फ़लस्तीनी राजनीति और राष्ट्र का क्या भविष्य है? - दुनिया जहान

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यह साल इसराइली कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक (पश्चिमी तट) के फ़लस्तीनियों के लिए अब तक का सबसे अधिक हिंसक साल साबित हुआ है.
इस साल जुलाई में इसराइली सेना ने सैनिक कार्रवाई की जो पिछले कई दशकों की सबसे बड़ी सैनिक कार्रवाई मानी जा रही है. ये मुख्य तौर पर जेनिन शहर में की गई.
इसराइली सेना का दावा है कि वहां से उसके नागरिकों पर हमले किए जा रहे थे. फ़लस्तीनियों का कहना है कि वो महज़ उनकी ज़मीन पर बसाई जा रही इसराइली बस्तियों के अतिक्रमण से अपनी ज़मीन को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत, यह इसराइली बस्तियां अवैध हैं.
काले कपड़े पहने और बंदूकें उठाए फ़लस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने इसराइली कार्रवाई के ख़िलाफ़ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किए. उनकी नाराज़गी केवल इसराइल के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि फ़लस्तीनी प्रशासन के ख़िलाफ़ भी थी.

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वो नारे लगा रहे थे कि इसराइल से लड़ने से पहले फ़लस्तीनी प्रशासन से लड़ें, क्योंकि वो एक निकम्मा प्रशासन है.
30 साल पहले, ओस्लो शांति समझौते के तहत फ़लस्तीनी प्रशासन- पैलेस्टीनियन अथॉरिटी यानी ‘पीए’ का गठन किया गया था.
यह प्रदर्शनकारी पीए के नेता महमूद अब्बास के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे. महमूद अब्बास, अबू माज़ेन के नाम से भी जाने जाते हैं. वो फ़लस्तीनी जनता के बीच काफ़ी अलोकप्रिय हो गये हैं.
87 वर्षीय महमूद अब्बास की सेहत ख़राब रहती है और स्पष्ट नहीं है कि उनकी जगह कौन लेगा?
लेकिन अगर नेतृत्व परिवर्तन सुचारू ढंग से नहीं हुआ तो क्षेत्र मे अफ़रा-तफ़री और हिंसा फैल सकती है.
इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि फ़लस्तीनी नेतृत्व का भविष्य क्या है?
परेशानियां और अटकलें
एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी पत्रकार डालिया हातूका ने बीबीसी के साथ बातचीत करते हुए कहा कि जब महमूद अब्बास पद से हटेंगे तब किसी ऐसे नेता की ज़रूरत होगी जिसके पास फ़लस्तीन के भविष्य का कोई विज़न हो, कोई योजना हो. फ़िलहाल उनके करीब ऐसा कोई नेता नहीं है.
उनके अनुसार, “मुझे याद है जब 2005 के चुनाव में मैंने पहली बार मतदान किया था. वो बड़ा ही रोचक और महत्वपूर्ण दौर था. लोग ख़ुश थे कि उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिला था.”
लेकिन यह 17 साल पुरानी बात है. महमूद अब्बास के सत्ता में आने के बाद से फ़लस्तीनियों को मतदान का मौका नहीं मिला है. इस दौरान महमूद अब्बास ने सत्ता पर अपनी पकड़ जमा ली.
डालिया हातूका ने कहा, “पिछले कुछ सालों के दौरान उन्होंने सभी अधिकार अपने हाथ में ले लिए हैं. 1993 में पीएलओ (पैलेस्टिनियन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन) ने इसराइल के साथ शांति समझौता किया था. वो अब पीएलओ के प्रमुख हैं. इसके अलावा फ़तह संगठन है जो फ़लस्तीनी प्रशासन का हिस्सा है. महमूद अब्बास फ़तह के भी प्रमुख हैं. जैसा कि एक युवा व्यक्ति ने हाल में मुझसे कहा कि वो हर चीज़ के अध्यक्ष हैं.”
1993 में इसराइली प्रधानमंत्री यित्ज़ाक रबीन और पीएलओ के नेता यासिर अराफ़ात ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के गठन पर सहमति हुई थी.
इस समझौते के तहत पांच वर्ष तक गज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक पर प्रशासन के लिए फ़लस्तीनी प्रशासन का गठन हुआ था.
इस दौरान स्थाई समझौते पर वार्ताएं होनी थीं. वो वार्ताएं विफल हो गईं मगर फ़लस्तीनी प्रशासन अभी भी कायम है.
समझौते का एक विवादस्पद मुद्दा यह था कि फ़लस्तीनी प्रशासन इसराइल के साथ सुरक्षा व्यवस्था क़ायम रखने के लिए तालमेल जारी रखेगा.
