सऊदी अरब को क्या भारत ने पाकिस्तान से छीन लिया है?

नरेंद्र मोदी

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इसराइल और संयुक्त अरब अमीरात के बीच गुरुवार को ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसके मुताबिक़ इसराइल वेस्ट बैंक के बड़े हिस्सों को मिलाने की अपनी योजना स्थगित कर देगा और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की शुरुआत होगी.

अभी तक इसराइल का खाड़ी के अरब देशों के साथ कोई राजनयिक संबंध नहीं था. इस समझौते की घोषणा ख़ुद अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने की.

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस समझौते से फ़लस्तीनी नेता कथित तौर पर हैरान हैं. अरब न्यूज़ की ख़बर के मुताबिक़ फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इस समझौते के बाद अरब लीग की बैठक बुलाने का प्रस्ताव रखा है.

उन्हें डर है कि इस समझौते के बाद खाड़ी के दूसरे देशों के भी इसराइल के साथ संबंध मज़बूत होंगे और 'अरब शांति समझौते' पर इसका असर पड़ेगा.

इस्लामी देशों का ध्रुवीकरण

एक तरह से उनकी ये चिंता जायज़ भी है. संयुक्त अरब अमीरात के इस फ़ैसले पर दूसरे इस्लामी देशों की शुरुआती प्रतिक्रिया ही अभी आई है. मिस्र और जॉर्डन ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है.

इस पूरे घटनाक्रम का असर खाड़ी देशों के आपसी रिश्ते, मध्य पूर्व की राजनीति और उनके साथ संबंध रखने वाले विश्व के दूसरे देशों पर भी पड़ेगा और उससे भारत भी अछूता नहीं रहने वाला.

नए समझौते के साथ ही इस्लामी दुनिया का ध्रुवीकरण होता हुआ नज़र आ रहा है.

इसराइल में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि फ़िलहाल दुनिया के मुस्लिम देश तीन खेमों में स्पष्ट तौर पर बँटे नज़र आ रहा है.

ईरान अलग-थलग खड़ा नज़र आता है, दूसरे खेमे में सऊदी अरब और यूएई एक साथ नेतृत्व करते नज़र आ रहे हैं और एक तीसरा खेमा नज़र आ रहा है तुर्की, मलेशिया और पाकिस्तान का. कुल मिला कर इस्लामी दुनिया की ये गुटबाज़ी इस फ़ैसले के बाद और भी बढ़ जाएगी.

भारत के दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ यूएई के क्राउन प्रिंस शेख मोहम्मद

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समझौते का भारत पर असर

ऐसे में सवाल उठता है कि इस फ़ैसले का भारत पर क्या असर पड़ेगा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की डिप्लोमेटिक एडिटर इंद्राणी बागची के मुताबिक़ भारत के इसराइल और यूएई दोनों से अच्छे संबंध है.

मध्य पूर्व में क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर इसराइल और भारत की सोच भी एक जैसी ही है. यूएई वहाँ उभरती हुई ताक़त है. इसलिए दोनों देश एक साथ आते हैं, तो इसका भारत भी स्वागत करेगा.

लेकिन क्या पाकिस्तान को अलग-थलग करने में भी इस जोड़ी के साथ आने से कोई असर होगा?

इस पर इंद्राणी कहती हैं, "चीन के साथ जाकर पाकिस्तान ने वैसे भी ख़ुद को अलग-थलग कर ही लिया है. लेकिन पाकिस्तान का इस्लामिक देशों पर दबदबा हमेशा रहेगा, इस बात को हम आसानी से नकार नहीं सकते. पाकिस्तान इलास्मिक देशों में अकेला ऐसा देश है, जिसके पास न्यूक्लियर ताक़त है. इस वजह से वो इस्लामिक देशों में अलग तरह का रुतबा रखता है."

वो कहती हैं कि अगर पाकिस्तान आज थोड़ा भी अलग-थलग है, तो इसका कारण वो ख़ुद है और उसकी नीतियाँ हैं.

हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि पहले सउदी अरब और यूएई पाकिस्तान के साथ माने जाते थे, लेकिन पिछले कुछ समय से, पाकिस्तान के मुक़ाबले भारत के साथ उनके रिश्ते बहुत बेहतर हुए हैं.

