इसराइल-फ़लस्तीन के बीच भड़की हिंसा का क्या है ट्रिगर पॉइंट

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- Author, राफ़ी बर्ग
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ ऑनलाइन की मध्य-पूर्व एडिटर
इसराइल और फ़लस्तीन के बीच हिंसा नए साल की शुरुआत से ही तेज़ हुई है.
दोनों तरफ़ मरने वालों की तादाद भी इस दौरान काफ़ी बढ़ी है. इसकी वजह आख़िर क्या है, इस रिपोर्ट में हमने ज़मीनी हालात समझने की कोशिश की है.
हिंसा का सिलसिला कैसे बढ़ा?
इसराइल और फ़लस्तीन के बीच हिंसा की जो घटनाएं हो रही हैं, वो मुख्य तौर पर वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में हो रही हैं. ये इलाक़ा 1967 के मध्य-पूर्व युद्ध के बाद से इसराइल के नियंत्रण में है.
हालांकि इसकी शुरुआत कैसे हुई, इसे लेकर तमाम दलीलें हैं, लेकिन इसमें बढ़ोतरी मार्च 2022 से होनी शुरू हो गई थी.
तब फ़लस्तीन की तरफ़ से इसराइल पर ज़ोरदार हमले हुए थे, जिसके जवाब में इसराइली सेना ने वेस्ट बैंक इलाक़े में आर या पार का ऑपरेशन शुरू कर दिया. इस दौरान इसराइली सेना ने तक़रीबन हर रात संदिग्ध इलाक़ों में दबिश दी.

हालात इतने बिगड़े कैसे?
पिछले एक साल में इसराइली सेना के ऑपरेशन और फ़लस्तीनी हमलों में कई आम नागरिकों की जान गई. इस दौरान जितने बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, उतने ही ज़्यादा लोगों की जान गई.
पिछले साल सिर्फ़ वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में 146 फ़लस्तीनी मारे गए. इसमें हमलावरों के साथ आतंकी और आम लोग भी शामिल थे. संयुक्त राष्ट्र संघ के रिकार्ड के मुताबिक़ ये तादाद 2005 के बाद सबसे ज़्यादा है.
इस दौरान फ़लस्तीनी या इसराइली अरबों के हमले में 29 इसराइली और दो विदेशी लोग भी मारे गए. 2015 के बाद इसराइलियों के लिए हिंसा का ये सबसे बुरा साल था.
अभी इस साल के पहले दो महीनों में ही 60 फ़लस्तीनी और 14 इसराइली मारे जा चुके हैं. ये तादाद 2022 के इन्हीं दो महीनों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है. इस दौरान हिंसा की भयंकर घटनाएं भी हुईं.
इसी फ़रवरी में नाब्लुस इलाक़े में इसराइली सेना ने जो रेड मारी. इसमें 11 फ़लस्तीनी मारे गए. फ़लस्तीन के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ उस रेड में दर्जनों लोग बुरी तरह ज़ख़्मी भी हुए थे.
इसी तरह पिछले महीने जेनिन में सेना की रेड में 10 फ़लस्तीनी मारे गए थे.
हालांकि इसराइलियों ने भी इस दौरान कम घातक हमलों का सामना नहीं किया. इसी जनवरी में पूर्वी यरुशलम के एक यहूदी मंदिर के बाहर सात लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई. इसी तरह फ़रवरी में शहर के बाहरी इलाक़े में एक बस स्टॉप पर हुए हमले में तीन लोग मारे गए.

