UAE और बहरीन से इसराइल की डील क्यों है ख़ास, पांच कारण

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- Author, जेरेमी बोवेन
- पदनाम, बीबीसी मध्य-पूर्व संपादक
मंगलवार को इसराइल और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं.
ये समझौता अमरीका के व्हाइट हाउस में होगा और अमरीका ने ही इस डील में मध्यस्थता की है.
पिछले हफ़्ते राष्ट्रपति ट्रंप ने बताया था कि बहरीन के विदेश मंत्री भी इस कार्यक्रम में शामिल होंगे और इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने को लेकर समझौता करेंगे.
लेकिन इन दो अरब देशों और इसराइल के बीच की ये डील क्यों ख़ास है?
1. खाड़ी देशों को व्यापार के लिए मिलेंगे मौक़े
यूएई ने अपने आपको एक ऐसे देश के तौर पर खड़ा किया है जो सैन्य ताक़त है, जहां व्यापार किया जा सकता है और जो छुट्टियां बिताने की एक जगह है.
ऐसा लगता है कि अमरीका ने इस डील को आधुनिक हथियारों के वादे के साथ करवाया है क्योंकि इससे पहले यूएई की आधुनिक हथियारों तक पहुंच संभव नहीं थी.
अब एफ़-35 फाइटर प्लेन और ईए-18जी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर एयरक्राफ़्ट यूएई को मिल सकेंगे. यूएई ने लीबिया और यमन में अपनी सेना का इस्तेमाल किया है.
लेकिन उसके लिए सबसे ख़तरनाक दुश्मन ईरान है जो खाड़ी के उस तरफ़ स्थित है. इसराइल और अमरीका भी ईरान को लेकर चिंतित हैं. साथ ही बहरीन भी.

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1969 तक तो ईरान बहरीन पर अपना अधिकार समझता था. बहरीन के सुन्नी राजाओं को भी लगता था कि उनके यहां शिया बहुमत का एक तबका ईरान के साथ मिला हुआ है.
बहरीन और यूएई ने पहले कभी इसराइल से रिश्ता नहीं जोड़ा. लेकिन अब उन्हें इसराइल के साथ व्यापार की उम्मीद है. इसराइल के यहां दुनिया का सबसे आधुनिक तकनीक सेक्टर है.
इसराइली लोगों को भी छुट्टियां मनाने के लिए खाड़ी के मरूस्थल, समुद्र तट और मॉल मिल जाएंगे. इन सभी देशों के लिए ये एक अच्छा व्यापारिक मौक़ा भी है.
2. इसराइल क्षेत्र में अलग-थलग नहीं रहेगा
इसराइल के लिए यूएई और बहरीन के साथ समझौता एक उपलब्धि ही है. इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू उस रणनीति को मानते हैं जो सबसे पहले 1920 के दशक में इसराइल और अरब देशों के बीच 'लोहे की दीवार' से जानी जाती है.
इसके पीछे बात ये है कि इसराइल अपनी ताक़त से आख़िर में अरब देशों को ये विश्वास दिला देगा कि उनके पास इसराइल को मान्यता देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. मध्य-पूर्व के इलाक़े में इसराइल अलग-थलग नहीं रहना चाहता. मिस्र और जॉर्डन के साथ भी उसके संबंध मधुर नहीं रहे.
इसराइल के लोग भी यरूशलम और कब्ज़े में लिए गए इलाकों की राजनीति से अलग अरब देशों के साथ संबंधों को लेकर आशावान हैं. ईरान के ख़िलाफ़ ताक़त इकट्ठी करना एक और फ़ायदा है.
नेतन्याहू ईरान को इसराइल का सबसे बड़ा दुश्मन कहते हैं, कभी-कभी तो उसके नेताओं की तुलना नाज़ियों से कर देते हैं. यूएई की संभावित हथियार डील को लेकर उन्होंने अपनी चिंताओं पर चुप्पी साध ली है.
नेतन्याहू भी समस्याओं से घिरे हुए हैं. उनके ख़िलाफ़ चल रहा भ्रष्टाचार का मुक़दमा उन्हें जेल भी भेज सकता है. शुरू में तो कोरोना वायरस महामारी के लेकर उनकी तारीफ़ हुई लेकिन बाद में व्यवस्था बुरी तरह फ़ेल हो गई.
यरूशलम में विपक्ष लगभग रोज़ उनके घर के बाहर रैलियां करता है. ऐसे में व्हाइट हाउस में होने वाला ये कार्यक्रम उनके लिए कुछ राहत लेकर आएगा.

