कोरोनाः बच्चों पर वैक्सीन का ट्रायल, जानिए क्या कह रहे हैं बच्चे

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चार जून की रात शिवम(बदला हुआ नाम) को थोड़ी बेचैनी हो रही थी. नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले शिवम को लग रहा था जैसे उसे अगले दिन यानी पांच जून को परीक्षा देने जाना है.

दरअसल इस बेचैनी के पीछे एक वजह थी . शिवम को कोवैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल का हिस्सा बनने जाना था.

वो इस बात को लेकर खुश था कि वे इतने बड़ी वैक्सीन मुहिम में अहम भूमिका निभा रहा है लेकिन मन ही मन में एक डर भी था.

डर इस बात का कि सुई बहुत प्वाइंटेड है तो बहुत दर्द होगा. कहीं कोई साइड इफेक्ट या दुष्प्रभाव न हो जाए. क्या वो सुरक्षित होगा या और कोई बीमारी हो सकती है जैसे कोरोना ही हो जाए.

वे ये बैचेनी अपनी एक फ्रेंड के साथ भी शेयर कर चुके था. वो दसवीं में पढ़ती हैं और वो भी इस ट्रायल का हिस्सा हैं.

शिवम बताते हैं कि मेरी इस फ्रेंड को सुई का थोड़ा डर था लेकिन उन्होंने कहा था कि वैक्सीन लगवा लेते हैं क्योंकि वैक्सीन लगवाने के बाद लोगों में ऐसी कोई समस्या होने की ख़बर नहीं आई है.

जब शिवम क्लिनिकल ट्रायल के लिए गए तो वहां 10-12 बच्चे थे जो ट्रायल के लिए आए हुए थे.

शिवम बताते हैं कि उन बच्चों के चेहरों पर कोई भाव नहीं था. न वो खुश दिखाई दे रहे थे न ही उदास थे.

भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के व्यस्कों पर हुए सफल ट्रायल के बाद अब बच्चों में क्लिनिकल ट्रायल पटना के एम्स अस्पताल में चल रहा है.

ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया की अनुमति के बाद कोवैक्सीन का दूसरा और तीसरा ट्रायल 2-18 उम्र के बच्चों में किया जा रहा है.

कोवैक्सीन को भारत बॉयोटेक और इंडियन कॉउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने मिलकर विकसित की है.

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बच्चों पर कोवैक्सीन का ट्रायल

कोवैक्सीन का बच्चों में क्लिनिकल ट्रायल पटना और दिल्ली के एम्स के अलावा नागपुर के मेडिट्रिना इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस में हो रहा है लेकिन पहले इसकी शुरुआत पटना के एम्स से बताई जा रही है.

पटना के एम्स में क्लिनिकल ट्रायल की पहली डोज़ लगवा चुके शिवम कहते हैं, वैक्सीन लगने के बाद हम सब मुस्करा रहे थे.

मेरी फ़्रेंड का कहना था कि सुई कब लगी पता ही नहीं चला. हम सबने वैक्सीन के बाद अपने मम्मी-पापा के साथ फ़ोटो खिंचवाया.

शिवम को अपनी मां से इस ट्रायल के बारे में पता चला था और उन्होंने ही शिवम को इसके लिए प्रोत्साहित किया.

पटना एम्स में डॉ संजीव कुमार क्लिनिकल ट्रायल की पूरी प्रक्रिया समझाते हुए कहते हैं कि बच्चों में वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल के लिए पहले हमने माता-पिता से बच्चों का रजिस्ट्रेशन कराया. अमूमन क्लिनिकल ट्रायल के लिए संचार माध्यमों के ज़रिए जानकारी दी जाती है ताकि जो इच्छुक हैं वो आकर रजिस्ट्रेशन करवा ले.

इस संबंध में हमारे पास 120 से ज्यादा बच्चों का रजिस्ट्रेशन हुआ जिसमें ज्यादातर 12-18 और कुछ 6-12 उम्र के बच्चे शामिल थे.

कार्डियोथोरेसिक सर्जरी में एचओडी और कोविड-19 के नोडेल ऑफ़िसर डॉ. संजीव कुमार आगे बताते हैं कि 'पहले हमें 12-18 साल के उम्र के बच्चों का क्लिनिकल ट्रायल करना था इसलिए उन्हें चुना'.

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ट्रायल से पहले बच्चों की मेडिकल जांच

इसके बाद बच्चों की मेडिकल हिस्ट्री देखी गई क्योंकि ट्रायल के लिए बच्चे का स्वस्थ होना आवश्यक होता है. ऐसे में ये देखा जाता है कि कहीं किसी बच्चे में तेज़ बुखार, टाइफाइड, किसी दवा से एलर्जी, कुपोषण, कोई बड़ी बीमारी जैसे मस्तिष्क या किडनी की कोई दिक्कत, कैंसर, शरीर के किसी भाग का प्रत्यारोपण आदि न हुआ हो.

