इसराइल-हमास संघर्ष: इधर अमेरिका की मुश्किलें बढ़ीं, तो उधर अरब देशों के शासकों की नींद उड़ी

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- Author, जेरेमी बोवेन
- पदनाम, बीबीसी के इंटरनेशनल एडिटर
ग़ज़ा के अल-अहली अस्पताल में ख़तरनाक धमाका होने से पहले ही फ़लस्तीनी और अन्य कई अरब यह मान चुके थे कि अमेरिका इसराइल का सिर्फ़ सबसे ख़ास समर्थक नहीं है.
बल्कि इसराइल बच्चों की जान लेने समेत जो कुछ ग़ज़ा में कर रहा है, उसमें अमेरिका भी उसके साथ शामिल हैं.
और ऐसा मानने का कारण था- अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का खुलकर इसराइल का समर्थन करना.
हमले के पीछे कौन है, इसे लेकर चल रहे विवाद का बहुत से लोगों की राय पर कोई असर नहीं पड़ने वाला.
12 दिनों से चल रहे युद्ध ने नफ़रत और विभाजन को और बढ़ा दिया है. इसराइल ने काफ़ी विस्तार से अपना पक्ष रखा कि अल-अहली अस्पताल पर हमला उसने नहीं किया.
इसराइल के लिए...

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उसने एक सबूत दिखाते हुए यह साबित करने का दावा किया कि इसराइल की ओर दाग़ी गई फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद नाम के संगठन की मिसाइल अपने लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही ख़राब होकर गिर गई थी.
लेकिन न सिर्फ़ हमास के समर्थकों बल्कि आम फ़लस्तीनियों के लिए भी ख़ून से सने शव रखने वाले बैग का ढेर ही वह सबूत था जो उन्हें चाहिए था.
अल-अहली अस्पताल की घटना में उन्हें सिद्धांत (कि किसने या क्यों हमला किया) नहीं बल्कि उसमें हुआ नुक़सान नज़र आ रहा है.
तेल अवीव में बिन्यामिन नेतन्याहू ने बाइडन को याद दिलाया कि हमास द्वारा अचानक किए गए इस हमले में 1400 लोगों की जान गई है, जिनमें ज़्यादातर इसराइली थे.
इस हमले के जवाब में की जा रही कार्रवाइयों में इसराइल हर रोज़ बड़ी संख्या में फ़लस्तीनियों की जान ले रहा है.
जल्दबाज़ी में तय दौरा

