इसराइल-ग़ज़ा पर सोशल मीडिया में ग़लत सूचनाएं और नफ़रत फैलाने के पीछे कौन है?

इमेज स्रोत, Reuters
- Author, मारियाना स्प्रिंग
- पदनाम, बीबीसी डिसइनफ़ॉर्मेशन एंड सोशल मीडिया संवाददाता
इसराइल और ग़ज़ा में इन दिनों जो कुछ चल रहा है उसे लेकर सोशल मीडिया पर झूठे दावों, कॉन्सपिरेसी थ्योरी और नफ़रती सामग्रियों की बाढ़ सी आ गई है.
ऐसे गैर प्रामाणिक अकाउंटों पर सवाल खड़ा हो रहा है जिन्हें तथ्यों पर भ्रम फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.
जैसे जैसे ज़मीनी स्तर पर हिंसा बढ़ रही है, मैं ये देखने की कोशिश कर रही थी कि इन ग़लत सूचनाओं को बढ़ावा देने के पीछे कौन लोग हैं.
जब मैंने बीते हफ़्ते की शुरुआत में अपना टिक टॉक पेज खोला तो मुझे एक वीडियो दिखा जिसमें एक युवा इसराइली महिला को हमास के लड़ाके बंधक बनाकर ले जा रहे हैं. 7 अक्टूबर का बताया जाने वाला वीडियो बहुत ख़ौफ़नाक था.
जब मैंने इस वीडियो के नीचे लोगों की टिप्पणियों को पढ़ना शुरू किया तो उन प्रतिक्रियाओं से मैं हैरान रह गई.
एक तरफ़ कुछ लोग इस पोस्ट से दुखी थे तो दूसरी तरफ़ कुछ लोगों का कहना था कि फुटेज में जैसा दिख रहा है, असल में वैसा है नहीं.
उन्होंने कहा कि वो महिला "सिविलियन" नहीं है, बल्कि एक सैनिक है, या ये क्लिप हमास को फंसाने के लिए नकली तौर पर बनाया गया है.
कुछ का दावा था कि हमास ग्रुप के ख़िलाफ़ ऐसे कोई सबूत नहीं हैं कि उसने बंधकों के साथ हिंसा की थी.
बीबीसी ने इस क्लिप को सच पाया है, इसमें दिखता है कि खून से लथपथ एक नौजवान महिला को बंदूकधारी पुरुष एक कार के अंदर धकेल रहे हैं.
इसे ग़ज़ा सिटी के बाहरी इलाके शीजिया में रिकॉर्ड किया गया था.

इमेज स्रोत, Getty Images
भ्रामक सूचनाएं दोनों ओर से फैलाई जा रहीं
मैंने अन्य सोशल मीडिया साइटों पर बंधकों के बारे में और वीडियो और टिप्पणियों को खंगाला और मुझे कमोबेश वैसी ही टिप्पणियां देखने को मिलीं.
इसराइल में लोगों को अनिवार्य रूप से सेना में सेवा देना पड़ती है, लेकिन तथ्य बताते हैं कि हमास ने जिन लोगों को बंधक बनाया उनमें अधिकांश सिविलियन हैं, जैसे कि इन क्लिप्स में लोग दिख रहे हैं. बंधकों में फ़ैस्टिवल में शामिल होने वाले लोग और बच्चे भी थे.
ये ग़लत सूचनाएं केवल उन्हीं अकाउंट तक सीमित नहीं हैं जो बंधकों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को कम करके दिखाना चाहते हैं.
बल्कि इसराइली सरकार की कार्रवाईयों का समर्थन करने वाली प्रोफ़ाइलों से भी भ्रामक सूचनाएं और नफ़रती सामग्रियां फैलाई गईं हैं.
बीते सप्ताहांत मुझे एक ऐसा अकाउंट दिखा जिसने एक वीडियो साझा किया था जिसमें कहा गया था कि फ़लस्तीनी लोग ग़ज़ा में जख़्मी होने का नाटक कर रहे हैं.
असल में इस क्लिप को, फ़लस्तीनी फ़िल्मों में काम करने वाले एक मेकअप आर्टिस्ट के बारे में 2017 में प्रकाशित एक रिपोर्ट से लिया था.
