तेल भंडार वाले मुल्क के असफलता के कगार पर पहुंचने की कहानी - दुनिया जहान

वेनेज़ुएला

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पनामा और कोलंबिया के बीच पहाड़ों और वर्षावनों के बीच से गुज़रता 100 किलोमीटर लंबा रास्ता ‘डारिएन गैप’ कहलाता है.

दलदल, सांप, जंगली जानवरों और अपराध के व्यापक स्तर की वजह से यह दुनिया का सबसे ख़तरनाक माइग्रेशन रूट यानी प्रवास का रास्ता माना जाता है.

यहां से गुज़रते हुए कई लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं. ज़मीन पर मध्य और दक्षिण अमेरिका को जोड़ने वाला यह एकमात्र रास्ता है.

मगर इस रास्ते से गुज़रने का जोख़िम उठाने वाले हज़ारों लोग ना तो कोलंबिया के हैं ना पनामा के. वो दरअसल दक्षिण में स्थित वेनेज़ुएला से आते हैं.

वेनेज़ुएला का शरणार्थी संकट, लातिन अमेरिका का सबसे बड़ा शरणार्थी संकट है और इसकी गिनती विश्व के बड़े शरणार्थी संकटों में होती है.

वेनेज़ुएला में अगले वर्ष राष्ट्रपति चुनाव होने हैं मगर निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के लिए सरकार और विपक्षी दलों के बीच वार्ताएं ठप्प पड़ी हैं.

इस हफ़्ते हम दुनिया जहान में यह जानने की कोशिश करेंगे कि क्या वेनेज़ुएला एक ‘फ़ेल्ड स्टेट’ यानि नाकाम देश है?

वीडियो कैप्शन, वेनेज़ुएला में लाखों की संख्या में लोग देश छोड़कर जा रहे हैं.

देश से क्यों भाग रहे हैं लाखों लोग?

वेनेज़ुएला के शरणार्थी संकट को समझने के लिए हमने बात की मारिया गैब्रियेला ट्रोंपोटेरो से जो जर्मनी की बीलफ़ेल्ड यूनिवर्सिटी में माइग्रेशन रिसर्चर हैं.

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उनका कहना है कि पिछले सात सालों में लगभग 73 लाख लोग देश छोड़ कर चले गए हैं.

इनमें से अधिकांश लोग अन्य लातिन अमेरिकी देशों या कैरेबियाई देशों में चले गए हैं.

उन्होंने कहा, “लातिन अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में यह अजीब बात है. यूक्रेन, सीरिया और कई दूसरे देशों से शरणार्थी इसलिए आते हैं क्योंकि वहां युद्ध छिड़ा हुआ है. लेकिन वेनेज़ुएला में कोई लड़ाई नहीं चल रही है.”

मारिया ट्रोंपोटेरो मानती हैं कि ग़रीबी वेनेज़ुएला के शरणार्थी संकट का सबसे बड़ा कारण है.

वेनेज़ुएला के लोगों के लिए देश के मानवीय संकट से निबटना बहुत मुश्किल है. मिसाल के तौर पर, वहां खाने पीने की चीज़ें ख़रीदने के लिए एक परिवार को 500 डॉलर प्रति माह खर्च करने पड़ते हैं लेकिन न्यूनतम वेतन केवल 50 डॉलर प्रति माह है.

युवाओं के लिए कॉलेज में पढ़ना मुश्किल है क्योंकि 18-19 साल की उम्र से ही उन्हें कमाने में जुटना पड़ता है. पानी और बिजली की समस्या हमेशा बनी रहती है.

जिन मानवाधिकार उल्लंघनों का ज़िक्र मारिया ट्रोंपोटेरो ने किया वो केवल ग़रीबी की वजह से नहीं बल्कि देश के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अलोकतांत्रिक शासन और राजनीतिक दमन से भी हो रहा है, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में लोग देश छोड़ रहे हैं.

निकोलस मादुरो

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इमेज कैप्शन, वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत ठप्प है.

लोगों में असंतोष

मारिया के मुताबिक़, “लोग निकोलास मादुरो की सरकार से ख़ुश नहीं हैं. चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से नहीं होते. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है. 280 से अधिक लोग राजनीतिक बंदी हैं. 2014, 2017 और 2019 में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान सैकड़ों लोग सुरक्षाबलों के हाथों मारे गए.”

