इसराइल पर हमास के हमले में ईरान पर सवाल क्यों, विदेशी मीडिया में क्या कहा जा रहा है?

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इसराइल के साथ टकराव में हमास को ईरान के समर्थन ने पूरी दुनिया को चौंकाया है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी इसकी काफी चर्चा है.
‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने लिखा है कि शनिवार को इसराइली ठिकानों पर हमास के अचानक हमले को ईरान का समर्थन हासिल है. हमास को इस हमले में ईरानी सुरक्षा अधिकारियों ने मदद की है.
अख़बार ने हमास और हिजबुल्लाह के सीनियर सदस्यों के हवाले से लिखा है कि इसराइल पर हमास के हमले को ईरान का समर्थन हासिल है और इस योजना को बेरूत में पिछले नवंबर को हुई बैठक में हरी झंडी दी गई थी.
‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने इन सदस्यों के हवाले से लिखा है कि ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड के अधिकारी हमास से मिल कर अगस्त से ही इसराइल पर हवा,ज़मीन और समुद्र में हमले की योजना बना रहे थे.
इसराइल पर 1973 में योम किपुर वॉर के दौरान किए गए हमले के बाद ये सबसे भीषण हमला है.
अख़बार के मुताबिक़ ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड के अधिकारियों की निगरानी में हुई बेरूत की बैठक में हमास के इस हमले की बारीक तैयारियां की गई थीं.
इस बैठक में इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड के अधिकारियों के अलावा ईरान समर्थित हमास समेत चार चरमपंथी समूहों के लोग भी शामिल थे. हमास का गज़ा में वर्चस्व है, वहीं हिजबुल्लाह लेबनान में सक्रिय है.
हालांकि अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि उसे इस हमले में ईरान के सहयोग का सुबूत नहीं मिला है. अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने सीएनएन को एक इंटरव्यू में कहा,''अभी तक हमें इस बात के सुबूत नहीं मिले हैं, ईरान ने हमास के हमले में सहयोग किया है. लेकिन इतना तय है कि दोनों के बीच काफ़ी दिनों से संबंध रहे हैं.''
अख़बार ने लिखा है कि एक यूरोपीय अधिकारी और सीरियाई सरकार के एक सलाहकार ने ईरान और हमास की तैयारी का वैसा ही ब्योरा दिया जैसा हमास और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड के अधिकारियों ने दिया है.

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‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने लिखा है इन बैठकों के बारे में पूछने पर हमास के एक सीनियर सदस्य महमूद मिरदावी ने कहा कि इस समूह ने हमले की तैयारी ख़ुद की थी.
उन्होंने कहा, ’’हमले का फैसला फ़लस्तीन और हमास का था.’’
संयुक्त राष्ट्र में ईरानी मिशन के प्रवक्ता ने कहा कि ईरान गज़ा में हमास की कार्रवाई का समर्थक है लेकिन उसने इसे निर्देशित नहीं किया है.
अख़बार लिखता है कि अगर ईरान ने इस हमले में हमास की मदद की है कि तो इसराइल के साथ उसकी ये लड़ाई अब आमने-सामने की हो जाएगी. अब तक दोनों के बीच छाया युद्ध चल रहा था. लेकिन इससे मध्य पूर्व में संघर्ष और बढ़ जाएगा.
इसराइली सुरक्षा बल के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि अगर इसराइलियों की हत्या में ईरान का हाथ पाया गया तो उनका देश ईरान के नेताओं पर हमले करेगा.
अख़बार ने हमास और हिजबुल्लाह के हवाले से लिखा है कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड की योजना एक चौरतफा मोर्चा बनाना है, जो इसराइल को हर तरफ से घेर ले.
उसकी इस योजना के मुताबिक हिजबुल्लाह और 'पॉपुलर फ्रंट फोर दि लिबरेशन ऑफ पेलिस्टिन' उत्तर से, फ़लस्तीन इस्लामिक जिहाद और हमास गज़ा और पश्चिम किनारे पर इसराइल को घेरेंगे.
इसराइल और हमास के संघर्ष में 700 से अधिक इसराइली और 400 से अधिक फ़लीस्तीन लोगों के मारे जाने की सूचना है.
ईरान का मीडिया क्या लिख रहा है?

