इसराइल पर हमास के हमले के बाद सऊदी अरब की बढ़ी दुविधा, क्या करेंगे क्राउन प्रिंस

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बीते शनिवार फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने इसराइल पर हमला किया, जिसके बाद इसराइल ने हमास के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का ऐलान कर दिया. हमास के हमले और इसराइल के पलटवार के बाद से पूरे मध्य-पूर्व में हालात तेज़ी से बदले हैं.
पूरे मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ा है और मौजूदा स्थिति में ईरान की महत्वपूर्ण भूमिका की चर्चा के मद्देनज़र सऊदी अरब की मुश्किलें बढ़ गई हैं.
मंगलवार को सऊदी अरब की कैबिनेट की अहम बैठक हुई, जिसमें गज़ा और इसराइल मुद्दे पर चर्चा हुई.
बैठक के बाद सऊदी सरकारी प्रेस ने एक बयान जारी कर कहा, "सरकार इस मुद्दे पर वैश्विक और इलाक़े के दूसरे नेताओं से चर्चा कर रही है और चाहती है कि ये तनाव इलाक़े के दूसरे मुल्कों में न फैले."
बयान में कहा गया है, "सऊदी अरब फ़लस्तीनी लोगों के वैध अधिकार हासिल करने, सम्मानजनक जीवन जीने की कोशिश और उनकी उम्मीदों को पूरा करने और न्यायपूर्ण और स्थायी शांति की कोशिश में उसके साथ खड़ा रहेगा."
इससे पहले सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से फ़ोन पर बातचीत की थी. दोनों के बीच फ़लस्तीन के आम नागरिकों के लिए ख़तरों के साथ-साथ पूरे मध्य-पूर्व में इस तनाव के संभावित असर और वैश्विक सुरक्षा पर चर्चा हुई.
क्राउन प्रिंस ने "अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानूनों का पालन करने और आम नागरिकों को निशाना बनाने से बचने" पर ज़ोर दिया था और कहा था कि सऊदी अरब फ़लस्तीनियों के संघर्ष के साथ है.
सऊदी अरब के एक बयान के बाद अब ये संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका की मध्यस्थता में इसराइल से रिश्ते सामान्य करने की हो रही बातचीत खटाई में पड़ सकती है.
जानकार मानते हैं कि इसराइल-फ़लस्तीन तनाव का असर दूसरे मुल्कों के साथ-साथ भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर पर भी हो सकता है.
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नेतन्याहू का बयान और इसराइल-सऊदी अरब रिश्ते
अमेरिका की कोशिश है कि मध्य-पूर्व में स्थायी शांति के लिए इसराइल और सऊदी अरब के बीच रिश्ते सामान्य हो जाएं.
वो बीते कई सालों से सऊदी अरब और यूएई समेत मध्य-पूर्व में अरब मुल्कों के साथ इसराइल से रिश्ते कायम करने की कोशिश में है.
इस कोशिश में 2020 में यूएई, बहरीन, मोरक्को और सूडान ने इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य (अब्राहम अकॉर्ड्स) किए थे. डोनाल्ड ट्रंप की कोशिशों से हुए इस शांति समझौते को 'सदी का समझौता' कहा गया था.
अमेरिका इसमें सऊदी अरब को भी लाने की कोशिश में था, लेकिन सऊदी पत्रकार जमाल खाशोज्जी की हत्या के बाद अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्ते बिगड़े और अमेरिका की ये कोशिश एक तरह से ठंडे बस्ते में चली गई.
जुलाई 2022 को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन सऊदी अरब के आधिकारिक दौरे पर गए, जिसके बाद इसे लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हुई. हालांकि बातचीत धीमी गति से चली क्योंकि फ़लस्तीनियों के लिए इसराइल के रुख़ में बदलाव न आने की दलील देकर सऊदी अरब रिश्ते सामान्य करने की इस कोशिश में बातचीत रोकता रहा.