इसके उदाहरण के तौर पर पिछले साल के ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) की बैठक का वो ज़िक्र करते हैं, जिसमें पाकिस्तान के ना चाहने के बाद भी भारत को स्पेशल ऑब्जर्वर के तौर पर बुलाया गया था. पाकिस्तान इस निमंत्रण के ख़िलाफ़ था, लेकिन यूएई ने एक ना सुनी.

इमरान खान, नरेन्द्र मोदी

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पाकिस्तान फ़ैक्टर

पाँच दशकों बाद ये पहला मौक़ा था, जब भारत को इस बैठक में बुलाया गया था. इतना ही नहीं इस साल होने वाली ओआईसी की सालाना बैठक में भी पाकिस्तान ने भारत पर इस्लामोफ़ोबिया को सक्रिय रूप से बढ़ावा देने का आरोप लगाया, जिसे ख़ारिज़ कर दिया गया. इस बार भारत के सपोर्ट में मालदीव उतरा था.

हरेंद्र मिश्रा कहते हैं, "यूएई और सऊदी अरब के साथ नज़दीकियों की एक बानगी बालाकोट हमले के बाद भी देखने को मिली. कई जगह इस तरह की ख़बरे आईं कि भारत के पायलट अभिनंदन को छुड़ाने में सऊदी अरब का अहम रोल रहा. पाकिस्तान पर अमरीका के साथ-साथ यूएई और सऊदी अरब की तरफ़ से भी काफ़ी दवाब था."

अभी हाल ही में पाकिस्तान ने जब जम्मू-कश्मीर में 370 हटाए जाने को लेकर OIC में सवाल उठाए थे, तो सऊदी अरब से साफ़ कह दिया कि ये भारत का आंतरिक मामला है.

इसके बाद पाकिस्तान के रवैए को देखते हुए सऊदी अरब ने पाकिस्तान से एक अरब डॉलर का क़र्ज़ चुकाने को कहा है, जो उसने 2018 में लिया था.

पाकिस्तान और सऊदी अरब

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2019 में संयुक्त अरब अमीरात ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी नवाज़ा था.

ये सभी घटनाक्रम बताते हैं कि भारत के रिश्ते यूएई और सऊदी अरब दोनों से काफ़ी अच्छे रहे हैं और अगर इसराइल के साथ किसी भी तरह का समझौता हुआ है तो निश्चित तौर पर भारत इस्लामी देशों के इस खेमे के साथ खड़ा नज़र आएगा.

खाड़ी के दूसरे देश, जो इस समझौते के समर्थक होंगे, उनके साथ भी भारत के रिश्ते अच्छे होंगे. भारत को इससे पाकिस्तान को अलग-थलग करने में भी एक तरह से मदद ही मिलेगी. इतना ही नहीं, जहाँ दुनिया आज मल्टीपोलर वर्ल्ड की तरफ़ बढ़ रही है, उसमें एक बड़े खेमे में भारत, अमरीका, यूएई, और सऊदी अरब एक साथ नज़र आ रहे हैं.

हरेंद्र मिश्र इस फ़ैसले का एक और बड़ा असर भारत पर देखते हैं. भारत और इसराइल के बीच रक्षा उपकरण बनाने को लेकर कई समझौते हाल के दिनों में हुए हैं. रक्षा उपकरणों का एक बड़ा बाज़ार खाड़ी देशों को माना जाता है. ऐसे में इसराइल की मदद से भारत जो भी सैन्य उपकरण बनाएगा, उसे बेचने में आने वाले दिनों में दिक़्क़त भी नहीं आएगी.

भारत के रक्षा मंत्री ने पिछले दिनों ही रक्षा क्षेत्र में आत्म निर्भर भारत का नारा भी दिया है.

सऊदी अरब और इसराइल

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यूएई के बाद, सऊदी अरब की बारी

यूएई और सऊदी अरब की दोस्ती भी जग-जाहिर है. ऐसे में ज़्यादातर जानकार मानते हैं कि सऊदी अरब भी यूएई की राह पर चलेगा. लेकिन इंद्राणी इस पर थोड़ी अलग राय रखती है. उनका मानना है कि सऊदी अरब शायद पूरी तरह खुल कर सामने ना आए. इसके पीछे वो वजह भी बताती है.