इन दावों से मुझे सिर्फ हैरानी ही नहीं हुई बल्कि ये इस बात का अंदाज़ा भी देते हैं कि सोशल मीडिया पर चल क्या रहा है.
अगर आप ताज़ा जानकारियों के लिए सोशल मीडिया पर भरोसा करते हैं तो तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने और ऑनलाइन बहस को उलझा देने की सफल कोशिशें आपको ज़मीनी सच्चाई से रूबरू कराने को बहुत मुश्किल बना देती हैं.
कैसे पहचानें भ्रामक पोस्ट
जब युद्ध अपराधों की जांच करने, मदद पहुंचाने और ग्राउंड ज़ीरो के हालात की जानकारी लेने की बात आती है तो, ये ग़लत सूचनाएं अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकती हैं.
कभी कभी इन भ्रामक पोस्टों के स्रोत को पहचानना आसान होता है.
उदाहरण के लिए, पॉप स्टार जस्टिन बीबर जैसे सैलिब्रिटी को ही लीजिए, जिन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर असावधानीवश एक पोस्ट साझा किया और लोगों से कहा कि "इसराइल के लिए प्रार्थना करें" लेकिन इसमें जो फ़ोटो लगाई वो इसराइली सेना द्वारा ग़ज़ा में की गई तबाही की थी.
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर कई ऐसे अकाउंट हैं जिन्हें हर संकट के बारे में कॉन्सपिरेसी थ्योरी देने वाला माना जाता है. इन अकाउंटों से भ्रामक पोस्टों को प्रसारित किया गया, शायद ज़मीन पर जो हो रहा है उसे बढ़ा चढ़ाकर पेश करने या उसे कम करके दिखाने के मक़सद से.
इनमें अलग अलग युद्धों के पुराने वीडियो और वीडियो गेम के फुटेज साझा करना शामिल है और इन्हें इसराइल और ग़ज़ा के मौजूदा हालात से संबिधित होने का दावा किया जाता है.
इसराइल समर्थक और मुस्लिम विरोध वाले पोस्ट साझा करने वाले कुछ बहुत सक्रिय अकाउंट, ऐसा लगता है कि भारत से हैं और वो देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हैं.
मैं उन प्रोफ़ाइल की जानकारी हासिल करने की कोशिश करना चाहती हूं जिनकी पहचान और स्थान बहुत स्पष्ट नहीं है.

इमेज स्रोत, EPA
इन अकाउंटों के पीछे कौन लोग हैं?
बंधकों को सिविलियन की बजाय सैनिक बताने वाले बहुत से अकाउंट वास्तविक लगते हैं और वे युवा लोगों से जुड़े हैं.
इन्होंने अपने प्रोफ़ाइल में मज़ाकिया मीम्स या फ़ुटबॉल की क्लिप लगा रखी है.
कुछ ने "फ़्री फ़लस्तीन" जैसे नारों वाली तस्वीरें लगा रखी हैं. जब मैंने उन्हें मैसेज किया तो उन्होंने बताया कि वे पाकिस्तान और यूएई से हैं.
कुछ प्रोफ़ाइलों के बारे में ये पता करना मुश्किल है कि वे वास्तविक लोगों के हैं या नहीं.
इनमें से कुछ प्रोफ़ाइलों से अलग अलग राजनीतिक विषयों पर भी पोस्ट साझा की गई हैं- जैसे रूसी राष्ट्रपति पुतिन और यूक्रेन में युद्ध के समर्थन में और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बारे में.
इनमें से बहुत सारे अकाउंट नए बनाए गए हैं या हाल ही में सक्रिय हुए हैं.
अतीत में इसराइली सरकार और हमास चरमपंथियों पर आरोप लगते रहे हैं कि वे अपने "बॉट" नेटवर्क के ज़रिए ऑनलाइन बहस को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं.
"बॉट" नेटवर्क में जाली अकाउंट इस्तेमाल किए जाते हैं ताकि विभाजनकारी और भ्रामक विचारों को बार बार और तेजी से प्रसारित किया जा सके.
