कोरोना वायरस: वैक्सीन मिलने के बाद भी क्यों पहनना पड़ेगा मास्क?

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    • Author, लेतिसिया मोरी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, साओ पाउलो

कोविड-19 की असरदार वैक्सीन में से एक फ़ाइज़र/बायोएनटेक ने बीते सोमवार से ब्रिटेन में इसका वितरण शुरू कर दिया है. दिसंबर महीने में इसके मेक्सिको और आने वाले महीनों में लातिन अमेरिकी देशों में पहुंचने की उम्मीद है.

लेकिन वैक्सीन मिलने से बाद पहली वो चीज़ क्या होगी जो आप करेंगे?

अगर आप को लगता है कि आप तुरंत मास्क से पीछा छुड़ा सकते हैं, यात्रा कर सकते हैं और उन सब से मिल सकते हैं जिनसे आप महामारी के चलते एक साल से नहीं मिले हैं तो डॉक्टर और संक्रामक रोग विशेषज्ञों ने तथ्यों के आधार पर चेतावनी दी है कि ज़िंदगी इतनी ज़ल्दी पहले की तरह सामान्य नहीं होगी.

बायोलॉजिस्ट नतालिया पस्टर्नक, ब्राज़ील के क्वेश्चन्स ऑफ साइंस इंस्टीट्यूट की प्रेसिडेंट हैं. उनके मुताबिक, ''वैक्सीन मिलने के बाद ज़रूरी है कि आप घर लौटें, सोशल आइसोलेशन बनाए रखें, दूसरी डोज़ का इंतज़ार करें और उसके बाद कम से कम 15 दिनों तक उम्मीद के मुताबिक, वैक्सीन के पूरी तरह प्रभावी होने का इंतज़ार करें.''

वो कहती हैं, ''इसके बाद एक बड़ी आबादी के प्रतिरक्षित (इम्यून) होने का इंतज़ार भी ज़रूरी है ताकि जीवन समान्य हो सके.''

सावधानियां बरतने के तीन कारण हैं-

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शरीर पर होने वाली प्रतिक्रिया

वैक्सीन कैसे काम करती है, इसका फ़ॉर्मूला हमेशा एक ही है कि- ये शरीर में एक तत्व जोड़ता है जिसे एंटीजेन कहते हैं.

ये एंटीजेन एक निष्क्रिय (मृत) वायरस, कमज़ोर वायरस (जो किसी को बीमार नहीं करें), वायरस का एक हिस्सा, कुछ प्रोटीन जो वायरस जैसे दिखते हों या फिर न्यूक्लिक एडिट (जैसे आरएनए वैक्सीन), इनमें से कुछ भी हो सकता है.

साओ पाउलो यूनिवर्सिटी के फ़ैकल्टी ऑफ़ मेडिसिन डॉ. जॉर्ज कलील के मुताबिक, ''एंटीजेन इम्यून प्रतिक्रिया को उकसाता है. यह शरीर को दूषित कीटाणुओं या वायरस से लड़ने के लिए तैयार करता है. ताकि ये वायरस को पहचान सके और उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर सके.''

अगली बार जब वायरस के संपर्क में आएंगे तो शरीर को याद रहेगा कि उससे कैसे लड़ना है और तुरंत इस ख़तरे से प्रभावी ढंग से निपट सकता है.

इस प्रतिक्रिया को एडैप्टिव इम्यून रिस्पॉन्स कहा जाता है और हर वायरस के लिए अलग होता है.

नतालिया पस्टर्नक बताती हैं, ''ये ऐसी प्रतिक्रिया है जिसका शरीर में असर दिखने में कम से कम दो सप्ताह का समय लगता है.''

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वो आगे कहती हैं कि वैक्सीन मिलने के बाद शरीर की पहली प्रतिक्रिया होती है- एंटीबॉडी बनाना, जो वायरस से चिपका रहता है और उसे बॉडी सेल में घुसने से रोकता है और उनका इस्तेमाल करके और वायरस तैयार करता है.

एक बेहतर इम्यून वाले व्यक्ति में रोगाणुओं के शरीर में घुसते ही एंटीबॉडी रिलीज़ होते हैं जो बॉडी सेल्स (कोशिकाओं) को नुकसान पहुंचने से बचाते हैं.

