कोविड वैक्सीन: क्या डेल्टा प्लस वेरिएंट पर असर करेगी?

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर में 21 जून से नई वैक्सीन पॉलिसी लागू करने की घोषणा की थी.
नई वैक्सीन पॉलिसी के तहत अब केंद्र सरकार ही राज्य सरकारों को वैक्सीन मुहैया करा रही है.
देश में कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर की आशंका के बीच टीकाकरण अभियान में तेज़ी आती देखी गई.
ऐसे में आपके मन में वैक्सीन को लेकर कई सवाल होंगे. पढ़िए उनके जवाब.
कोविड वैक्सीन के लिए कौन योग्य है?
18 साल से अधिक उम्र का हर व्यक्ति कोविड वैक्सीन के लिए योग्य है.
एक मई से शुरू हुए कोविड टीकाकरण अभियान के तीसरे चरण में 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को शामिल किया गया है.
कोविड टीकाकरण अभियान के पहले चरण की शुरुआत 16 जनवरी, 2021 से शुरू हुई थी जिसमें हेल्थ केयर वर्कर्स और फ्रंट लाइन वर्कर्स को वैक्सीन देने में प्राथमिकता दी गई.

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दूसरा चरण एक मार्च, 2021 से शुरू हुआ जब 45 साल से अधिक उम्र के लोगों को इसमें शामिल किया गया.
भारतीय ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया की अनुमति के बाद कोवैक्सीन का दूसरा और तीसरा ट्रायल 2-18 उम्र के बच्चों में किया जा रहा है. इसके नतीजे के बाद 18 साल से कम उम्र के लोगों के वैक्सीनेशन पर कोई फ़ैसला संभव होगा.
आप कोविड वैक्सीन के लिए कैसे रजिस्टर करा सकते हैं?
भारत में कोविड-19 का टीका लगवाने के लिए भारत सरकार की ओर चलाई जा रही सुविधा कोविन प्लेटफ़ॉर्म पर जाकर रजिस्टर करना होगा. आप आरोग्य सेतु ऐप पर भी वैक्सीन के लिए पंजीयन करा सकते हैं.
अगर आपको ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन में कोई दिक़्क़त आए तो आप राष्ट्रीय हेल्पलाइन '1075' पर फ़ोन करके कोविड-19 टीकाकरण और कोविन सॉफ्टवेयर से जुड़ी कोई भी बात पूछ सकते हैं.
अगर आप ऑनलाइन अपॉइंटमेंट नहीं ले सकते हैं तो भी आपके पास एक विकल्प है. वैक्सीन केंद्रों पर हर रोज़ सीमित संख्या में ऑन-स्पॉट रेजिस्ट्रेशन कराने की सुविधा होती है. मतलब आप सीधे जाकर भी वहां रजिस्टर करा सकते हैं. हालांकि इंतज़ार और लाइन से बचने के लिए कोविन पोर्टल के ज़रिए ऑनलाइन अपॉइंटमेंट लेने की सलाह दी जाती है.
वैक्सीन के लिए पंजीयन कराने के लिए cowin.gov.in की वेबसाइट पर जाएं और अपना मोबाइल फ़ोन नंबर दर्ज करें. आपके नंबर पर आपको एक वन टाइम पासवर्ड मिलेगा. इस नंबर को वेबसाइट पर पर लिखे ओटीपी बॉक्स में लिखें और वेरिफ़ाई लिखे आइकन पर क्लिक करें. इससे ये वेरिफ़ाई हो जाएगा.
इसके बाद आपको रजिस्ट्रेशन का पन्ना नज़र आएगा. यहाँ अपनी जानकारी लिखें और एक फ़ोटो आईडी भी साझा करें. अगर आपको पहले से कोई बीमारी है जैसे- शुगर, ब्लड प्रेशर, अस्थमा अन्य तो इसकी जानकारी विस्तार से लिखें.