सोशल मीडिया का विश्लेषण करने वाली इसराइल की कंपनी सायाब्रा के अनुसार, सात अक्टूबर को हमास द्वारा किए हमले के बारे में बहस करने वाले पांच में से एक अकाउंट फ़ेक है.
इस संदर्भ में "फ़ेक" का मतलब, वे स्वतः संचालित हैं लेकिन ऐसे अन्य अकाउंट भी हो सकते हैं जिन्हें जाली पहचान के आधार पर वास्तविक लोग चलाते हों.
कंपनी का कहना है कि उसने एक्स और टिक टॉक पर क़रीब 40,000 फ़ेक अकाउंट का पता लगाया है.
इसके अनुसार, इन प्रोफ़ाइलों में से कुछ हमास के समर्थन में भ्रामक दावे फैलाते हैं और बताते हैं कि चरमपंथी बंधकों के प्रति नरमी बरत रहे थे, जबकि तथ्य कुछ और बताते हैं.
लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इसराइल समर्थक जाली अकाउंट नहीं हैं.
कुछ तरीके हैं जिनसे हम पता कर सकते हैं कि अकाउंट प्रामाणिक है कि नहीं. उदाहरण के लिए अगर एक प्रोफ़ाइल को हाल फिलहाल में बनाया गया है और अचानक उसने बड़ी संख्या में विभाजनकारी, भ्रामक और विरोधाभासी सामग्रियां साझा करना शुरू कर दिया है.
हालांकि ये तय कर पाना कि कोई प्रोफ़ाइल वाक़ई फ़ेक है या नहीं और इसके पीछे कौन है, बहुत मुश्किल काम है.
इसके लिए सोशल मीडिया कंपनियों से सूचनाएं इकट्ठा करने की ज़रूरत है और यहां तक पत्रकारों की पहुंच नहीं है.

इमेज स्रोत, EPA-EFE/REX/SHUTTERSTOCK
सोशल मीडिया साइटों पर दबाव
इस हफ़्ते ग़लत सूचनाओं के बड़े पैमाने पर फैलने को लेकर सोशल मीडिया साइटों को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है.
यूरोपीय संघ आतंकवाद समर्थक सामग्रियों और हेट स्पीच के प्रसार को लेकर एक्स की जांच कर रहा है.
ट्विटर (एक्स) के पूर्व कर्मचारियों ने पहले मुझे बताया था कि नए मालिक एलन मस्क के आने पर हुई छंटनी के बाद किस तरह कंपनी भ्रामक ख़बरों को रोकने में असमर्थ हो गई है.
सोशल मीडिया कंपनी में सरकार द्वारा प्रायोजित अभियानों पर नज़र रखने वाले रे सेराटो ने मुझे बताया कि टेकओवर के बाद किस तरह उनकी पहले की टीम को ‘मिटा’ दिया गया.
उनके अनुसार, मध्य पूर्व समेत ‘कुछ ख़ास इलाक़ों’ को देखने वाले मुख्य एक्सपर्ट अब कंपनी से विदा हो चुके हैं, जिनका काम ही था, विशेष संगठित भ्रामक ख़बरों को फैलने से रोकना.
बीबीसी के सवालों पर एक्स ने कोई टिप्पणी नहीं की.
हालांकि पिछले हफ़्ते इस सोशल मीडिया साइट ने कहा कि उसने हमास से जुड़े सैकड़ों अकाउंट को अपने प्लेटफ़ॉर्म से हटा दिया है.
टिक टॉक कंपनी ने अपनी गाइडलाइंस में कहा है कि "मौजूदा हालात के संबंध में अपने प्लेटफ़ॉर्म पर हिंसक, नफ़रती या भ्रामक सामग्रियों को रोकने के लिए विशेष संसाधनों में वृद्धि की है."
एक्स, टिक टॉक और अन्य प्लेटफ़ॉर्मों पर जिस तरह से ग़लत सूचनाएं फैलती हैं, वो ग़ज़ा और इसराइल के हालात पर आम जनता के नज़रिए को आकार दे सकती हैं.
और इसका असर ये होगा कि जो कुछ चल रहा है उसे लेकर राजनेताओं पर कोई बड़ा फैसला लेने का दबाव बढ़ेगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