लेकिन एक दूसरे तरह का इम्यून रिस्पॉन्स भी है जिसे सेलुलर रिस्पॉन्स कहते हैं. नतालिया पस्टर्नक कहती हैं, ''इन्हें टी-शेल कहते हैं, जो वायरस को रोकती नहीं हैं लेकिन यह पहचान करती हैं कि कौन सी सेल वायरस से ग्रसित है और उसे नष्ट करती है.''

यानी अगर वायरस किसी तरह एंटीबॉडी से बचकर शरीर की किसी सेल में चला गया तो टी-सेल्स उन्हें ढूंढने और 'जॉम्बी सेल्स' को नष्ट करने का काम करता है ताकि और वायरस न पनपें.

जॉर्ज कलील बताते हैं, ''सेल्युलर रिस्पॉन्स का असर एंटीबॉडी के मुक़ाबले थोड़ा देर से दिखता है. यह दूसरी वजह है कि इम्यूनिटी बेहतर होने का इंतज़ार कुछ हफ़्तों तक पड़ता है.''

यानी वैक्सीन लेने के कुछ हफ़्ते बाद ही आप सुरक्षित रह सकते हैं. ये ठीक वैसा है, जैसे शरीर को कोई सूचना 'प्रोसेस' करने और उसी के अनुरूप काम करने के लिए वक़्त चाहिए.

कोरोना से बचाव के लिए दो डोज़

कोरोना वायरस के मामले में वैक्सीन मिलने के बाद दूसरा मुद्दा कुछ समय के लिए सुरक्षात्मक कदम उठाने का है.

इस बीमारी के ख़िलाफ़ तैयार हुईं अधिकतर वैक्सीन के पूरी तरह प्रभावी होने के लिए इसके दो डोज़ ज़रूरी हैं.

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अब तक अपना प्रभाव दिखा चुकीं चार वैक्सीन हैं, जिनकी दो डोज़ की ज़रूरत होगी. ये हैं- फ़ाइज़र, मॉडर्ना, ऑक्सफ़ोर्ड/ एस्ट्राज़ेनेका और स्पूतनिक वी. यह कोरोनावैक पर भी लागू होता है, जिसे बुटांटन इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर फ़ार्मा कंपनी सिनोवैक बना रही है.

जॉर्ज कलील कहते हैं, ''संकेत ऐसे हैं कि पहली डोज़ लेने के बाद एक महीने तक इंतज़ार करें. फिर दूसरी रोज़ लें और फिर कम से कम 15 दिनों तक महामारी से बचाव के ज़रूरी एहतियात बरतते रहें, जैसे सेल्फ़ आइसोलेशन और मास्क का इस्तेमाल करें. हर वैक्सीन के असर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसके बाद ही आप सुरक्षित हो सकते हैं.''

नतालिया पस्टर्नक कहती हैं, ''पहली डोज़ वह है, जिसे डॉक्टर मुख्य बूस्टर कहते हैं. कह सकते हैं कि यह इम्यून सिस्टम को 'किक-स्टार्ट' देती है. दूसरी डोज़ बेहतर इम्यून रिस्पॉन्स पैदा करती है.''

हालांकि वैक्सीन लेने और एक से डेढ़ महीने तक सारे एहतियात बरतने के बाद भी, ज़िंदगी को आम पटरी पर लौटने में वक़्त लगेगा. और जब तक ज़्यादा आबादी को वैक्सीन नहीं मिल जाती, तब तक लोगों को सावधानी के उपाय करते रहने चाहिए.

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क्या वैक्सीन से भी नहीं मरेगा कोरोना वायरस?

तो इसका जवाब है नहीं. वैज्ञानिक बताते हैं कि अगर अच्छे से टीकाकरण हुआ तो वैक्सीन हर्ड इम्यूनिटी के ज़रिए कोरोना संक्रमण को फैलने से रोक सकती है.

