इसराइल और हमास के बीच जारी जंग के ख़िलाफ़ क्या इस्लामिक देश एकजुट हैं?

इसराइल

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इसराइल पर हमास के हमले और फिर इसके बाद इसराइल की जवाबी कार्रवाई पर पश्चिमी देश एक सुर में बोलते दिख रहे हैं.

लेकिन अमूमन फ़लस्तीन के लिए खुल कर अपना समर्थन जताने वाले मुस्लिम देशों ने सतर्क प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है. इसराइल हमास संघर्ष पर इन देशों का रुख़ बँटा हुआ दिख रहा है.

इन देशों ने स्वतंत्र फ़लस्तीन राष्ट्र की वकालत की है लेकिन पहले की तरह इसराइल की कड़ी आलोचना करने से वो बचते दिख रहे हैं. ईरान को छोड़ कर ज़्यादातर इस्लामी देशों ने खुलकर हमास का पक्ष लेने से परहेज़ किया है.

हमास का हमला ऐसे वक़्त हुआ है, जब इसराइल और मुस्लिम देशों के बीच रिश्ते सुधारने की कवायद चल रही थी. दोनों ओर से औपचारिक संबंध कायम करने के लिए 2020 में इसराइल और दो अरब देशों बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात ने अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. कई मुस्लिम देश इसके समर्थक हैं.

इस्लामी देशों के सबसे बड़े और अहम संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन यानी ओआईसी ने इसराइल की कड़ी आलोचना के बजाय सतर्क प्रतिक्रिया दी है.

संगठन ने कहा है कि वह फ़लस्तीन में इसराइल की कब्ज़ा की गई ज़मीन पर उसके सैन्य कार्रवाई से चिंतित हैं. इसने सैकड़ों लोगों को शहीद किया है और बड़ी तादाद में फ़लस्तीन लोगों को घायल किया है.

यूएई ने हमास को ज़िम्मेदार ठहराया

हमास

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इमेज कैप्शन, इसराइली सेना के हमले में ध्वस्त बिल्डिंग के मलबे से लोगों को निकालते फलस्तीनी

ओआईसी ने गज़ा में इसराइली कब्ज़े की निंदा की है और कहा है, ''इसराइल समस्या का अंतरराष्ट्रीय मान्यता के हिसाब से हल निकालने में नाकाम रहा है. इसराइली हमले में तेज़ी और फ़लस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ रोज हो रहे अपराध से वहाँ के लोगों की ज़मीन और संप्रुभता छिन चुकी है. वो अपने हक़ से वंचित हैं और यही वहाँ अस्थिरता की वजह है.''

ओआईसी ने इस संघर्ष के लिए इसराइली ‘कब्जे’ को ज़िम्मेदार ठहराया है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से इसराइली हमले को रोकने और शांति बहाल करने की अपील की है.

लेकिन ओआईसी के एक अहम सदस्य संयुक्त अरब अमीरात (यूएई ) ने इस हिंसा के लिए फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास को ज़िम्मेदार ठहराया है.

यूएई के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इसराइली शहरों और गज़ा पट्टी के नज़दीक गांवों पर हमास के हमले से संघर्ष ने भीषण रूप ले लिया है. हमास ने आबादी वाले इलाक़ों पर हजारों रॉकेट दागे हैं.

यूएई का विदेश मंत्रालय इस बात को लेकर बेहद चिंतित दिखा कि इसराइली लोगों को उनके घरों से निकाल कर बंधक बना लिया गया है.

यूएई ने कहा है कि दोनों ओर के नागरिकों को अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए. उन्हें संघर्ष का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए.

यूएई

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यूएई ने इस संघर्ष में मारे गए लोगों के प्रति शोक जताते हुए इसे रोकने के लिए बड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर ज़ोर दिया है. यूएई अब्राहम एकॉर्ड पर हस्ताक्षर करने वाला देश है और फ़लस्तीनी इससे ख़ुश नहीं थे.

वहीं सऊदी अरब ने कहा है कि वो इसराइली सेना और अलग-अलग फ़लीस्तीनी गुटों के बीच संघर्ष पर नज़दीकी निगाहें बनाए हुए है.

सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है, ''सऊदी अरब दोनों पक्षों से हिंसा छोड़ने की अपील करता है. इसके साथ ही वो दोनों ओर के नागरिकों की सुरक्षा बहाल करने और संयम बरतने की अपील करता है.''

सऊदी अरब के बयान में कहा गया है,''गज़ा पट्टी में हालात जिस कदर विस्फोटक हो गए हैं वो इसराइल के लगातार कब्जे और फ़लस्तीनी लोगों को उनके क़ानूनी हक से वंचित करने का नतीजा है.''

