इसराइल की बमबारी में तबाह हुआ ग़ज़ा का खूबसूरत पड़ोसी, जहां कल चमन था...

- Author, एलिस कुडी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
20 अक्टूबर की दोपहर के आसपास, ग़ज़ा के पड़ोस में स्थित पॉश माने जाने वाले अल-ज़हरा के इलाके में रहने वाले लोग मलबे और धूल के सामने खड़े थे. वहाँ पहले उनके घर हुआ करते थे.
इस्लाम में शुक्रवार को विशेष माना जाता है. इस दिन विशेष नमाज़ पढ़ी जाती है. यह सप्ताहांत की शुरुआत का प्रतीक है.
अल-ज़हरा में इसका मतलब फलाफल और हम्मस, कॉफी और चाय था. ये सभी खाद्य पदार्थ भूमध्य सागर के किनारे स्थित विशाल अपार्टमेंट या विला में परोसे जाते थे. यहां के निवासी जानते थे कि वे ग़ज़ा के अन्य लोगों की तुलना में अधिक भाग्यशाली हैं.
लेकिन इसराइली बमों ने रात भर में 25 अपार्टमेंट ब्लॉकों को नष्ट कर दिया था. इनमें सैकड़ों लोग रहते थे. सात अक्टूबर के हमास के हमलों के जवाब में इसराइल कई दिनों से ग़ज़ा पर बमबारी कर रहा था, लेकिन तब तक अल-ज़हरा को कोई नुक़सान नहीं हुआ था.
जो लोग यहाँ रहते थे, उनमें से कुछ डॉक्टर, वकील, शिक्षाविद, फैशन डिजायनर और उद्यमी शामिल थे. इनमें से कुछ लोगों ने खंडहर बनी इमारतों में ज़िंदा रहने की कोशिश की, लेकिन अधिकांश लोग जो कुछ बचा सके थे, उसे समेटा और ग़ज़ा में तितर-बितर हो गए.
सैकड़ों मील दूर तुर्की में अल-ज़हरा में पली-बढ़ीं हाना हुसैन इस ख़बर को देखकर डर गईं. वो दो साल से तुर्की में रह रही हैं. उस दिन जल्दबाजी में उन्होंने यह पता लगाने के लिए अपने परिवार को फोन किया कि वे सुरक्षित हैं या नहीं. उन्होंने अपने परिजनों से कहा कि वह उनसे प्यार करती हैं. यह कहते ही फोन कट गया.
'हालचाल लेने के लिए धन्यवाद, हम ज़िंदा हैं'

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तबाह हुए अपार्टमेंट ब्लॉकों में रहने वाले लोग स्थानीय दंत चिकित्सक महमूद शाहीन के प्रयासों से पास के एक विश्वविद्यालय में शरण लिए हुए थे.
डॉक्टर ने अपने पड़ोसियों को वहाँ से सुरक्षित निकालने के अभियान का नेतृत्व किया था.
बीबीसी ने इस हफ़्ते की शुरुआत में कहानी बताई थी कि कैसे उन्हें एक इसराइली ख़ुफ़िया एजेंट से एक सुबह फोन आया था, जिसमें उन्हें चेतावनी दी गई थी कि ब्लॉकों पर बमबारी की जाएगी.
जब अल-ज़हरा के आवासीय ब्लॉकों पर हमले के फ़ैसले के सवाल पर इसराइली सुरक्षा बल (आईडीएफ) ने बताया कि वे इस तरह के ख़ास सवालों के जवाब देने में असमर्थ हैं.
आईडीएफ का कहना है कि हमास ग़ज़ा के पार से इसराइल पर हमला कर रहा था. उसने ख़ुद को रिहाइशी इलाकों की आड़ में छिपाया है. आईडीएफ ने अल-ज़हरा पर हुए हमलों में मारे गए किसी हमास कार्यकर्ता का नाम नहीं लिया है. ऐसा माना जाता है कि कोई मरा भी नहीं है.
इसराइल का कहना है कि उसकी रणनीति हमास को जड़ से ख़त्म करने की है. वह हमास पर नागरिक समुदायों के बीच में सक्रिय होने का आरोप लगाता है.
उसका कहना है कि वह हमलों में जनहानि को कम करने के लिए क़दम उठाता है, जैसा कि हमने बताया कि महमूद को पड़ोस को ख़ाली करने का निर्देश देने वाला फोन आया था.
जिस एजेंट ने दंत चिकित्सक को बुलाया था, उसने उससे यह भी कहा, "हम वे चीज़ें देखते हैं जो आप नहीं देखते हैं."
अल ज़हरा के लोगों से बीबीसी का संपर्क