जब ये जानकारी पूरी हो जाए तो रजिस्टर लिखे आइकन पर क्लिक करें. जैसे ही ये रजिस्ट्रेशन पूरा होगा आपको कम्प्यूटर स्क्रीन पर अपनी अकाउंट डिटेल नज़र आने लगेगी. इस पेज से आप अपनी अपॉइटमेंट डेट तय कर सकते हैं. आप इसी तरह से आरोग्य सेतु ऐप पर भी रजिस्टर करा सकते हैं.
मैंने पहली ख़ुराक ले ली है, दूसरी ख़ुराक के लिए?
हां, वैक्सीन की दूसरी डोज़ के लिए आपको फिर से अपॉइंटमेंट लेना होगा. ध्यान रखिए, पहली डोज़ लेने के बाद दूसरी डोज़ के लिए अपॉइंटमेंट अपने आप शिड्यूल नहीं होगा. कोविन पोर्टल की मदद से आपको फिर से अपॉइंटमेंट लेना होगा.
भारत में किन वैक्सीन को मंजूरी मिली है?
भारत में कोविड-19 से बचाव के लिए जो वैक्सीन लगाई जा रही है, उन्हें ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया (डीसीजीआई) ने अनुमति दी है. ये वैक्सीन हैं - कोविशील्ड, कोवैक्सीन, स्पुतनिक V और मॉडर्ना वैक्सीन. स्पुतनिक V के बारे में कहा जा रहा है कि ये वैक्सीन कोविड-19 के ख़िलाफ़ क़रीब 92% सुरक्षा देती है.
30,000 लोगों पर किए एक ट्रायल में पाया गया कि मॉडर्ना वैक्सीन गंभीर कोविड से क़रीब 95% तक सुरक्षा देती है.

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रूसी वैक्सीन स्पुतनिक V का भारत में उत्पादन शुरू करने की योजना पर काम चल रहा है. रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फंड (आरडीआईएफ़) और भारत की दवा कंपनी पैनेसिया बायोटेक ने इसके लिए समझौता किया है.
कोविशील्ड जहां असल में ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका का संस्करण है वहीं कोवैक्सीन पूरी तरह भारत की अपनी वैक्सीन है जिसे 'स्वदेशी वैक्सीन' भी कहा जा रहा है. कोविशील्ड को भारत में सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया कंपनी तैयार कर रही है.
वहीं, कोवैक्सीन को हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक कंपनी ने इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के साथ मिलकर बनाया है.
इसके अलावा कोवोवैक्स और बायोलॉजिकल ई की दो वैक्सीन को भी जल्द ही अनुमति मिलने की उम्मीद है. कोवावैक्स के आख़िरी चरण के क्लिनिकल ट्रायल में इसे 90 फ़ीसदी तक कारगर पाया गया है जबकि भारत सरकार ने बायोलॉजिकल ई की वैक्सीन के 30 करोड़ खुराक का ऑर्डर दे चुकी है.
क्या कोविड वैक्सीन फ्री हैं?
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात जून, 2021 को अपनी घोषणा में कहा है कि देश में 18 साल से अधिक उम्र के सभी लोगों को 21 जून, 2021 से मुफ़्त में वैक्सीन दी जाएगी.
इससे पहले केंद्र सरकार के अस्पतालों में वैक्सीन मुफ़्त मिल रही थी और उत्तर प्रदेश, असम, सिक्किम, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, दिल्ली, समेत कई राज्यों ने कहा था कि उनके यहां 18 साल से ऊपर की उम्र के सभी लोगों को वैक्सीन निशुल्क दिया जाएगा.
प्राइवेट अस्पताल में लोगों को इसका भुगतान करना होगा. कोविशील्ड प्राइवेट अस्पतालों को 600 रुपये प्रति खुराक और कोवैक्सीन 1200 रुपये प्रति खुराक के दर से उपलब्ध कराई जा रही थी.
कोविशील्ड और कोवैक्सीन ने कहा है कि वो केंद्र सरकार को 150 रुपये प्रति खुराक के दर से आपूर्ति करेगी. जबकि राज्य सरकारों के लिए कोविशील्ड की कीमत 300 रुपये प्रति खुराक और कोवैक्सीन की 600 रुपये प्रति खुराक तय की गई थी.