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ईरानी मीडिया में हमास के हमले का समर्थन किया गया है.
‘तेहरान टाइम्स’ ने इसराइल पर हमास के इस हमले का समर्थन करते हुए लिखा है,''इतिहास ने पन्ना पलट दिया है. अभी जो हो रहा है वो भविष्य को एक आकार देगा.कुछ ही घंटों में कई गणनाएं और मज़बूत समीकरण बेकार साबित हो गए हैं. आग वहां भड़की, जहां उन्हें लगा था कि ये हमेशा के लिए बुझ चुकी है.''
‘तेहरान टाइम्स’ ने लिखा है कि "अल-अक्सा स्टॉर्म" ऑपरेशन ज़ियोनिस्ट दुश्मनों की रणनीति पर बड़ा और ऐतिहासिक हमला है.
''फ़लस्तीनी इलाक़ों पर कब्जे के बाद इसराइल को लगा ये झटका अप्रत्याशित है. बेशक, युद्ध अभी शुरू हुआ है लेकिन आगे अब कई चौंकाने वाले मामले सामने आएंगे. इसराइल तो अभी तक ये समझ ही नहीं पाया है कि उसे कुछ ही घंटों में क्या-क्या झेलना नहीं पड़ा है.’’
अख़बार लिखता है, ''इस वक़्त इसराइल की लड़ाई को बाधित करना मौजूदा लड़ाई की भावना है. इसराइल के पास बेहद खतरनाक कैलकुलेशन का सेट है, जिसके आधार पर उसने बेवकूफी भरी रणनीतियां तैयार की थी. ये भ्रम अब दूर होना चाहिए.''
तेहरान टाइम्स ने लिखा है,’’ पिछले महीने इसराइल का पहला कैलकुलेशन ये था कि वो अल-अक्सा मस्जिद को नष्ट कर सकता है और उसके खंडहरों पर अपने मंदिर बना सकता है. मौजूदा समय में सत्ता में बैठी जियोनिस्ट चरपमंथियों की एक टीम मस्जिद को जल्द से जल्द गिराना चाहती थी.’’
‘तेहरान टाइम्स’ लिखता है, '' इसराइल ये सोच रहा था कि वो कब्जे और हत्या के पुराने दिनों में लौट सकता है. अल-कुदस में वो घरों पर कब्जा कर सकता है. हर इसराइली सड़क पर मुस्लिमों को मार सकता है. ये घटना अल-कुदस में हर दिन होती है.''

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अख़बार ने लिखा है कि इसराइल ने सोचा कि गज़ा में काम खत्म हो गया है कि और कोई भी लड़ना नहीं चाहता. उसने ये भी सोचा था कि प्रतिरोध करने वाले समूहों में के बीच मतभेद चरम पर हैं.
उसका मानना था कि कतर और मिस्र ने प्रतिरोध को नियंत्रित कर लिया है और उनके संकल्प को दबा दिया है.
इसराइल ये भी सोच रहा था कि उत्तरी मोर्चा स्थायी तौर पर ठप पड़ गया है और हिजबुल्लाह कभी भी दूसरे संघर्ष का जोखिम नहीं लेगा.
इस तरह इसराइल चार अहम निष्कर्षों पर पहुंच चुका था. 1. वो गज़ा पट्टी में अपने कब्जे को पूरा कर सकता है और अल-कुदस को खत्म कर सकता है. 2. वो दक्षिणी और उत्तरी मोर्चों को हमेशा के लिए बंद रख सकता है. 3.वो बाकी इस्लामी देशों पर ये बात थोप सकता है हालात सामान्य हैं. 4. अपनी सारी ऊर्जा "पूर्व में सैन्य विस्तार" पर खर्च करना और ईरान पर ध्यान केंद्रित करना.
लेकिन ये सारे अनुमान ध्वस्त हो गए हैं.
'हमास के हमले की गूंज यूक्रेन, सऊदी और ईरान में सुनाई पड़ेगी'