जो लोग देश से भागना चाहते हैं उनके लिए क्षेत्र के दूसरे देशों तक पहुंचना बेहद मुश्किल होता है. पासपोर्ट और वीज़ा के लिए पैसे ना होने के कारण कई लोग ग़ैरक़ानूनी तरीके से दूसरे देशों में पहुंचने को मजबूर हो जाते हैं.

मारिया गैब्रियेला ट्रोंपोटेरो के अनुसार, “इन लोगों के सामने यात्रा के दौरान कई बाधाएं होती हैं. कई लोग बीमार होते हैं, औरतें गर्भवती होते हुए भी मुश्किल यात्रा पर निकल पड़ती हैं."

"लातिन अमेरिका के अधिकांश देशों में प्रवेश के लिए वेनेज़ुएला के लोगों को वीज़ा की ज़रूरत होती है. ये लोग बिना वीज़ा और कागज़ातों के एक देश से दूसरे देश की सीमाएं लांघ कर यात्रा करते जाते हैं.”

जो लोग उत्तरी देशों में जाना चाहते हैं उन्हें ‘डारिएन गैप’ के रास्ते से जाना पड़ता है जहां जंगली जानवर, दलदल और तेज़ बहने वाली नदियों के बीच से रास्ता तय करना पड़ता है.

मारिया कहती हैं कि वेनेज़ुएला में ग़रीबी का यह आलम है कि एक रिटायर्ड व्यक्ति को महीने में केवल 20 डॉलर मिलते हैं.

यह लोग विदेशों में बसे अपने बच्चों पर निर्भर होते हैं. हर प्रकार से यह स्थिति उनके लिए मुश्किल है जो देश से बाहर निकल गए हैं और उनके लिए भी जो पीछे छूट गए हैं.

पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ की साल 2013 में मौत हुई. उनके निधन के बाद मादुरो राष्ट्रपति बने. मादुरो इसके पहले उपराष्ट्रपति और विदेश मंत्री थे.

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इमेज कैप्शन, पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ की साल 2013 में मौत हुई. उनके निधन के बाद मादुरो राष्ट्रपति बने.

चाविज़्मो

लगभग 100 साल पहले वेनेज़ुएला में तेल भंडारों की खोज हुई और उसके 20 सालों के भीतर ही वेनेज़ुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देशों में से एक बन गया.

वेनेज़ुएला की आय का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात से आता था और यही उसकी अस्थिरता का कारण भी बना.

इन सालों में वेनेज़ुएला ने कई बड़े आर्थिक उतार चढ़ाव और राजनीतिक उथल-पुथल का सामना किया.

लेकिन पहले हम बात करेंगे पिछले 25 सालों की.

1990 के दशक में तेल की कीमतों में आई गिरावट की वजह से वेनेजुएला में ग़रीबी फैलने लगी और सरकार अपने कर्ज़ चुकाने में असफल हो गई.

अर्थव्यवस्था चरमराने लगी और 1998 में वेनेज़ुएला में हुए राष्ट्रपति चुनाव में जनता सरकार में बदलाव चाहने लगी.

बदलाव की वो आशा थे युवा और करिश्माई नेता ह्यूगो चावेज़. चावेज़ ने राष्ट्रपति चुनाव में आसानी से जीत हासिल कर ली.

ह्यूगो चावेज़ की राजनीति और शासन के बारे में अधिक जानकारी के लिए बीबीसी ने बात की अलेहांड्रो वालेस्को से जो न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं और आधुनिक वेनेज़ुएला के जानकार भी.

वो कहते हैं कि ह्यूगो चावेज़ प्रभावशाली वक्ता थे और देश के उसी मैदानी क्षेत्र से थे जहां से कई बड़े नेता आए थे. उनके सत्ता में आने से लगा कि वेनेज़ुएला में उज्ज्वल भविष्य का एक नया अध्याय शुरू होगा.

“चावेज़ कई बातों का प्रतिनिधित्व करते थे, जिसमें देश की नई और पुरानी दोनों नीतियां शामिल थीं. उनके सत्ता में आने को एक नये अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा था. मगर असल सवाल यह था कि यह नया अध्याय कैसा होगा?”

चावेज़ एक समाजवादी एजेंडा लेकर सत्ता में आए थे और उनका वादा था कि वो देश के ग़रीबों के जीवन को बेहतर बनाएंगे.

