इसराइल और हमास की जंग पर भारत के भीतर प्रतिक्रिया धार्मिक लाइन पर क्यों बँट जाती है?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
फ़लस्तीनी संगठन हमास के चरमपंथियों ने इसराइल के भीतर घुसकर हमला किया.
इस हमले में अब तक 700 लोगों की मौत हो चुकी है और कहा जा रहा है कि उन्होंने इसराइल के क़रीब 100 सैनिकों को बंधक बनाया है.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने इसे अपने मुल्क के ख़िलाफ़ युद्ध बताया है. इसराइल जवाब में गज़ा पर लगातार हमले कर रहा है और इस हमले में सैकड़ों फ़लस्तीनियों की भी मौत हुई है.
इसराइल और फ़लस्तीनियों के इस टकराव पर पूरी दुनिया बँटी हुई दिख रही है.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि इसराइल पर आतंकवादी हमला हुआ है और इस मुश्किल घड़ी में भारत इसराइल के साथ खड़ा है.
लेकिन भारत के भीतर भी लोगों की राय कमोबेश धार्मिक आधार पर बँटी हुई दिख रही है.
बीजेपी खुलकर इसराइल का समर्थन कर रही है जबकि बाक़ी पार्टियाँ फ़लस्तीनियों के अधिकारों की भी बात कर रही हैं.
बीजेपी ने इसराइल पर हमास के हमले के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा,''कल,इसराइल को एक कायराना आतंकी हमले का सामना करना पड़ा.
वैसा ही जैसा 26/11/2008 को मुंबई को निशाना बनाया गया था. इसराइल ने युद्ध का एलान कर दिया है और उसकी सेना ने जवाबी हमला किया है.''
इसने आगे लिखा,''कमज़ोर कांग्रेस के नेतृत्व में भारत ने क्या किया? कुछ भी नहीं. इसने डोजियर भेजे. दरअसल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने हिंदू संगठनों पर दोष मढ़ने की कोशिश की थी और पाकिस्तान को बेकसूर करार दिया था. न कभी माफ करें और न कभी भूलें.''
दूसरी ओर कांग्रेस ने एक्स पर लिखा,''भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इसराइल के निर्दोष नागरिकों पर हुए हमलों की कड़ी शब्दों में निंदा करती है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सदैव मानना रहा है कि आत्म सम्मान, समानता और गरिमा के जीवन के लिए फ़लस्तीनी लोगों की वैध आकांक्षाओं को इसराइल के वैध राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को सुनिश्चित करते हुए केवल बातचीत की प्रक्रिया के माध्यम से पूरा किया जाना चाहिए. किसी भी प्रकार की हिंसा कभी भी कोई समाधान नहीं दे सकती है और इसे रोकना चाहिए.''

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बीजेपी के हालिया रुख़ के जवाब में सोशल मीडिया पर लोग अटल बिहारी वाजपेयी का 46 साल पुराना एक वीडियो क्लिप शेयर कर रहे हैं.
वायरल वीडियो 1977 में जनता पार्टी की विजय रैली का है, जिसमें वाजपेयी फ़लस्तीनियों का खुलकर समर्थन कर रहे हैं.
वाजपेयी कह रहे हैं, "अरबों की जिस ज़मीन पर इसराइल कब्ज़ा करके बैठा है, वो ज़मीन उसको ख़ाली करनी होगी."
बीजेपी का रुख़

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अटल बिहारी वाजपेयी इस वीडियो में कहते दिख रहे हैं, "ये कहा जा रहा है कि जनता पार्टी की सरकार बन गई. वो अरबों का साथ नहीं देगी, इसराइल का साथ देगी. आदरणीय मोरारजी भाई स्थिति को स्पष्ट कर चुके हैं. ग़लतफ़हमी को दूर करने के लिए मैं कहना चाहता हूँ कि हम हरेक प्रश्न को गुण और अवगुण के आधार पर देखेंगे. लेकिन मध्य-पूर्व के बारे में यह स्थिति साफ़ है कि अरबों की जिस ज़मीन पर इसराइल कब्ज़ा करके बैठा है, वो ज़मीन उसको ख़ाली करनी होगी."