उनके मुताबिक़ मध्य पूर्व में सऊदी अरब धार्मिक मामलों में सबसे संरक्षणवादी विचारधारा वाला देश माना जाता है. इस वजह से इसराइल के साथ पिछले इतिहास को देखते हुए यहूदियों के साथ खुले तौर पर सऊदी अरब के लिए आना मुश्किल हो सकता है. हालाँकि राजनीतिक तौर पर कई सालों से सऊदी इसराइल का साथ देते आए हैं.

इंद्राणी बताती हैं कि भारत और इसराइल के बीच की विमान सेवा शुरू करने के लिए सऊदी अरब ने अपने एयर स्पेस के इस्तेमाल की इजाज़त भारत को दी है. ये इस बात का उदाहरण है कि सऊदी का रवैया इसराइल के प्रति पिछले दिनों बदला है.

लेकिन हरेंद्र मिश्रा ऐसा नहीं लगता. वो कहते हैं, "एक पुरानी कहावत है दोस्त का दोस्त, दोस्त और दोस्त का दुश्मन दुश्मन. फ़िलहाल सऊदी अरब और इसराइल दोनों का दुश्मन ईरान है. ऐसे में बहुत संभावना है कि दोनों भी भविष्य में एक साथ आ जाए."

वो बताते हैं कि इसका इशारा गुरुवार को अमरीकी राष्ट्रपति के प्रेस कॉन्फ़्रेंस से भी मिलता है.

इस समझौते के बाद प्रेस से बात करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा, "अब जब 'बर्फ़' पिघल ही गई है, तो मुझे उम्मीद है कि कुछ और अरब-मुस्लिम देश संयुक्त अरब अमीरात का अनुसरण करेंगे."

बिन्यामिन नेतन्याहू

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इसराइल और सऊदी अरब की दोस्ती

दरअसल, सऊदी अरब इसराइल के साथ आए, ऐसे इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ख़ुद भी चाहते हैं. इसराइल में इस वक़्त उनके इस्तीफ़े की माँग हो रही है. उन पर रिश्वत, धोखाधड़ी और भरोसा तोड़ने के साथ-साथ कोरोना महामारी को ठीक से हैंडल नहीं कर पाने के भी आरोप हैं.

ऐसे में वो चाहते हैं कि जितने ज़्यादा देशों के साथ संबंध अच्छे होंगे, वो फ़लस्तीनियों को अलग-थलग करने में उतने ही सफल हो पाएँगे और अपने लिए सकारात्मक माहौल तैयार करने में आसानी होगी.

इसके अलावा इसराइल और सऊदी अरब दोनों ईरान को अपना दुश्मन मानते हैं. इस लिहाज से भी दोनों के संबंध पिछले कुछ वर्षों में सहयोग का ही रहा है.

आज अरब जगत में दूसरे देशों से ईरान की प्रतिद्वंद्विता का आधार धार्मिक है. ईरान शिया अल्पसंख्यकों का नेतृत्व करता है, तो सऊदी अरब सुन्नी बहुसंख्यकों का. अमरीका के दोस्त होने के नाते इसराइल ईरान के निशाने पर हमेशा से रहता है. अमरीका की वजह से इसराइल-यूएई समझौते के बाद अब ईरान और इसराइल में दरार और ज़्यादा बढ़ जाएगी.

कई मौक़ों पर इसराइल के सेना प्रमुख और दूसरे नेता ये कह चुके हैं कि दोनों देशों के साझा हित हैं. मध्य-पूर्व में ईरान हमारे लिए चिंता का विषय है और हम साथ मिलकर लड़ने को तैयार हैं.

दोनों देश ईरान के ख़िलाफ़ ख़ुफ़िया सूचनाएँ भी एक दूसरे से पिछले कुछ समय से साझा करते आए हैं. इसराइल ने ये बात ख़ुद स्वीकार भी की है.

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