तुर्की का नरम रुख़?

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सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला रुख़ तुर्की का रहा है. आमतौर पर इसराइल पर हमलावर तेवर अपनाने वाले तुर्की ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी है.

उसने इसराइल और हमास के बीच चल रहे संघर्ष पर चिंता जताते हुए इलाक़े में जल्द से जल्द शांति बहाल करने की अपील की है.

तुर्की के विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया है, ‘’हिंसा बढ़ने का किसी भी पक्ष को फ़ायदा नहीं होगा. तुर्की हालात काबू करने में सहयोग देने के लिए हमेशा तैयार है. इस दुखद घटनाक्रम ने साबित कर दिया है कि इसराइल और फ़लस्तीन दो राष्ट्र हैं. इस घटना ने इस नज़रिये की अहमियत एक बार फिर साबित कर दी है. हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं, वो हिंसा का रास्ता छोड़ एक स्थायी समाधान की दिशा में काम करें.’’

हालांकि तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प अर्दोआन ने बाद में एक बयान जारी करते हुए कहा कि एक स्वतंत्र और 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र और भौगोलिक तौर पर जुड़े फ़लस्तीन राष्ट्र को साकार करने का समय में आ गया है. वो फ़लस्तीन जिसकी राजधानी यरुशलम (पूर्वी) हो.

अर्दोआन ने कहा, ’’फ़लस्तीन-इसराइल संघर्ष को ख़त्म करने का कोई पक्का समाधान ही मध्य-पूर्व में शांति ला सकता है,’’

क़तर ने क्या कहा?

क़तर

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ओआईसी के सदस्य क़तर ने भी शांति की अपील करते हुए कहा है कि वह इसराइल और हमास के बीच बढ़ते संघर्ष पर नज़र रखे हुए है. ख़ास कर इसराइल की सेना और लेबनान के हिजबुल्लाह गुट के बीच गोलीबारी पर.

क़तर के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा है, ’’क़तर एक बार फिर सभी पक्षों से संघर्ष को आगे न बढ़ाने की अपील करता है. दोनों पक्ष पूरी तरह हिंसा छोड़ दें ताकि ये इलाक़े और बड़ी हिंसा के दुश्चक्र में न फंस जाए.’’

क़तर ने कहा है कि वो संबंधित पक्षों से संवाद बनाए हुए है ताकि शांति और स्थिरता बहाल करने की अंतरराष्ट्रीय कोशिश को समर्थन मिल सके.

क़तर ने कहा है कि प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुल रहीम बिन जासिम अल-थानी अरब देशों के अपने समकक्षों से लगातार संपर्क कर रहे हैं और समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं.

मलेशिया और इंडोनेशिया ने क्या कहा?

मलेशिया

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इमेज कैप्शन, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम

मलेशिया ने इसराइल और हमास के बीच संघर्ष पर चिंता जताई है. मलेशिया ने कहा है कि वो संघर्ष में हुई मौतों पर चिंतित है.

मलेशिया के विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है, ''इस नाज़ुक समय में और ज़्यादा जानें नहीं जानी चाहिए. जो विध्वंस हो रहा है और वो तुरंत रुके और दोनों पक्ष शांति और संयम से काम लेते हुए संघर्ष को रोकने की दिशा में बढ़े.''

हालांकि मलेशिया ने ये भी कहा है कि इस समस्या की मूल वजह को समझना होगा.

मलेशिया के विदेश मंत्रालय ने कहा, ''फ़लीस्तीनियों की ज़मीन पर लंबे वक़्त तक कब्जा रहा है. उन्हें नाकेबंदी और दूसरी तरह की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है. अल-अक्सा मस्जिद को अपवित्र किया गया है. और शासन इसराइलियोंं के हाथ में रखने की राजनीति होती रही है.''

मुस्लिमों की सबसे बड़ी आबादी वाले देश इंडोनेशिया ने भी इसराइल और हमास के बीच हिंसक संघर्ष पर चिंता जताते हुए हिंसा तुरंत बंद करने की अपील की है.

हालांकि इंडोनेशिया ने भी कहा है कि इस समस्या की मूल वजह फ़लस्तीनी इलाक़ों पर इसराइल का कब्जा है.

इंडोनेशिया के विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है,''इस समस्या को किसी भी तरह सुलझाना होगा. फ़लीस्तीन पर इसराइली कब्जे से जो समस्या पैदा हुई है, उसे संयुक्त राष्ट्र के मानकों के मुताबिक़ सुलझाना होगा. अत्याचार करने वाले और इसके शिकार के बीच कोई समानता नहीं हो सकती.''