साथ ही यह सुनिश्चित करेगा कि पश्चिम तट, गज़ा पट्टी और इसराइल पर हमले ना हों. मगर फ़लस्तीनियों को लगता है कि उनका प्रशासन इसराइल की मर्ज़ी पर चल रहा है.
डालिया हातूका कहती हैं, “फ़लस्तीनी सोचते हैं कि जब इसराइली सेना जेनिन और हेबरॉन में कार्रवाई करती है, शरणार्थी शिविरों पर हमले करती है तब फ़लस्तीनी सुरक्षाबल कहां बैठे होते हैं? वो उनके हितों की सुरक्षा क्यों नहीं करते? लोग मानते हैं कि फ़लस्तीनी सुरक्षाबल बस इसराइल की मर्ज़ी मान रहा है.”
लोगों में यह धारणा भी पनप रही है कि महमूद अब्बास क्षेत्र के दूसरे तानाशाहों की तरह बन गए हैं और सत्ता से चिपके रहना चाहते हैं.
डालिया हातूका ने कहा, “उन्होंने अपने संभावित प्रतिद्वंदी को बाहर कर दिया है. पश्चिम तट, गज़ा और वो फ़तह संगठन के भीतर भी विरोधी आवाज़ों को दबा रहे हैं. कई साल पहले फ़लस्तीनी संसद को भंग कर दिया गया. उनके आदेशों को चुनौती देने वाला कोई नहीं है. यह एक समस्या है. साथ ही न्यायपालिका को भी दरकिनार कर दिया गया है.”
डालिया हातूका का मानना है कि युवाओं में निराशा फैल रही है क्योंकि उन्हें नेतृत्व में कोई नई योजना या नया विचार दिखाई नहीं देता. तंग आकर कई युवा हथियार उठा रहे हैं. ख़ासतौर पर शरणार्थी शिविरों में कई छोटे मिलिशिया गुट पनप रहे हैं.

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सत्ता की खोह
रमल्ला में पैलेस्टीनियन सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च में राजनीतिशास्त्र के प्रोफ़ेसर ख़लील शिकाकी कहते हैं कि फ़लस्तीनी समस्या को सुलझाने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा.
“आज 60% लोग मानते हैं कि फ़लस्तीनी प्रशासन एक बोझ है. केवल 15% फ़लस्तीनी मानते हैं कि राष्ट्रपति को बने रहना चाहिए. इसी वजह से वो चुनाव करवाना नहीं चाहते.”
“ना चुनाव हो रहे हैं और ना नेतृत्व परिवर्तन पर कोई बात हो रही है जिस कारण फ़लस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन में सत्ता संघर्ष का ख़तरा बढ़ गया है.”
ख़लील शिकाकी का कहना है कि फ़लस्तीनी मीडिया में इस विषय पर खुल कर बात नहीं हो रही है. इस पर चर्चा केवल सोशल मीडिया और अकादमिक तबकों में हो रही है.
चिंता का दूसरा कारण यह है कि ‘फ़तह’ और चरमपंथी संगठन ‘हमास’ के बीच दरार पड़ चुकी है.
इस्लामी चरमपंथी गुट ‘हमास’ ने 2003 में संसदीय चुनाव में जीत हासिल की थी जिसके बाद यूके, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने ‘हमास’ को आतंकवादी संगठन करार देकर फ़लस्तीनियों पर प्रतिबंध लगा दिए और विदेशी सहायता रोक दी गई.
गज़ा में भड़की हिंसा के बाद महमूद अब्बास ने सरकार को भंग कर दिया. तभी से अब्बास की ‘फ़तह’ पार्टी पश्चिम तट का प्रशासन चला रही है और गज़ा का प्रशासन ‘हमास’ के हाथ में है.
ख़लील शिकाकी ने बीबीसी से कहा, “पहले ‘हमास’ ने ही क्षेत्र में अस्थिरता फैला दी है. पश्चिम तट में हाल की हिंसा को देखते हुए लगता है कि ‘हमास’ जान गया है कि पश्चिम तट में फ़लस्तीनी प्रशासन कमज़ोर पड़ गया है और वो मौके का फ़ायदा उठाना चाहता है."
"उसने पश्चिमी तट में सशस्त्र गुट और सैन्य ढांचे बनाना शुरू कर दिया है जो ज़रूरत पड़ने पर इसराइल पर हमले कर सकते हैं और अगर फ़लस्तीनी प्रशासन उन्हें रोकने की कोशिश करे तो उससे भी निपट सकते हैं. ‘हमास’ सैनिक और राजनीतिक मोर्चे पर अपनी पकड़ बना रहा है और लोगों को फ़लस्तीनी प्रशासन के ख़िलाफ़ संगठित कर रहा है.”