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने पूरे मामले पर ट्वीट कर कहा, ''फ़लस्तीन के कब्ज़े वाले इलाक़े में शांति स्थापित होने की दुआ करता हूँ.''
महाराष्ट्र से एआईएमआईएम के विधायक और प्रवक्ता वारिस पठान ने भी अटल बिहारी वाजपेयी का वीडियो शेयर किया है. पठान ने कुछ फ़लस्तीनियों की तस्वीर लगाकर पूछा है कि क्या ये आतंकवादी थे कि इन्हें मार दिया गया.
ख़ुद को सनातनी कहने वाले चंदन कुमार शर्मा ने ट्विटर पर लिखा है, ''मैं चंदन शर्मा इसराइल जाने के लिए तैयार हूँ. अगर भारत सरकार आदेश दे तो भारत का एक-एक राष्ट्रवादी हिंदू इसराइल जाकर समर्थन करेगा और समर्थन में युद्ध लड़ेगा. हिंदुओं आप तैयार हैं? इसराइल के साथ 100 करोड़ हिंदू हैं. भारत इसराइल ज़िंदाबाद.''
वहीं पत्रकार राणा अय्यूब ने ट्विटर पर लिखा, ''गज़ा में नागरिकों के साथ होने वाली मारपीट पर भारत में ट्विटर पर जताई जा रही ख़ुशी, गिरने की इंतिहा है. ये भावना उस नफ़रत के समांतर चल रही है, जिसका लोगों ने अपने ऊपर से मंज़ूरी लेकर हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.''
लेकिन इसके बाद उनकी काफ़ी ट्रोलिंग हुई.
भारत में इसराइल के राजदूत नाओर गिलोन ने कहा है कि भारत के भीतर से इसराइल को ज़ोरदार समर्थन मिल रहा है और इसे लेकर वे शुक्रगुज़ार हैं.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर अश्विनी कुमार महापात्रा से पूछा कि क्या भारत में इसराइल और हमास की जंग पर प्रतिक्रिया धार्मिक आधार पर बँटी हुई है?
महापात्रा कहते हैं, ''हमास ने जिस तरह इसराइल पर हमला किया है, उसे इस्लाम की लड़ाई की तरह पेश करने की कोशिश की है. हमास ने अल-अक़्सा मस्जिद का हवाला दिया है और लोगों को मारते हुए उसके आतंकवादी अल्लाहू अकबर का नारा लगा रहे हैं. हमास की पूरी कोशिश है कि दुनिया भर के मुसलमान उसकी लड़ाई को अपनी लड़ाई मानें. ऐसे में लोगों का धर्म के आधार पर लामबंद होना बहुत चौंकाता नहीं है.''
महापात्रा कहते हैं, ''हमास आतंकवादी संगठन है और पीएम मोदी ने वही कहा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि फ़लस्तीन पर भारत की नीति बदल गई है.''

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इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू 2018 के अपने भारत दौरे में 17 फ़रवरी को अहमदाबाद में एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे.
संबोधन का समापन उन्होंने 'जय हिंद, जय भारत और जय इसराइल' से किया.
हॉल तालियों से गूँज उठा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ख़ुश होकर ताली बजाते रहे.
बीजेपी ने इसका वीडियो क्लिप अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किया और लिखा कि पीएम नेतन्याहू ने जय हिंद, जय भारत और जय इसराइल का नारा लगाया.
इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 1973 में बनी और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी 1980 में. दोनों दक्षिणपंथी पार्टी हैं. दोनों ख़ुद को राष्ट्रवादी पार्टी कहती हैं.
लिकुड पार्टी ग्रेटर इसराइल की बात करती है और भारतीय जनता पार्टी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के भीतर से भी अखंड भारत की आवाज़ उठती रहती है.
लेकिन क्या इस आधार पर भारत और इसराइल में वैचारिक समानता खोजना ठीक है? दोनों देशों के निर्माण बिल्कुल अलग हालात में हुए हैं.
