इसराइल क्यों रहता है ईरान के निशाने पर

क़ासिम सुलेमानी

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    • Author, पंकज प्रियदर्शी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ईरान के शीर्ष सैनिक कमांडर क़ासिम सुलेमानी की अमरीकी कार्रवाई में मौत के बाद मध्य पूर्व में स्थिति विस्फोटक बनी हुई है. ईरान और अमरीका के रिश्ते काफ़ी तनावपूर्ण हैं. ईरान जहाँ एक ओर बदले की कार्रवाई की बात कर रहा है, वहीं अमरीका भी जवाब देने की धमकी दे रहा है.

बुधवार को ईरान ने इराक़ स्थित अमरीकी सैन्य ठिकाने पर मिसाइल हमला भी किया. लेकिन अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का कहना है कि इस हमले में किसी अमरीकी की जान नहीं गई है.

दूसरी ओर ईरान ने धमकी दी है कि अगर अमरीका ने जवाबी कार्रवाई की, तो वो इसराइल पर भी हमला कर सकता है.

ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की ओर से जारी बयान में कहा गया है- हम इस अपराध में अमरीकी सरकार और इसराइली सरकार को अलग करके नहीं देखते हैं.

ईरान प्रदर्शन

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ईरान की समाचार एजेंसी तसनीम का कहना है कि अमरीका की जवाबी कार्रवाई हुई तो हिज़्बुल्लाह इसराइल पर हमला करेगा.

जवाब में इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा है कि अगर ईरान ने ऐसा कुछ करने की कोशिश भी की, तो उसे मुँहतोड़ जवाब मिलेगा.

दरअसल सुलेमानी की मौत के बाद इसराइल भी अमरीका के साथ-साथ मध्य पूर्व के कई देशों के निशाने पर है.

बिन्यामिन नेतन्याहू

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इराक़ी संसद ने प्रस्ताव पारित करके कहा है कि अमरीकी सैनिक इराक़ छोड़कर चले जाएँ. हालाँकि जानकार मानते हैं कि अमरीका ऐसा बिल्कुल नहीं करेगा. लेकिन अगर ऐसा कुछ भी हुआ तो इसराइल को इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं.

येरुशेलम पोस्ट में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार ऐसा कुछ हुआ और ईरान, सीरिया और इराक़ में अपनी रणनीति चलाता रहा, तो आख़िकार ईरान और इसराइल में युद्ध छिड़ सकता है.

ईरान-इसराइल संबंध

ईरान में इस्लामिक क्रांति

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अमरीका के दोस्त होने के नाते इसराइल ईरान के निशाने पर हमेशा से रहता है, लेकिन आपको जानकर ये आश्चर्य हो सकता है कि एक समय ईरान और इसराइल के रिश्ते अच्छे थे.

क़रीब 30 साल तक दोस्ताना संबंध के बाद 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद हालात बदल गए.

ये उस स्थिति में है, जब दोनों देशों की सीमाएँ एक-दूसरे से मिलती नहीं है और न ही उनके बीच कोई ज़मीन विवाद है.

लेकिन एक सच ये भी है कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने इसराइल से कूटनीतिक संबंध तोड़ लिए थे. लेकिन सैनिक सहयोग कई वर्षों तक जारी रहा.

इसराइल की आज़ादी की घोषणा

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इसराइल के सबसे पुराने अख़बारों में से एक हारेट्ज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार जब ईरान इराक़ से साथ एक लंबे युद्ध में फँसा था, उस समय उसने इसराइल से हथियार तक ख़रीदे थे.

1948 में जब इसराइल आज़ाद हुआ, तो इराक़ में अपने यहाँ रहने वाले यहूदियों पर कार्रवाई करनी शुरू की. बड़ी संख्या में यहूदियों ने वहाँ से पलायन किया और ईरान ने इसमें यहूदियों की बहुत मदद की.