क्या कोविड वैक्सीन सुरक्षित है?
ज़्यादातर विशेषज्ञों की राय है कि कोरोना से लड़ने के लिए बनी अब तक की लगभग सभी वैक्सीनों की सुरक्षा संबधी रिपोर्ट ठीक रही है.
हो सकता है वैक्सिनेशन के चलते मामूली बुखार आ जाए या फिर सिरदर्द या इंजेक्शन लगाने वाली जगह पर दर्द होने लगे.
हालांकि ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका की कोरोना वैक्सीन लगवाने वाले कई लोगों के मस्तिष्क में असामान्य रूप से ख़ून के थक्के पाए गए हैं.
वैक्सीन लेने के बाद कई लोगों में "सेरिब्रल वीनस साइनस थ्रॉम्बोसिस" (सीवीएसटी) यानी मस्तिष्क के बाहरी सतह पर ड्यूरामैटर की परतों के बीच मौजूद शिराओं में ख़ून के थक्के देखे गए हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि अगर कोई वैक्सीन 50 फ़ीसदी तक प्रभावी होती है, तो उसे सफल वैक्सीन की श्रेणी में रखा जाता है.
डॉक्टरों का ये भी कहना है कि वैक्सीन लगवाने वाले व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य में होने वाले किसी भी मामूली बदलाव पर पूरी नज़र बनाए रखनी होगी और किसी भी बदलाव को तुरंत किसी चिकित्सक से शेयर करना होगा.

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क्या वैक्सीन लेने के बाद भी मुझे कोविड हो सकता है?
इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मौजूदा कोविड-19 वैक्सीन में से कोई भी संक्रमण को पूरी तरह रोक सकती है.
भारत में जो वैक्सीन लग रही है, उनमें एक है कोविशील्ड, जिसके अंतरराष्ट्रीय क्लिनिकल ट्रायर दिखाते हैं कि वैक्सीन की दो डोज़ के बाद यह 90% तक कारगर है. वहीं दूसरी वैक्सीन है कोवैक्सीन, जिसके तीसरे चरण के ट्रायल का प्रारंभिक डेटा दिखाता है कि वो 81% कारगर है.
इसके अलावा अब रूस की स्पुतनिक V को भी भारत में इस्तेमाल की मंज़ूरी दी जा चुकी है. इस वैक्सीन के ट्रायल के नतीजों के मुताबिक पहली डोज़ के बाद यह वैक्सीन कोविड-19 के ख़िलाफ़ क़रीब 92% सुरक्षा देती है.
मॉडर्ना वैक्सीन एक आरएनए वैक्सीन है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को सक्रिय करने के लिए वायरस के आनुवंशिक कोड के हिस्से को इनजेक्ट करती है. एक ट्रायल में पाया गया कि मॉडर्ना वैक्सीन गंभीर कोविड से क़रीब 95% तक सुरक्षा देती है.
यानी कोई भी वैक्सीन लेने से संक्रमण का ख़तरा बहुत हद तक कम हो जाता है . हालांकि वैक्सीन से काफ़ी हद तक संक्रमण और उसके गंभीर असर से बचाव हो जाता है. अब तक के रिसर्च अध्ययनों से यह ज़ाहिर होता है कि वैक्सीन लेने के बाद संक्रमण की चपेट में आए लोगों में संक्रमण अधिकांश मामलों में गंभीर नहीं साबित हुआ.
भारत सरकार की गाइडलाइन के मुताबिक़ वैक्सीन सेंटर के साथ-साथ खुराक लेने के बाद भी सोशल डिस्टेंसिंग, फेस कवर, मास्क, हैंड सैनिटाइजेशन के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है.
वैक्सीन कैसे काम करती है?