वो देश में शिक्षा व्यवस्था को सुधारने, शिशु मृत्यु दर को कम करने और कई लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालने में कामयाब भी रहे.

मगर इसके लिए आवश्यक धन के लिए चावेज़ ने तेल उद्योग और उससे होने वाली आय को सरकारी नियंत्रण में ले लिया.

साल 2014 से तेल की कीमतें कम होने से वेनेज़ुएला आर्थिक संकट में घिर गया.

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इमेज कैप्शन, साल 2014 से तेल की कीमतें कम होने से वेनेज़ुएला आर्थिक संकट में घिर गया.

2003 में ईराक़ युद्ध की वजह से तेल की क़ीमतों में उछाल आया और वेनेज़ुएला को तेल से होने वाले मुनाफ़े में खासी वृद्धि हुई.

अलेहांड्रो वालेस्को के अनुसार, “तेल उद्योग, संसद, सरकारी संस्थाओं और सेना पर उनका पूरा नियंत्रण था. उनके लिए समस्या का कारण बाहरी नहीं था. दरअसल, चाविज़्मो या चावेज़वाद ही उनके लिए समस्या बन गया. वो 21वीं सदी के समाजवादी चावेज़ बन चुके थे.”

2012 में जब चावेज़ तीसरी बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे तब उनकी उम्र केवल 57 वर्ष थी. लेकिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा था.

उनकी समाजवादी राजनीतिक विचारधारा चाविज़्मो कहलाती थी. चाविज़्मों को बरकरार रखने के लिए उन्हें एक उत्तराधिकारी की आवश्यकता थी.

उन्होंने अपने विदेश मंत्री निकोलास मादुरो को अपना उत्तराधिकारी चुना. मगर वेनेज़ुएला की जनता को मादुरो के व्यक्तित्व में वो अपील नहीं दिखी जो चावेज़ में थी.

2013 में चावेज़ की मृत्यु के कुछ सप्ताह बाद हुए राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें जीत तो हासिल हुई लेकिन काफ़ी छोटे अंतर से.

अलेहांड्रो वालेस्को ने बताया कि चौंकाने वाली बात यह थी कि 2012 में राष्ट्रपति चुनाव में चावेज़ ने भारी जीत हासिल की थी. लेकिन उनकी मृत्यु के चंद सप्ताह बाद हुए आकस्मिक चुनाव में मादुरो 1.5 प्रतिशत से भी कम मार्जिन से जीत पाए.

इस तरह शुरुआत से ही मादुरो के शासन की लोकप्रियता कम थी.

चावेज़ के शासन के दौरान हुए आर्थिक कुप्रबंधन और तेल पर अत्यधिक निर्भरता के कारण वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था फिर पटरी से उतर गयी और सरकारी ख़ज़ाना ख़ाली हो गया.

अलेहांड्रो वालेस्को कहते हैं कि वेनेज़ुएला की सरकार तेल निर्यात को हर समस्या के हल के रूप में देख रही थी. उसके पास दूरदर्शिता और दीर्घकालिक योजना नहीं थी.

यानि जब तेल की कीमतें बढ़ीं तो सारा मुनाफ़ा खर्च कर दिया गया और जब कीमतें गिरीं तो सरकार के पास कर्ज़ चुकाने के पैसे भी नहीं रहे.

वेनेजुएला

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लातिन अमेरिका का सऊदी अरब

जब वेनेज़ुएला में तेल भंडारों की खोज हुई तब विदेशी तेल कंपनियों ने तेल के कुओं को सरकार से किराये पर लेकर तेल निकालना शुरू कर दिया था.

1960 में वेनेज़ुएला तेल निर्माता देशों की संस्था ओपेक का संस्थापक सदस्य बना.

दस साल बाद विश्व के कुल तेल उत्पादन का 6% हिस्सा वेनेज़ुएला से आने लगा था.

वेनेज़ुएला के तेल उद्योग के इतिहास के बारे में हमने बात की लुईसा पैलासियोस जो कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ़ ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी में वरिष्ठ शोधकर्ता हैं.

वो कहती हैं कि तेल की वजह से वेनेज़ुएला का महत्व काफ़ी बढ़ गया था.

“वेनेज़ुएला तेल बाज़ार में एक बड़ी ताक़त बन गया. वो अमेरिका को भी भारी मात्रा में तेल निर्यात करने लगा. यहां तक कि उसे लातिन अमेरिका का सऊदी अरब कहा जाने लगा. देश के दूसरे उद्योगों में भी बड़े स्तर पर विदेशी निवेश होने लगा जिससे उसकी अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ने लगी.”

