इसराइल-फ़लस्तीन हिंसाः क्यों इतने आक्रामक हो गए हैं नेतन्याहू

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इसराइल ने शुक्रवार को ग़ज़ा पट्टी पर हवाई हमले किए. इससे एक दिन पहले ही इसराइली सुरक्षाबलों ने वेस्ट बैंक के जेनिन शरणार्थी शिविर में चलाए अभियान में नौ फ़लस्तीनियों को मार दिया था. ये हाल के सालों में वेस्ट बैंक में इसराइली सुरक्षाबलों का सबसे बड़ा अभियान था.
साल 2023 में अब तक इसराइली सुरक्षाबलों के अभियानों में कम से कम 30 फ़लस्तीनियों की मौत हुई है जिनमें विद्रोही लड़ाके और आम नागरिक शामिल हैं.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ साल 2022 में इसराइल के सुरक्षाबलों की कार्रवाई में कम से कम 150 फ़लस्तीनी मारे गए थे. वहीं वेस्ट बेंक में बसे इसराइली लोगों के हमलों में चार फ़लस्तीनी मारे गए थे.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ इन कार्रवाइयों और हमलों में मारे गए अधिकतर लोग 25 साल से कम उम्र के थे.
ताज़ा हिंसा के बाद फ़लस्तीनी इलाक़ों में प्रशासन चलाने वाली फ़लस्तीनी अथॉरिटी (पीए) ने कहा है कि वह इसराइल के साथ अपना सुरक्षा सहयोग ख़त्म कर रही है.

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इसराइल और फ़लस्तीन के बीच क्यों है तनाव?
- प्रथम विश्व युद्ध के बाद मध्य पूर्व में ऑटोमन साम्राज्य के ख़त्म होने के बाद इस इलाक़े पर ब्रितानियों का कब्ज़ा हुआ.
- यहां अधिकतर यहूदी और अरब समुदाय के लोग रहते थे. दोनों में तनाव बढ़ा जिसके बाद ब्रितानी शासकों ने यहां यहूदियों के लिए फ़लस्तीन में 'ज़मीन' बनाने की बात की. यहूदी इस इलाक़े को अपना पूर्वजों की ज़मीन मानते हैं, इस पर अरब समुदाय भी अपना दावा करते हैं. नतीजा ये हुआ कि दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा.
- 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने फ़लस्तीन को दो हिस्सों में बांटने के फ़ैसले पर मुहर लगी, एक हिस्सा यहूदियों का और दूसरी अरब समुदायों का.
- अरब के विरोध के बीच 14 मई 1948 को यहूदी नेताओं ने इसराइल राष्ट्र के गठन का एलान किया और ब्रितानी यहां से चले गए.
- इसके तुरंत बाद पहला इसराइल-अरब युद्ध हुआ. क़रीब साढ़े सात लाख फ़लस्तीनी बेघर हो गए.
- ये पूरा क्षेत्र तीन हिस्सों में बंट गया- इसराइल, वेस्ट बैंक (जॉर्डन नदी का पश्चिमी किनारा) और ग़ज़ा पट्टी.
- फ़लस्तीनी आबादी ग़ज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक में रहती है. इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच संघर्ष अब तक हो रहा है.
- इसराइल का मक़सद दुनिया के मंच पर यहूदी राष्ट्र के रूप में मान्यता पाने का है. वहीं फ़लस्तीन इसका विरोध करता रहा है.