एक वैक्सीन आपके शरीर को किसी बीमारी, वायरस या संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार करती है. वैक्सीन में किसी जीव के कुछ कमज़ोर या निष्क्रिय अंश होते हैं जो बीमारी का कारण बनते हैं.
ये शरीर के 'इम्यून सिस्टम' यानी प्रतिरक्षा प्रणाली को संक्रमण (आक्रमणकारी वायरस) की पहचान करने के लिए प्रेरित करते हैं और उनके ख़िलाफ़ शरीर में एंटीबॉडी बनाते हैं जो बाहरी हमले से लड़ने में हमारे शरीर की मदद करती हैं.
वैक्सीन लगने का नकारात्मक असर कम ही लोगों पर होता है, लेकिन कुछ लोगों को इसके साइड इफ़ेक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है. हल्का बुख़ार या ख़ारिश होना, इससे सामान्य दुष्प्रभाव हैं.
वैक्सीन लगने के दो तीन सप्ताह के बाद ही आप उस बीमारी से लड़ने की इम्यूनिटी विकसित कर लेते हैं.
अमेरिका के सेंटर ऑफ़ डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) का कहना है कि वैक्सीन बहुत ज़्यादा शक्तिशाली होती हैं क्योंकि ये अधिकांश दवाओं के विपरीत, किसी बीमारी का इलाज नहीं करतीं, बल्कि उन्हें होने से रोकती हैं.

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मुझे वैक्सीन की दूसरी खुराक कब लेनी चाहिए?
कोवैक्सीन की दूसरी डोज़, पहली डोज़ के 4 से 6 हफ़्ते के अंतराल के बाद लेने की सलाह दी जाती है. भारत सरकार ने दूसरे डोज़ के अंतराल को बनाए रखा है. जबकि कोविशील्ड के दूसरी डोज़ के लिए समय बढ़ाया गया है.
पहले कोविशील्ड के लिए दो खुराक के बीच का अंतराल 4 से 8 हफ़्ते रखा गया था लेकिन अब इसे बढ़ाकर 12 से 16 सप्ताह कर दिया गया है. इसका ध्यान रखते हुए आप अपनी सहूलियत के हिसाब से वैक्सीन की दूसरी डोज़ की तारीख़ चुन सकते हैं.
स्पुतनिक वैक्सीन के मामले में दूसरी खुराक तीन हफ्ते बाद दी जा सकती है.
दुनिया भर में दो डोज़ में अलग अलग वैक्सीन लेने की शुरुआत हो चुकी है और इसको लेकर कई रिसर्च पर चल रहे हैं लेकिन अभी तक भारत में इसको लेकर कोई प्रावधान नहीं बनाया है. तब तक इस बात का ध्यान रखें कि उसी वैक्सीन की दूसरी डोज़ लें, जिसकी पहली ली है. अगर पहले भी कोवैक्सीन लगवाई तो दूसरी बार भी वही लगवाएं और पहली बार कोविशील्ड लगवाई थी तो दूसरी बार भी वही वैक्सीन लगवाएं.
जब दूसरी वैक्सीन लगवाने जाएं तो पहली डोज़ के बाद दिया गया वैक्सीन सर्टिफिकेट लेकर जाएं. ये वैक्सीन सर्टिफिकेट, वैक्सीन केंद्र ही आपको प्रिंट करके देता है. इसके अलावा आप कोविन पोर्टल से भी ये सर्टिफिकेट निकाल सकते हैं. इसके लिए आपको वही मोबाइल नंबर डालना होगा जो रजिस्ट्रेशन के वक़्त डाला था.
डेल्टा वेरिएंट: फाइज़र-बायोनटेक वैक्सीन के लिए आठ हफ़्ते का गैप सबसे सही
फाइज़र-बायोनटेक वैक्सीन की पहली और दूसरी डोज़ के बीच लंबा अंतराल रखने से शरीर का इम्यून सिस्टम संक्रमण के ख़िलाफ़ लड़ने वाली ज़्यादा एंटीबॉडी बनाता है. एक अध्ययन में ब्रिटेन के रिसर्चरों ने ये पाया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फाइंडिग से ब्रिटेन सरकार के उस फ़ैसले को बल मिला है, जिसके तहत शुरुआती तीन हफ़्ते के गैप को बढ़ाया गया था.
