इसराइल-फ़लस्तीनियों के वो अनसुलझे मुद्दे जिनके कारण भड़की हिंसा

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- Author, जेरेमी वावेन
- पदनाम, बीबीसी मध्य पूर्व संपादक
इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच बढ़ रहे तनाव के पीछे लंबे समय से चला आ रहा अनसुलझा विवाद है, जिसके कारण दोनों एक बार फिर आमने-सामने हैं.
मध्यपूर्व के देशों के लिए ये एक ऐसी समस्या है जिसके कारण समय-समय पर झड़पें होती आई हैं, लेकिन इस बार मामला रॉकेट दाग़ने, हवाई हमले करने और जान के नुक़सान तक पहुंच गया है.
ये विवाद पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय अख़बारों की हेडलाइन से ग़ायब था लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि ये समस्या ख़त्म हो गई थी.
दोनों के बीच विवाद सुलझे नहीं है, मुद्दे वही हैं और दोनों के बीच की नफ़रत भी. ये लड़ाई और मुसीबत कई पीढ़ियों से चली आ रही है.
जब तक ये संघर्ष चल रहा है, दोनों में से कोई भी पक्ष सुरक्षित नहीं है. ये तय है कि जब तक मामला पूरी तरह से न सुलझ जाए तब तक हर कुछ सालों में कोई गंभीर संकट आएगा.
पिछले 15 सालों में ये विवाद ग़ज़ा पट्टी और इसराइल को बांटने वाली एक तार के आसपास रहा है.

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इस बार के हालात बता रहे हैं कि यरुशलम और इसराइल के धार्मिक स्थल पर विवाद के कारण हिंसा भड़की है.
ईसाई, यहूदी और मुसलमान इस जगह को पवित्र मानते हैं और उनके लिए इस जगह का धार्मिक महत्व है. ये यहूदियों और मुसलमानों के धर्म की उत्पत्ति का भी स्थान है और इसलिए महत्वपूर्ण है. यहूदियों और मुसलमानों के लिए ये जगहें उनके राष्ट्रीय प्रतीक का हिस्सा भी हैं.
भौगोलिक रूप से ये दोनों जगहें अगल-बगल हैं. 'द चर्च ऑफ़ द होली सेपल्कर' भी इसराइली चेकपॉइंट के दूसरी तरफ है जिसमें फ़लस्तीनी ईसाईयों की आस्था है.
तनाव के शुरुआत की एक वजह फ़लस्तीनियों को उनके घर शेख जराह से हटाने की धमकी है.
ये पुराने शहर की दीवारों के बाहर की जगह है जहां फ़लस्तीनी रहते हैं. इसकी ज़मीन और यहां की प्रॉपर्टी पर यहूदियों ने इसराइल की अदालतों में दावा कर रखा है.
इलाक़े में यहूदी आबादी बढ़ाने की कोशिश
लेकिन ये विवाद केवल कुछ घरों को लेकर नहीं है. ये सालों से इसराइली सरकार यरुशलम में यहूदियों की संख्या बढ़ाने की कोशिशें कर रही है, और इस मुद्दे को लेकर यहां तनाव है.
शहर के चारों ओर यहूदियों के लिए काफ़ी संख्या में घर बनाए गए हैं. इसराइल पर ये आरोप लगाया जाता है कि ऐसा करने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय कानून भी तोड़े गए हैं. हाल के सालों में सरकार और यहां रहने वाले यहूदियों ने पुराने शहर में धीरे-धीरे कर यहूदियों को बसाने की कोशिश की है.
पिछले कुछ हफ़्तों में इस इलाक़े में इसराइली पुलिस के हथियारबंद जवानों की संख्या बढ़ा दी गई है. रमज़ान के मौक़े पर अल-अक़्सा मस्जिद में गैस और स्टेन ग्रेनेड का इस्तेमाल किया गया.
मक्का और मदीना के बाद मुसलमानों के लिए ये सबसे पवित्र जगह है.
इसके बाद फ़लस्तीनी क्षेत्र के सबसे प्रमुख इस्लामी चरमपंथी संगठन हमास ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए इसराइल को अल-अक़्सा परिसर और शेख जराह से सेना हटाने का अल्टीमेटम दिया और फिर रॉकेट दाग़ दिए.
समाधान नहीं हुआ तो जारी रहेगी हिंसा
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ट्वीट किया, "ग़ज़ा के चरमपंथी संगठनों ने एक रेड लाइन को लांघ दिया है. इसराइल अधिक ताकत के साथ जवाब देगा."
अगर इसका कोई समाधान नहीं निकला तो हिंसक वारदातें बार-बार होंगी. सोमवार को मुझसे पूछा गया था कि आख़िरी बार मुझे यरुशलम में उम्मीद की किरण कब दिखी थी और कब लगा था कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के साथ मिलकर रह सकते हैं.
मैं 1995 से 2000 तक यरुशलम में रहा और उसके बाद भी कई बार वहां गया हूं. लेकिन मेरे लिए इस सवाल का जवाब देना मुश्किल था.
1990 में हुए ओसलो समझौते के दौरान थोड़े समय के लिए उम्मीद जगी थी लेकिन यरुशलम के वो लोग जो वहां 40 सालों से रह रहे हैं और अब शहर की ग़लत साइड पर आ गए हैं, उन्हें शायद इस बात का एहसास बेहतर हुआ होगा और उनके पास दूसरों की अपेक्षा ज़्यादा यादें होंगी.
दोनों तरफ़ के नेता अपनी जगह मज़बूत करने के लिए अपनी निजी राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं. जबकि किसी भी फ़लस्तीनी और इसराइली नेता के लिए शांति की कोशिश करना सबसे अहम होना चाहिए. सालों में इस चैलेंज को गंभीरता से नहीं लिया गया.

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कैसे सुलझेगा विवाद?
दोनों के बीच मुद्दों को सुलझाने के लिए कुछ नए सुझाव भी सामने आए हैं.
दो थिंक टैंक कार्नेजी एंडाउमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस और यूएस-मिडिल ईस्ट प्रोजेक्ट ने एक संयुक्त रिपोर्ट प्रकाशित कर फ़लस्तीनी और इसराइली दोनों के लिए एकाधिकार और सुरक्षा की बात कही.
रिपोर्ट में कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र को "इसराइल के कंट्रोल वाले इलाक़े में रहने वाले लोगों को पूरी तरह से समानता और आज़ादी का समर्थन करना चाहिए और दो अलग और असमान सिस्टम को बढ़ावा नहीं देना चाहिए."
ये नई सोच है, लेकिन इस हफ़्ते पुरानी वास्तविकताएं, उसी तरह की बयानबाजियां और एक सदी से ज़्यादा लंबे समय से चल रहे संघर्ष ने फिर से तनाव कम होने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.
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