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‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में स्तंभकार थॉमस एल फ्रीडमैन ने लिखा है कि ये संघर्ष इसराइल और हमास के बीच होने वाली रोजमर्रा का टकराव नहीं है. गज़ा और इसराइल के बीच सीमा सिर्फ 37 मील लंबी है. लेकिन इस संघर्ष ने जो झटके दिए हैं उससे गज़ा के फलस्तीनियों और इसराइल के बीच टकराव न सिर्फ और घात बन जाएगा बल्कि इसकी गूंज यूक्रेन, सऊदी अरब और ईरान में भी सुनाई पड़ेगी.
इसकी वजह क्या है? क्योंकि इसराइल और हमास के बीच कोई भी लंबा संघर्ष अमेरिका और पश्चिमी देशों की ओर से यूक्रेन को दी जा रही सैन्य मदद अब इसराइल की ओर से मुड़ सकती है.
अभी ऐसा लग रहा है कि हमास को ईरान ने उकसाया है. इससे ईरान और इसराइल में टकराव और बढ़ेगा. इससे इसराइल और हिजबुल्लाह में भी टकराव बढ़ेगा.
ये घटना सऊदी अरब और ईरान के बीच भी टकराव बढ़ा सकती है. यानी कई मोर्चों पर ये ख़तरनाक समय का दौर है.
उन्होंने लिखा है कि हमास न सिर्फ इसराइल में घुस कर हमला करने में सफल रहा है बल्कि वो महिलाओं और बच्चों समेत कई इसराइलियों को भी बंधक बनाने में सफल रहा है. इसराइलियों के शवों को सड़कों पर घसीटने की तस्वीरें भी वायरल हो रही हैं.
रिश्ते सामान्य करने की कोशिश को लगेगा झटका - डॉन

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पाकिस्तानी अख़बार ‘डॉन’ ने लिखा है कि पिछले अरब-इसराइल युद्ध के पचास साल के बाद अब एक बार फिर फलस्तीन में दुश्मनी भड़क उठी है.
फलस्तीनी समूह हमास ने शनिवार को इसराइल पर निशाना साधते हुए हमले किए. वहां अपने लड़ाके भेजे और फलस्तीनियों और इसराइलियों के बीच एक लंबे टकराव की शुरुआत हो गई.
अख़बार लिखता है कि दोनों पक्षों को संयम बरतने और नागरिकों को सुरक्षित करने की जरूरत है. फिर भी इसराइल बदला लेने की अपनी प्रवृति रोकेगा ऐसा नहीं लगता.
इसकी गाज फलस्तीनियों पर गिरेगी. खास कर गज़ा में जो भारी कीमत चुकाएंगे. क्योंकि महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को तेल अवीव की वॉर मशीन खत्म कर देगी. ऐसा हो सकता है कि क्योंकि इसराइल के मित्र देश हमला करने के अपने अधिकार का ढिंढोरा पीट रहे हैं.
ताज़ा तनाव इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने के मुस्लिम देशों की कोशिशों पर भी सवालिया निशान उठा रहा है.
फ़लस्तीन का सवाल तब तक हल नहीं हो सकता जब तक जब तक वहां के नागरिकों के लिए एक व्यावहारिक राष्ट्र न बन जाए जो सुरक्षित और आत्मनिर्भर हो.और जहां जियोनिस्टों की ओर से जातीय सफाये के शिकार लोगों को अपनी धरती पर लौटने का अधिकार मिल सके.
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