आठ हफ़्ते के अंतराल को डेल्ट वेरिएंट से निपटने में बहुत ही सही माना गया है.
ब्रिटेन में इससे पहले 2020 के अंत में दो ख़ुराक के बीच के अंतराल को बढ़ाकर 12 हफ़्ते कर दिया गया था.
लेकिन अब जब टीकाकरण अभियान में सभी उम्र के लोगों को शामिल कर लिया गया और 18 साल से ऊपर वाले सभी लोगों को कम से कम वैक्सीन की पहली डोज़ लग गई है, तो लोगों से अपने दूसरे डोज़ को आगे बढ़ाने के लिए कहा जा रहा है. उनसे कहा जा रहा है कि वो दूसरी डोज़ आठ हफ़्ते बाद लगवाएं.
इस स्टडी को सरकार ने फंड किया है. ये स्टडी एक प्री-प्रिंट पेपर में छपी है, हालांकि विशेषज्ञों की ओर से इसे रिव्यू किया जाना बाक़ी है.
क्या मैं वैक्सीन की दूसरी डोज़ किसी अन्य राज्य/ज़िले में लगवा सकता हूं?
हां, आप किसी भी राज्य/ज़िले या शहर/महानगर में वैक्सीन लगवा सकते हैं. बस ये है कि आप सिर्फ उन्हीं केंद्रों पर वैक्सीन लगवा पाएंगे जहां वो वाली वैक्सीन लग रही हो, जो आपने पहली डोज़ के दौरान लगवाई थी.
क्या मैं दो अलग-अलग वैक्सीन ले सकता हूं?
अमेरिकी हेल्थ एजेंसी सीडीसी का कहना है कि सबसे अच्छी वैक्सीन वही है जो सबसे पहले आपके लिए उपलब्ध हो क्योंकि वो सुरक्षित है, असरदार है और आपके बीमार पड़ने के जोख़िम को कम करती है.
वैक्सीन की दूसरी ख़ुराक में अलग वैक्सीन लेने के असरों पर अभी अध्ययन चल रहा है.

वैक्सीन कितने दिन तक मुझे कोविड से सुरक्षित रखेगी?

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भारतीय केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक़, वैक्सीन से मिलने वाली सुरक्षा की अवधि अभी तक तय नहीं है. हालांकि ब्रिटेन के बायोबैंक में 1700 लोगों पर हुए अध्ययन के मुताबिक एंटी बॉडी विकसित होने के बाद 88% लोगों में छह महीने बाद भी एंटीबॉडी को सक्रिय देखा गया. वहीं अमेरिकी सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन (सीडीसी) ने कहा कि वैक्सीन लेने के बाद लोग कितने दिन तक सुरक्षित रहेंगे, इसको लेकर अभी तक ठीक ठीक कुछ नहीं कहा जा सकता.
क्यावैक्सीन डेल्टा वेरिएंट्स पर प्रभावी हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोना संक्रमण के अलग अलग वेरिएंट्स को नाम दिया है. ब्रिटेन में सबसे पहले पाए गए वेरिएंट को अब अल्फ़ा कहा जा रहा है, जबकि दक्षिण अफ्रीका में पाए गए वेरिएंट को बीटा और ब्राज़ील में सबसे पहले पाए गए वेरिएंट को गामा कहा गया है. वहीं भारत में सबसे पहले देखे गए वेरिएंट को डेल्टा कहा जा रहा है. अब डेल्टा प्लस वेरिएंट भी आ गया है.
ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ ( एम्स) और नेशनल सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल (एनसीडीसी) ने एक अध्ययन में पाया है कि कोविशील्ड और कोवैक्सीन की दोनों डोज़ की वैक्सीन ले चुके लोगों को भी भारत में पहली बार अक्टूबर, 2020 में पाया गया डेल्टा वेरिएंट कोरोना वायरस संक्रमित कर सकता है. लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक़ कोविड वैक्सीन से कोरोना के वेरिएंट्स को रोकने में मदद मिलेगी.