एक तरफ़ अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन इस कोशिश को राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में बताते रहे हैं, तो वहीं महीने भर पहले इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र के मंच पर कहा था कि इसराइल और सऊदी अरब के बीच अहम शांति समझौता' लगभग होने ही वाला है.
22 सितंबर को उन्होंने था, "इस तरह का शांति समझौता अरब-इसराइल संघर्ष को ख़त्म करने और अन्य अरब मुल्कों के इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने को बढ़ावा देगा. इससे फ़लस्तीनियों के साथ शांति की संभावनाएं भी बढ़ेंगी."
उनका कहना था इस समझौते से एक "नया मध्य-पूर्व बनेगा" और "हम फ़लस्तीनियों के साथ स्थायी शांति" के रास्ते पर बढ़ सकेंगे."

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लेकिन एक महीने के भीतर ही हमास के इसराइल पर अचानक किए हमले के बाद नेतन्याहू ने मंगलवार को गज़ा को घेरने का आदेश दिया और चेतावनी दी, "हम मध्य-पूर्व की तस्वीर बदल देंगे."
इससे पहले उन्होंने कहा, "गज़ा के लोगों से मैं कहना चाहता हूं- इलाक़े को छोड़ कर चले जाएं क्योंकि हम वहाँ अपनी पूरी ताक़त झोंक देंगे. हमारे सुरक्षाबल वहाँ मौजूद आख़िरी आतंकवादी को ख़त्म कर देंगे. वो एक बस्ती से दूसरी बस्ती, एक घर से दूसरे घर जाएंगे और अपना नियंत्रण फिर से हासिल करेंगे."
उन्होंने हमास के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी और कहा, "इसराइल ने युद्ध शुरू नहीं किया लेकिन हम युद्ध ख़त्म करेंगे."
अंतरराष्ट्रीय मामलों की बीबीसी संवाददाता पॉल एडम्स का कहना है कि इसराइल की ख़ुफ़िय़ा एजेंसी मोसाद में पहले वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हाइम तोमर ने उन्हें बताया कि हमले का वक़्त ईरान को सूट करता था. उनका कहना है कि इसराइल और सऊदी अरब के बीच अहम समझौता होने वाला था जो हमास के हमले के बाद खटाई में पड़ चुका है.

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इसराइल की मुश्किल
अमेरिका स्ठित अरब-गल्फ़ स्टेस्ट्स इंस्टीट्यूट में सीनियर फेलो हुसैन इबिश ने वॉशिंगटन पोस्ट को बताया, "स्थिति आसानी से कंट्रोल से बाहर जा सकती है. इसके लिए माकूल स्थिति बन रही है कि एक के बाद घटनाएं ऐसा रूप ले लें कि आख़िर में इसराइल ईरान पर हमला कर दे."
इस सप्ताह इसराइल लेबनान सीमा पर तनाव बढ़ रहा है और इसराइल की जवाबी कार्रवाई में हिज़्बुल्लाह के तीन लड़ाके मारे गए. इसके बाद कयास ये लगाए जा रहे हैं कि हमास के साथ बेहतर संबंध रखने वाले लेबनान के हिज़्बुल्लाह मौजूदा तनाव में शामिल हो सकता है.
सुरक्षा कंसल्टेंट ले बैक के ख़ुफ़िया विभाग के प्रमुख माइकल होरोवित्ज़ ने अख़बार को बताया, "नेतन्याहू हमास की मदद के लिए बार-बार ईरान को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं लेकिन हाल के हमले के बाद से वो ऐसा करने से बचते दिख रहे हैं. वो शायद संभलकर क़दम उठा रहे हैं."