आधिकारिक रूप से देखें तो ईरान ने फ़लस्तीन को बाँटने की संयुक्त राष्ट्र की योजना का विरोध किया था और इसराइल को यूएन का सदस्य बनाने का विरोध भी किया था. लेकिन सच ये भी है कि ईरान तुर्की के बाद दूसरा मुस्लिम बहुल देश था, जिसने अनौपचारिक रूप से इसराइल को मान्यता दी. जो एक दशक के बाद औपचारिक हो गया.

दरअसल इसराइल ईरान के लिए एक माध्यम का काम कर रहा था. अमरीका से समर्थन हासिल करने के लिए ईरान को अमरीका के यहूदी समुदाय की आवश्यकता थी और इसराइल इसके लिए एक माध्यम था. दूसरी ओर अमरीका को भी उस क्षेत्र में सहयोगी देशों की ज़रूरत थी ताकि वो सोवियत संघ के वर्चस्व को चुनौती दे सके.

इसराइल के ख़िलाफ़ फ़लस्तीनियों का प्रदर्शन

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अरब जगत में ईरान

आज अरब जगत में दूसरे देशों से ईरान की प्रतिद्वंद्विता का आधार धार्मिक है. ईरान शिया अल्पसंख्यकों का नेतृत्व करता है, तो सऊदी अरब सुन्नी बहुसंख्यकों का.

जब तक शीत युद्ध चला ईरान तेल का बड़ा स्रोत था, फ़ारस की खाड़ी पर अपने नियंत्रण के कारण वो अमरीका का सहयोगी देश था और इस तरह इसराइल का भी.

ईरान ने इसराइल को भी तेल दिया और इसराइल के कई सैन्य सलाहकार तेहरान में रहते थे. 60 और 70 के दशक में तेल अवीव और तेहरान के बीच विमानों की नियमित उड़ान भी थी.

1970 में गमाल अब्दुल नसीर की मौत और अनवर सादात के सत्ता में आने के बाद ईरान और मिस्र के बीच रिश्तों में गरमाहट आने लगी.

दूसरी ओर 1975 में ईरान और इराक़ के बीच समझौता हुआ. इस समझौते के तहत ईरान इस बात के लिए तैयार हो गया कि वो कुर्द अलगाववादियों को हथियार देना बंद कर देगा. दोनों ही स्थितियाँ इसराइल के लिए झटका थी. वो इसलिए क्योंकि ईरान की नज़र में इसराइल की रणनीतिक क़ीमत कम हुई.

ख़ुमैनी

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एक फ़रवरी 1979 को आयतुल्लाह ख़ुमैनी फ़्रांस से ईरान लौटे और तीन सप्ताह बाद ही उन्होंने इसराइल से रिश्ते तोड़ लिए. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद धीरे-धीरे ईरान में इसराइल के ख़िलाफ़ माहौल बनने लगा और आख़िरकार ईरान उन अरब देशों में शामिल हो गया, जो इसराइल का विरोध करते थे. ईरान भी अब ये मानने लगा था कि इसराइल ने मुसलमानों की ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा कर रखा है.

आने वाले वर्षों में स्थिति और बिगड़ी. सोवियत संघ के पतन और खाड़ी युद्ध में सद्दाम हुसैन की हार के कारण अब ईरान का शत्रु अमरीका भी था.

धीरे-धीरे अरब जगत में इसराइल विरोध की आग फैली और ईरान इसका अगुआ बन गया. इसराइल का आरोप है कि ईरान ने उन सभी गुटों को मदद की, जो इसराइल के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हुए थे. इनमें ख़ास हैं हिज्बुल्लाह और हमास. सीरिया में भी इसराइल विरोध की आग थी. इसराइल का आरोप है कि कई बार हिज़्बुल्लाह के लोगों को वहाँ से प्रशिक्षण भी मिलता था और ईरान उनकी मदद करता था.

