अल-अक़्सा मस्जिद क्यों है फ़लस्तीनियों और इसराइल दोनों के लिए अहम?

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यरूशलम की अल-अक़्सा मस्जिद बुधवार को पटाखों, गोली बारी और चीखपुकार से दहल गई.
मस्जिद में इसराइल की पुलिस घुस गई और फ़लस्तीनियों और इसराइली पुलिस के बीच संघर्ष की ख़बरें हैं.
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ वीडियो में दिख रहा है कि इसराइली पुलिस के जवान फ़लस्तीनियों को पीट रहे हैं.
एक अन्य वीडियो में ताज़ा हिंसा के बाद मस्जिद के अंदर फ़र्नीचर और कालीन उलट पुलट दिखाई दे रहे हैं.
इसराइली पुलिस का दावा है कि पटाखे, डंडे और पत्थरों से लैस होकर फ़लस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने खुद को मस्जिद के भीतर बंद कर लिया था.
फ़लस्तीनियों का कहना है कि इसराइली पुलिस की ओर से किए गए बल प्रयोग में 14 लोग घायल हो गए. वीडियो में दिखाई दे रहा है कि पुलिस कुछ लोगों के हाथ बांध कर परिसर से बाहर ले जा रही है.
इसराइली पुलिस ने स्टन ग्रेनेड और रबर की गोलियों का इस्तेमाल किया. इस दौरान गज़ा पट्टी से इसराइल की ओर नौ रॉकेट्स दागे गए.
इसराइली सेना के मुताबिक़, पांच रॉकेट को रास्ते में ही नष्ट कर दिया गया जबकि अन्य चार रॉकेट को खुली जगहों पर ज़मींदोज़ कर दिया गया.
विवाद भले पुराना हो लेकिन पिछले कुछ समय से अल-अक़्सा मस्जिद को लेकर तब तनाव बढ़ने लगा जब बीती जनवरी में इसराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री और धुर-दक्षिणपंथी नेता इतमार बेन गिवीर ने मस्जिद परिसर का दौरा किया.
बिन्यामिन नेतन्याहू के प्रधानमंत्री बने एक सप्ताह भी पूरा नहीं हुआ था कि ये दौरा हुआ. इसे फ़लस्तीनी प्रशासन ने "उकसावे" वाला क़दम बताया था.

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तनाव बढ़ने की वजह
फ़लस्तीनियों और इसराइल के बीच पहले भी कई संघर्षों की शुरुआत अल-अक़्सा मस्जिद में हुए विवाद से हुई है.
इस समय रमज़ान का महीना चल रहा है और वेस्ट बैंक और पूर्वी यरूशलम में महीनों पहले से ही तनाव अपने चरम पर है.
बेहद संवेदनशील समय में इस पवित्र जगह से नए दौर की हिंसा भड़क उठने को लेकर अधिकारी और राजनयिक पहले से आशंका जता रहे थे.
जॉर्डन ने वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम पर सन् 1948 से लेकर 1967 में हुए छह दिनों तक युद्ध से पहले तक राज किया था.
इस युद्ध के बाद इसराइल ने इस क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित कर लिया.
हालांकि, जॉर्डन और इसराइल के बीच हुई शांति संधि के तहत यरुशलम के ईसाई और मुस्लिम धार्मिक स्थलों की निगरानी का अधिकार जॉर्डन को मिला.
बीते साल मई में इसराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट ने अल-अक़्सा मस्जिद प्रबंधन में विदेशी हस्तक्षेप को ख़ारिज करने की बात कही थी. इस बयान के बाद जॉर्डन और फ़लस्तीनी भड़क गए.
जॉर्डन ने इसे पवित्र स्थलों की 'फ़लस्तीनी ज़मीन पर क़ब्ज़े' की योजना का हिस्सा बताया था. अभी इसके प्रबंधन की ज़िम्मेदारी जॉर्डन वक्फ़ बोर्ड के पास है.