नेचर पत्रिका में प्रोफ़ेसर गुप्ता और उनके साथी रिसर्चरों के प्रकाशित शोध अध्ययन के मुताबिक़ कुछ वेरिएंट निश्चित तौर पर इन वैक्सीनों से बच जाएंगे और ऐसे वेरिएंट पर नियंत्रण अगली पीढ़ी की वैक्सीनों और वैकल्पिक वायरल एंटीजन के इस्तेमाल से हो पाएगा.
वैक्सीन क्या डेल्टा प्लस वेरिएंट पर असर करेगी?
डेल्टा प्लस वेरिएंट, डेल्टा वेरिएंट से ही जुड़ा है. ज़्यादातर लोगों में कोरोना के नए वेरिएंट को लेकर चिंता है. कुछ का मानना है कि नया 'डेल्टा प्लस' वेरिएंट कोरोना वैक्सीन पर भी भारी पड़ सकता है.
हालांकि कोविड टास्क फोर्स के प्रमुख वीके पॉल के मुताबिक़, "कोरोना वायरस के डेल्टा प्लस वेरिएंट को अभी स्टडी किया जाना बाक़ी है और अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक डेटा मौजूद नहीं है, जो साबित करता हो कि नए वेरिएंट वैक्सीन के असर को कम कर देते हैं."
पीटीआई को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "डेल्टा वेरिएंट में बदलाव होने से तथा-कथित डेल्टा प्लस वेरिएंट बना है और क्योंकि ये एक नया वेरिएंट है, इसे लेकर वैज्ञानिक जानकारी अभी शुरुआती दौर में ही है. अभी ये प्रमाणित नहीं हुआ है कि डेल्टा वेरिएंट का ये रूप ज़्यादा संक्रामक है, ज़्यादा बीमार करता है या वैक्सीन की प्रभावकारिता पर कोई बुरा असर डालता है. अभी हमें और जानकारी सामने आने का इंतज़ार करना चाहिए. हमें इन पहलुओं का व्यवस्थित रूप से अध्ययन होने का इंतज़ार करना चाहिए."
साफ़ है कि फिलहाल सरकार की ओर से डेल्टा प्लेस के वैक्सीन पर प्रभाव को लेकर पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा गया है और रिसर्च अभी जारी है. हालांकि आम दिशा-निर्देशों में वैक्सीन की दोनों डोज़ लेने की सलाह दी गई है.

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क्या वैक्सीन लैंब्डा वेरिएंट पर असर करेगी?
अब लैंब्डा वेरिएंट ने भी चिंता बढ़ा दी है. इस वेरिएंट का वैज्ञानिक नाम C.37 है, जो अब एक संभावित ख़तरे की तरह सीमने आया है और अब तक 25 से ज़्यादा देशों में फैल चुका है. सबसे पहले ये वेरिएंट पेरू में पाया गया था.
ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्रालय ने चेताया है कि कोरोना वायरस का लैंब्डा वेरिएंट डेल्टा से भी ज़्यादा ख़तरनाक है.
बीते महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लैंब्ड़ा (C.37) को 'वेरिएंट ऑफ़ कंसर्न' घोषित किया था. डब्ल्यूएचओ ने कहा था कि कई देशों में लैंब्डा का कम्युनिटी ट्रांसमिशन हो चकुा है.
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि लैंब्डा में बहुत सारे म्यूटेशन आ गए हैं, इसकी वजह से संक्रमण दर तेज़ी से बढ़ी है. ऐसी चिंताएं है कि ये वेरिएंट एंटीबॉडी और वैक्सीन से बच सकता है. हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस तथ्य को जानने के लिए और डेटा जुटाने की कोशिश की जा रही है.