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कैसे भड़क रही है हिंसा?
इस सवाल पर दोनों पक्ष एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. लेकिन इसके पीछे कुछ पुरानी वजहें भी हैं.
फ़लस्तीनी हमलावर और इनका समर्थन करने वाले लोग कहते हैं कि वो इसराइल से लड़ रहे हैं, अपनी ज़मीन और हमलों का बदला ले रहे हैं.
इसमें से कई हमले ऐसे हमलावरों ने किए जो किसी संगठन के निर्देश पर काम नहीं करते. ऐसे हमलों के लिए इसराइल वेस्ट बैंक का प्रशासन संभालने वाले फ़लस्तीनी अथॉरिटी को ज़िम्मेदार ठहराता है.
इस दौरान 'लायंस डेन' नाम के नए आतंकी संगठनों ने भी हमले किए. फ़लस्तीन में इस संगठन की लोकप्रियता काफ़ी तेज़ी से बढ़ी है.
इसराइल कहता है कि ऐसे आतंकी संगठनों के ख़िलाफ़ जो वेस्ट बैंक में ऑपरेशन 'ब्रेक द वेव' चलाया जा रहा है, उसका मक़सद आतंकियों को गिरफ्तार करना ताकि उन्हें नए हमले करने से रोक सकें.
हालांकि इसराइली सेना की ये रेड ज्यादातर घनी आबादी वाले शरणार्थी शिविरों और शहरी इलाक़ों में हो रही है. यहाँ सेना को जबर्दस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है, इसकी वजह से ज़्यादा लोग हताहत होते हैं.

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क्या कभी थमेगी हिंसा?
इसकी संभावना हाल फ़िलहाल में तो नहीं दिखती. इसराइल कहता है कि आतंकी समूहों को कमज़ोर करने और उनकी तरफ़ से हमले रोकने के लिए वो अपना मिलिटरी ऑपरेशन जारी रखेगा. दूसरी तरफ फ़लीस्तीन का कहना है कि उसकी तरफ़ से हमले अपने से कहीं ज़्यादा मज़बूत सेना की ज़्यादती का जवाब है.
रही बात हिंसा रोकने की राजनितक कोशिशों की तो स्थायी समाधान निकालने के लिए ऐसी कोई प्रक्रिया फ़िलहाल नहीं है. इसकी वजह से इसराइल और फ़लस्तीन दोनों के बीच दशकों पुरानी शिकायतों का सिलसिला और भी गंभीर होता जा रहा है.
उधर फ़लस्तीनी अथॉरिटी (PA) की अपनी मुश्किले हैं. कई फ़लस्तीनी ही इस पर इसराइली सेना के साथ मिलीभगत का आरोप लगाते हुए तंज़ कसते हैं. अथॉरिटी आतंकियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई करने से भी बचती है क्योंकि इससे आम फ़लस्तीनी लोगों के बीच उनकी साख कम होगी.
दूसरी तरफ़ इसराइल की नई दक्षिणपंथी सरकार है जो फ़लस्तीनी हमलों के ख़िलाफ़ कड़े क़दम उठा रही है. इसके तहत हमलावरों के घर बुल्डोजर से ढहाए जा रहे हैं ताकि उन्हें निर्वासित किया जा सके. इसके अलावा वो वेस्ट बैंक इलाक़े में यहूदी बस्तियां भी बढ़ा रहे हैं.

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इसराइल वेस्ट बैंक के उन हिस्सों पर यहूदी बस्तियां बसा रहा है, जिसे फ़लस्तीन अपने भावी देश का हिस्सा बताता है. उसके मुताबिक़ इसराइल के साथ लंबे संघर्ष की जड़ यही है.
अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के मुताबिक़ भी ये बस्तियां अवैध है, लेकिन इसराइल इसे नहीं मानता.
उम्मीद की एक हल्की सी रौशनी अमेरिका की मध्यस्थता में हो रही वार्ता से ज़रूर निकलती रही है. इसके तहत फ़लस्तीन और इसराइल के प्रतिनिधि बरसों बाद आमने सामने बैठे.
दोनों के बीच तनाव कम करने के उपायों पर बातचीत के लिए ये बैठक रविवार को जॉर्डन में हुई थी. बैठक में ये तय हुआ कि दोनों पक्ष एक बार फिर इसी मार्च में आमने सामने बैठेंगे.
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