1970 के दशक में तेल की क़ीमत में भारी उछाल की वजह से वेनेजुएला को फ़ायदा हुआ. 1976 में वेनेज़ुएला सरकार ने राष्ट्रीय तेल कंपनी पेट्रोलियस डी वेनेज़ुएला की स्थापना की.

1980 के मध्य तक तेल की अंतरराष्ट्रीय क़ीमत गिर कर आधी हो गयी और 1990 के दशक में वो और गिर गयी. मगर 90 के दशक के अंत तक तेल की क़ीमत फिर बढ़ने लगी.

1998 में ही ह्यूगो चावेज़ पहली बार राष्ट्रपति चुने गए थे. उनके पास तेल की बढ़ी हुई क़ीमत से फ़ायदा उठाने का बढ़िया अवसर था.

लुईसा पैलासियोस ने कहा कि चावेज़ के शासनकाल के दौरान तेल की क़ीमत में छ: गुना वृद्धि हो चुकी थी. जिससे सरकार की आय में भारी वृद्धि हुई.

यह बस, किस्मत की बात थी. सरकार को इसके लिए कुछ ख़ास नहीं करना पड़ा था. तेल उत्पादन बढ़ा कर और पैसे बनाए जा सकते थे.

निकोलस मादुरो बस ड्राइवर रहे हैं और अब भी ड्राइविंग सीट थामे रखना चाहते हैं.

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इमेज कैप्शन, निकोलस मादुरो बस ड्राइवर रहे हैं.

कैसे वेनेज़ुएला फंसता गया संकट में?

लुईसा पैलासियोस के मुताबिक़, तेल उत्पादन के तरीके किफ़ायती नहीं थे क्योंकि देश में तकनीकी जानकारों की कमी हो गयी थी. चावेज़ की शासन शैली इसके लिए ज़िम्मेदार थी.

जब तेल कंपनी के कर्मचारियों ने चावेज़ के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किए तो चावेज़ ने उन्हें नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया. परिणाम यह हुआ कि कई तकनीकी रूप से कुशल कर्मचारी देश छोड़ कर चले गए.

लुईसा कहती हैं, “वेनेज़ुएला के तेल उद्योग के इतिहास में यह एक बड़ी घटना थी. तेल उद्योग से जुड़े टेक्निकल एक्सपर्ट और कुशल कर्मचारी भारी संख्या में तेल उद्योग छोड़ कर बाहर चले गए. सरकार ने उनके साथ समझौता करने की कोशिश नहीं की.”

नतीजा यह हुआ कि जब तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, उसी समय वेनेज़ुएला का तेल उत्पादन घट गया. यही बात दूसरे उद्योगों में भी हुई और देश से तकनीकी जानकारों का पलायन जारी रहा.

इसके चलते वेनेज़ुएला ज़रूरी सामान भी नहीं बना पा रहा था और उन चीज़ों को विदेश से आयात करने पर मजबूर हो गया.

चावेज़ अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाते गए क्योंकि तब तक तेल से होने वाले मुनाफ़े से उनकी नीतियों की ख़ामियां छुपती रही थीं.

2013 में उनके उत्तराधिकारी निकोलस मादुरो सत्ता में आए तब तेल की क़ीमत फिर गिरना शुरू हो चुकी थी.

मगर उन्होंने और कड़ी राष्ट्रवादी नीतियां अपना लीं. इसके चलते देश में नाराज़गी और विरोध प्रदर्शन बढ़ने लगे.

2015 में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वेनेज़ुएला को अमेरिका की सुरक्षा के लिए ख़तरा करार देते हुए उसके ख़िलाफ़ प्रतिबंधों की घोषणा कर दी.

2018 में निकोलास मादुरो दूसरी बार राष्ट्रपति चुने गए मगर कई लोगों का मानना था कि यह चुनाव फ़र्जी था.

इसके बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेज़ुएला के तेल उद्योग के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगा दिए. तेल से होने वाली आय के ख़त्म होने से अर्थव्यवस्था और बिगड़ गयी.

देश अलग थलग पड़ गया और ग़रीबी की गर्त में धंस गया. अब उसे एक बार फिर बदलाव की ज़रूरत थी.

