मोदी के लिए क्यों अहम है यहूदी देश इसराइल?

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इसराइल की यात्रा पर जाने वाले नरेंद्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री बन गए हैं. वह मंगलवार (चार जुलाई) को इसराइल पहुंच रहे हैं.
मोदी ने हाल में कहा था कि भारत और यहूदी देश इसराइल के बीच सदियों पुराना संबंध है. उम्मीद की जा रही है कि मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सैन्य और साइबर सुरक्षा पर समझौते हो सकते हैं.
पर्यवेक्षकों का मानना है कि मोदी रामल्ला नहीं जाएंगे. मतलब फ़लस्तीनी नेताओं से मुलाक़ात नहीं करेंगे. अब तक ऐसा होता रहा है कि है लोग इसराइल के बाद फ़लस्तीनी नेताओं से भी मुलाक़ात करते थे.
मोदी की इस यात्रा को एक अहम क़दम माना जा रहा है. भारत और इसारइल के बीच 25 सालों से राजनयिक संबध हैं, लेकिन भारत में बड़ी मुस्लिम आबादी होने के कारण दोनों देशों के बीच संतुलित गतिविधि ही देखने को मिलती थी.
दोनों देश आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई, सुरक्षा, कृषि, पानी और ऊर्जा सेक्टर में साथ मिलकर वर्षों से काम कर रहे हैं.

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इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने इस यात्रा को काफ़ी अहम बताया है. टाइम्स ऑफ़ इसराइल के मुताबित नेतन्याहू ने कहा कि दोनों देशों के बीच संबंधों में लगातार सरगर्मी आ रही है.
भारतीय प्रधानमंत्री मोशे नाम के उस इसराइली लड़के से भी मुलाक़ात करेंगे जिसके माता-पिता 2008 में मुंबई के यहूदी सेंटर पर हुए आतंकी हमले में मारे गए थे.

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1992 में इसराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली यात्रा है. इसराइल में मौजूद में पत्रकार हरेंद्र मिश्रा ने कहा कि मोदी के आने को लेकर तैयारी ज़ोरों पर है.

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हरेंद्र मिश्रा के मुताबिक 'नेतन्याहू मोदी की तीन दिवसीय यात्रा में हमेशा साथ रहेंगे. यहां कहा जा रहा है मोदी के स्वागत की जो तैयारियां हो रही हैं उससे ऐसा लग रहा है कि पिछले वर्षों में आए दुनिया के किसी भी नेता के लिए इस तरह की तैयारी नहीं की गई.'
हरेंद्र मिश्रा ने कहा कि क़रीब 80 हज़ार के आसपास भारतीय मूल के यहूदी यहां रहते हैं और उनमें बहुत ज़्यादा उत्साह देखने को मिल रहा है.
मिश्रा ने कहा कि मोदी यहां भी भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करेंगे. इसराइली मीडिया में मोदी की यात्रा की चर्चा काफ़ी है. मिश्रा ने कहा कि यह चर्चा इसलिए भी है क्योंकि मोदी फ़लस्तीनी क्षेत्र में नहीं जाएंगे.