पाकिस्तान का रुख रातोंरात बदला

पाकिस्तान

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में फलस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन

इस मामले पर पाकिस्तान का रुख़ रातोंरात बदलता दिखा.

पहले उसने इसराइल पर हमास के हमले का विरोध नहीं किया था. लेकिन उसने जवाबी हमला करने वाली इसराइली सेना की भी निंदा नहीं की थी

लेकिन अब पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने फ़लीस्तीन का साफ़ तौर पर समर्थन किया है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है, ’’पाकिस्तान फ़लस्तीन के समर्थन में खड़ा है और इसराइल की कब्जा करने वाली सेना की हिंसा और अत्याचार को खत्म करने की अपील करता है.’’

विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है, ‘’पाकिस्तान हमेशा से वहां दो देशों के सिद्धांत की वकालत करता आ रहा है. पाकिस्तान का कहना है कि इसी से मध्य-पूर्व में शांति आ सकती है. फ़लस्तीन की समस्या का अंतरराष्ट्रीय क़ानून के हिसाब से वाजिब और व्यापक समाधान ही यहाँ स्थायी शांति बहाल कर सकता है.''

बांग्लादेश और मालदीव ने कहा- फ़लस्तीन को उसका हक़ मिले

बांग्लादेश

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बांग्लादेश ने भी इसराइल और फ़लस्तीन मुद्दे पर बयान जारी कर अपना रुख़ साफ़ किया है.

बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है,''हमारा मानना है कि इस संघर्ष से किसी को फ़ायदा नहीं होने वाला है. हम दोनों पक्षों से संयम बरतने और तुरंत संघर्ष रोकने की मांग करते हैं. बांग्लादेश मानता है कि इलाक़े में इसराइली कब्जे में रहना और फ़लस्तीन में इसराइल की अवैध बस्तियों से शांति कायम नहीं हो सकती. लिहाजा बांग्लादेश दो राष्ट्र की नीति का समर्थन करता है.’’

मालदीव के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद मोइज़्ज़ू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर फ़लस्तीन पर इसराइल के कब्ज़े को हटाने की अपील की है.

उन्होंने लिखा है, ''इसराइल को फ़लस्तीन में तुरंत अपना अवैध कब्ज़ा हटा लेना चाहिए. साथ ही उसे फ़लस्तीन की कब्जाई ज़मीन भी उसे लौटा देना चाहिए. इसराइल पूर्वी यरुशल को मिलाकर फ़लस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर मान्यता दे. उसे यरुशलम को 1967 की सीमाओं के आधार पर फ़लस्तीन की राजधानी मानना चाहिए.’’

हमास के हमले को ईरान का समर्थन

नरीस केनानी

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इमेज कैप्शन, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नरीस केनानी

इसराइल पर हमास के हमले का ईरान ने समर्थन किया है.

हमास के हमले के बाद हमास के प्रवक्ता ग़ाज़ी हमद ने कहा कि इस अभियान को ईरान का समर्थन हासिल है.

दूसरी तरफ ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान और सोशल मीडिया पर तेहरान से आ रही जश्न की तस्वीरें भी इस बात की तस्दीक करती दिखीं.

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नरीस केनानी ने कहा है कि हमास के ऑपरेशन ‘अल-अक्सा फ्लड’ रेजिस्टेंस ग्रुप और सताए हुए फलस्तीनियो की स्वत: स्फूर्त प्रतिक्रिया है. यह फ़लस्तीनियों के नैसर्गिक निविर्वाद हक़ के समर्थन में की गई कार्रवाई है.

उन्होंने कहा कि इसराइल के ख़िलाफ़ ऑपरेशन यहूदियों की युद्ध को बढ़ावा देने और दहशत फैलाने वाली नीतियों के ख़िलाफ़ स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. ख़ास कर ये उस प्रधानमंत्री की हड़पने वाली और दुस्साहसी नीतियों के ख़िलाफ़ ज़ाहिर की गई प्रतिक्रिया है.

ईरान सरकार के इस रुख़ की ईरान के मीडिया में भी देखने को मिली, जहां हमास के 'अल-अक़्सा स्टॉर्म' नाम के इस अभियान को यहूदी शासन के लिए बड़ा धक्का बताया जा रहा है. (यहूदियों की अपने लिए एक अलग राष्ट्र बनाने की कोशिश जिसमें यहूदी फ़लस्तीन के इलाक़ों पर अपना कब्ज़ा चाहते हैं क्योंकि वो इसे 'यहूदियों की पवित्र जगह' मानते हैं.)

इसराइल के कई हिस्सों पर हमले के बाद फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास (जो हमास के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं) ने कहा कि फ़लस्तीन के लोगों को हक़ है कि वो "कब्ज़ा करने वालों के ख़िलाफ़ अपना बचाव करें."

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