कोविड-19: आप तक कैसे पहुंचेगी वैक्सीन?

वैश्विक स्तर पर अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रयासों के चलते दुनिया को कोरोना वायरस की कई वैक्सीन रिकॉर्ड समय में तैयार करने में सफलता मिल सकी है. इन टीकों की मदद से कोविड-19 की भयंकर महामारी से सबसे ज़्यादा जोख़िम वाले लोगों को सुरक्षित करने में मदद मिलेगी

स्क्रॉल करके नीचे जाएं और देखें कि ये टीके कैसे रिकॉर्ड समय में वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं से निकलकर लोगों की बांहों तक पहुंच रहे हैं

वैक्सीन की ज़िंदगी प्रयोगशाला में शुरू होती है

प्रयोगशाला में वैक्सीन विकसित करने की प्रक्रिया का चित्रण.

वैज्ञानिकों ने नए कोरोना वायरस की वैक्सीन विकसित करने का काम तभी शुरू कर दिया था, जब जनवरी 2020 में इसके जेनेटिक सीक्वेंस यानी जैविक बनावट को जारी किया गया था.

दुनिया के तमाम विशेषज्ञों ने पहली बार बड़े पैमाने पर सहयोग करते हुए, वैक्सीन के विकास के अलग अलग चरणों पर एक साथ काम करना शुरू किया था. इस अभूतपूर्व वैश्विक सहयोगा का ही नतीजा था कि वैक्सीन के विकास का जो काम दस साल में होता है, उसे बारह महीनों के अंदर पूरा करने में कामयाबी मिल सकी.

वैक्सीन के विकास के लिए आपस में सहयोग कर रहे दुनिया के तमाम वैज्ञानिकों में से कई ऐसे थे, जिन्होंने सार्स और मर्स महामारियों के वायरस के बारे में अध्ययन किया था. इसीलिए, नए कोरोना वायरस को हराने वाली वैक्सीन तैयार करने की मज़बूत बुनियाद पहले से तैयार थी.

रिसर्चरों ने इस वायरस के बारे में विस्तार से अध्ययन किया, जिससे वो वायरस में मौजूद उस छोटे से तत्व का पता लगा सकें, जो हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम या रोग प्रतिरोधक क्षमता को एक्टिव करता है. वायरस में मौजूद इस तत्व को वैज्ञानिक ज़ुबान में एंटीजन कहते हैं.

वायरस को हराने में कामयाब होने वाली ज़्यादातर वैक्सीन में इस वायरस को बनाने वाले छोटे छोटे ब्लूप्रिंट या वायरस के नुक़सान न करने वाले अंश होते हैं, जिससे कि ये हमारे शरीर में ही बन सकें.

रिसर्चरों ने इन एंटीजन का टेस्ट लैब में कंप्यूटर मॉडल पर किया, जिससे कि इनके साइड इफेक्ट पर नज़र रखी जा सके.

इसके बाद इन टीकों का परीक्षण इंसानों में शुरू किया गया.

इंसानों पर वैक्सीन के ट्रायल का इलस्ट्रेशन/चित्रण

जब लैब में हुए ये परीक्षण पूरे हो गए, तब ये टीके दुनिया के तमाम देशों में ऐसे लोगों को लगाए गए, जो ख़ुद पर इन टीकों का परीक्षण कराने के लिए तैयार थे. इन्हें वैक्सीन वॉलंटियर्स कहा जाता है. इन टीकों के ह्यूमन ट्रायल या इंसानों पर परीक्षण का मक़सद न सिर्फ़ ये सुनिश्चित करना था कि टीके इंसानों के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि ये पता लगाना भी था कि वायरस से बचने के लिए वैक्सीन की कितनी ख़ुराक देनी पड़ेगी.

आम तौर पर वैक्सीन के ऐसे ट्रायल या परीक्षण करने में दस साल तक का समय लगता है. लेकिन, कोविड-19 के लिए टीकों के कई चरण के परीक्षण एक साथ किए गए, जिससे वैक्सीन को जल्द से जल्द इस्तेमाल किया जा सके.