इसके बाद सबसे अहम होता है इस बात का पता लगाना कि इन बच्चों को पहले कोरोना न हुआ हो और ये बच्चे कोविड पॉजिटिव के संपर्क में न आए हों.

ये सारी पड़ताल करने के बाद बच्चों की संख्या छँट कर 88 हो गई. इसके बाद इन बच्चों का RT-PCR और एंटी बॉडी टेस्ट करवाया गया.

इसमें से ज्यादातर बच्चे ऐसे निकले जिनमें एंटीबॉडी थी यानि उन्हें कोविड हुआ होगा लेकिन वे एसिम्पटोमैटिक रहे होंगे और कोविड का पता नहीं चल पाया होगा. वहीं इसमें से कुछ बच्चों के अभिभावक पीछे हट गए.

डॉक्टर संजीव कुमार

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डॉ संजीव कुमार कारण बताते हुए कहते हैं कि इसके पीछे बच्चों में वैक्सीन को लेकर घबराहट या डर हो सकता है वहीं अभिभावकों में वैक्सीन से होने वाले साइडइफेक्ट की आशंका भी एक पहलू हो सकता है.

वे आगे बताते हैं कि जब हमने इन बच्चों में ये सारी जांच-परख कर ली उसके बाद 27 बच्चे बचे जो इस क्लिनिकल ट्रायल के लिए स्वस्थ और उपयुक्त पाए गए.

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बच्चों पर निगरानी

डॉ संजीव कुमार के मुताबिक इन 27 बच्चों को पहला डोज़ दिया जा चुका है. इन बच्चों पर 28 दिन तक निगरानी रखी जाएगी. इसके बाद एंटीबॉडी टेस्ट की जाएगी फिर ब्लड सैंपल आईसीएमआर को भेजा जाएगा. फिर वैक्सीन का दूसरा डोज़ दिया जाएगा और 14 दिन के बाद यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी.

एम्स पटना में डॉ वीना सिंह, प्लास्टिक सर्जरी विभाग में एचओडी हैं और कोवैक्सीन के लिए ट्रायल का हिस्सा रह चुकी हैं.

उन्होंने इस संबंध में सारी जानकारियां इकट्ठा की और सारी तसल्ली होने के बाद अपने बच्चे को ट्रायल में भाग लेने को कहा.

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वे बताती हैं, ''हालांकि मैं बहुत निडर महिला हूं और इस बात को लेकर भी सजग थी क्या हो सकता है . एक शंका वैक्सीन लगने के तुरंत बाद एलर्जी की थी. लेकिन वहां बच्चों के डॉक्टर मौजूद थे तो वो चिंता भी जाती रही.''

वे फ़ोन पर हंस कर कहती हैं कि जब सुई लगती है तो दर्द होता है बस वही बच्चों को वहां हुआ और सब ठीक रहा और ये बच्चे अब निगरानी में हैं.

बच्चों पर निगरानी रखने के लिए एक चेक लिस्ट बनाई गई है. जिसमें अभिभावकों और बच्चों को कुछ बातों पर ध्यान देने के लिए कहा गया है और कुछ भी गड़बड़ होने पर उसकी जानकारी तुरंत रिपोर्ट करने की हिदायत दी गई है.

जैसे - बच्चों को बुख़ार, सिर दर्द या चक्कर तो नहीं आ रहा है, किसी तरह का इंफेक्शन तो नहीं हुआ है, शरीर में दर्द, कमज़ोरी तो नहीं हुई और किसी प्रकार की एलर्जी, शरीर में चकत्ते निकलना आदि जैसी समस्याएं तो नहीं आ रही है.

डॉक्टर वीना

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रोज़ अस्पताल से इन लोगों को फ़ोन कर फ़ॉलोअप लिया जाता है.

डॉक्टर संजीव कुमार का कहना था कि पहला डोज़ लगने के बाद छह बच्चों ने एक दिन के लिए बुख़ार होने की शिकायत की थी लेकिन और किसी तरह के साइड इफेक्ट की ख़बर नहीं आई.

वे कहते हैं कि 12-18 साल के उम्र के बच्चों में हमें ट्रायल को लेकर कोई दिक्कत नहीं आई. वे आत्मविश्वास से भरे हुए थे लेकिन 6-12 और 2-6 साल के बच्चों के बीच क्लिनिकल ट्रायल चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंकि ये छोटे बच्चे होंगे.

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