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3. डोनाल्ड ट्रंप भी विदेश नीति के साधक के तौर पर देखे जाएंगे
ये डील डोनाल्ड ट्रंप के लिए कई तरह से काम करेगी. एक तो ईरान के ऊपर अधिकतम दबाव बनेगा. दूसरा, चुनावी साल में वो प्रचार कर पाएंगे कि वे दुनिया के बेहतरीन 'डीलमेकर' हैं.
इसराइल के लिए वे कुछ भी अच्छा करेंगे या ख़ासकर नेतन्याहू सरकार के लिए कुछ अच्छा करेंगे तो अमरीका में अमरीकी ईसाई (इवेंजेलिकल) वोटरों को पसंद आएगा.
ईरान के ख़िलाफ़ 'अमरीका के दोस्तों' का गठबंधन ज़्यादा अच्छे से काम कर सकता है अगर खाड़ी के अरब देश खुले तौर पर इसराइल के साथ हो. राष्ट्रपति ट्रंप के मुताबिक़ 'सदी का समझौता' जो कि इसराइल और फलस्तीन के बीच होना था, वो तो अब तक नहीं हो पाया.
लेकिन ये 'इब्राहिम संधि' जो इसराइल और यूएई के बीच हो रही है वो मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन को शिफ़्ट कर देगी और ट्रंप सरकार इसे विदेश नीति की सफलता के तौर पर पेश करेगी.
4. 'फ़लस्तीनियों के लिए ये धोखा है'
एक बार फिर फ़लस्तीन को पीछे छोड़ दिया गया. फ़लस्तीनियों ने इस इब्राहिम संधि को धोखा कहा है. इस संधि से पहले यूएई और बहरीन में सहमति थी कि इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने की क़ीमत फ़लस्तिनियों की आज़ादी है.
लेकिन अब इसराइल तो अरब देशों के साथ अपने रिश्ते सार्वजनिक तौर पर बनाने जा रहा है और फलस्तीनी अब भी पूर्व यरूशलम और वैस्ट बैंक में इसराइल के कब्ज़े में हैं.
अबु धाबी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन ज़ायेद एल नहयान कहते हैं कि उन्होंने इस डील की कीमत मांगी है कि इसराइल वैस्ट बैंक के बड़े हिस्से को अपने में नहीं मिलाएगा. लेकिन ऐसा लग रहा है कि नेतन्याहू भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते वैस्ट बैंक को मिलाने के ख़याल से फ़िलहाल पीछे हट रहे हैं.
फ़लस्तीनियों की चिंता बढ़ गई है क्योंकि बहरीन भी इस समझौते में शामिल है. ये बिना सऊदी अरब की सहमति के बिना नहीं हुआ होगा. सऊदी ने ही अरब शांति समझौते की नींव रखी थी और फ़लस्तीन की स्वतंत्रता की मांग रखी थी.
किंग सलमान के लिए तो इसराइल को मान्यता देना मुश्किल है लेकिन उनके बेटे मोहम्मद बिन सलमान ऐसा करने में शायद ना झिझकें.

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5. ईरान के लिए नया सिरदर्द
ईरान के नेताओं ने इस समझौते की कई बार आलोचना की है. ये इब्राहिम संधि उन पर दबाव तो डालेगी. ट्रंप के लगाए प्रतिबंध पहले ही आर्थिक तौर पर ईरान के लिए परेशानी का सबब हैं. अब रणनीतिक तौर पर भी समस्या होगी.
इसराइल के एयरबेस ईरान से काफ़ी दूर हैं. लेकिन यूएई तो खाड़ी के उस पार ही है. ये तब महत्वपूर्ण हो जाएगा अगर ईरान की न्यूक्लियर साइट्स पर एयरस्ट्राइक की बात फिर हुई तो. इसराइल, अमरीका, बहरीन, यूएई के पास अब कई नए विकल्प होंगे और ईरान के पास कम.
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