इसराइल पर हमास के हमले से क्या फ़लस्तीनी राष्ट्र का ख़्वाब टूट जाएगा?

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या आपको अहसास है कि इसराइल पर हमले से आपने फ़लस्तीनियों के हक़ के लिए संवेदना रखने वाले कई लोगों को अलग-थलग कर दिया है, आपने शायद उनकी बात को कई सालों पीछे छोड़ दिया है?
ब्रिटेन के एक टीवी चैनल के इस सवाल के जबाव में हमास के राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय संबंध के प्रमुख बासेम नाइम ने कहा कि उन्हें इस बात का भरोसा है कि दुनिया के करोड़ों लोग उनका समर्थन करते रहेंगे.
लेकिन उनका ये दावा कितना सही है?
साल 1948 में बनने के बाद ये पहली बार है कि इसराइल के भीतर इतने बड़े स्तर पर हिंसा हुई है.
फ़लस्तीनी गुट हमास के हमले में इसराइल में कम से कम 900 लोग मारे गए हैं जबकि गज़ा पर इसराइल के जारी हमलों में अभी तक क़रीब 700 लोगों के मारे जाने की ख़बर है.
गज़ा इलाक़े में क़रीब 20 लाख लोग रहते हैं, जिनमें से बड़ी तादाद में लोग मानवीय मदद पर निर्भर हैं. दोनो तरफ़ मरने वालों में बच्चे, बूढ़े और महिलाएँ शामिल हैं.
संगीत फ़ेस्टिवल में नाचते, झूमते युवाओं का क़त्लेआम, परिवारों, बच्चों, महिलाओं को अग़वा करके ले जाते, लोगों के घरों में घुसकर उन्हें मारते हमास चरमपंथियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर करोड़ों लोगों ने देखी और दुनिया सकते में हैं.
दूसरी ओर जवाबी कार्रवाई में गज़ा में मारे गए लोगों की तस्वीरें और वीडियो भी सोशल मीडिया पर आ रहे हैं और वे भी काफ़ी व्यथित करने वाले हैं.
नॉर्वेजियन रिफ़्यूजी काउंसिल के जान एगलैंड ने एक टीवी चैनल से बातचीत में कहा, "ये तस्वीरें दुनिया भर में फैल रही हैं. ये फ़लस्तीनी कॉज (उनके हक़ की बात) के लिए बहुत बुरा है, क्योंकि इसका बड़ा बदला लिया जाएगा."
हमास ने अग़वा किए गए बंधकों को मारने की धमकी दी है.
यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मध्य-पूर्व के देशों में जहाँ फ़लस्तीनियों के पक्ष में समर्थन के नारे लगे हैं, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी सहित दुनिया के कई मुल्कों की सरकारों ने हमास के हमलों की आलोचना की है.
वरिष्ठ पत्रकार मेंहदी हसन ने एक ट्वीट में लिखा- अगर ये सच है कि बच्चों को बंधक बनाया गया, तो ये बर्बरता है और इससे शांति के साथ-साथ इसरालइली कब्ज़े को ख़त्म करने का रास्ता आगे नहीं बढ़ता.

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थिंक टैंक चैटम हाउस में प्रोफ़ेसर योसी मेकेलबर्ग लिखते हैं, "इस हमले से फ़लस्तीनियों को फ़ायदा नहीं होगा. इसराइल की ब्लॉकेड की नीति और मज़बूत हो जाएगी. और अगर हमले का मक़सद इसराइल को उसके पड़ोसियों से संबंध बेहतर करने से रोकना था, तो हमले और बंधक बनाने के क़दम का उल्टा असर होगा और इससे इलाक़े के नेताओं को संदेश जाएगा कि फ़लस्तीन में बातचीत का कोई विश्वसनीय पार्टनर नहीं है."
फ़लस्तीनियों ने अब्राहम समझौते के अंतर्गत इसराइल के मध्य-पूर्व के देशों से संबंधों को बेहतर होते देखा है.
कई जानकार ये भी दावा कर रहे हैं कि हमले की एक वजह अमेरिका की मध्यस्थता में इसराइल और सऊदी अरब के बीच बातचीत था, जिससे फ़लस्तीनियों को संदेश गया कि उनको इस समझौते से सबसे बड़ा नुक़सान होगा और उनके हक़ की बात हमेशा के लिए पीछे छूट जाएगी.
फ़लस्तीन का समर्थन भारतीय विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत-इसराइल के संबंध प्रगाढ़ हुए हैं.
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हमास के हमले को "आतंकवादी हमला" बताने को उसी चश्मे से देखा जा रहा है.
'द हिंदू' की पूर्व संपादक मालिनी पार्थ सारथी ने एक ट्वीट में लिखा है- जिस तरह से एलटीटीई की बर्बरता से श्रीलंका में तमिलों के हक़ की बात पर बहुत बुरा असर पड़ा था, फ़लस्तीनी कॉज़ (या उनके हक़ के बात) को भी चरमपंथी हमास की क्रूरता से नुक़सान पहुँचा है.
वो लिखती हैं, "दुनिया मासूम नागरिकों पर हुए इस हमले को कभी माफ़ नहीं कर सकती."
उधर लीबिया, जॉर्डन और माल्टा में भारत के राजदूत रहे अनिल त्रिगुनायत के मुताबिक़ ताज़ा हमास हमले का फलीस्तीन कॉज़ या उनके हक़ की बात पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
वो कहते हैं, "पूरे मध्य-पूर्व, यूरोप, कनाडा जैसे देशों में फ़लस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं. इसका मतलब है कि फ़लस्तीन के लिए ज़मीन पर समर्थन है."
ताज़ा हिंसा पर वो कहते हैं, "इलाक़े में ख़ून-ख़राबा लंबे समय से जारी रहा है. हमें दोनो तरफ़ मृत लोगों की संख्या को गिनना चाहिए."
सेंटर फ़ॉर इंडिया-वेस्ट एशिया डायलॉग में डायरेक्टर प्रोफ़ेसर एके पाशा मानते हैं कि हमास के हमले के बाद इसराइल से आ रही तस्वीरों का फ़लस्तीनियों के लिए भावनाओं पर "थोड़ा बहुत तुरंत असर होगा, लेकिन जो इसराइल कर रहा है, या ग्राउंट अटैक करने जा रहा है, उससे इसराइल के लिए भावनाएँ पूरी तरह ख़त्म हो जाएँगी."
हमास के हमलों का असर