सत्ता परिवर्तन के दौरान यह बातें काफ़ी महत्वपूर्ण हो सकती हैं. फ़लस्तीनी क़ानून के अनुसार अगर अब्बास पद छोड़ देते हैं या पद पर रहते हुए उनकी मृत्यु हो जाती है तो संसद के अध्यक्ष को अंतरिम राष्ट्रपति बनाया जाएगा और 60 दिनों के भीतर उन्हें चुनाव करवाना होगा. अब्बास ऐसा नहीं चाहेंगे क्योंकि संसद का अध्यक्ष विपक्षी दल ‘हमास’ का सदस्य है.
ख़लील शिकाकी कहते हैं कि फ़िलहाल संसद नहीं है क्योंकि वर्तमान राष्ट्रपति ने 2018 में संसद को भंग कर दिया था. संसद का अध्यक्ष भी नहीं है. इसलिए अब्बास के ना रहने पर क्या होगा इसकी कोई योजना नहीं है और ना ही चुनाव करवाने की कोई योजना है. अब्बास की जगह कौन ले, इस पर आम सहमति नहीं है जिसकी वजह से उनके ना रहने पर सत्ता में खोह पैदा हो सकती है जो हिंसक रूप ले सकती है.
ख़लील शिकाकी की राय है कि अगर सशस्त्र गुटों ने सत्ता हथियाने की कोशिश की तो स्थिति बहुत बिगड़ सकती है. सवाल है कि मौजूदा हालात में फ़लस्तीनियों को कौन एकजुट कर सकता है?
सर्वोच्च पद
फ़लस्तीनी और अरब मामलों के विश्लेषक अहमद ख़ालिदी मानते हैं कि सवाल यह नहीं कि अब्बास का उत्तराधिकारी कौन होगा बल्कि वो अब्बास प्रशासन से अलग क्या करेगा. अब्बास के उत्तराधिकारी के लिए कुछ एक नाम सामने आते रहे हैं उनमें से एक हैं अब्बास के नज़दीकी हुसैन अल शेख़ जो इसराइल के साथ वार्ताओं में प्रमुख भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन वो भी फ़लस्तीनी जनता के बीच अलोकप्रिय हैं. अब्बास की ‘फ़तह’ पार्टी में भी कई नेता सर्वोच्च पद के दावेदार हैं.
अहमद ख़ालिदी के अनुसार, “अब्बास की जगह लेने वाले नेता को आम जनता का समर्थन होना चाहिए जो केवल तकनीकी तौर पर चुनाव ना जीते बल्कि सही मायने में आम फ़लस्तीनियों का प्रतिनिधि हो. जैसा कि यासिर अराफ़ात थे जो कई दशकों तक फ़लस्तीनियों के नेता रहे और उन्हें आम जनता का समर्थन हासिल था.”
ऐसे दो नेता भी हैं जिन्हें जनता का समर्थन प्राप्त है. उनमें से एक हैं अब्बास के कट्टर प्रतिद्वंदी मरवान बरघौटी जो इंतिफ़ादा में अपनी भूमिका को लेकर इसराइल की जेल में उम्रकैद काट रहे हैं और दूसरे हैं मोहम्मद अर्लान जो अबू धाबी में निर्वासन में रह रहे हैं जिन्हें ‘फ़तह’ और ‘हमास’ दोनों ही दलों में पसंद किया जाता है. लेकिन ऐसा कोई नेता नहीं हो जिसे स्थानीय लोगों का ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय ताकतों का समर्थन भी हासिल हो.
अहमद ख़ालिदी का कहना है कि ज़्यादातर दावेदार ओस्लो समझौते के समय की पीढ़ी के हैं यानी वो 60 की उम्र के करीब के नेता हैं, “बहुत से युवा नेता जो चरमपंथी नहीं हैं वो मुख्यधारा की राजनीति में अलग थलग पड़े हुए हैं. वो सामाजिक कार्यकर्ता हैं. लेकिन उनके पास व्यापक जन समर्थन नहीं है.”
गज़ा और पश्चिम तट में हुई रायशुमारी से पता चलता है कि ‘हमास’, अब्बास के ‘फ़तह’ संगठन से अधिक लोकप्रिय है. अगर चुनाव हुए तो ‘हमास’ का प्रत्याशी जीत जाएगा.
अहमद ख़ालिदी का मानना है, “फ़लस्तीनी प्रशासन और इसराइल दोनों ही नहीं चाहेंगे कि ‘हमास’ सत्ता हथिया ले. ऐसा होने की संभावना तो नहीं लगती लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इसराइल पूरी ताकत के साथ भीतर घुस आएगा.”
फ़लस्तीनी राजनीति में ध्रुवीकरण तो है लेकिन समाज का राजनीतिक मक़सद लोगों को साथ रखे हुए है. जो भी नया नेता आएगा उसे इस लक्ष्य को पूरा करना होगा.