वैक्सीन के सफल परीक्षण के नतीजों को उन संस्थाओं को भेजा गया, जो दवाओँ के सुरक्षित होने को प्रमाणित करती हैं, और उन्हें इस्तेमाल करने की मंज़ूरी देती हैं.

इन संगठनों और उनके वैज्ञानिकों ने तमाम टीकों के परीक्षण के नतीजों और उनके सुरक्षित होने के दावों का बारीक़ी से विश्लेषण किया. इसके अलावा इनकी गुणवत्ता और असरदार होने का भी सत्यापन किया, जिससे कि टीकों के इस्तेमाल को हरी झंडी दी जा सके.

वैक्सीन के इस्तेमाल को मंज़ूरी देने की प्रक्रिया जल्द पूरी करने के लिए ब्रिटेन की नियामक संस्था ने 'रॉलिंग रिव्यू' नाम की एक व्यवस्था का इस्तेमाल किया. इसमें वैक्सीनों के परीक्षणों के पूरा होने का इंतज़ार करने और उसके बाद जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने के बजाय, ट्रायल के दौरान ही जुटाए जा रहे आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर टीकों को मंज़ूरी दी गई

वैक्सीनों की ख़ुराक की बड़ी तादाद किसी दवा कारखाने में बनाई जाती है

वैक्सीन का बड़े पैमाने पर उत्पादन होते दिखाने वाला चित्रण

आम तौर पर इस चरण तक पहुंचने के बाद ही-यानी जब किसी दवा को नियामक संस्था से मंज़ूरी मिल जाती है-दवाओं का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया जाता है

लेकिन, कोविड की वैक्सीनों के मामले में, उनके इस्तेमाल की मंज़ूरी मिलने से पहले से ही उन्हें बडे पैमाने पर बनाने की क्षमता विकसित कर ली गई थी. वो भी उस समय जब वैक्सीन पर रिसर्च जारी थी. उन्हें तैयार करने के लिए वैज्ञानिक काम कर ही रहे थे. इसका कारण ये था कि वैक्सीन तैयार करने में भारी मात्रा में निवेश किया जा रहा था.

वैक्सीन को मंज़ूरी मिलने से पहले ही उन्हें बनाने की क्षमता विकसित करने का मक़सद ये था कि जब सुरक्षित और असरदार वैक्सीन तैयार कर ली जाए और उसे मंज़ूरी मिल जाए, तो कंपनियां उनके जल्द से जल्द वितरण के लिए तैयार रहें

कोई भी वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया के दौरान वायरस के सक्रिय तत्वो को बड़ी मात्रा में अन्य तत्वों जैसे कि स्टेबिलाइज़र से मिलाया जाता है.

इस दौरान वैक्सीन में वो केमिकल भी मिलाया जाता है जिसे 'एडजुवैंट' कहते हैं. 'एडजुवेंट' हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता या इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाता है.

बड़ी मात्रा में तैयार किए गए इन टीकों को छोटी छोटी कीटाणु रहित शीशियों में पैक करने और मंज़िल की ओर रवाना किए जाने से पहले, इनकी गुणवत्ता की पड़ताल की जाती है

वैक्सीन को कोल्ड चेन या फ्रीज़र वैन और आइस कूलिंग रेफ्रिजरेटर जैसे माध्यमों से ही एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है.

वैक्सीन को कोल्ड चेन के ज़रिए तमाम ठिकानों तक ले जाने की प्रक्रिया का चित्रण.

जब वैक्सीन के निर्माता, उन्हें अपने प्लांट से निकालते हैं, तो उन्हें रेफ्रिजेरेटेड ट्रकों के ज़रिए तय मंज़िल की ओर रवाना किया जाता है. इससे वैक्सीन को लगातार एक ख़ास तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है.

ज़्यादातर पारंपरिक टीके 2 से 8 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित रखे जाते हैं. लेकिन, कोविड-19 के कई टीके ऐसे भी हैं, जो इससे कम तापमान पर स्टोर किए जाते हैं.

उदाहरण के लिए, फाइज़र-बायोएनटेक की वैक्सीन को बेहद कम तापमान यानी -70 डिग्री सेल्सियस पर रखना पड़ता है.