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बीबीसी ने इस क्षेत्र के कई परिवारों से दो सप्ताह तक बातचीत की. इनमें पुराने निवासियों के साथ-साथ युवा, महत्वाकांक्षी नवागंतुक भी शामिल थे.
इन लोगों ने हमें बताया कि उन्होंने कैसे अपने घरों से समेटे जाने लायक सामान समेटा और अपनी आँखों के सामने ही अपने घरों में विस्फोट होते हुए देखा. और फिर अनिश्चितता लिए हुए ग़ज़ा के चारों ओर तितर-बितर हो गए. ग़ज़ा के उस पार अस्थायी आश्रयों और अस्थायी घरों में रहने वाले लोग जीवन और अपने प्रिय पड़ोसियों की मौत की कहानी बताना चाहते थे.
टेलीफोन पर हमारी बातचीत के दौरान कई बार वहां से बमों की आवाज़ आती थी. छिटपुट व्हाट्सऐप संदेश भी आते थे.
लोग भागने के लिए या शरण लेने के लिए बातचीत को कम कर देते हैं. कुछ मामलों में, हम कई दिनों तक लोगों से संपर्क नहीं कर पाए.
ग़ज़ा पर हाल ही में तेज़ हुए इसराइल के हमलों के दौरान कम्युनिकेशन ब्लैकआउट के बाद अल-ज़हरा के एक निवासी ने हमें एक छोटा सा संदेश छोड़ा, "यह पूछने के लिए धन्यवाद. हम अब भी जीवित हैं."
हमारी बातचीत से पता चला कि अल-ज़हरा छोड़ने वाले सभी लोग जीवित नहीं बचे हैं. मारे गए लोगों में एक स्थानीय जिम का युवा बॉडी-बिल्डर भी शामिल है. उनके सोशल मीडिया पोस्ट के अनुसार, एक दोस्त से कहे गए उनके अंतिम शब्द थे, "सब कुछ ख़त्म हो गया."
हमास की ओर से संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि युद्ध शुरू होने के बाद से ग़ज़ा में 10 हज़ार से अधिक फ़लस्तीनी मारे गए हैं. इनमें से एक तिहाई से अधिक बच्चे हैं.
मृतकों और बिछड़े लोगों का डॉक्युमेंटेशन करतीं नैशवा

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ग़ज़ा घनी आबादी वाला क्षेत्र है. वहाँ बहुत ग़रीबी है. वहां प्रवेश करने और वहां से निकलने पर सख्त नियंत्रण है. लेकिन अल-ज़हरा बड़े घरों और साफ़-सुथरी बाहरी जगहों, बादाम और अंजीर के पेड़ों, खेल के मैदानों और पार्कों वाला इलाक़ा था.
अल-ज़हरा की स्थापना 1990 के दशक में फ़लस्तीनी प्राधिकरण (पीए) के अध्यक्ष यासिर अराफ़ात ने कर्मचारियों और समर्थकों के लिए किया था. स्थानीय लोगों का कहना है कि इसके अब भी पीए के साथ मज़बूत संबंध हैं. पीए वेस्ट बैंक में स्थित है. वह हमास का कट्टर प्रतिद्वंद्वी है.
यह वाडी ग़ज़ा नदी के ठीक उत्तर में स्थित है. यह वह स्थान है, जहाँ इसराइल ने 13 अक्टूबर को नागरिकों को दक्षिण की ओर जाने का आदेश दिया था.
हमास के सैकड़ों बंदूकधारियों के हमले के जवाब में इसराइल ने कई दिनों तक बमबारी की. हमास के हमले में 1,400 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. इनमें कई बच्चों सहित अधिकांश नागरिक थे. हमास के बंदूकधारियों ने 200 से अधिक लोगों को बंधक बना लिया था.
हमने जिन लोगों से भी बात की उनका ज़ोर इस बात पर था कि उनकी जानकारी के मुताबिक यह क्षेत्र हमास और उसके अभियानों से उतना ही दूर है जितना कि ग़ज़ा में होना संभव है.
ग़ज़ा पर हमास 2007 से शासन कर रहा है. एक व्यक्ति ने हमें बताया, "यहां कोई सेना नहीं थी. मुझे ऐसा नहीं लगता कि यहां हमास समर्थक रहते थे."
फ़ेसबुक पेज से मिलती जानकारी