क्या मिक्स एंड मैच वैक्सीन भारत के लिए काम करेगी?
दिल्ली के एम्स अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि कोविड-19 के ख़िलाफ़ दो अलग-अलग वैक्सीन की डोज़ दिए जाने से बेहतर इम्युनिटी या ज़्यादा एंटीबॉडी पैदा हो सकती है, लेकिन इस पर फ़ैसला लेने से पहले और ज़्यादा डेटा की ज़रूरत है. उन्होंने ये भी कहा कि कोरोना वायरस के अधिक संक्रामक वेरिएंट डेल्टा प्लस और डेल्टा के ख़िलाफ वैक्सीन की मिक्स डोज़ ज़्यादा कारगर हो सकती है.
एनडीटीवी से बातचीत में डॉ. गुलेरिया ने कहा, "ऐसा पहले भी देखा गया है- एक वैक्सीन के बाद दूसरी वैक्सीन को बूस्टर के तौर पर दिया गया. कुछ डेटा बताते हैं कि वैक्सीन की मिक्स डोज़ लेने पर थोड़े अधिक साइड इफेक्ट्स देखे गए. वहीं दूसरी रिसर्च ये भी बताती है कि इससे बेहतर इम्युनिटी और एंटीबॉडी बनती है."
उन्होंने कहा कि सरकार इस पर काम कर रही है और कुछ महीनों में इसके नतीजे सामने होंगे.
उन्होंने साथ ही कहा, "अभी इस पर और अधिक डेटा की ज़रूरत है. आने वाले समय में कई सारी वैक्सीन देश में उपलब्ध होंगी. जिसमें फाइज़र, मॉडर्ना, स्पुतनिक-वी और जायडस कैडिला शामिल है. इसलिए इस समय हम नहीं जानते हैं कि कौन सा मिश्रण ज़्यादा सही होगा. लेकिन हां, शुरुआती स्टडी बताती हैं कि दो अलग-अलग डोज़ देना एक विकल्प हो सकता है."


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वैक्सीन कैसे बनती है और उसे ओके कौन करता है?
जब एक नया रोगजनक (पैथोजन) जैसे कि एक जीवाणु, विषाणु, परजीवी या फ़ंगस शरीर में प्रवेश करता है तो शरीर का एक उप-भाग जिसे एंटीजन कहा जाता है, वो उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडी का उत्पादन शुरू कर देता है.
एक वैक्सीन में किसी जीव के कुछ कमज़ोर या निष्क्रिय अंश होते हैं जो बीमारी का कारण बनते हैं.
ये शरीर के 'इम्यून सिस्टम' यानी प्रतिरक्षा प्रणाली को संक्रमण (आक्रमणकारी वायरस) की पहचान करने के लिए प्रेरित करते हैं और उनके ख़िलाफ़ शरीर में एंटीबॉडी बनाते हैं जो बाहरी हमले से लड़ने में हमारे शरीर की मदद करती हैं.
पारंपरिक टीके शरीर के बाहरी हमले से लड़ने की क्षमता को विकसित कर देते हैं.
लेकिन टीके विकसित करने के लिए अब नये तरीक़े भी इस्तेमाल किये जा रहे हैं. कोरोना की कुछ वैक्सीन बनाने में भी इन नये तरीक़ों को आज़माया गया है.
भारत में किसी भी वैक्सीन निर्माण की प्रक्रिया विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित मानकों के आधार ही होती है जिसकी सभी चरणों की समीक्षा 'ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया' नामक सरकारी संस्था करती है.
डीजीसीआई से हरी झंडी मिलने के बाद ही किसी वैक्सीन के बल्क निर्माण की अनुमति मिलती है.
गुणवत्ता नियंत्रण यानी क्वॉलिटी कंट्रोल को ध्यान में रखते हुए वैक्सीन के बल्क निर्माण के मानक तैयार किए जाते हैं और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए समय-समय पर वैज्ञानिकों तथा विनियामक प्राधिकरणों के माध्यम से चेकिंग होती रहती है.

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