़लस्तीनियों की मांगें
रियाद में फ़लस्तीनी अधिकारियों की टीम में राष्ट्रपति महमूद अब्बास के दो करीबी लोग, फ़लस्तीन अथॉरिटी के इंटेलिजेंस चीफ़ माजेद फ़राज और फ़लस्तीनी लिबरेशन आर्गेनाइजेशन के सेक्रेटरी जनरल हुसैन अल शेख़ शामिल हैं.
इस वार्ता के बारे में जानकारी रखने वाले एक फ़लस्तीनी अधिकारी के अनुसार, बुधवार को इनकी मुलाक़ात सऊदी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मुसाएद अल-आइबन से हुई.
अमेरिकी समर्थित समझौते प्रक्रिया में शामिल होने के बदले मांगों की सूची पर पिछले हफ़्ते अम्मान में अमेरिकी उप विदेश मंत्री बारबरा लीफ़ के साथ एक बैठक में बातचीत हुई.
फ़लस्तीनी अधिकारी ने बीबीसी को सूची के बारे में बताया जिसमें निम्न मांगें शामिल हैं-
- पश्चिमी तट के उस हिस्से फ़लस्तीनी अथॉरिटी को सौंपना, जिस पर इसराइल का पूर्ण नियंत्रण है (इसे 1990 के दशक में हुए ओस्लो शांति समझौते के तहत एरिया सी के नाम से जाना जाता है.)
- पश्चिमी तट में इसलाइल बस्तियों के विस्तार पर ‘पूरी तरह से पाबंदी’
- फ़लस्तीनी अथारिटी को सऊदी वित्तीय समर्थन बहाल करना, जोकि 2016 से ही कम होना शुरू हुआ और तीन साल पहले पूरी तरह बंद हो गया. ये राशि प्रति वर्ष 20 करोड़ डॉलर के करीब है.
- यरूशलम में अमेरिकी कॉंसुलेट (वाणिज्य दूतावास) यानी फ़लिस्तीनियों के लिए कूटनीतिक मिशन- को फिर से खोलना, जिसे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बंद कर दिया था.
- अमेरिकी मध्यस्थता में इसराइल और फ़लस्तीन के बीच वार्ता को फिर से बहाल किया जाए, जो 2014 में अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी के समय बंद हो गया था.
ये रियायतें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं और अमेरिकी इसे फ़लस्तीन की ओर से अत्यधिक बारेगन के रूप में देखते रहे हैं.

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फ़लस्तीनी पक्ष से क्या कहा गया
लेकिन सऊदी इसराइल संबंधों के सामान्य होने को लेकर फ़लस्तीनियों के अबतक के सार्वजनिक आधिकारिक स्डैंट से ये बहुत अलग है.
पहले का स्टैंड ये था कि अगर फ़लस्तीन को आज़ाद राष्ट्र नहीं माना जाता है तो वे इस तरह के समझौतों को पूरी तरह ख़ारिज कर देंगे.
सऊदी अरब की अगुवाई में 2002 में अरब शांति पहल शुरू हुआ, जिसमें अरब जगत की ओर से इसराइल को मान्यता देने के बदले कब्ज़ा किए गए इलाक़ों से इसराइल के पीछे हटने और पश्चिमी तट और ग़ज़ा में फ़लस्तीनी राष्ट्र और पूर्वी यरूशलम में राजधानी बनाने की मांग थी.
बुट्टु के मुताबिक मौजूदा नज़रिया फ़लस्तीनी नेतृत्व की ‘गहरी मजबूरी’ को दिखाता है.
वो कहती हैं, “फ़लस्तीनी कमोबेश इस तरह के संबंध सामान्य करने वाले किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं होना चाहते क्योंकि अरब जगत का समर्थन ही हमारे लिए एकमात्र रास्ता बचा है.”
“हमें बताया गया है कि हम इसका बहुत विरोध नहीं कर सकते. हमें बताया गया है कि कब्ज़े को ख़त्म करने की मांग के लिए हमें कोई भी क़ानूनी कार्यवाही की इजाज़त नहीं होगी. ये भी बताया गया है कि बॉयकॉट, निवेश बंद करने और प्रतिबंध लगाने की हम मांग नहीं कर सकते.”
बुट्टु ने बीबीसी को बताया, “अब फ़लस्तीनी अथॉरिटी सवाल कर रही है- क्या हमें अपनी मांगों पर आगे बढ़ना चाहिए या हमें वही करना चाहिए जो हमने 2020 में किया था, यानी नज़रअंदाज़ करना? और बावजूद ये बाध्यता है- भले ही इस पर फ़लस्तीनी अथॉरिटी कुछ बी करती है, इसका फेल होना तय है.”
2020 में तीन अरब देश- यूएई, बहरीन और मोरक्को ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की मध्यस्थता में इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने का समझौता किया.
उस साल चौथे देश सूडान ने भी इसराइल के साथ राजनयिक संबंध बहाल करने की ओर कदम उठाने की बात कही थी.
लेकिन उसी साल सैन्य तख़्तापलट और देश में इसके भारी विरोध के चलते सूडान इस ओर बढ़ नहीं पाया.
उस समय इसे पश्चिमी एशिया में पुराने विरोधियों के बीच नए संबंधों के बनने के रूप में देखा गया था, जिसमें राजनयिक, व्यापार और सुरक्षा सहयोग शामिल थे.
उस समय राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में इसराइली-फ़लस्तीनी समझौते और अमेरिकी दूतावास को यरूशलम में स्थानांतरित करने के ख़िलाफ़ फ़लस्तीनी अथॉरिटी ने अमेरिका के साथ राजनयिक संबंध तोड़ लिए थे.
उनका आरोप था कि ये इसराइल के पक्ष में अधिक झुका हुआ था. इसे ट्रंप ने ‘सदी का समझौता’ क़रार दिया था.
तब फ़लस्तीनी अथॉरिटी ने संबंध बहाल किए जाने के सौदे को अरब एकता के प्रति ‘विश्वासघात' माना था.
एक अन्य वरिष्ठ फ़लस्तीनी अधिकारी का मानना है कि इस प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रहने की बजाय, इस बार सऊदी के साथ वार्ता, रियाद को अरब शांति पहल की बुनियाद की याद दिलाने का एक तरीका हो सकता है, जिसका लक्ष्य एक आज़ाद फ़लस्तीनी राष्ट्र है.
लेकिन अगर देखा जाए तो मौजूदा फ़लस्तीनी नेतृत्व का इस प्रक्रिया में शामिल होना किसी जोख़िम से कम नहीं है क्योंकि वो पहले ही अपने लोगों में अलोकप्रिय है.
2020 में इसराइल और यूएई के बीच संबंधों के सामान्य होने के बाद हुए सर्वेक्षणों से पता चलता है कि फ़लस्तीनियों का भारी बहुमत इस समझौते को फ़लस्तीनी संघर्ष को छोड़ने के रूप में देखता है.
लेकिन दूसरी तरफ़ इसराइल द्वारा फ़लस्तीनियों को दी गई किसी भी रियायत को बिन्यामिन नेतन्याहू के गठबंधन में चरमपंथियों द्वारा अस्वीकार किया जाना लगभग तय है.
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