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अल-अक्सा मस्जिद इतनी अहम क्यों?
ये पहली बार नहीं है, जब यरुशलम स्थित अल अक़्सा मस्जिद इसराइल और फ़लस्तीन के बीच विवाद की वजह बनी हो.
बीते साल भी यहां फ़लस्तीनियों और इसराइली सुरक्षाबलों के बीच झड़प हुई थी और फिर हमास और इसराइल के बीच संघर्ष शुरू हो गया था.
यहां ये जानना ज़रूरी है कि अल-अक़्सा मस्जिद इसराइल और फ़लस्तीनियों दोनों के लिए इतनी अहम क्यों है?
दरअसल, पूर्वी यरुशलम स्थित ये यहूदियों की सबसे पवित्र जगह है और इस्लाम में भी इसे तीसरे सबसे पवित्र स्थल के रूप में माना जाता है.
यहूदियों के लिए 'टेंपल माउंट' और मुसलमानों के लिए 'अल-हराम अल शरीफ़' के नाम से मशहूर पावन स्थल में 'अल-अक़्सा मस्जिद' और 'डोम ऑफ़ द रॉक' शामिल है.
'डोम ऑफ़ द रॉक' को यहूदी धर्म में सबसे पवित्र स्थल का दर्जा दिया गया है. पैग़ंबर मोहम्मद से जुड़े होने के कारण 'डोम ऑफ़ द रॉक' को मुसलमान भी पावन स्थल मानते हैं.
इस धार्मिक स्थल पर ग़ैर-मुसलमानों की प्रार्थना पर पाबंदी लगी हुई है.
इस परिसर का प्रबंधन जॉर्डन के वक्फ़ द्वारा किया गया जाता है, जबकि सुरक्षा इंतज़ामों पर इसराइल का नियंत्रण है.
लंबे समय से यहाँ केवल मुस्लिम ही नमाज़ पढ़ सकते हैं और कुछ विशेष दिनों में ही ग़ैर-मुस्लिमों को परिसर में प्रवेश की इजाज़त है लेकिन वे यहां प्रार्थना नहीं कर सकते.

100 साल पुराना विवाद
प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानिया सल्तनत की हार के बाद मध्य-पूर्व में फ़लस्तीन के नाम से पहचाने जाने वाले हिस्से को ब्रिटेन ने अपने क़ब्ज़े में ले लिया था.
इस ज़मीन पर अल्पसंख्यक यहूदी और बहुसंख्यक अरब बसे हुए थे.
दोनों के बीच तनाव तब शुरू हुआ जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ब्रिटेन को यहूदी लोगों के लिए फ़लस्तीन को एक 'राष्ट्रीय घर' के तौर पर स्थापित करने का काम सौंपा.
यहूदियों के लिए यह उनके पूर्वजों का घर है जबकि फ़लस्तीनी अरब भी इस पर दावा करते रहे हैं और उन्होंने इस क़दम का विरोध किया था.
1920 से 1940 के बीच यूरोप में उत्पीड़न और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नरसंहार से बचकर भारी संख्या में यहूदी एक मातृभूमि की चाह में यहाँ पर पहुँचे थे.
इसी दौरान अरबों, यहूदियों और ब्रिटिश शासन के बीच हिंसा भी शुरू हुई.

1948 के बाद की स्थिति
1947 में संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीन को यहूदियों और अरबों के अलग-अलग राष्ट्र में बाँटने को लेकर मतदान हुआ और यरुशलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर बनाया गया.
इस योजना को यहूदी नेताओं ने स्वीकार किया जबकि अरब पक्ष ने इसको ख़ारिज कर दिया और यह कभी लागू नहीं हो पाया.
1948 में समस्या सुलझाने में असफल होकर ब्रिटिश शासक चले गए और यहूदी नेताओं ने इसराइल राष्ट्र के निर्माण की घोषणा कर दी.
कई फ़लस्तीनियों ने इस पर आपत्ति जताई और युद्ध शुरू हो गया. अरब देशों के सुरक्षाबलों ने धावा बोल दिया.
लाखों फ़लस्तीनियों को अपने घरों से भागना पड़ा या उनको उनके घरों से ज़बरन निकाल दिया गया. इसको उन्होंने अल-नकबा या 'तबाही' कहा.
बाद के सालों में जब संघर्ष विराम लागू हुआ, तब तक इसराइल अधिकतर क्षेत्र को अपने नियंत्रण में ले चुका था.
जॉर्डन के क़ब्ज़े वाली ज़मीन को वेस्ट बैंक और मिस्र के क़ब्ज़े वाली जगह को गज़ा के नाम से जाना गया.
वहीं, यरुशलम को पश्चिम में इसराइली सुरक्षाबलों और पूर्व को जॉर्डन के सुरक्षाबलों के बीच बाँट दिया गया.
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