मादुरो को वेनेज़ुएला की सेना का समर्थन हासिल है

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2024 में राष्ट्रपति चुनाव, क्या होगा बदलाव?

2019 में मादुरो सरकार के प्रखर विरोधी युवा नेता ख़्वान गाइदो ने 2018 के चुनाव को फ़र्जी बताते हुए ख़ुद को वेनेज़ुएला का अंतरिम राष्ट्रपति घोषित कर दिया.

दर्जनों देशों ने उनकी अंतरिम सरकार को मान्यता दी.

थोड़े समय के लिए देश में बदलाव की आशा जगी, लेकिन एक साल के भीतर ही विपक्षी दल ख़्वान ग्वाइदो के ख़िलाफ़ हो गए और उन्हें बाहर कर दिया गया.

वेनेज़ुएला में अगले राष्ट्रपति चुनाव 2024 में होने हैं. अगले चुनाव से क्या आशा की जा सकती है?

हमने बात की मारियानो डी आल्बा से जो इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार हैं. उनका कहना है कि वेनेज़ुएला के अधिकांश मतदाता अब थक गये हैं.

“वेनेज़ुएला की अधिकांश जनता की सबसे बड़ी चिंता है कि परिवार के लिए दो जून की रोटी का इंतज़ाम कैसे हो? वो हर महीने सोचते हैं कि अगले महीने घर खर्च के लिए पैसे कैसे आएंगे. अधिकांश लोगों के पास राजनीतिक बहस या विरोध के लिए समय और रुचि नहीं बची है.”

अगर लोग परिवर्तन की आशा से प्रेरित होकर मतदान के लिए बाहर निकलें तब भी चुनावों के निष्पक्ष होने की संभावना कम है.

मारियानो डी आल्बा ने कहा, “मुझे लगता है कि अंतरराष्ट्रीय मापदंड के अनुसार जिसे स्वतंत्र और निष्पक्ष कहा जा सके ऐसा चुनाव वेनेज़ुएला में होना फ़िलहाल असंभव लगता है. चुनावी प्रक्रिया, मीडिया और न्यायालयों पर सरकार का नियंत्रण है. विपक्ष के लिए कुछ आशा तब हो सकती है जब वो भारी बहुमत प्राप्त करे जिसे सरकार स्वीकार भी कर ले.”

वीडियो कैप्शन, अथाह तेल वाले वेनेज़ुएला में भोजन संकट

2025 तक एक चौथाई आबादी देश छोड़ देगी!

पिछले पांच सालों के दौरान विपक्ष ने बदलाव के जो वादे किए थे वो पूरे नहीं हो पाए.

इसलिए विपक्षी दलों के लिए यह आसान नहीं होगा. देश को आगे ले जाने का रास्ता निकालने के लिए विपक्ष और मादुरो सरकार के बीच बातचीत नहीं हो पा रही है.

हाल में अमेरिका और वेनेज़ुएला की सरकार के प्रतिनिधियों ने दोहा में बातचीत की.

मारियानो डी आल्बा की राय है कि वेनेज़ुएला के संकट का समाधान करने में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण है.

वो वेनेज़ुएला की सरकार से निष्पक्ष चुनाव करवाने की मांग कर सकते हैं और उसे समझा सकते हैं कि मौजूदा संकट से बाहर निकला जा सकता है.

यह दिखाने के लिए वो प्रतिबंधों में छूट भी दे सकते हैं.

किसी देश को फ़ेल्ड स्टेट या नाकाम देश तब कहा जाता है जब वो क़ानून के मुताबिक प्रशासन चलाने में असमर्थ हो जाए.

वेनेज़ुएला में विश्व के सबसे बड़े तेल भंडार हैं. मगर पहले चावेज़ और बाद में मादुरो सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन और सत्ता में बने रहने के लिए अपनायी गयी नीतियों के कारण लोग देश छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं.

अनुमान है कि 2025 तक वेनेज़ुएला की एक चौथाई आबादी देश छोड़ चुकी होगी.

तो यह कहा जा सकता है कि वेनेज़ुएला की स्थिति एक फ़ेल्ड स्टेट के मापदंडों से मेल खाती है.

मगर यह उम्मीद भी की जा रही है कि अमेरिका वेनेज़ुएला को दोबारा लोकतंत्र की राह पर लाकर उसकी स्थिति सुधारने में अहम भूमिका निभा सकता है.

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