यहूदियों के लिए एक मुल्क और सुरक्षित ठिकाने के रूप में इसराइल का जन्म हुआ, लेकिन इसका संबंध केवल दुनिया भर में सताए गए यहूदियों से नहीं है.
इसराइल की पहचान के भीतर राष्ट्रीय और धार्मिक अवधारणा निहित है.
ऐसे तो इसराइल लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मुल्क है, लेकिन इसराइल को यहूदियों से ही जोड़कर देखा जाता है. इस स्थिति में आरोप लगता है कि इसराइल में अरबी अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक हो जाते हैं.
दूसरी तरफ़ भारत आज़ादी के बाद धार्मिक, भाषाई और जातीय विविधता आधारित लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना.
इस विचारधारा के कारण राष्ट्रीय पहचान पर मजहब दशकों तक भारी नहीं पड़ा.

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भारत की राजनीति में 1980 के दशक में वोट बैंक की राजनीति के कारण सांप्रदायिकता में तेज़ी आई. भारतीय जनता पार्टी का उभार भी इस राजनीति से सीधा जुड़ा है.
लेकिन भारत अब भी इतना नहीं बदला है कि उसकी तुलना इसराइल या पाकिस्तान से की जा सके.
पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बना, यह एक तथ्य है. इसराइल यहूदियों का है, इसमें भी कोई झूठ नहीं है.
लेकिन भारत हिंदुओं का है, यह किसी पार्टी का एजेंडा हो सकता है, लेकिन भारत जिस विचारधारा से बना है, उसकी जड़ में ये बात नहीं है.
तो फिर बीजेपी नेता या भारत की बहुसंख्यक हिंदू आबादी इसराइल के पक्ष में क्यों खड़े दिखते हैं?
जब-जब इसराइल और हमास के बीच हिंसक संघर्ष हुआ, अधिकतर भारतीयों का समर्थन और विरोध धार्मिक लाइन पर बँटा दिखा.
बीजेपी नेता सोशल मीडिया पर खुलकर इसराइल के पक्ष में बोलते दिखे. ऐसा प्रतीत होता है कि सोशल मीडिया पर इसराइल का समर्थन करने वाले ज़्यादातर लोग हिंदू थे. वहीं बड़ी संख्या में मुसलमानों का समर्थन फ़लस्तीनियों के साथ रहा.
बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने 2021 में 10 मई को इसराइल के समर्थन में एक ट्वीट किया, ''इसराइल के भाइयों और बहनों को पूरा समर्थन है. दुनिया आपके साहस और दमखम को देख रही है. आप राह दिखा रहे हैं. सभी सकारात्मक और ईश्वरीय ताक़तें इसराइल के साथ हों. हम इसराइल के साथ खड़े हैं- आज और हमेशा.''
दूसरी तरफ़ 2021 में 21 मई को ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रवक्ता सैयद आसिम वक़ार ने फ़लस्तीनियों के समर्थन में अपने ट्वीट में लिखा, ''अल्हम्दो लिल्लाह फ़लस्तीन की जीत हम सबको मुबारक. जो आतंकवादी थे, वो सब के सब इसराइल के साथ थे. जो इंसानियत के पैरोकार थे, वो फ़लस्तीनियों के साथ थे. इंसानियत ज़िंदाबाद, इसराइल के हामी मुर्दाबाद, आतंकवादी मुर्दाबाद.''
आसिम वक़ार ने 2021 में इसराइल और हमास के बीच हुए युद्धविराम को फ़लस्तीनियों की जीत कहा था.
लेकिन क्या आम लोगों के बीच भी इसराइल और फ़लस्तीनियों को लेकर इसी तरह हिंदू बनाम मुसलमान दिखा?
वारिस पठान से फ़लस्तीनियों के समर्थन पर पूछा था, तो उस समय उन्होंने कहा था, ''मुसलमान तो फ़लस्तीनियों के साथ ही रहेगा. वहाँ हमारा पहला क़िबला है और मक्का-मदीना के बाद हमारे लिए सबसे पवित्र स्थल है. भला कोई मुसलमान इसराइल का समर्थन क्यों करेगा?''