हालांकि, ब्रिटेन में तैयार की गई ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन को किसी सामान्य फ्रिज के तापमान पर भी रखा जा सकता है. इसीलिए, इस टीके को कहीं लाने-ले जाने में कम चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. इस वैक्सीन को कम तापमान पर रखी जाने वाली अन्य दवाओं की कोल्ड चेन के ज़रिए भी कहीं लाया-ले जाया जा सकता है.

इस वैश्विक महामारी के ख़ात्मे के लिए ज़रूरी ये है कि उन लोगों तक पहले वैक्सीन पहुंचे, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. न कि उन लोगों को पहले मिले, जो इसे ख़रीद पाने की क़ुव्वत रखते हैं.

अमीर देशों की सरकारों ने एक साथ कई टीकों की करोड़ों डोज़ या खुराक के ऑर्डर दे रखे हैं. लेकिन, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के ग़रीब और कम आमदनी वाले देशों के सबसे कमज़ोर तबक़े के लोगों तक वैक्सीन पहुंचाने के लिए कोवैक्स के नाम से एक कार्यक्रम चला रखा है.

वैक्सीन की ख़ुराक को प्रमुख केंद्रों से टीकाकरण केंद्रों तक ले जाया जाता है

वैक्सीन के टीकाकरण केंद्रों तक पहुंचने का सफर दिखाने वाला चित्रण.

जब कोई वैक्सीन, अपनी तय मंज़िल वाले देश पहुंचती है, तो उसे तुरंत वितरित करने के बजाय, एक ख़ास ठिकाने पर उसकी गुणवत्ता की पड़ताल की जाती है.

फाइज़र की वैक्सीन को सुरक्षित रखने के लिए ख़ास तरह के रेफ्रिजरेटर की ज़रूरत होती है. कई देशों ने इस टीके को रखने के लिए विशेष फ्रीज़र फार्म बनाए हैं. ये वो गोदाम हैं, जहां वैक्सीन को सुरक्षित रखने के लिए कई डीप फ्रीज़र रखे गए हैं.

जब परीक्षण करने वाले, बाहर से आई वैक्सीन की खेप को हरी झंडी दे देते हैं, तो उन्हें कम तापमान वाले विशेष वाहनों के ज़रिए अस्पतालों, क्लिनिक और दूसरे टीकाकरण केंद्रों तक ले जाया जाता है.

कई बार केंद्रीय वैक्सीन हब से टीकों को अस्पतालों और क्लिनिक तक ले जाने से पहले क्षेत्रीय केंद्रों पर ले जाया जाता है.

मरीज़ों को वैक्सीन, टीकाकरण केंद्रों में दी जाती है.

मरीज़ों को वैक्सीन लगाने की प्रक्रिया का इलस्ट्रेशन.

टीकाकरण केंद्रों के प्रशिक्षित कर्मचारियों को वैक्सीन की छोटी छोटी खेप पहुंचाई जाती है. इन केंद्रों में इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि मरीज़ों को लगाने के लिए लाए गए टीके, सही तरीक़े से यानी उचित तापमान पर रखे जाएं.

फ्रीज़ किए हुए टीकों को मरीज़ों को लगाने से पहले उन्हें सामान्य तापमान पर लाकर पिघलाया और पतला किया जाता है.

असली काम तब शुरू होता है, जब वैक्सीन को सिरिंज में भरकर मरीज़ की बांह के ऊपरी हिस्से में लगाया जाता है.

हमारे शरीर के अंदर जाने के बाद ये वैक्सीन, हमारे इम्यून सिस्टम या रोग प्रतिरोधक व्यवस्था को शरीर में कहीं भी मौजूद नए कोरोना वायरस से लड़ने के लिए तैयार करती है. टीके इस उम्मीद में लगाए जाते हैं कि इन्हें लेने वाले कोविड-19 की भयंकर बीमारी के शिकार दोबारा न हों.

ये तो समय के साथ वैक्सीन लेने वालों पर बारीक़ी से नज़र रखने से ही पता चलता है कि जिन्हें ये टीके लगे हैं, वो कब तक कोरोना वायरस से सुरक्षित रह पाते हैं.