अल-अक़्सा मस्जिद पर इसराइल की टिप्पणी से बढ़ी आशंका

अल-अक्सा मस्जिद

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इसराइल के प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट ने रविवार को अल-अक़्सा मस्जिद के प्रबंधन में बाहरी हस्तक्षेप को ख़ारिज करने की बात कही है. इस बयान के बाद जॉर्डन और फ़लस्तीन भड़क गए हैं.

दरअसल, नेफ़्टाली बेनेट के बयान को जॉर्डन और इसराइल के बीच सन् 1994 में हुई शांति संधि से पीछे हटना माना जा रहा है. इस संधि के तहत ही यरुशलम में मुसलमानों और ईसाइयों के पवित्र स्थलों की देखरेख और प्रबंधन का ज़िम्मा जॉर्डन को मिला था.

अल-अक़्सा मस्जिद परिसर के प्रबंधन को लेकर इसराइली पीएम ने कहा, "हम किसी भी विदेशी हस्तक्षेप को ख़ारिज करते हैं." इसराइली पीएम के इस बयान को जॉर्डन के साथ समझौते से पीछे हटने के तौर पर देखा जा रहा है.

बेनेट ने रविवार को हुई कैबिनेट बैठक की शुरुआत में कहा था, "अल-अक़्सा मस्जिद और यरुशलम को लेकर निर्णय इसराइल की सरकार करेगी."

उन्होंने ये भी दावा किया कि इसराइली सरकार यरुशलम में सभी धर्मों के लोगों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार बनाए रखेगी.

जॉर्डन की संसद में फ़लस्तीनी मामलों से जुड़ी समिति ने पीएम बेनेट के बयानों की निंदा करते हुए इसे 'गैर-ज़िम्मेदाराना' करार दिया है. समिति ने नेफ़्टाली बेनेट से ये भी कहा है कि वो "दो अरब मुसलमानों के सब्र की इम्तिहान न लें."

इसराइल

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जॉर्डन का इसराइल पर आरोप

यरुशलम में जारी तनाव को लेकर जॉर्डन के विदेश मंत्री ऐमान सफ़ादी ने मंगलवार को कहा है कि इसराइल का यहाँ के पवित्र स्थलों पर कोई अधिकार नहीं है और ये 'फ़लस्तीनी ज़मीन पर क़ब्ज़े' का हिस्सा है.

जॉर्डन ने वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम पर सन् 1948 से लेकर 1967 में हुए छह दिनों तक हुए युद्ध तक राज किया था. इस युद्ध के बाद इसराइल ने इस क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था. हालांकि, जॉर्डन और इसराइल के बीच हुई शांति संधि के तहत यरुशलम के ईसाई और मुस्लिम धार्मिक स्थलों की निगरानी का अधिकार जॉर्डन को मिला.

टाइम्स ऑफ़ इसराइल ने जॉर्डन के अल मामलका टीवी को दिए ऐमान सफ़ादी के इंटरव्यू के कुछ अंश छापे हैं. इस इंटरव्यू में सफ़ादी ने कहा, "इसराइल का अल-अक़्सा मस्जिद पर कोई अधिकार नहीं है. ये मुस्लिमों का धार्मिक स्थल है. केवल जॉर्डन वक्फ़ के पास ही इसके परिसर के प्रबंधन का पूरा अधिकार है."

जॉर्डन के विदेश मंत्री ऐमान सफ़ादी

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इमेज कैप्शन, जॉर्डन के विदेश मंत्री ऐमान सफ़ादी

उन्होंने इसराइल पर आरोप लगाया कि वो अल-अक़्सा मस्जिद में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने में मुश्किलें पैदा कर रहा है. उन्होंने ये भी कहा कि इसराइल वक्फ़ के सदस्यों की ड्यूटी के बीच आ रहा है. उन्होंने कहा, "वक्फ़ ने अल-अक़्सा मस्जिद परिसर के लिए दर्जन भर नए कर्मचारियों की नियुक्ति की है लेकिन इसराइल उनके रास्ते में अड़चन पैदा कर रहा है."

जॉर्डन के सांसद अल-ज़हरवी ने इसराइल को ऐसी औपनिवेशिक शक्ति बताया है जो फ़लीस्तीनियों के ख़िलाफ़ आतंकवाद का इस्तेमाल करती है. साथ ही उन्होंने कहा कि यरुशलम में इसराइल की वैधता का अभाव है.

यरुशलम पोस्ट की ख़बर के अनुसार, जॉर्डन ने एक बार फिर से ये कहा है कि वो अल-अक़्सा परिसर (टेंपल माउंट) में सुरक्षा गार्डों की नियुक्ति के लिए इसराइली सरकार सहित किसी भी पक्ष के आदेशों का पालन नहीं करेगा.