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ग़ज़ा पर हवाई हमले
इसराइल ने शुक्रवार को ग़ज़ा पट्टी पर हवाई हमले किए. रिपोर्टों के मुताबिक़ इसराइली विमानों ने अल-मग़ाज़ी शरणार्थी कैंप पर कम से कम तेरह हवाई हमले किए. इसके अलावा ग़ज़ा शहर के अल-ज़ैतून इलाक़े पर भी हमले हुए.
पहले इसराइली ड्रोन से मिसाइलें दाग़ीं गईं, इसके बाद लड़ाकू विमानों ने हमले किए.
शुक्रवार को हुए हवाई हमलों में हताहतों के बारे में ये रिपोर्ट लिखे जाने तक कोई जानकारी नहीं मिली है.
ग़ज़ा दुनिया का सर्वाधिक घनी आबादी वाला इलाक़ा है जहां क़रीब 21 लाख लोग रहते हैं.
इसराइल का कहना है कि उसने रॉकेट हमलों के बाद जवाबी कार्रवाई करते हुए हमास की एक भूमिगत रॉकेट फ़ैक्ट्री को इस हमले में नष्ट कर दिया है.
इसराइल ने फ़लस्तीनी क्षेत्र की तरफ़ से दाग़े गए कई रॉकेटों को हवा में नष्ट करने का दावा भी किया है. इसराइल का कहना है कि वो इन हवाई हमलों में इस्लामिक जेहाद के नेताओं को भी निशाना बना रहा है.
वहीं फ़लस्तीनी समूहों ने कहा है कि वो जेनिन में इसराइली हमले में मारे गए फ़लस्तीनी लोगों की मौत का बदला लेंगे.

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फिर से बढ़ रहा है तनाव
इन ताज़ा कार्रवाइयों के बाद इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच एक बार फिर से तनाव बढ़ गया है.
ग़ज़ा और जेनिन पर इसराइली हमलों की तुर्की ने निंदा की है. एक बयान में तुर्की के विदेश मंत्रालय ने कहा है, "हम वेस्ट बैंक में बढ़ रहे तनाव से चिंतित हैं और हम नागरिकों की जान लेने वाले हमलों की निंदा करते हैं."
तुर्की और इसराइल ने साल 2022 में कई सालों के तनाव के बाद राजनयिक संबंध बहाल किए थे. हालांकि इसराइल में नई कट्टरवादी सरकार बनने के बाद ये रिश्ते अब खटाई में पड़ते दिख रहे हैं.
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन इसराइल, मिस्र और वेस्ट बैंक का दौरा करने जा रहे हैं. वो दोनों पक्षों से तनाव को कम करने की अपील करेंगे.
जेनिन कैंप पर इसराइली सुरक्षा बलों की कार्रवाई के कुछ देर बाद ही ब्लिंकेन के अगले सप्ताह शुरू होने जा रहे इस दौरे की घोषणा की गई है.