नैशवा रेज़ेक 18 साल से अल-ज़हरा में रह रही थीं. यह उनके लिए सबसे महान शहर था.
वो अपने आसपास की समितियों और एक स्थानीय युवा परिषद में सक्रिय थीं. नैशवा एक दशक से अधिक समय से चल रहे एक कम्युनिटी फेसबुक ग्रुप में शामिल थीं.
अगर आप उनसे किसी विशेष निवासी के बारे में पूछते हैं, तो शायद वो उसे जानतीं हो और शायद उनका फोन नंबर भी उन्हें याद हो.
इस फेसबुक पेज के क़रीब 10 हज़ार फॉलोवर हैं. युद्ध से एक दिन पहले इस पेज पर एक स्थानीय कैफे में होने वाले बिलियर्ड टूर्नामेंट और स्नातक की डिग्री लेने वाले छात्रों के लिए बधाई संदेश दिए गए थे.
अब इस फ़ेसबुक पेज पर वे अपने पड़ोस में हुए विनाश का अपडेट देते हैं. वे वहाँ रहने वाले लोगों की मौत की पहचान करती हैं. नैशवा इससे पहले इतना कभी व्यस्त नहीं रहीं. एक हालिया पोस्ट में उनके इतालवी रेस्तरां में हुए हमले में मारे गए एक परिवार पर शोक व्यक्त किया गया है.
युद्ध की घोषणा के बाद नैशवा अपने पति और चार बच्चों के साथ दक्षिण की ओर चली गईं. जाने से पहले उन्होंने अपने पड़ोसी को एक चाबी दी और कहा कि जब वह चली जाएं तो वे उनके प्यारे घर के पौधों की देखभाल करें.
पहले बम विस्फोट के दो दिन बाद, उनकी अपनी इमारत नष्ट हो गई. यह अल ज़हरा की सबसे ऊंची इमारत थी.
वो याद करती हैं, "किसी ने मुझे फोन किया और बताया, 'मैं अभी-अभी आपके टावर के पास से गुजरी हूं और यह सब जमीन पर है.''
पौधों की चिंता

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वह पांचवीं मंजिल पर स्थित अपने घर को बहुत बड़ा और विशाल बताती हैं. उनके परिवार ने उसे ख़रीदा और एक दशक के दौरान उसमें काफ़ी सुधार किया. उन्होंने हाल ही में एक नया एयर कंडीशनर, एक टेलीविजन और फर्नीचर ख़रीदा था.
वो कहती हैं, "बहुत से लोग कहते हैं कि यह केवल पैसा है, लेकिन मेरे लिए मेरा घर ही मेरी आत्मा है."
अब वो उत्तरी ग़ज़ा में रह रही हैं. उनका कहना है कि उनका परिवार अब भी ख़तरे में हैं. वो बताती हैं कि तीन दिन पहले ही उनके घर के पास की इमारत पर बमबारी की गई. उस बमबारी से उठे धुंए से उनका दम घुटने लगा.
उनके बच्चे पूछते रहते हैं कि जब वे अल-ज़हरा से भागे तो वे अपने साथ नया एयर कंडीशनर और टीवी क्यों नहीं ला सके. वे यह भी पूछते रहते हैं कि वे घर कब जा सकते हैं और अपने खिलौने कब ले सकते हैं.
नैशवा के लिए उनके पौधे बहुत प्रिय हैं.
खाना पकाने के लिए लकड़ी तलाशता एक प्रोफ़ेसर