यह सच है कि व्यक्तिगत तौर पर कोई भी वैक्सीन 100 फ़ीसदी प्रभावी नहीं है और यह कोविड-19 की वैक्सीन के मामले में भी सच है. उदाहरण के लिए, फ़ाइज़र वैक्सीन अपने तीसरे चरण की टेस्टिंग में 95 फ़ीसदी असरदार रही है.

इसका मतलब है कि जिस शख़्स को वैक्सीन दी जाएगी, उसमें पांच फ़ीसदी यह आशंका बनी रहेगी कि वो वैक्सीन किसी व्यक्ति पर शायद असर न भी करे.

लेकिन कुछ लोगों को वैक्सीन देने से वायरस का संक्रमण फैलने से कैसे रुक सकता है?

जॉर्ज कलील कहते हैं, ''वैक्सीन हर्ड इम्यूनिटी के ज़रिए काम करती है. वैक्सीन वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या घटाती है, जिससे संक्रमण आगे न बढ़े और उन्हीं मरीज़ों में रहे. इसी तरह चेचक का ख़ात्मा हुआ था.''

हर्ड इम्यूनिटी सिर्फ़ इसलिए ज़रूरी नहीं है कि वैक्सीन 100 फ़ीसदी असरदार है, बल्कि इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि बहुत से लोग ऐसे हैं जो इसे हासिल भी नहीं कर सकते.

डॉक्टर कलील कहते हैं, ''बहुत लोगों को वैक्सीन इसलिए नहीं मिलेगी क्योंकि वो बुज़ुर्ग नहीं हैं या फिर टीकाकरण अभियान का हिस्सा नहीं हैं. कोरोना वायरस की वैक्सीन का परीक्षण अब तक बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर नहीं हुआ है.''

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इसके अलावा वो लोग जिन्हें इम्यून सिस्टम पर असर डालने वाली कोई बीमारी हो, उन्हें भी वैक्सीन नहीं दी जा सकती.

डॉ. कलील के मुताबिक, ''जब कम आबादी में टीकाकरण होगा तो बाकी लोगों का बचाव हर्ड इम्युनिटी से होगा.''

कोरोना वायरस के मामले में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि महामारी को रोकने के लिए 80 फ़ीसदी आबादी का टीकाकरण ज़रूरी है. आदर्श रूप से 90 फ़ीसदी.

इसीलिए यह ज़रूरी है कि जिन्हें वैक्सीन मिल गई है और जिन लोगों ने एक से डेढ़ महीने का वक़्त भी पूरा कर लिया है, वो महामारी से बचाव के उपायों को न छोड़ें.

कोरोना के मामले में ऐसा है कि वैक्सीन को बड़ी आबादी तक पहुंचने में कुछ वक़्त लगेगा.

वैक्सीन की करोड़ों डोज़ बनाना एक रात का काम नहीं है. सरकार और फ़ार्मा कंपनियों के बीच समझौते, कई देशों की वेटिंग लिस्ट, डिस्ट्रीब्यूशन और स्टोरेज़ की मुश्किलें (कुछ वैक्सीन को ज़ीरो तापमान से नीचे रखे जाने की ज़रूरत है.) जैसे कई मुद्दे हैं.

बायोलॉजिस्ट नतालिया पस्टर्नक कहती हैं, ''यह महत्वपूर्ण है कि जिसे भी पहले वैक्सीन मिले वो महामारी से लड़ने के उपाय अपनाता रहे. वैक्सीन मिलने के एक से डेढ़ महीने के बाद भी. अगर उनका इम्यून बेहतर हो भी गया है तो इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वो इस बीमारी को फैलाने का काम नहीं करेंगे.''

वैज्ञानिक का कहना है कि अब तक जो वैक्सीन टेस्ट की गई हैं वो शरीर में वायरस को फिर से फैलने से रोकेंगी और लोगों को बीमार होने से बचाएंगी. लेकिन इस बात के कोई साक्ष्य नहीं है कि जिस शख़्स को वैक्सीन दी जा चुकी है उससे दूसरों को कोरोना संक्रमण नहीं होगा.

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(नोट: यह लेख मूल रूप से बीबीसी की पुर्तगाली सेवा में प्रकाशित हुआ है. आप इसे यहां पढ़ सकते हैं. )

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