सुलेमानी फ़ैक्टर

गोलान हाइट्स

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अब बात क़ासिम सुलेमानी और इसराइल की. आख़िर सुलेमानी को लेकर ईरान अमरीका के साथ-साथ इसराइल पर भी क्यों निशाना साधता रहता है.

पिछले साल मार्च में आई बीबीसी डॉक्यूमेंट्री 'शैडो कमांडर: ईरान्स मिलिटरी मास्टरमाइंड' में इसराइली अधिकारियों ने ये बताया था कि वे सुलेमानी की सेना के बारे में क्या सोचते हैं.

इसराइल की मिलिटरी ऑपेशंस के प्रमुख जनरल निटज़न एलॉन ने कहा था कि कैसे 2018 में गोलान हाइट्स पर ईरानियों ने अपनी स्थिति मज़बूत बनाने की कोशिश की थी. इसराइल का गोलान हाइट्स पर पिछले 50 सालों से क़ब्ज़ा है.

इसराइल का आरोप था कि ये सारा कुछ क़ासिम सुलेमानी के नेतृत्व में हुआ था. लेकिन इसराइल सुलेमानी की भूमिका को लेकर शुरू से ही सशंकित रहा है.

दरअसल अमरीका की तरह इसराइल भी क़ासिम सुलेमानी को बड़ा ख़तरा मानता रहा है. पिछले साल अगस्त में इसराइली सेना ने दावा किया था कि उसने सीरिया से ड्रोन हमले की कोशिश को नाकाम कर दिया था. इसराइल ने साज़िश के पीछे सुलेमानी का हाथ बताया था. अल कुद्स पर हिज़्बुल्लाह की मदद का भी आरोप लगा था.

सुलेमानी को लेकर इसराइल हमेशा से सशंकित रहा है. इसराइल का आरोप रहा है कि सुलेमानी ने हिज़्बुल्लाह के शिया लड़ाकों को प्रशिक्षण दिया है. इसराइल के ख़िलाफ़ जंग को लेकर सुलेमानी हमेशा काफ़ी खुलकर बोलते थे. अगस्त में उन्होंने कहा था कि ये ईरान का इसराइल के साथ आख़िरी संघर्ष है. ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख हुसैन सलामी ने कहा था कि इसराइल को पूरी तरह ख़त्म करना अब सपना नहीं.

द येरुशेलम पोस्ट ने लिखा है कि इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू ने उस समय सुलेमानी और हिज्बुल्लाह के हसन नसरल्लाह को सावधान किया था.

वर्ष 1998 में सुलेमानी कुद्स फ़ोर्स के प्रमुख बने थे. 1992 में ब्यूनस आयर्स में इसराइली दूतावास पर हमले के लिए हिज़्बुल्लाह को मदद देने का आरोप कुद्स फ़ोर्स पर ही था.

वर्ष 2006 में इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच हुए युद्ध में हिज़्बुल्लाह को ईरान की मदद के लिए सुलेमानी ही ज़िम्मेदार थे. वर्ष 2010 में न्यूयॉर्कर ने लिखा कि अमरीकी और इसराइली ठिकाने पर हमले के पीछे हिज़्बुल्लाह का हाथ था और मदद सुलेमानी की थी.

आने वाले कई वर्षों में इसराइल की विरोधी शक्तियों को एकजुट करने में सुलेमानी की मदद की बात इसराइल हमेशा से करता रहा है. फरवरी 2016 में सुलेमानी ने तेहरान में हमास के प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात की.

क़ुवैती अख़बार अल जरीदा ने दावा किया कि जनवरी 2018 में अमरीका ने कथित तौर पर सुलेमानी की हत्या के लिए इसराइल को हरी झंडी दी थी. अल जरीदा के मुताबिक़ इससे तीन साल पहले भी इसराइल ने सुलेमानी पर कार्रवाई का मन बनाया था, लेकिन उस समय अमरीका ने ईरानी नेतृत्व को चेतावनी दे दी थी.

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