बिन्यामिन नेतन्याहू: बार-बार वापसी करने वाले ‘बीबी’ क्यों हैं ख़ास?

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जून 2021 में जब लगातार 12 साल पीएम रहने के बाद बिन्यामिन नेतन्याहू को अपना पद छोड़ना पड़ा, तब कई जानकारों ने कहा था कि ये उनके दौर का अंत था, और एक नए दौर की शुरुआत. लेकिन नेतन्याहू ने वादा किया था : हम वापस आएंगे,
चुनाव के अब तक के नतीजे बता रहे हैं कि उनकी विदाई बहुत कम समय के लिए थी और और एक साल से थोड़े ही ज़्यादा समय बाद वो एक शानदार जीत के साथ वापस आ रहे हैं.
73 साल के लिकुड पार्टी के प्रमुख ने अपने सेंटर लेफ्ट प्रतिद्वंदी यार लापिड को हराया है. लापिड वही शक्स हैं जिन्होंने ने नेतन्याहू को हराने की योजना बनाई थी और कामयाब हुए थे. नाटकीय रूप से उनकी वापसी उनके समर्थकों के विश्वास को और ताकत देगी की "किंग बीबी" राजनीतिक तौर पर हार नहीं सकते.
अगर नतीजे कंफ़र्म हुए को इसराइल के प्रधानमंत्री पद पर सबसे लंबे समय तक रहने वाले नेतन्याहू पांचवा चुनाव जीतकर छठी बार पीएम बनेंगे. 74 साल के इस देश के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है.
नेतन्याहू की सफलता के पीछे उनकी बनाई गई उस इमेज का बहुत योगदान है कि इस व्यक्ति ने इसराइल को मध्य पूर्व की ख़तरनाक ताकतों से सुरक्षित रखा है. वो फ़लस्तीन को लेकर बहुत सख्त रहे हैं और शांति वार्ता से ज़्यादा कड़ी सुरक्षा को तवज्जो दी है. वो लंबे समय से ईरान से ख़तरे को लेकर चेतावनी देते रहे हैं.
लेकिन राजनीतिक सफलताओं के साथ ही उनपर घूसखोरी, धोखाधड़ी समेत कई गंभीर आरोप लगे हैं. हालांकि उन्होंने हमेशा इन आरोपों को ग़लत बताया है. टाइम्स ऑफ़ इसराइल ने तो उन्हें "अल्ट्रा-ड़िविसिव" यानी अलगाव पैदा करने वाला बताया है. विपक्ष उन्हें लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताता है.

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भाई की विरासत
बिन्यामिन नेतन्याहू का जन्म 1949 में तेल अवीव में हुआ. 1963 में उनका परिवार अमेरिका चला गया जब उनके इतिहासकार और यहूदी अधिकार कार्यकर्ता पिता बेंजियन को एक अकादमिक पद की पेशकश की गई.
18 साल की उम्र में नेतन्याहू इसराइल लौट आए उन्होंने सेना में पांच वर्ष बिताए जहाँ उन्होंने एक इलीट कमांडो यूनिट में एक कप्तान के रूप में सेवा की. 1968 में नेतन्याहू ने बेरूत के हवाई अड्डे पर एक हमले में भाग लिया और 1973 के मध्य पूर्व युद्ध में वे लड़े.
इसराइल में सैन्य सेवा के बाद नेतन्याहू वापस अमेरिका चले गए जहां उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में स्नातक और मास्टर डिग्री हासिल की.

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1976 में नेतन्याहू के भाई जोनाथन युगांडा के एंटेबे में एक अपहृत विमान से बंधकों को छुड़ाने के लिए हुई कार्रवाई में मारे गए थे. उनकी मृत्यु का नेतन्याहू परिवार पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनका नाम इसराइल में प्रसिद्ध हो गया.
नेतन्याहू ने अपने भाई की याद में एक आतंकवाद विरोधी संस्थान की स्थापना की और 1982 में वाशिंगटन में इसराइल के मिशन के उप प्रमुख बने.
एक विशिष्ट अमेरिकी उच्चारण के साथ स्पष्ट अंग्रेजी बोलने वाले नेतन्याहू अमेरिकी टेलीविजन पर एक जाना-पहचाना चेहरा और इसराइल के लिए एक प्रभावी वकील बन गए. नेतन्याहू को 1984 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में इसराइल का स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त किया गया.