"अगर उन्होंने ईरान को इसके लिए ज़िम्मेदार बताया तो उन्हें ईरान के ख़िलाफ़ क़दम उठाना पड़ेगा. मुझे नहीं लगता कि ये ईरान के हित में होगा. मैं देख रहा हूं कि शुरुआत से स्थिति को संभालने की कोशिश हो रही है लेकिन हो सकता है कि हम किसी ऐसी स्थिति की शुरुआत में हों, जो अभी लंबा चलने वाली है."
वॉशिंगटन में मिडल ईस्ट इंस्टीट्यूट के उपाध्यक्ष ब्रायन काटलिस ने द टाइम ऑफ़ इसराइल से कहा, "ये रास्ता तय करना पहले भी मुश्किल था, अब ये रास्ता और मुश्किल हो गया है."
अख़बार लिखता है कि फ़लस्तीनियों के हक़ों का मुद्दा सऊदी अरब की प्राथमिकताओं से एक है और "ताज़ा स्थिति इशारा करती है कि इसराइल और फ़लस्तीन का मुद्दा जटिल है और जिस तरह अब्राहम अकॉर्ड्स ने इसे नज़रअंदाज़ किया, वैसाा करना मुश्किल होगा."
सऊदी मामलों के जानकार अज़ीज़ अल्गाशियान ने अख़बार से कहा, "सऊदी अरब के बयान से पता चलता है कि वो साफ़ कर रहा है कि फ़लस्तीनियों की क़ीमत पर वो इसराइल से बातचीत नहीं करेगा. सऊदी अरब अपने पुराने रुख़ पर वापस चला गया है."
"नेतन्याहू ने इसे युद्ध बताकर बातचीत के रास्ते में पत्थर रख दिया है. मुझे नहीं लगता कि युद्ध के साथ-साथ बातचीत आगे बढ़ सकेगी."
सऊदी अरब की कश्मकश
द न्यू अरब में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर के मुसलमानों और अरबी लोगों के लिए फ़लस्तीन बेहद महत्वपूर्ण है.
सऊदी नेतृत्व को इसका अहसास है कि अगर उसने फ़लस्तीनियों के संघर्ष से मुँह मोड़ा तो असर इलाक़े में और वैश्विक स्तर पर उसकी छवि पर पड़ेगा. अगर सऊदी अरब ने इसराइल के साथ समझौता किया तो इससे उसकी धार्मिक वैधता को गंभीर हानि पहुँच सकती है.
न्यूज़ वेबसाइट लिखता है कि मध्य-पूर्व के दो बड़े देश सऊदी अरब और ईरान किसी भी कारण से आमने-सामने नहीं खड़े होना चाहेंगे. दोनों के बीच में चीन की मध्यस्थता में इसी साल मार्च में समझौता हुआ और दोनों ने राजनयिक रिश्ते फिर से बहाल कर चुके हैं.

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ये दोनों मुल्क मुस्लिम दुनिया का नेता बनना चाहते हैं. ईरान में हुए 1979 के इस्लामिक क्रांति के बाद उसकी छवि यह बनी कि वह पश्चिम से टकराने में डरता नहीं है.
सऊदी अरब की मुश्किल ये है कि ऐसे वक़्त में इसराइल से हाथ मिलाना, अपने ख़िलाफ़ ईरान के हाथों में हथियार दे देने जैसा होगा.
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में मिडल ईस्ट मामलों के निदेशक जूस हिल्टरमैन ने फ़ाइनेन्शियल टाइम्स को बताया, "इसराइल के साथ समझौते के लिए अमेरिका से किसी भी तरह के दबाव को लेकर सऊदी अरब को सतर्क रहना चाहिए. देश के भीतर और लगभग पूरे मध्य-पूर्व में लोग फ़लस्तीनियों के हक़ों का समर्थन करते हैं. दोनों के बीच व्यापार, तकनीक जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है लेकिन सीधे तौर पर शांति से इसका नाता नहीं है."