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हमास के हमलों का असर ये है कि फ़लस्तीन को दुनिया के हिस्सों से मिलने वाली आर्थिक मदद पर "पुनिर्विचार" होने की ख़बरें आ रही हैं.
याद रहे कि फ़लस्तीन के लिए ये आर्थिक मदद बेहद महत्वपूर्ण है.
यूरोपीय कमिशन ने कहा कि फ़लस्तीन को दी जाने वाली यूरोपीय यूनियन की आर्थिक मदद पर तुरंत पुनिर्विचार होगा ताकि मदद के पैसे का किसी भी तरह इसराइल पर हमले में इस्तेमाल न हो.
ऑस्ट्रिया ने कहा है कि वो हमास के हमलों के जवाब में फ़लस्तीनियों को दी जाने वाली क़रीब दो करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद रोक रहा है.
जर्मनी में भी फ़लीस्तीनियों को दी जाने वाली आर्थिक मदद पर बहस चल रही है और एक मंत्री ने कहा कि इसराइल पर हमले के बाद फ़लस्तीनी इलाक़ों से "हमारे पूरे संबंध की समीक्षा की जाएगी."
कई बड़े हॉलीवुड सितारों ने खुलकर इसराइल का समर्थन किया है.
अमेरिका ने इसराइल को हथियार भेजने शुरू कर दिए हैं और इलाक़े में लड़ाकू विमान और नौसेना के युद्धपोत भेज रहा है ताकि दूसरा कोई देश और चरमपंथी गुट मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए इसराइल पर हमला न कर सके.
सवाल उठ रहे हैं कि गज़ा पर शासन करने वाले हमास की अपनी जनता के प्रति क्या ज़िम्मेदारी है और लोगों पर होने वाले आर्थिक असर या फिर इसराइली हमले की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
मसले का इतिहास

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इसराइल और फ़लस्तीनीयों की चली आ रही ये लंबी लड़ाई ज़मीन को लेकर है.
अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसराइल और फ़लस्तीन दो अलग देशों की बात करता है, जो एक दूसरे के साथ शांति से रहें, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद ऐसा नहीं हो पाया है.
फ़लस्तानियों का कहना है कि दशकों से इसराइल उनके साथ अमानवीय सुलूक कर रहा है और इसराइली लगतार उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर रहे हैं.
इसराइल का अभी भी वेस्ट बैंक इलाक़े में कब्ज़ा है लेकिन वो गज़ा से निकल चुका है.
पूर्वी येरुशलम, गज़ा और वेस्ट बैंक में रहने वाले इसराइली और फ़लीस्तीनियों के बीच तनावपूर्ण माहौल रहा है.
गज़ा में फ़लीस्तानी चरमपंथी गुट हमास हमास का शासन है.
हमास और इसराइल के बीच पूर्व में कई बार लड़ाइयाँ हुई हैं. इसराइल और मिस्र गज़ा की सीमाओं पर कड़ाई से नियंत्रण करते हैं ताकि उनके मुताबिक़ हमास के पास हथियार न पहुँचे, लेकिन इससे फ़लीस्तीनियों को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
फैलती इसराइली आबादी भी फ़लीस्तीनी ग़ुस्से का कारण है.
लीबिया, जॉर्डन और माल्टा में भारतीय राजदूत रहे अनिल त्रिगुनायत के मुताबिक़, "जब तक फ़लीस्तीनी मुद्दा हल नहीं हो जाता, तब तक ये मसला जारी रहेगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसा रास्ता निकालना चाहिए ताकि दोनो पक्ष साथ रह पाएँ."
प्रोफ़ेसर एके पाशा के मुताबिक़, "फ़लस्तीनी कॉज़ एक भावनात्मक मुद्दा हो चुका है, और पूरी दुनिया में ही नहीं, या फिर अरब देशों या फ़लस्तीन के लोग मे ही नहीं, मुसलमानों में ही नहीं, जिस पर भी उपनिवेशवाद या साम्राज्यवाद का असर पड़ा है, या जो कोई भी शोषित हैं, उनमें ये फ़लीस्तीनीयों के लिए समर्थन धीरे धीरे फैल रहा है."
लेकिन द हिंदू की पूर्व संपादक मालिनी पार्थ सारथी इससे सहमत नहीं.
वो कहती हैं, "कोई भी नस्लीय और क्षेत्रीय लड़ाई हिंसा से नहीं सुलझाई जा सकती. मासूम नागरिकों पर क्रूर हमले करने से ये लड़ाई और बिड़ेगी. इसराइल ने कहा कि ये उसका 9/11 का क्षण है और वो बातचीत की मेज़ पर कभी नहीं लौटेगा, और वो बदले की कार्रवाई करेगा जिसका फ़लस्तीनी लोगों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा. और फिर दोनों तरफ़ के चरमपंथ आगे आ जाएँगे और सैन्य विकल्प पूरे ज़ोर-शोर से हावी हो जाएगा."
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