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सत्ता तक का सफ़र
1988 में इसराइल लौटने के बाद वो घरेलू राजनीति में शामिल हुए और नेसेट (संसद) में लिकुड पार्टी के लिए एक सीट जीतकर उप विदेश मंत्री बने. कुछ समय में वे पार्टी के अध्यक्ष बने और 1996 में यित्ज़ाक राबिन की हत्या के बाद हुए चुनाव में इसराइल के पहले सीधे चुने गए प्रधानमंत्री बने.
इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच 1993 के ओस्लो शांति समझौते की तीखी आलोचना करने के बावजूद नेतन्याहू ने हेब्रोन के 80 प्रतिशत भाग को फ़लस्तीनी प्राधिकरण के नियंत्रण में सौंपने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और कब्जे वाले वेस्ट बैंक से अधिक निकासी के लिए सहमति जताई.
अपने पूर्व कमांडर और लेबर लीडर एहुद बराक से हारकर नेतन्याहू ने 17 महीने पहले चुनाव की घोषणा की और 1999 में उन्होंने अपना पद खो दिया. इसके बाद नेतन्याहू ने लिकुड नेता के रूप में पद छोड़ दिया और उनकी जगह एरियल शेरोन ने ले ली.
2001 में शेरोन के प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद नेतन्याहू सरकार में लौटे. वे पहले विदेश मंत्री और फिर वित्त मंत्री बने. 2005 में उन्होंने कब्जे वाले ग़ज़ा पट्टी से इसराइल की वापसी के विरोध में इस्तीफा दे दिया.
नेतन्याहू को 2005 में एक मौका फिर मिला जब शेरोन ने लिकुड पार्टी से अलग होकर एक नई मध्यमार्गी पार्टी कदीमा की स्थापना की.

नेतन्याहू का अब तक जीवन
- 1949 - तेल अवीव में जन्म
- 1967-73 - इलीट कमांडो यूनिट में रहे
- 1984 - यूएन में राजदूत बने
- 1988 - संसद और सरकार में प्रवेश
- 1996 - प्रधानमंत्री चुने गए
- 1999 - चुनाव में हार सामना किया
- 2002-03 - विदेश मंत्री रहे
- 2003-05 - वित्त मंत्री रहे, ग़ज़ा पट्टी से इसराइल की वापसी के विरोध में इस्तीफा दे दिया.
- दिसंबर 2005 - लिकुड पार्टी के नेता बने
- 2009 - पीएम के तौर पर वापसी
- 2013 - फिर पीएम चुने गए
- 2015 - चौथी बार पीएम बने
- 2019 - घूसखोरी और धोखाधड़ी के आरोप लगे
- 2020 - पांचवे टर्म की शुरुआत, ट्रायल शुरू हुआ
- 2021 - विपक्षा गठबंधन के बाहर किया
- 2022 - आंशिक नतीज़ों के अनुसार छठी बार चुनाव जीता

नेतन्याहू ने फिर से लिकुड का नेतृत्व हासिल किया और मार्च 2009 में दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए. उन्होंने वेस्ट बैंक में बंदोबस्त निर्माण पर एक अभूतपूर्व 10 महीने की रोक के लिए सहमति जताई जिससे फलस्तीनियों के साथ शांति वार्ता हो पाई लेकिन 2010 के अंत में वार्ता विफल हो गई.
हालाँकि 2009 में उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसराइल के साथ एक फ़लस्तीनी राज्य की अपनी सशर्त स्वीकृति की घोषणा की थी लेकिन बाद में उन्होंने अपने रुख को सख्त कर लिया. 2019 में एक इसराइली रेडियो स्टेशन से बातचीत करते हुए नेतन्याहू ने कहा था कि "एक फिलिस्तीनी राज्य नहीं बनाया जाएगा, जैसा कि लोग बात कर रहे हैं. ऐसा नहीं होगा".