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, मध्य पूर्व पर अमेरिकी सरकार के पूर्व डिप्टी राष्ट्रीय ख़ुफ़िया अधिकारी जोनाथन पेनिकॉफ़ का कहना है, "अगर इसराइल गज़ा पर बम बरसाएगा और वहां नुक़सान पहुंचाएगा तो अरब देश उसके साथ रिश्ते सामान्य करने से समर्थन में नहीं रहेंगे. सऊदी अरब के लिए ये मुश्किल स्थिति है."

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एआई-मॉनिटर की एक रिपोर्ट के अनुसार मध्य-पूर्व में यथास्थिति कभी भी नहीं थी, अब स्थिति और बिगड़ गई है. नेतन्याहू ने कभी-कभार हमास को लेकर बयान ज़रूर दिए हैं लेकिन अब तक वो फ़लस्तीनियों के साथ बात की संभावना को टालते रहे हैं. उनको समर्थन देने वाली दक्षिणपंथी पार्टियां फ़लस्तीनियों को किसी तरह की छूट देने के ख़िलाफ़ हैं.
न्यूज़ वेबसाइट लिखता है कि "जब तक संघर्ष जारी है, बातचीत आगे बढ़ना मुश्किल है और युद्ध ख़त्म होने के बाद अगर नेतन्याहू फिर से सत्ता में आते हैं तो सऊदी-इसराइल शांति समझौते पर बातचीत आगे बढ़ सकती है."
लेकिन इसमें ईरान की भूमिका बेहद अहम हो जाती है. एआई-मॉनिटर लिखता है कि "हमास के हमले के साथ ईरान ये संदेश दे रहा है कि युद्ध के बाद होने वाली किसी भी तरह की बातचीत में रीजनल अलाइन्मेन्ट (सीमाएं तय करने की कोशिश) के मुद्दे पर उसका पक्ष महत्वपूर्ण है.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, एसओएएस यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन में मिडल ईस्ट इंस्टीट्यूट की निदेशक लीना ख़तीब कहती हैं, "मौजूदा तनाव ने स्थिरता और विकास के सऊदी अरब की योजना पर पानी पेर दिया है."
संयुक्त राष्ट्र के लिए पाकिस्तान की दूत रही मलीहा लोधी ने एक टीवी चैनल को बताया, "जो मौजूदा हालात हैं, उनमें ये सवाल ही पैदा नहीं होता कि सऊदी अरब या फिर कोई और मुस्लिम देश इसराइल के साथ रिश्ते बेहतर करने की कोशिश करेगा. मुझे लगता है कि बाइडन की इस डील पर अभी ब्रेक लग गया है."
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भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर पर होगा असर?
हमास और इसराइल के हमले के बाद अब कहा जा रहा है कि इसका असर अमेरिका के साथ मिल कर बनी भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर की योजना पर भी पड़ सकता है.
इसी साल दिल्ली में हुए जी20 सम्मेलन के दौरान इस ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर की घोषणा की गई थी. इसे चीन के बेल्ट एंड रोड परियोजना का प्रतिद्विंदी माना जा रहा था.
पाकिस्तान के जियो टीवी के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर कहते हैं, "इस कॉरिडोर के ज़रिए हिंदुस्तान को इसराइल तक और इसराइल को यूरोप तक कनेक्ट किया जाना था. लेकिन हमास के इसराइल पर हमले ने इस योजना को मिट्टी में मिला दिया है. इस कारण भारत की बीजेपी सरकार नाराज़ है."
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार "इस कॉरिडोर के लिए इसराइल और सऊदी अरब के बीच बेहतर रिश्ते चाहिए. अरब देश फ़लस्तीन का समर्थन करते हैं और गज़ा पर इसराइल बम बरसा रहा है, ऐसे में रिश्ते सामान्य कैसे हो सकते हैं."

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कौन मुल्क किसके साथ?
जहां अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और नॉर्वे समेत कई देश इसराइल के समर्थन में आते दिख रहे हैं, वहीं ईरान, क़तर जैसे मुल्कों ने फ़लस्तीन के लिए सहानुभूति ज़ाहिर की है.