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धार्मिक आधार पर क्यों बँटी हुई है प्रतिक्रिया?
भारत में इसराइल और फ़लस्तीनियों का मुद्दा इतना सांप्रदायिक क्यों है?
यह सवाल 2021में जेएनयू में सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज के प्रोफ़ेसर एके पाशा से पूछा था तो उन्होंने कहा था, ''1980 के दशक में आडवाणी ने जो राजनीति शुरू की, ये उसी राजनीति का परिणाम है. बीजेपी हिंदुओं के बीच यह नैरेटिव सेट करने में कामयाब रही है कि हिंदू बड़ी तादाद में हैं फिर भी मुसलमानों का दबदबा है, इसलिए उन्हें सबक़ सिखाने की ज़रूरत है. इसराइल की एक छवि मुसलमान विरोधी बनी है और बीजेपी भी मुसलमानों की उपेक्षा वाली राजनीति करती है. ऐसे में बीजेपी समर्थकों को इसराइल रास आता है.''
पाशा का कहना था कि भारत में इसराइल का समर्थन मुसलमान विरोधी भावना के कारण है.
उन्होंने कहा था, ''हिंदू इसराइल का समर्थन मुसलमान विरोधी भावना के कारण कर रहे हैं. लेकिन भारत के जो मुसलमान फ़लस्तीनियों का समर्थन कर रहे हैं, ये इसलिए नहीं है कि मुसलमान मानवाधिकारों को लेकर चिंतित हैं बल्कि यहाँ भी मजहबी कारण ही है. मुसलमान इस्लाम के पहला क़िबला अल-अक़्सा मस्जिद के कारण फ़लस्तीनियों का समर्थन कर रहे हैं.''
20 मई 2021 को पाकिस्तान की एक हिंदू लड़की सुरक्षा डोडाई ने अपने मुल्क में फ़लस्तीनियों के समर्थन को लेकर ट्वीट कर तीखा सवाल पूछा था. अपने ट्वीट में सुरक्षा ने लिखा था, ''पाकिस्तानियो, अपने ही मुल्क में ग़ैर-मुस्लिम लड़कियों के साथ रेप और जबरन धर्मांतरण को लेकर कभी विरोध किया? लेकिन तुमलोग फ़लस्तीनियों को लेकर इसराइल का विरोध कर रहे हो. क्या फ़लस्तीनी मुसलमान हैं इसलिए? ग़ज़ब आपका पाखंड है. लानत है."
''अभी देख रही हूँ कि कई सेलिब्रिटी फ़लस्तीनियों के समर्थन में इसराइल का विरोध कर रहे हैं लेकिन जबरन धर्मांतरण और रेप को लेकर कोई सामने नहीं आता है.''
एके पाशा के मुताबिक़ हिंदुत्व की राजनीति का प्रेम असल में यहूदियों से नहीं रहा है.
उन्होंने कहा था, ''मुसलमानों के विरोध के नाम पर ये इसराइल का समर्थन करते हैं लेकिन यहूदियों की रा़जनीति और हिंदुत्व की राजनीति में कोई मेल नहीं है. इसराइल में चाहे जितनी दक्षिणपंथी सरकार रहे, उनकी वैज्ञानिक सोच पर धार्मिक रूढ़ि और कट्टरता हावी नहीं होती. लेकिन भारत में हिंदुत्व की राजनीति की पोस्टर महिला और सांसद कहती हैं कि गो मूत्र पीने से कोरोना ठीक हो जाएगा और वो भी इसका सेवन करती हैं.''
पाशा ने कहा था कि यहूदी दक्षिणपंथ और हिंदुत्व में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है.
उनके मुताबिक़, ''इसराइल अपनी जीडीपी का 20 फ़ीसदी से अधिक शिक्षा पर ख़र्च करता है. हिंदुत्व की सरकार ढाई से तीन फ़ीसदी में ही अटकी है. साइंस और अर्थशास्त्र में सबसे ज़्यादा नोबेल सम्मान पाने वाले यहूदी हैं. हिंदू आपको गिने-चुने मिलेंगे, वो भी हिंदुत्व की राजनीति के घोर विरोधी लोग हैं.''