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ग़ज़ा का विवाद
साल 2009 में नेतन्याहू के सत्ता में लौटने के बाद और उससे पहले फ़लस्तीन के हमले और मिलिट्री के एक्शन ने इसराइल को गज़ा पट्टी में लडाई के बीच खड़ा कर दिया. साल 2021 में सिर्फ 12 सालों में चौथी बार ऐसा विवाद हुआ. इसके कारण विरोधी पार्टियों का नेतन्याहू को सत्ता से बेदखल करने करने की कोशिश नाकाम हुई. कई चुनाव बेनतीजा रहे,
इस विवाद में इसराइल को अमेरिका का साथ मिला, जो उसका सबसे क़रीबी साथी था. लेकिन नेतन्याहू और बराक ओबामा ने बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं रहे.
एक मौका ऐसा भी आया जब मार्च 2015 में कांग्रेस को संबोधित करते हुए नेतन्याहू ने अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर प्रोग्राम को "ख़राब डील" बताया. ओबामा प्रशासन ने इस यात्रा की निंदा करते हुए इसे दख़ल देने और नुकसान पहुंचाने वाला बताया.

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ट्रंप से रिश्ते
2017 में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका और इसराइल की सरकारों के बीच कई समझौते हुए. एक साल के भीतर ही ट्रंप ने एलान किया कि वो येरूशलम को इसराइल की राजधानी का दर्जा देते हैं.
इस कदम से अरब देश नाराज़ हुए क्योंकि वो येरूशलम के आधे हिस्से पर फ़लस्तीन के दावे का समर्थन करते हैं. इसराइल ने 1967 में मध्य पूर्व जंग के बाद से इस इलाके पर कब्ज़ा कर रखा है.
जनवरी 2020 में नेतन्याहू इसराइल और फ़लस्तीन के बीच शांति के लिए बनाए गए ट्रंप के ब्लूप्रिंट की तारीफ़ की और इसे "सदी का अवसर" बताया, फ़लस्तीन ने इसे एकतरफ़ा बताया था.

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नेतान्याहू ईरान के मुद्दे पर भी ट्रंप के साथ दिखे. उन्होंने साल 2018 के ईरान न्यूक्लियर डील से बाहर आने और आर्थिक प्रतिबंध लगाते ने राष्ट्रपति ट्रंप के फ़ैसले का समर्थन किया.
हालांकि जब जो बाइडन के चुनाव जीतने पर नेतन्याहू ने उन्हें बधाई दी, तो ट्रंप ने उनपर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उनपर धोखा देने का आरोप लगाया.
2016 के बाद नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने शुरू हुए. नवंबर 2019 में उन पर तीन अलग-अलग मामलों में रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वास भंग करने का आरोप लगाया गया.
आरोप और ट्रायल
नेतन्याहू पर आरोप है कि उन्होंने धनी व्यापारियों से उपहार स्वीकार किए और अधिक सकारात्मक प्रेस कवरेज पाने का प्रयास करने के लिए पत्रकारों और मीडिया मालिकों पर एहसान किए.
नेतन्याहू ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि ये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं. उनका कहना है कि राजनीतिक फ़ायदे के लिए उन्हें निशाना बनाया गया और वो इसे विपक्ष की साजिश बताते हैं. मई 2020 में उन पर मुकदमा चला, पहली बार किसी पीएम के साथ ऐसा हुआ.
लेकिन इससे उनके चुनाव पर असर नहीं पड़ा. एग्ज़िट पोल के नतीजों के बाद बुधवार को उन्होंने जश्न मनाते हुए समर्थकों से कहा, "हमने इसराइल के लोगों का भरोसा जीता है."
उनके विरोधियों के लिए नेत्नयाहू का वापस आना एक नए दौर का आगाज़ है.
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