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ऐसे में अल-अहली में हुई घटना फ़लस्तीनियों के लिए इस बात का एक और सबूत है कि इसराइल के लिए उनकी जान की कोई क़ीमत नहीं है.
अस्पताल में हुई तबाही को लेकर शुरुआती ख़बरें तब आईं जब जो बाइडन को मध्य पूर्व ले जाने के लिए उनका विमान एयर फ़ोर्स वन उड़ान भरने की तैयारी में था. लेकिन इसके उड़ने से पहले ही बाइडन के दौरे के कार्यक्रम में बदलाव हो गया.
राष्ट्रपति बाइडन इसराइल को लेकर गहरी प्रतिबद्धता रखते हैं. उन्हें इसराइल को समर्थन जताने के लिए तेल अवीव जाना और नेतन्याहू को सबके सामने गले लगाना एकदम सामान्य लगा होगा.
बाइडन ने सोचा होगा कि इसके बाद जॉर्डन की राजधानी अम्मान में उस सम्मेलन में भाग लेकर संतुलन साध लेंगे जिसे जल्दबाज़ी में तय किया गया था.
यहां उनकी जॉर्डन के शासक, मिस्र के राष्ट्रपति और फ़लस्तीनी राष्ट्रपति से मुलाक़ात होनी थी.
तेल अवीव दौरा एक 'जुआ'
मगर जॉर्डन ने अल-अहली में हुई घटना के बाद इस सम्मेलन को रद्द कर दिया. फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास भी तुरंत इसराइल के क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक के रामल्ला में मौजूद अपने मुख्यालय की ओर रवाना हो गए.
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और यहां तक कि जॉर्डन ने भी बयान जारी कर इसराइल की आलोचना की है.
यह दौरा बाइडन के लिए बहुत मुश्किल हो गया था. आमतौर पर राष्ट्राध्यक्ष उसी समय किसी कूटनीतिक मिशन पर विदेश जाते हैं जब पहले ही बातचीत करके सारी औपचारिकताएं पूरी हो गई हों और बस समझौते पर दस्तख़त होना बाक़ी हो.
तेल अवीव जाना बाइडन के लिए एक तरह का जुआ था. वह युद्ध छेड़ चुके इसराइल का समर्थन करने के साथ-साथ ग़ज़ा में पैदा हुए मानवीय संकट को भी दूर करना चाहते थे.
नेतन्याहू को इसके लिए राज़ी कर पाना असंभव था लेकिन उनकी बैठक एक समझौते पर पहुंचने में सफल रही.
इसराइल को और सैन्य मदद का वादा किया गया. बदले में वह खाने, पानी और दवाओं से लदी गाड़ियों को मिस्र से दक्षिणी ग़ज़ा में दाख़िल होने देने के लिए तैयार हो गया.
अस्पतालों में जेनरेटरों को चलाने के लिए ईंधन की भी ज़रूरत है मगर जब समझौते के बारे में बताया गया तो इस बात का कोई ज़िक्र नहीं किया गया.
इसराइलियों की मदद करने और उन्हें युद्ध के नियम कायदों का पालन करने की याद दिलाने के अलावा बाइडन यह संदेश भी देना चाहते हैं कि इस जंग का दायरा बढ़ना नहीं चाहिए.
उन्होंने भूमध्यसागर के पूर्वी हिस्से में पहले से ही दो विमानवाहक युद्धपोत तैनात कर दिए हैं. इससे वह ईरान और लेबनान में मौजूद उसके सहयोगी हिज्बुल्ला को संदेश देना चाहते हैं कि अगर आपने दख़ल दिया तो आपको अमेरिका से निपटना पड़ेगा.
अनिश्चितता का माहौल

मध्य पूर्व के अंदर और बाहर के देशों के नेताओं को हमास और इसराइल की इस जंग से इसलिए भी चिंता है क्योंकि ऐसी स्थिति उन्होंने पहले कभी नहीं देखी.
पहले पता रहता था कि आगे क्या हो सकता है, इसलिए एक तरह की राहत रहती थी. लेकिन अब पहले जैसा कुछ नहीं बचा है.
सात अक्टूबर को इसराइल पर हमास के हमलों से पहले मध्य पूर्व पहले जैसा ही था. एक यथास्थिति सी बनी हुई थी.
भले ही इस क्षेत्र के किसी भी नेता को यह स्थिति पसंद नहीं थी मगर कम से कम स्थिरता तो नज़र आ रही थी.
जब इसराइल पर हमास का हमला हुआ, ज़्यादातर फ़लस्तीनी भी बाक़ियों की तरह हैरान थे. उनमें से कई ने हमास की आलोचना करते हुए कहा था वह भूल रहा है कि उसके अरबी नाम का मतलब- इस्लामिक रेजिस्टेंस मूवमेंट है.
नेतन्याहू का भ्रम

