इसराइल पर हमले से हमास को क्या हासिल हुआ, अब आगे की क्या है राह?- प्रेस रिव्यू

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इसराइल पर हमास का हमला और उसके बाद गज़ा में इसराइली सेना की जवाबी कार्रवाई में अब तक एक हज़ार से ऊपर लोगों की जान जा चुकी है.
लेकिन सवाल ये है कि क्या हमास को इस हमले से फ़लस्तीन के मुद्दे पर कुछ बड़ी उपलब्धि मिलेगी?
अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' ने इसी पर एक विश्वलेषण प्रकाशित किया है. आज के प्रेस रिव्यू में सबसे पहले यही रिपोर्ट पढ़िए.
छह अक्टूबर 1973 को जब मिस्र और सीरिया की सेना ने इसराइली बलों पर सुनियोजित हमला किया, तब इसराइल पूरी तरह हिल गया था. इसके छह साल पहले ही इसराइल ने अरब सेनाओं को हराया था.
उसने महज़ छह दिनों में जॉर्डन से वेस्ट बैंक-पूर्वी यरुशलम, सिनाई प्रायद्वीप और मिस्र से ग़ज़ा और सीरिया से गोलन हाइट्स पर अपना कब्ज़ा कर लिया था.
इसराइल के नीति निर्माताओं के साथ-साथ सैन्य जानकारों का भी मानना था कि इसराइल ने अपने प्रतिद्वंद्वियों के ख़िलाफ़ एक मज़बूत प्रतिरोध स्थापित किया है. फिर मिस्र-सीरियाई हमले ने इस सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया.
सात अक्टूबर को हुए हमास के हमले और योम किप्पुर के बीच लगातार तुलना हो रही है. साल 1973 में शुरुआती झटकों के बाद इसराइल ने अपने अधिकांश क्षेत्र को वापस पा लिया.
लेकिन मिस्र ने इतना बड़ा हमला किया था, जो इसराइल के मानस में हमेशा के लिए रह गया. पाँच सालों के भीतर इसराइल ने मिस्र के साथ कैंप डेविड समझौता किया, जिसके तहत संबंधों के सामान्य बनाने के बदले सिनाई प्रायद्वीप लौटाने पर सहमति बनी.
लेकिन हमास को इसराइल पर हमला करके अपने फ़लस्तीन के लिए कुछ हासिल होगा? अगर योम किप्पुर जंग देशों की सेनाओं के बीच लड़ी गई थी तो अब इसराइल के सामने इस्लामी चरमपंथियों का गुट है.
साथ ही 1973 में अधिकांश लड़ाई सिनाई और गोलान में लड़ी गई थी. लेकिन हमास ने इसराइली शहरों पर हमला किया है, जिसमें 900 इसराइलियों की जान गई है.
इसराइल ने हमास पर जंग का एलान कर दिया है. लेकिन अब ग़ज़ा में इसराइली हमले जारी हैं. अभी ये भी अस्पष्ट है कि हमास को मिस्र की तरह इस हमले से कोई रणनीतिक नफ़ा होगा या नहीं. हालांकि सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या हमास वाक़ई इसराइल से कुछ रणनीतिक फ़ायदा या छूट चाहता है?
1990 के दशक के मध्य में द्वि-राष्ट्र समाधान का वादा करने वाली ओस्लो प्रक्रिया रुक जाने के बाद, शांति स्थापित करने की ओर कोई बड़ा क़दम उठता नहीं दिखा है.
इस दौरान इसराइल ने देखा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अब फ़लस्तीन से हट रहा है. साथ ही क्षेत्रीय अरब देश इसराइल के साथ संबंध बनाने के लिए आगे आ रहे हैं और फ़लस्तीनी प्रतिरोध कमज़ोर पड़ रहा है. इसलिए इसराइल ने बिन किसी समझौते के कब्ज़ा जारी रखा.
अस्थिर यथास्थिति