जॉर्डन के इस्लामी मामलों के मंत्रालय ने सोमवार को जारी एक बयान में कहा है कि अल-अक़्सा मस्जिद और अल हरम अल-शरीफ़ के अंदर गार्ड और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति जॉर्डन और यरुशलम में उसके वक़्फ़ विभाग के अधिकार क्षेत्र में है.

जॉर्डन और इसराइल के अधिकारी अल-अक़्सा मस्जिद के आसपास की व्यवस्था पर चर्चा करने के लिए रमज़ान के बाद मिलने के लिए सहमत हुए थे, लेकिन यरुशलम में इस्लामिक अवक़ाफ़ ने अरब न्यूज को बताया कि "ऐसी बैठकों के संबंध में कोई तैयारी नहीं हुई है."

इस्लामिक मामलों से जुड़ी संस्था इस्लामिक अवकाफ़ के निदेशक अज़्ज़म अल-ख़तीब ने अरब न्यूज़ को बताया कि उन्हें किसी भी बैठक या यात्रा के बारे में सूचित नहीं किया गया.

फ़लस्तीनी समिति ने अल-अक़्सा के विभाजन पर जॉर्डन की अस्वीकृति को दोहराया और कहा कि यरुशलम फ़लस्तीन की राजधानी बना रहेगा.

फ़लस्तीन ने भी जताया विरोध

फ़लस्तीनी प्रशासन ने भी इसराइली पीएम के बयान को ख़ारिज कर दिया है.

फ़लस्तीन क्षेत्र के राष्ट्रपति के प्रवक्ता नबील अबु रुदाइनेह की ओर से कहा गया है, "ये बयान भ्रामक और ग़लत हैं. अल-अक़्सा मस्जिद में लगातार घुसपैठ और चर्च में आने वाले अनुयायियों पर रोक इसकी गवाह है."

उन्होंने कहा, "अंतरराष्ट्रीय समुदायों के अपना प्रस्तावों के अनुसार, इस्लामी और ईसाइयों के पवित्र स्थल वाला पूर्वी यरुशलम हमेशा से फ़लस्तीन की राजधानी है. ताज़ा प्रस्ताव में भी ये पुष्टि की गई है कि पूर्वी यरुशलम फ़लस्तीनी क्षेत्र का हिस्सा है."

अल-अक्सा मस्जिद

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इमेज कैप्शन, बीते महीने भी फ़लस्तीनियों ने अल-अक्सा में इसराइल के ख़िलाफ़ किया था प्रदर्शन

अबु रुदाइनेह ने कहा, "1930 के लीग ऑफ़ नेशंस रेज़ॉल्यूशन में माना गया है कि अल-अक़्सा मस्जिद, अल-बुराक (पश्चिमी दीवार) और इससे सटे प्लाज़ा केवल मुस्लिमों से संबंधित हैं. इसराइल की ओर से पूर्वी यरुशलम सहित फ़लस्तीन के किसी भी क्षेत्र को कब्ज़े में लेने का प्रयास विफल साबित होगा."

उन्होंने कहा, "हमारे क्षेत्र और पूरी दुनिया में भी शांति, सुरक्षा और स्थिरता हासिल करने का सिर्फ़ एक तरीक़ा है, फ़लस्तीनी लोगों के अधिकारों को मान्यता देना और पूर्वी यरुशलम के साथ अलग फ़लस्तीन राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय मान्यता देने के लिए लाए गए प्रस्तावों को मान्यता देना."

इसराइल और जॉर्डन के बीच विदेशी पर्यटन पर सहमति है लेकिन इस दौरान किसी धार्मिक क्रिया को करने की इजाज़त नहीं है.

इसराइल और जॉर्डन के बीच शांति समझौते के तहत इस बात पर सहमति बनी है कि अल-अक्स मस्जिद में जॉर्डन की विशेष भूमिका बनी रहेगी. दोनों पक्ष एक-दूसरे को धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले स्थानों तक जाने देंगे. दोनों पक्षों के बीच प्रार्थना की आज़ादी, धार्मिक समझ विकसित करने के लिए साथ काम करने, सहिष्णुता और शांति बनाए रखने पर भी सहमति बनी थी.

रविवार को कैबिनेट के सामने दिए भाषण में बेनेट ने यूनाइटेड अरब लिस्ट के चेयरमैन मंसूर अब्बास की उस मांग को भी ख़ारिज कर दिया जिसमें उन्होंने टेंपल माउंट से जुड़े फ़ैसलों को लेकर जॉर्डन को और अधिकार दिए जाने की मांग की थी.

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शनिवार रात को ही अब्बास ने अरबी भाषा में एक फ़ेसबुक पोस्ट किया. इसमें उन्होंने कहा था कि अल-अक़्सा मस्जिद को लेकर यूनाइटेड अरब लिस्ट के विचार इसराइल और जॉर्डन के बीच इस पवित्र स्थल को लेकर आपसी समझ पर आधारित हैं.

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