''हिंदुत्व की राजनीति मध्यकालीन सोच से आगे नहीं बढ़ पा रही है. जबकि यहूदियों के बनाए तकनीक से अरब के देश समंदर से पानी साफ़ करके पी रहे हैं. पूरी दुनिया इसराइली तकनीक का लोहा मान रही है. हिंदुत्व की राजनीति से भला किसका जीवन आसान हुआ है? इसलिए दोनों की तुलना कई मोर्चों पर तार्किक नहीं है.''

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हिंदुत्व की राजनीति और यहूदी प्रेम
लेकिन क्या वाक़ई हिंदुत्व की राजनीति यहूदियों की समर्थक रही है? अगर ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को उठाकर देखें, तो ऐसा नहीं है.
विनायक दामोदर सावरकर को उनके आलोचक और समर्थक दोनों हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के जनक के तौर पर देखते हैं.
जेल में रहने के दौरान ही 1923 में सावरकर की किताब 'हिंदू नेशनलिज़म: हिंदुत्व; हू इज अ हिंदू' प्रकाशित हुई थी. ब्रिटिश सरकार ने इन्हें जेल में डाला था.
इस किताब के प्रकाशन के बाद 'हिंदुत्व' टर्म आगे चलकर बहुत लोकप्रिय हुआ. बीजेपी और आरएसएस ने भी सावरकर के हिंदुत्व को स्वीकार किया और आडवाणी भी इसी आधार पर भारतीयों की जन्मभूमि और पुण्यभूमि की बात करते थे.
सावरकर राजनीति परिदृश्य में 1930 के दशक में आते हैं. यह वक़्त दूसरे विश्व युद्ध का था. इस दौरान सावरकर ने इटली और जर्मनी का जमकर बचाव किया था.
सावरकर को 1937 में हिंदू महासभा का अध्यक्ष बनाया गया था और वे 1942 तक अध्यक्ष रहे थे. उनका अध्यक्षकाल भारत और अंतरराष्ट्रीय इतिहास के लिए काफ़ी संवेदनशील दौर था.
वैचारिक स्तर पर आरएसएस और हिंदू महासभा में बहुत गहरा संबंध था.
संबंधों को इससे भी समझा जा सकता है कि आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार 1926 से 1931 तक हिंदू महासभा के सचिव रहे थे.
सावरकर के भाषण मुख्य रूप से दो विषयों पर केंद्रित रहते थे. एक अंतरराष्ट्रीय स्थिति और दूसरा हिंदू-मुस्लिम संबंध.
जेल से निकलने के बाद सावरकर जब राजनीति में आए, तो वो दौर रोम-बर्लिन एक्सिस और इसमें जापान के शामिल होने का था.
मतलब इटली और जर्मनी की फासीवादी सरकारों और जापान के साथ आने के लिए 1936 में समझौता हुआ था. कहा जाता है कि इस अहम घटना को हिंदू महासभा और हिंदू अतिवादी राष्ट्रवादियों ने अपने पक्ष में लिया.
सावरकर ने एक अगस्त, 1938 को पुणे में क़रीब 20 हज़ार लोगों की भीड़ के सामने भाषण दिया.
इस भाषण में उन्होंने जर्मनी में नाज़ीवाद और इटली में फासीवाद का समर्थन करते हुए कहा, ''भारत को किसी वाद को लेकर विरोध या समर्थन नहीं करना चाहिए. जर्मनी को नाज़ीवाद और इटली को फासीवाद की राह पर जाने का पूरा हक़ है. उन्हें वर्तमान हालात में जो भी उनके हक़ में लग रहा है, उसे चुना है. बोल्शेविक रूस को अच्छा लग रहा है और ब्रिटेन को लोकतंत्र.'' (हिंदू महासभा के बॉम्बे ऑफिस से जारी प्रेस नोट)
जर्मनी में नाज़ीवाद और इटली में फासीवाद के बचाव में सावरकर ने नेहरू पर भी हमला बोलना शुरू कर दिया था.