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इसराइल में नेतन्याहू को भी अपने राजनीतिक विरोधियों से इस बात के लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ा कि जब हमास ने हमला किया तब वह सोए हुए थे.
सैन्य और ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी को लेकर भी उनकी आलोचना हुई. इसराइलियों को लगता था कि उनकी सरकार उन्हें सुरक्षित रख सकती है.
नेतन्याहू को भी एक भ्रम था. उन्हें लगता था कि फ़लस्तीनियों को स्वतंत्रता दिए बिना ही संभाला जा सकता है.
उनकी सरकार ने हमास के साथ कई विषयों पर समझौता किया था, जैसे कि इसराइल में कितने लोग काम करने के लिए आ सकते हैं.
इसी समय नेतन्याहू ‘फूट डालो और राज करो' की नीति पर काम कर रहे थे ताकि हमास के प्रतिद्वंद्वी, फ़लस्तीनी प्रशासन को कमज़ोर कर सकें.
फ़लस्तीनी प्रशासन कई सालों से शांति वार्ताओं में शामिल होता रहा है जो आख़िरकार बेकार साबित हुईं.
उसने काफ़ी समय पहले इसराइल को मान्यता भी दे दी थी. लेकिन अब, अगर उनसे फिर से वार्ता शुरू करनी है तो भविष्य में इसराइल को फ़लस्तीनियों को यरूशलम में राजधानी के साथ भावी राष्ट्र के लिए ज़मीन देने पर भी चर्चा करनी होगी.
लेकिन इस बारे में विचार करना भी नेतन्याहू के लिए संभव नहीं है क्योंकि उनकी सरकार अति-धार्मिक राष्ट्रवादियों के समर्थन से चल रही है.
उनका रिकॉर्ड भी बताता है कि वह कभी इस तरह की रियायतें देने के पक्ष में नहीं हैं. उनके लिए यह जताना आसान है कि कोई भी इसराइल के शांति नहीं चाहता.
नेतन्याहू या उनके उत्तराधिकारी अगर अगली पीढ़ी को जंग से बचाना चाहते हैं तो उन्हें अपने सोचने का तरीका बदलना होगा.
सऊदी-इसराइल संधि का क्या होगा?

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अमेरिका के सहयोगी अरब देशों के लिए भी मौजूदा घटनाक्रम एक चेतावनी लेकर आया है कि आप फ़लस्तीनियों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते.
जॉर्डन और मिस्र काफ़ी पहले इसराइल के साथ शांति समझौते कर चुके हैं. संयुक्त अरब अमीरात भी रिश्तों को सामान्य कर चुका है.
सभी को उम्मीद थी कि एक नया मध्य पूर्व बनाने की अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की योजना से फ़ायदा होगा और इसे वे विदेश नीति की कामयाबी के रूप में भी दिखा सकेंगे.
इसराइल और सऊदी अरब के बीच समझौता करवाने की योजना थी जिसके तहत उन्हें एक-दूसरे को मान्यता देनी थी और बदले में अमेरिका से उन्हें सुरक्षा की गारंटी मिलनी थी.
बाइडन के अधिकारियों को लगा था कि वे इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. लेकिन अब सऊदी अरब और इसराइल के बीच होने वाली सुलह का एजेंडा खटाई में पड़ गया है.
अरब देशों की चिंता

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ग़ज़ा मे छिड़ी जंग और अस्पताल में हुए धमाके ने अरब देशों के शासकों और राष्ट्रपतियों की फिर से नींद उड़ा दी है.
ट्यूनिशिया में 2010 के आख़िर में एक कारोबारी ने भ्रष्टाचार और अधिकारियों से तंग आकर ख़ुद को आग लगा ली थी.
इसके अगले साल अरब देशों में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया था.
इससे डरे नेताओं को सबकुछ गंवाने का डर लगने लगा था- न सिर्फ़ सत्ता और संपत्ति बल्कि अपनी जान भी.

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अगर ट्यूनिशिया में एक युवा शख्स की मौत से क्रांति आ सकती है तो उस जंग से क्या नहीं हो सकता जिसमें हज़ारों फ़लस्तीनी नागरिकों की जान चली गई हो?
हमास और इसराइल की जंग के बीच हो रहे ख़ूनख़राबे ने दिखा दिया है कि अनिश्चितता बनी रहेगी.
युद्ध के बाद एक नई यथास्थिति भी बनेगी. शायद युद्ध से मिलने वाला झटका एक नई सोच को जन्म दे. लेकिन अगर पुराने तौर-तरीके ही बरक़रार रहे तो ज़्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती.
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