ईरान को परमाणु ताक़त हासिल करने से रोकने के लिए इसराइल क्या कर रहा है?

इसराइल ने हाल ही में क्षेत्रीय संगठनों के साथ सैन्य अभ्यास बढ़ाएं हैं

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    • Author, योलांडा नेल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, तेल अवीव

लाल सागर में पहली बार इसराइली, अमीराती और बहरीनी नौसेनाओं ने अमेरिकी युद्धपोत के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास किया है.

इसराइली तटीय शहर एलाट के उत्तर में रेगिस्तानी एयरबेस पर बीते महीने इसराइल समेत आठ देशों ने वायु सैनिक अभ्यास किया था और उनके जहाज़ हवाओं में अलग-अलग अभ्यास कर रहे थे.

इस तरह के युद्धाभ्यास ईरान को एक मज़बूत संदेश भेजने के लिए हैं जिसने हाल ही में अपना बड़ा सैन्य अभ्यास किया था और रणनीतिक गठबंधनों पर ज़ोर दिया था.

यह ऐसे समय पर हो रहा है जब इसराइल में अधिकतर लोग यह सोच रहे हैं कि उसके जैसा छोटा देश कैसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अकेले हमला कर सकता है.

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इसराइल की तैयारी

इसराइली सरकार ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर संभावित हमलों की तैयारी के लिए इसराइली सैन्य बलों को 1.5 अरब डॉलर की रक़म दी हुई है और रोज़ाना इसको लेकर सैन्य और राजनीतिक नेताओं की ओर से चेतावनियां आती रहती हैं.

ईरान पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों से मैंने उनका नज़रिए लिया है कि आगे क्या हो सकता है?

एक इसराइली सुरक्षा अधिकारी ने मुझसे कहा, "इसराइल की ईरान से युद्ध करने में कोई दिलचस्पी नहीं है लेकिन हम ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देंगे."

"उनके परमाणु कार्यक्रम की प्रगति को देखते हुए हम सभी विकल्पों की तैयारी कर रहे हैं जिसमें सैन्य क्षमताएं भी शामिल हैं."

ईरान और अमेरिका समेत पांच देशों के बीच हुए 2015 के परमाणु समझौते को दोबारा लागू करने को लेकर ईरान के ख़िलाफ़ तनाव में थोड़ी नरमी आई थी. इस समझौते को जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन (JCPOA) के नाम से जाना जाता है. 29 नवंबर से ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में इस पर फिर से चर्चा होगी.

JCPOA ईरान की परमाणु गतिविधियों को सीमित करता है और यह उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में भी ढील देता है. हालांकि, साल 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसराइल की अनुमति के बाद इसको निरस्त कर दिया था.

ईरान के पास कितना यूरेनियम है?

ईरान हमेशा कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है.

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नए चरण की बातचीत जब तय हुई तो ईरान ने घोषणा कर दी कि उसने 25 किलो यूरेनियम को 60% की शुद्धता के साथ और 210 किलो यूरेनियम को 20% की शुद्धता के साथ उसका उत्पादन कर लिया है. यह परमाणु बम बनाने के लिए ज़रूरी मात्रा से बस थोड़ा सा कम है.

तेहरान दोहराता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ़ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. यहां तक कि ईरानी विशेषज्ञ भी ज़ोर देते हैं कि इतनी उच्च शुद्धता का यूरेनियम सिर्फ़ परमाणु संपन्न राष्ट्रों के पास ही रहा है.

एक इसराइली सुरक्षा अधिकारी कहते हैं, "ईरान पहले की तुलना में आज परमाणु हथियार बनाने के बेहद क़रीब हैं क्योंकि उनके पास इसकी अलग-अलग सामग्री मौजूद है. यह एक तथ्य है जिसके इसराइली राष्ट्र के लिए सुरक्षा निहितार्थ हैं."

इसराइली रक्षा प्रतिष्ठानों का अनुमान है कि अगर ईरान ने फ़ैसला कर लिया है तो वो एक महीने के अंदर एक परमाणु हथियार बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में समृद्ध यूरेनियम जमा कर सकता है.

इस तरह के हथियार बनाने वालों को वॉरहेड की भी ज़रूरत होती है जो बैलिस्टिक मिसाइल पर लगाए जा सकते हैं. इससे समय का अंदाज़ा लगा पाना ख़ासा मुश्किल है लेकिन कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसमें 18 से 24 महीने लग सकते हैं.

इसराइल के बारे में माना जाता है कि उसके पास परमाणु हथियार हैं लेकिन उसने जानबूझकर इसे आधिकारिक तौर पर अस्पष्ट रखा है, उसका मानना है कि परमाणु संपन्न ईरान उसके लिए एक संभावित ख़तरा है.