सावरकर ने पुणे के ही भाषण में कहा था, ''जर्मनी, जापान, रूस या इटली को बताने वाले हम कौन होते हैं कि वहाँ की सरकार किस नीति को अपनाए. क्या केवल इसलिए कि हमारा एक ख़ास नीति से अकादमिक प्रेम है? ज़ाहिर सी बात है कि जर्मनी के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा, इसके बारे में पंडित नेहरू से हिटलर को ज़्यादा पता है. यह तथ्य है कि जर्मनी और इटली, नाज़ीवाद और फासीवाद के बाद ज़्यादा ताक़तवर हुए हैं. दोनों विचारधारा उनके लिए जादू की छड़ी और उनकी सेहत के हिसाब से टॉनिक साबित हुई हैं.''

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राष्ट्रहित सर्वोपरि
सावरकर ने अपने भाषण में कहा था, ''अपनी ज़रूरत के हिसाब से भारत किसी ख़ास तरह की सरकार को स्वीकार या नकार सकता है. लेकिन पंडित नेहरू जर्मनी और इटली के ख़िलाफ़ सभी भारतीयों के प्रतिनिधि बनकर खड़े होने लगते हैं. पंडित नेहरू कांग्रेस के एक तबके की तरफ़ से भले विरोध कर सकते हैं. नेहरू को इस मामले में स्पष्ट कर देना चाहिए कि वे जर्मनी, इटली, जापान और अन्य देशों के बारे में अपनी दुर्भावना व्यक्त करते हैं तो देश के करोड़ों सनातनी हिंदू उनके साथ नहीं होते हैं.''
सावरकर की अध्यक्षता में हिंदू महासभा का मुस्लिम विरोधी एजेंडा खुलकर सामने आया था.
दूसरी तरफ़ जिस नाज़ीवाद का सावरकर समर्थन कर रहे थे, वो अल्पसंख्यक यहूदियों के ख़िलाफ़ अत्याचार और नफ़रत को बढ़ावा दे रहा था.
सावरकर ने अपने कई भाषणों में हिटलर के यहूदी विरोधी एजेंडे का समर्थन किया.
14 अक्तूबर, 1938 को सावरकर ने भारत में मुसलमानों की समस्या के समधान के रूप में कहा था, ''एक देश वहाँ की बहुसंख्यक आबादी से बनता है. जर्मनी में यहूदी क्या कर रहे हैं? वे अल्पसंख्यक हैं और उन्हें जर्मनी छोड़ देना चाहिए. जर्मनी में जर्मनों का राष्ट्रवादी आंदोलन है, लेकिन यहूदी वहाँ सांप्रदायिक हैं. राष्ट्रीयता साझे भौगोलिक क्षेत्र पर निर्भर नहीं हो सकती बल्कि इसका संबंध वैचारिक, धार्मिक, भाषिक और सांस्कृतिक एकता से है. ऐसे में एक राष्ट्र के तौर पर जर्मन और यहूदी साथ नहीं रह सकते.''
जिस सावरकर ने यहूदियों पर अत्याचार करने वाले हिटलर का समर्थन किया था, उनकी बीजेपी और आरएसएस में काफ़ी प्रतिष्ठा है. इन्हीं सावरकर की तस्वीर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संसद के सेंट्रल हॉल में नेहरू जैसी हस्तियों के साथ लगवाई थी.
उसके बाद से बीजेपी की सरकारों ने सावरकर की जयंती और पुण्यतिथि पर सेंट्रल हॉल में श्रद्धांजलि अर्पित करना शुरू किया.
खाड़ी के कई देशों में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद ने कहा था कि बीजेपी नेताओं या भारत की घरेलू राजनीति में इसराइल को लेकर जो भी सोच हो, लेकिन विदेश नीति के तौर पर देखें तो इसराइल के साथ भारत के संबंध में एक किस्म की निरंतरता है.