अहमद ख़ालिदी कहते हैं यह लंबी प्रक्रिया है और नए नेता को स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के गठन और इसराइली कब्ज़े को ख़त्म करने के लिए काम करना होगा. मगर ऐसा नहीं लगता कि दोनों पक्षों के बीच इन मुद्दों पर वार्ताओं के ज़रिए कोई समझौता हो पाएगा.
फ़लस्तीनी राष्ट्र
पैलेस्टीनियन इंस्टीट्यूट फ़ॉर पब्लिक डिप्लोमसी की कार्यकारी निदेशक इनेस अब्देल रज़ाक का मानना है कि इसराइल की बात किए बिना फ़लस्तीनी राष्ट्र की बात नहीं हो सकती.
“हम एक देश में रह रहे हैं जिस पर इसराइल का शासन है. यह हक़ीक़त है कि इसराइल फ़लस्तीनियों के जीवन को नियंत्रित करता है. फ़लस्तीनी प्रशासन के नियंत्रण वाले क्षेत्र में भी आयात और निर्यात जैसी महत्वपूर्ण बातों पर इसराइल का नियंत्रण है. जन्म और मृत्यु का रजिस्ट्रेशन तक इसराइल के हाथ में है.”
इसराइल में बिन्यामिन नेतन्याहू एक धुर दक्षिणपंथी गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं जो इसराइल के हितों में कोई बदलाव नहीं चाहती.
इनेस अब्देल रज़ाक ने कहा, “इसराइल और फ़लस्तीनी प्रशासन किसी प्रकार का राजनीतिक संगठन नहीं पनपने देना चाहते. इसकी वजह से साइबर सर्विलांस के ज़रिए सभी गतिविधियों पर नज़र रखी जा रही है. गिरफ़्तारियां हो रही हैं राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है. छात्रों की गिरफ़्तारियां हो रही हैं. उन्हें डराया और धमकाया जा रहा है ताकि कोई छात्र संगठन ना बन पाए.”
“अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय फ़लस्तीनी समस्या सुलझाने के प्रति गंभीर होता तो ये कार्रवाईयां बंद करने के लिए कदम उठाने की कोशिश करता और इसराइल को इसके लिए जवाबदेह बनाता. वो स्थिरता के नाम पर फ़लस्तीनी प्रशासन पर भी दबाव नहीं डाल रहा है.”
धीरे धीरे अरब जगत के साथ इसराइल के संबंध सुधर रहे हैं और वो अलग थलग नहीं रहा है. इसका भी फ़लस्तीनी मुद्दे पर असर पड़ेगा.
अब्देल रज़ाक कहती हैं, “अमेरिका की नीति स्पष्ट है कि वो अन्य देशों को भी इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. अमेरिका मौजूदा हालात को एक तरह से जायज़ बना रहा है जिसमें फ़लस्तीनियों के अधिकार और मुद्दों को दरकिनार कर दिया गया है. संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और सऊदी अरब जैसे देश टेक्नॉलॉजी, हथियार और दूसरे क्षेत्र में इसराइल के साथ व्यापार बढ़ा रहे हैं. उन्हें अपनी जनता या फ़लस्तीनियों के हितों और अधिकारों की चिंता नहीं है.”
अब्देल रज़ाक ने कहा कि फ़लस्तीन की 70% आबादी कि उम्र 30 साल से कम है यानी जब से वो पैदा हुए हैं उन्होंने महमूद अब्बास को ही सत्ता में देखा है और उन्हें कभी मतदान करने का अवसर नहीं मिला है. लेकिन अब समय आ गया है कि नई पीढ़ी से कोई नेतृत्व उभरे.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि फ़लस्तीनी नेतृत्व का भविष्य क्या है?
फ़लस्तीनी राजनीति में महमूद अब्बास का उत्तराधिकारी कौन बनेगा यह स्पष्ट नहीं है. मगर अनुमान यही है कि अब्बास के करीबी नेताओं में से ही कोई उनकी जगह लेगा जिस पर बदलाव लाने की ज़िम्मेदारी होगी.
हमारे एक्सपर्ट मानते हैं कि चुनाव के ज़रिए ही शांतिपूर्ण नेतृत्व परिवर्तन बेहतर होगा. लेकिन चुनाव की संभावना दिखाई नहीं देती.
अगर नेतृत्व परिवर्तन शांतिपूर्ण तरीके से नहीं हुआ तो हिंसा और अफ़रा-तफ़री बढ़ सकती है. यहां तक कि फ़लस्तीनी प्रशासन ढह सकता है और फ़लस्तीनियों का स्वतंत्र राष्ट्र का सपना और धुंधला पड़ सकता है.
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