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हिंसक विद्रोह के बाद इसराइल वर्ष 2005 में गज़ा से पीछे हट गया था, लेकिन 2007 के बाद से इसराइल और मिस्र ने गज़ा पर नाकाबंदी कर दी.
वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनी गतिविधियों को सीमित करने के लिए इसराइल ने सैकड़ों चेकपॉइंट बनाए और कई स्तरों वाली सुरक्षा तैनाती की.
वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियां तेज़ी से बढ़ीं और इन बस्तियों के समर्थक नेता सत्ता में आए. ये यथास्थिति सात अक्टूबर तक फ़लस्तीनियों के लिए अस्थिर थी लेकिन इसराइलियों के लिए ये बेहतर व्यवस्था थी.
अख़बार ने आख़िर में लिखा है कि शनिवार को हमास के सुनियोजित हमले ने इसराइल के सुरक्षा मॉडल को पंगु बना दिया.
एक देश जो अपनी ख़ुफ़िया तंत्र और सैन्य श्रेष्ठता पर गर्व करता है, उसके नीति-निर्माताओं को शनिवार का हमला सालों तक डराएगा.
हमास ने इस हमले से ये भी दिखाया है कि पश्चिम एशिया के राजनीतिक समस्याओं में फ़लस्तीन का मुद्दा केंद्र में रहेगा. फिर इसराइल का यूएई से अच्छा संबंध हो या सऊदी अरब और ईरान के बीच कूटनीतिक रिश्तों की बहाली हो या फिर इसराइल और सऊदी अरब के बीच वार्ता हो.
अख़बार लिखता है कि हमास के हमले का मक़सद केवल 'हमला' था, जो इसराइल के सुरक्षा मॉडल को ध्वस्त करे और फ़लस्तीन के मुद्दे को पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में वापस लाए.
लेकिन इसके लिए हमास ने बहुत बड़ा जोखिम लिया है. इसराइल के सैकड़ों नागरिकों का कत्ल करके हमास ने एक बार फिर से 1990 से 2000 के बीच वाली रणनीति अपनाई है, जिसके कारण उसे आतंकवादी संगठन का तमगा दे दिया गया था.
हमास ने इसराइल को ग़ज़ा में हमले का आधार भी दे दिया है. इसराइल हमास के सैन्य और सामाजिक ढांचों को निशाना बनाए. सैकड़ों और फ़लस्तीनियों की जान जाएगी. जब इसराइल ने साल 2006 में लेबनान पर हमला किया था तो हिजबुल्ला ने 30 दिनों तक उसका सामना किया था, जिसके बाद इसराइल संघर्षविराम पर सहमत हो गया था. लेकिन क्या हमास छोटे से गज़ा में इसराइल का इतने लंबे समय तक सामना करने में सक्षम है?
हमास-इसराइल की जंग के बीच फ़लस्तीन के राष्ट्रपति की रूस जाने की ख़बर

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रूस की मीडिया ने फ़लस्तीनी राजदूत के हवाले से ये कहा है कि फ़लस्तीनी क्षेत्र के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के मॉस्को जाने की उम्मीद है.
अंग्रेज़ी अख़बार द टेलीग्राफ़ ने ये ख़बर प्रकाशित की है.
रूस के आरबीसी न्यूज़ ने राजदूत अब्देल हाफ़िज़ नोफ़ाल के हवाले से लिखा है, "ये दौरा कब होगा, इसको लेकर हम क्रेमलिन (रूस) की ओर से औपचारिक बयान का इंतज़ार कर रहे हैं."
"इस बात पर सहमति बन गई है कि अब्बास यहां मॉस्को आएंगे."
फ़लस्तीनी राजदूत ने रूस के सरकारी टीवी चैनल से अलग बातचीत में कहा कि दोनों पक्षों के बीच लगातार संपर्क जारी है.
सोमवार को इसराइल ने गज़ा पर पूरी तरह पाबंदी का एलान किया है. ये कार्रवाई शनिवार को हुए हमास के हमले के बाद हुई है.
रूस का ईरान और हमास के साथ ही इसराइल से भी संबंध है. रूस ने इसराइल और फ़लस्तीन में जारी हिंसा की निंदा की थी और अमेरिका पर स्वतंत्र फ़लस्तीन देश की ज़रूरत को दरकिनार करने का आरोप लगाया था.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बीते साल महमूद अब्बास से आख़िरी मुलाकात की थी. वहीं, अब्बास ने दो साल पहले आख़िरी बार रूस का दौरा किया था.
फ़लस्तीन के समर्थन में मार्च निकालने पर एएमयू के छात्रों पर एफ़आईआर

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों पर रविवार की शाम फ़लस्तीन के समर्थन और इसराइल के ख़िलाफ़ मार्च निकालने पर एफ़आईआर दर्ज की गई है.
अंग्रेज़ी अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' की ख़बर के अनुसार प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने 'वी स्टैंड विद पैलेस्टीन', 'एएमयू स्टैंड्स विद पैलेस्टीन' जैसे नारे लगाए और इसी के बैनर-पोस्टर दिखाए. एफ़आईआर में पांच लोगों का नाम है. हालांकि, अभी कई और लोगों पर मुकदमा हो सकता है.
टीओआई ने अलीगढ़ पुलिस के हवाले से बताया है कि छात्रों पर समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ाने जैसे आरोपों में केस दर्ज किया गया है.
एसपी (सिटी) मृगांक शेखर पाठक ने कहा, "कुछ लोगों ने बिना परमिशन के विरोध मार्च निकाला और भड़काऊ नारेबाज़ी की. आईपीसी की संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है. हम इस मामले की जांच कर रहे हैं और उसी के आधार पर कार्रवाई की जाएगी."
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