उनके मुताबिक़, ''बीजेपी की जो विचारधारा है, उसके आधार पर वैसी विचारधारा वाली पार्टियों से संबंध जोड़ सकते हैं. ऐसा वामपंथी पार्टियों के साथ देखेंगे, तो मिलेगा. संभव है कि सद्दाम हुसैन की बाथ पार्टी से भी किसी का कोई संबंध निकल आए. लेकिन दो देशों का संबंध पारस्परिक हितों से आगे बढ़ता है न कि सांप्रदायिक एंगल से संबंध आगे बढ़ते हैं.''
तलमीज़ अहमद ने कहा था, ''सांप्रदायिक एंगल ही कारगर होता तो पाकिस्तान खाड़ी के देशों का सबसे लाडला होता लेकिन ऐसा नहीं है. खाड़ी के देशों को पता है कि तेल भारत ही ख़रीदेगा. पाकिस्तान उनके लिए बोझ है और बोझ कोई नहीं उठाना चाहता है. भारत और इसराइल के संबंधों को केवल इस्लामिक चरमपंथियों के ख़िलाफ़ गठजोड़ के रूप में नहीं देख सकते. दोनों देशों का संबंध समय और हालात की मांग के हिसाब से आगे बढ़ रहा है. आप देखें कि मोदी जी हिंदूवादी नेता हैं, लेकिन उनके कार्यकाल में अरब देशों से कारोबार और बढ़े हैं. उन्हें सऊदी और यूएई ने अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान भी दिया.''

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बीजेपी सरकारें और इसराइल
केंद्र में पहली बार बीजेपी के नेतृत्व में सरकार आई और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो इसराइल के साथ रिश्ते में और गहराई आई.
वाजपेयी के शासन काल में इसराइल के साथ आर्थिक, सामरिक, विज्ञान-तकनीक और कृषि के क्षेत्र में कई अहम समझौते हुए.
वाजपेयी सरकार में दोनों देशों के बीच कई द्विपक्षीय दौरे हुए. 1992 में इसराइल से राजनयिक संबंध क़ायम होने के बाद भारत की ओर से पहली बार 2000 में तत्कालीन गृह मंत्री आडवाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने इसराइल का दौरा किया.
लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब 'माई कंट्री माई लाइफ़' में अपने इसराइल दौरे को लेकर लिखा है, ''जून 2000 में इसराइल की मेरी पाँच दिवसीय यात्रा से उस देश के साथ मेरे पुराने संबंध फिर से ताज़ा हो गए. नई परिस्थितियों में मित्रता बढ़ाने और द्विपक्षीय सहयोग को सशक्त करने में बड़े उपयोगी साबित हुए. 1995 में भाजपा अध्यक्ष के रूप में मैं इसराइल गया था. दोनों देशों, जिनमें कई बातों में समानता है, के बीच राजनयिक संबंधों के पूर्ण सामान्यीकरण में अपनी भूमिका पर मुझे गर्व है.''
इस दौरे में आडवाणी ने फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात से ग़ज़ा में मुलाक़ात की थी. इस दौरे में आडवाणी ने इसराइल से परमाणु सहयोग बढ़ाने की वकालत की थी.
इसके बाद इसराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन 2003 में भारत दौरे पर आए और यह दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए काफ़ी अहम साबित हुआ.
रूस के बाद आज की तारीख़ में इसराइल भारत के लिए सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता देश है.
2017 जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसराइल के दौरे पर गए और यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला इसराइल दौरा था.
अब तक कोई भी भारत से उच्चस्तरीय नेता इसराइल जाता था. तो फ़लस्तीनी क्षेत्र में ज़रूर जाता था, लेकिन मोदी इस दौरे में फ़लस्तीनी इलाक़े में नहीं गए और न ही इस दौरे में फ़लस्तीनियों का एक बार भी नाम लिया था.
हालाँकि 2018 में मोदी अलग से फ़लस्तीनी इलाक़े गए. कहा जाता है कि भारत को अमेरिका के क़रीब लाने में इसराइल का सबसे बड़ा हाथ है.
अमेरिका में यहूदी लॉबी को बहुत शक्तिशाली माना जाता है और बीजेपी शासन में भारत की इस लॉबी से क़रीबी रहती है.
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