ऑस्ट्रिया और जर्मनी ने फ़लस्तीन को दी जा रही मदद बंद करने की बात की है.
कई मुल्कों ने गज़ा पर इसराइल के कड़ी जवाबी कार्रवाई को लेकर को इसराइल से कहा है कि वो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन न करे.
स्पेन, लक्सम्बर्ग और फ्रांस ने कहा है कि इन हालातों में आम फ़लस्तीनी नागरिकों के लिए मदद बेहद ज़रूरी है.
स्पेन के कार्यकारी विदेश मंत्री जोस मैनुअल अल्बारेज़ ने मंगलवार को कहा है कि हमास के हमले के लिए फ़लस्तीन को अधिक मदद की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, "आतंकवादियों की यूरोपीय संघ की लिस्ट में हमास का नाम है लेकिन हम हमास को आम फ़लस्तीनी नागरिकों या फ़लस्तीनी प्राधिकरण या फिर वहां मौजूद संयुक्त राष्ट्र के संगठनों के साथ कन्फ्यूज़ नहीं कर सकते."
यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने इसराइल से कहा है कि हमास से बदला लेने की कोशिश में वो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन न करे.
मानवीय राहत के लिए संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी मार्टिन ग्रिफ़ित्स ने कहा है कि वो दोनों पक्षों को ही ये संदेश देना चाहते हैं कि युद्ध की स्थिति में क़ानूनों का पालन सबसे ज़रूरी है.
उन्होंने कहा, "युद्धबंदियों को छोड़ा जाए और आम नागरिकों और रिहाइशी इलाकों को बचाया जाए. ग़ज़ा को मिलने वाली मानवीय मदद को किसी हाल में रोका नहीं जाना चाहिए."
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अमेरिका का रुख़
अमेरिका ने कहा है कि वो इस मसले को गंभीरता से लेता है और चरमपंथियों से मुक़ाबले में अमेरिका, इसराइल के साथ खड़ा है.
विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने कहा है कि "ज़मीनी स्थिति समझने और चरमपंथियों से मुक़ाबला करने में इसराइल की कैसे मदद की जाए इसका आकलन करने के लिए मैं बुधवार को इसराइल जाउंगा."
राष्ट्रपति जो बाइ़डन ने बिन्यामिन नेतन्याहू से बात की जिसके बाद अमेरिका इसराइल को हथियार और आयरन डोम मिसाइल सिस्टम के लिए और इंटरसेप्टर देगा.
ईरान की भूमिका पर सवाल
हमास के साथ ईरान के क़रीबी रिश्ते रहे हैं. ईरान ने सालों तक इस चरमपंथी संगठन को आर्थिक मदद और हथियारों की सप्लाई की है.
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने हमास से जुड़े अनाम सूत्रों के हवाले से बीते सप्ताह ख़बर दी थी कि बेरूत में बीते दिनों हुई एक बैठक में ईरान ने हमले के लिए हमास को हरी झंडी दी थी. हालांकि अमेरिका के बाइडन प्रसासन ने कहा है कि अब तक उन्हें इस बात के कोई सबत नहीं मिले हैं जो ये इशारा करें कि इसराइल पर हमले के पीछे ईरान का हाथ था.
व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जेक सुलिवन ने मंगलवार को संवाददाता सम्मेलन में पूछे गए एक सवाल के उत्तर में कहा, "हम कहते रहे हैं कि व्यापक पैमाने पर देखा जाए तो इस हमले में ईरान क भागीदारी रही है क्योंकि वो हमास की मिलिटरी विंग को आर्थिक मदद, हथियार और प्रशिक्षण देता रहा है. लेकिन जहां तक 7 अक्तूबर को हुए हमले की बात है इसमें ईरान के शामिल होने को लेकर अब तक कोई सबूत नहीं मिले हैं."
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