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इसराइल फ़लस्तीन के बीच विवाद
14 मई 1948 को इसराइल राष्ट्र का गठन हुआ था. इसके तुरंत बाद पहला इसराइल-अरब युद्ध हुआ जिसमें इसराइल की जीत हुई और क़रीब साढ़े सात लाख फ़लस्तीनी बेघर हो गए.
ये क्षेत्र तीन हिस्सों में बंट गया- इसराइल, वेस्ट बैंक (जॉर्डन नदी का पश्चिमी किनारा) और ग़ज़ा पट्टी. फ़लस्तीनी आबादी ग़ज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक में रहती है.
इसके बाद से ही इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच संघर्ष चल रहा है. इसराइल, मिस्र, जॉर्डन, सीरिया और अरब देशों के बीच भीषण युद्ध भी हो चुके हैं.
हाल के सालों में तनाव इसराइली अदालत के कई फ़लस्तीनी परिवारों को शेख़ जर्रार इलाक़े से निकालने के आदेश के बाद से बढ़ा है. अक्तूबर 2020 में इसराइल की एक अदालत ने पूर्वी यरूशलम के शेख़ जर्रार इलाक़े में रह रहे फ़लस्तीनी परिवारों को जगह ख़ाली करने और उनकी जगह यहूदियों को बसाने का आदेश दिया. मई 2021 तक परिवारों को अपने घर और ज़मीनें ख़ाली करनी थी. फ़रवरी 2021 में इन परिवारों ने इसराइल के कोर्ट में अपील की जिसे लेकर क़ानूनी लड़ाई चल रही है.
अप्रैल 2021 में फ़लस्तीनियों ने शेख जर्रार से लोगों को निकाले जाने का विरोध किया. मई में जब अदालत ने घर ख़ाली करने का आदेश दिया तो प्रदर्शन और उग्र हो गए.
कई दिनों के धरना-प्रदर्शन के बाद सात मई 2021 को अल-अक़्सा मस्जिद परिसर में हिंसा शुरू हो गई.
प्राचीन यरुशलम शहर में हिंसक वारदातों के बाद समूचे पूर्वी यरुशलम में तनाव फैल गया.
कई दिनों की हिंसा के बाद 10 मई को हमास ने इसराइल पर रॉकेट हमले किए, जिनके जवाब में इसराइल ने ग़ज़ा पर हवाई हमले किए और कई फ़लस्तीनी मारे गए.
21 मई को दोनों पक्षों ने मिस्र की मध्यस्थता में समझौता कर लिया. ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक़ इस संघर्ष में कम से कम 260 फ़लस्तीनी मारे गए थे.
धुर-दक्षिणपंथी सरकार
दिसंबर 2022 में बिन्यामिन नेतन्याहू एक बार फिर इसराइल के प्रधानमंत्री बनें. इस बार उन्होंने इसराइल के इतिहास का सबसे कट्टरपंथी और धार्मिक गठबंधन बनाया.
नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के साथ दो अति-रुढ़िवादी और तीन धुर-दक्षिणपंथी पार्टियां भी सत्ता में आ गईं. इनमें रिलीजियस जायनिस्ट पार्टी (धार्मिक यहूदीवादी पार्टी) भी शामिल है जो वेस्ट बैंक में बसने वाले यहूदियों के आंदोलन और अति-राष्ट्रवादी यहूदी धड़े से जुड़ी है.
सत्ता में आने के लिए नेतन्याहू ने इन कट्टरवादी पार्टियों को कई रियायतें दीं, इनमें वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का विस्तार भी शामिल है.
नेतन्याहू ने अरब लोगों ख़िलाफ़ नस्लीय हिंसा भड़काने के दोषी पाए गए ज्यूइश पॉवर पार्टी के नेता इतामार बेन गवीर को राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बना दिया.
वहीं वेस्ट बैंक में इसराइल बस्तियों का काम देखने वाले विभाग का प्रमुख धार्मिक यहूदीवादी पार्टी के प्रमुख बेज़ालेल स्मोटरिच को बना दिया.
इसराइल की नई सरकार अपनी कट्टरवादी और फ़लस्तीनी विरोधी नीतियों को तेज़ी से लागू करना चाह रही है और इसी को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है.

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इतने आक्रामक क्यों हो गए हैं नेतन्याहू?

इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स के डॉ फ़ज़लुर्रहमान का विश्लेषण
मध्य-पूर्व में इसराइल का वर्चस्व पिछले 8-10 साल में बहुत अधिक बढ़ गया है. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौर में आए अब्राहम एकॉर्ड ने इस वर्चस्व को और भी ज़्यादा मज़बूत किया है. 1948 के बाद से इसराइल की सबसे पहली प्राथमिकता रही है इसराइली राष्ट्र को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलवाना.
इसराइल का मक़सद हमेशा से ही यह रहा है कि वो दुनिया के मंच पर अपने आप को यहूदी राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलाए. पिछले 70-72 सालों में संघर्ष करते हुए और धीरे-धीरे इसराइल ने इस मक़सद को हासिल कर लिया है. पहले यूरोप और अमेरिका, फिर लातिन अमेरिका और अफ़्रीका और फिर एशिया ने इसराइल को मान्यता दी.
इसराइल अपने पड़ोसी देशों से भी मान्यता चाहता था. पड़ोसी देशों मिस्र और जॉर्डन और अन्य देशों के साथ इसराइल ने पर्दे के पीछे और सामने से वार्ताएं की. दशकों के प्रयास के बाद इसराइल इन देशों से संबंध बनाने में कामयाब रहा. इस दौरान इसराइल को सबकुछ मिलता गया और फ़लस्तीनियों के हाथ से चीज़ें निकलती गईं.
संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान से संबंध बहाल होने के बाद इसराइल की नीति में एक बहुत बड़ा बदलाव ये आया है कि वो अब आक्रामक हो गया है. इस आक्रामक रवैया का मतलब ये है कि अब उसे अपनी नीति को आगे बढ़ाने में कोई रुकावट नहीं है.
पड़ोसी देशों मिस्र और जॉर्डन से इसराइल का जो भी विरोध था उसे अब इसराइल ने ख़त्म कर दिया है. इसराइल ने 1979 में मिस्र और 1994 में जॉर्डन से समझौता किया.
इसराइल और नेतन्याहू की आक्रामकता की एक वजह तो ये है कि उसने अरब दुनिया में अपने ख़िलाफ़ विरोध को लगभग शांत कर दिया है.
अब अरब देश इसराइल के साथ सुरक्षा, कूटनीतिक और कारोबारी रिश्ते चाहते हैं. इसराइल और संयुक्त अरब अमीरात के बीच हो रहे समझौते इस बात के उदाहरण हैं.
नेतन्याहू की आक्रामकता की एक दूसरी वजह इसराइल की घरेलू राजनीति है. नेतन्याहू के साथ कट्टरवादी पार्टियां हैं और उनकी राजनीतिक ज़मीन लगातार मज़बूत हो रही है.
नवंबर में हुए ताज़ा चुनावों में नेतन्याहू की समर्थक एक ऐसी कट्टर पार्टी ने जीत हासिल की है जिसके नेता हिंसा भड़ाकने के दोषी पाये जा चुके हैं.
इस समय इसराइल में कट्टरवादी विचारधारा बढ़ रही है. इन कट्टरवादी तत्वों को शांत करने के लिए भी नेतन्याहू और आक्रामक हो रहे हैं.
इसराइल की आक्रामकता की और वजह वैश्विक स्तर पर बदल रही राजनीति भी है. इसराइल-फ़लस्तीन का मुद्दा अब वैश्विक राजनीति में उतना अहम नहीं है जितना अब से दस साल पहले तक हुआ करता था. अब चरमपंथ की बदलती शक्ल और यूरोप में रूस की आक्रामकता पर दुनिया का ध्यान है.
वहीं अमेरिका में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद भी फ़लस्तीनियों के मुद्दे को लेकर बहुत कुछ बदला है. ट्रंप ने खुलकर इसराइल का समर्थन किया. उन्होंने अमेरिका के दूतावास को यरुशलम में स्थापित कर दिया. ट्रंप के जाने के बाद आए जो बाइडेन ने भी इसराइल को लेकर अमेरिका का रवैया नहीं बदला. इससे इसराइल का हौसला और बढ़ा है.
70 सालों से फ़लस्तीन अरब दुनिया का एजेंडा था. अरब देशों ने हर तरह से फ़लस्तीन का समर्थन किया. लेकिन इन 70 सालों में कुछ हासिल नहीं हुआ.
सऊदी अरब, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात और दूसरे देशों ने फ़लस्तीनी एजेंडे का आर्थिक और राजनयिक रूप से सहयोग किया. लेकिन अब 70 साल बात उन्हें ये अहसास हो रहा है कि हम कहां पहुंचे.
इस दौरान फ़लस्तीनी कमज़ोर होते गए और इसराइल मज़बूत होता गया. मिस्र और जॉर्डन जो कभी फ़लस्तीनियों का मुद्दा उठा रहे थे अब इसराइल के क़रीबी हैं. ऐसे में अरब देशों को ये लगने लगा कि हम कब तक फ़लस्तीनियों के मुद्दे को उठाते रहेंगे.
वहीं दूसरी तरफ़ इसराइल को दुनिया के हर कोने में मान्यता मिल रही है. उसका सुरक्षा ढांचा मज़बूत हो रहा है. वो कई देशों को सुरक्षा और ख़ुफ़िया तकनीक एक्सपोर्ट कर रहा है. ऐसे में फ़लस्तीनियों को लेकर अरब देशों का मुखर इसराइल विरोध लगभग शांत हो गया है.
यही वजह है कि इसराइल और नेतन्याहू लगातार फ़लस्तीनी मुद्दे को लेकर आक्रामक हैं.

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