वहीं ईरान इसराइली राष्ट्र को ही नहीं मानता है और उसके अधिकारी इस मान्यता को मानते रहे हैं कि वो आगे अस्तित्व में नहीं रहेगा.

वहीं अमेरिका समेत दूसरे खाड़ी अरब मुल्क जो इसराइल के क़रीब जा रहे हैं वो भी परमाणु संपन्न ईरान का विरोध करते हैं. यह अभी तक साफ़ नहीं है कि इसमें उनके क्या हित हैं जो उन्हें किसी भी सैन्य टकराव में मदद करने से पीछे खींचते हैं.

तेज़ी से बढ़ता तनाव

पूर्व इसराइली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और वर्तमान में यरुशलम इंस्टिट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजी एंड सिक्योरिटी में सीनियर फ़ैलो याकोव अमिदरोर ने पहली बार 90 के दशक में ईरान के परमाणु इरादों के ख़तरों के बारे में बताया था. उस समय वो सैन्य ख़ुफ़िया विभाग में काम करते थे.

ताज़ा बदलाव पर उनका एक आकलन है. वो कहते हैं, "इसराइल कभी ऐसी स्थिति में नहीं रह सकता है जब ईरानी बम के बहुत और बहुत क़रीब पहुंच चुके हों और इसे कैसे रोकना है इसको लेकर जल्द से जल्द कोई फ़ैसला लेना होगा."

"मैं बम गिरा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं देखता हूं क्योंकि मुझे नहीं लगता है कि परमाणु ताक़त पाने के अपने सपने से अगर ईरानी पीछे हटते हैं तो इसके बाद वो आज से ज़्यादा आक्रामक हो जाएंगे."

इसराइल अपने दुश्मनों के परमाणु ठिकानों को दो बार तबाह करने में सफल हुआ है. पहले उसने 1981 में इराक़ में किया और दूसरी बार 2007 में सीरिया में किया.

लेकिन कई विश्लेषक सवाल खड़ा करते हैं कि क्या इसराइल के पास ईरान के बेहद उन्नत परमाणु कार्यक्रमों को सही तरीक़े से रोकने की क्षमता है क्योंकि ईरान के पास ऐसे परमाणु ठिकाने हैं जो ज़मीन के नीचे भी हैं और इसके लिए इसराइल को कितनी भारी क़ीमत चुकानी होगी.

अमिदरोर स्वीकार करते हैं, "इसराइल में हर कोई मानता है कि यह (हमला) बेहद जटिल युद्ध की ओर ले जा सकता है."

वहीं ईरान कई बार दोहरा चुका है कि वो किसी भी हमले का 'एक चौंकाने वाला जवाब' देगा. ऐसा माना जाता है कि ईरान अपनी सेनाओं के अलावा छद्म लड़ाकों के साथ भी गठजोड़ कर सकता है जो इस पूरे क्षेत्र में फैले हुए हैं. इनमें लेबनान में हिज़बुल्ला, सीरिया और इराक़ में शिया लड़ाके, यमन में हूती विद्रोही आंदोलन और ग़ज़ा पट्टी में इस्लामी जिहाद के लड़ाके शामिल हैं. इनके पास हज़ारों रॉकेट हैं.

इसराइल-ईरान युद्ध अगर होता है तो उसमें क्षेत्र के ईरान समर्थित लड़ाके समूह भी ज़रूर शामिल होंगे.

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इन ख़तरों के बावजूद कुछ लोगों का मानना है कि हमला काफ़ी फ़ायदेमंद होगा और यह ईरान के परमाणु कार्यक्रम को कुछ सालों के लिए पीछे धकेल देगा.

लेकिन आधिकारिक प्राथमिकता अभी भी शांति बहाली और बातचीत के साथ हल निकालने की है.

मोसाद ख़ुफ़िया एजेंसी में रिसर्च की प्रमुख रहीं सिमा शाइन कहती हैं, "मुझे उम्मीद है कि कूटनीतिक चैनल सफल होगा. लेकिन मैं इसकी फ़िलहाल बहुत अधिक संभावना नहीं मानती हूं."

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन प्रशासन ने कहा है कि 'आपसी अनुपालन' के साथ ईरान की JCPOA में वापसी होगी लेकिन इसराइल की सरकार ने इसका विरोध किया है.

इस सौदे के ज़रिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर 2025 तक कई प्रतिबंध हट जाते हैं और यह ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल बनाने पर या क्षेत्र में चरमपंथी समूहों को समर्थन देने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता है.

इसराइल के इंस्टिट्यूट फ़ॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़ में ईरान कार्यक्रम की प्रमुख शाइन कहती हैं, "ईरान की स्थिति को लेकर मेरा आकलन है कि वो वास्तव में पीछे वापस नहीं लौटना चाहता है."

"वो असल में देखना चाहते हैं कि उन पर से कुछ प्रतिबंध कम हों और उनको मालूम है कि इसके बदले में उन्हें इसके लिए कुछ देना भी होगा. सवाल यह है कि ईरान की गणना क्या है, उसकी अर्थव्यवस्था कितनी गहराई से राहत चाहती है?"

उनको डर है कि परमाणु समझौते पर बातचीत के कारण और समय व्यर्थ हो सकता है और इससे ईरान को अपने यूरेनियम क्षमता को बढ़ाने में मदद मिल सकती है.

क्या कार्रवाई हो सकती है?

वॉशिंगटन के मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट में ईरान विश्लेषक एलेक्स वटांका ज़ोर देते हुए कहते हैं कि तेहरान के अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर गहरी वैचारिक प्रतिबद्धताएं हैं.

यूरोपीय संघ और अमेरिका के अविश्वास के बावजूद एलेक्स का मानना है कि ईरान JCPOA में वापस आना चाहता है ताकि उस पर घरेलू आर्थिक दबाव में कमी आई. वो देखते हैं कि हालिया कार्रवाई और मांगों ने 'उनके हाथ मज़बूत किए हैं.'

ईरान के अधिकारियों का कहना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम राष्ट्रीय गर्व का मुद्दा है.

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वटांका का मानना है कि ऐसा ज़रूरी नहीं है कि ईरान परमाणु हथियार चाहता हो. "यह एक विकल्प है जो वो चाहता है लेकिन यह केवल हथियार बनाने के लिए नहीं है. यह ईरान के एक परमाणु संपन्न राष्ट्र बनने के लिए है और यह अमेरिका को दिखाने के लिए है कि शासन बदलने वाला नहीं है."

हालांकि, वो इसराइल के हमला करने के ख़तरे को लेकर बेहद विश्वस्त नहीं हैं. उनका मानना है कि गुप्त रूप से की गई कोशिशें ईरान की परमाणु प्रगति को बेहतर तरीक़े से रोक सकती हैं.

वटांका ने कहा, "वो साबित कर चुके हैं कि वो कर सकते हैं. उच्च स्तर पर ईरान में साफ़तौर पर घुसपैठ की जा चुकी है. उनके पास निश्चित रूप से सभी जानकारियां हैं."

ऐसी रिपोर्टें थीं कि एक दशक पहले अमेरिका और इसराइल ने मिलकर स्टक्सनेट कंप्यूटर वायरस के ज़रिए ईरानी परमाणु कार्यक्रम को बाधित करने की कोशिश की थी.

हाल ही में ईरान ने इसराइल पर अपने शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मोहिसन फ़खरीज़ादेह की नाटकीय रूप से हत्या करने का आरोप लगाया था. तेहरान के नज़दीक़ आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से युक्त रिमोट कंट्रोल मशीनगन से उनकी हत्या कर दी गई थी और परमाणु प्रतिष्ठान में विस्फोट हुआ था.

इसराइल ने ईरान के प्रभाव को ख़त्म करने के लिए पड़ोसी देश सीरिया और हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ कई सैन्य कार्रवाइयां भी की हैं जिन्हें 'युद्ध के भीतर युद्ध' भी कहा जा सकता है.

ईरान ने कहा था कि नतांज़ परमाणु केंद्र पर जुलाई 2020 में हुआ धमाका 'नुक़सान पहुंचाने' के लिए था.

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लगातार बढ़ता डर

कई विशेषज्ञों में इस बात को लेकर ख़ासा मतभेद है कि आगे क्या होगा. हालांकि इस बात को लेकर सहमति है कि ईरानी परमाणु योजनाओं पर आगामी बातचीत बेहत महत्वपूर्ण समय पर हो रही है.

अगर ईरान परमाणु हथियार बनाने में सफल हो जाता है तो फिर सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इसी रास्ते पर चल निकलेंगे.

वॉशिंगटन कह चुका है कि वो मध्य पूर्व में 'हमेशा के युद्धों' को बंद करना चाहता है लेकिन उसने चेतावनी दी है कि ईरान के मामले में वो 'अन्य विकल्पों' को भी देखेगा, जिसमें सैन्य ताक़त विकल्प भी शामिल है.

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हाल ही में इसराइल में हुए वायु सेना अभ्यास के अंत में सांकेतिक रूप से एक अमेरिकी लड़ाकू विमान एक ऐसा बम लेकर जा रहा था जो ज़मीन के अंदर परमाणु ठिकानों को नष्ट कर सकता है और उसके साथ दो इसराइली लड़ाकू जहाज़ भी थे.

इसको ईरान के ख़िलाफ़ एक गंभीर सैन्य तैयारी के रूप में भी देखा जा सकता है.

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