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अहमद हम्माद एक विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं. वो नैशवा के घर के पास की एक इमारत में रहते थे. वे इस समुदाय के एक अन्य स्थापित सदस्य थे. वह उन लोगों में से एक थे, जिन्होंने हमलों के बाद वहीं रुकना चुना.
हम्माद क़रीब 50 साल के हैं और उत्तर में स्थित एक विश्वविद्यालय में मीडिया और संचार पढाते हैं. वे अपने शोध पत्र हमें भेजने के उत्सुक हैं. वे अपने आठ से 27 साल की उम्र के छह बच्चों के बारे में गर्व से बात करते हैं.
वे कहते हैं, "उनमें से एक दंत चिकित्सक है, एक आईटी में काम करता है, एक ने विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया है और अन्य तीन अभी भी स्कूल में हैं."
पिछले महीने जब हमने फोन पर बात की थी, तो अहमद और उनका परिवार अल-ज़हरा स्थित अपने घर में शरण लिए हुए था. वह घर अब बिना दरवाजे और खिड़कियों के है. वे अपने काम या स्कूल जाने में सक्षम नहीं थे. वे अपना समय जलाने के लिए लकड़ी ढूंढने में बिताते थे ताकि वे खाना बना सकें. वे वहीं रुके रहे क्योंकि वे बाहर निकलने से बहुत डरे हुए थे. उन्हें डर था कि दक्षिण की ओर बढ़ते समय वे हमलों में फंस जाएंगे.
इसराइल ने 27 अक्टूबर की रात हवाई हमले तेज कर दिए और जमीनी अभियानों का विस्तार किया. इसके बाद से हमारा अहमद से संपर्क टूट गया. कुछ दिनों बाद, उन्होंने हमसे संपर्क करके बताया कि बहुत कठिन रातों और उनसे भी बदतर सुबह के बाद अपना घर छोड़ चुके हैं. वह दक्षिण की ओर जाते हुए निरंतर बमबारी के बारे में बताते हैं. वो बताते हैं कि जब भी कोई बम गिरता है तो वे लोग जमीन पर लेट जाते हैं.
अल-ज़हरा के उद्यमी

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तुर्की में रहने वाली हाना अपने परिवार का कुशलक्षेम जानने के लिए अपने फोन से चिपकी रहीं.
इस इंतजार के दौरान ही उन्होंने हमें उस जगह के बारे में कहानियाँ सुनाईं, जिसे वह दुनिया की सबसे खूबसूरत गर्मजोशी से भरी जगह कहती हैं.
अल-ज़हरा के निवासी समुद्र तट पर सूर्योदय और सूर्यास्त के समय जमा होते थे. वे वहां जाने वाली मुख्य सड़क को भर देते थे. शुक्रवार को हाना और उनकी सहेलियाँ चुटकुले और हफ्ते भर में घटी कहानियाँ सुनाने के लिए वहाँ जाती थीं.
युद्ध ने यहाँ जीवन को कितना बदल दिया, इसका संकेत देते हुए हाना कहती हैं कि उन्हें उन्हीं दोस्तों से संदेश मिलने लगे. इनमें से एक ने पूछा कि क्या उसके मर जाने के बाद हाना उसके बच्चों की देखभाल करेगी. वहीं दूसरी दोस्तों ने महिलाओं के लिए स्वच्छता उत्पादों के विकल्पों पर सलाह मांगी. वहीं एक दूसरे दोस्त ने पीने के लिए साफ पानी की इच्छा जताई.
कई दिन के इंतजार के बाद आखिरकार हाना अपने परिवार से संपर्क करने में कामयाब रहीं. इसमें उसका भाई याह्या भी शामिल था, जिसे वह अपना हमसफर बताती हैं. याह्या अल-ज़हरा में उद्यमियों की नई पीढ़ी में से हैं. 30 साल के फैशन डिजाइनर पड़ोस के ठीक दक्षिण में अपने मौजूदा भीड़भाड़ वाले आवास की जगह अपने पूर्व जीवन के बारे में बात करना पसंद करते हैं. वहां वे अपने परिवार के साथ घर के नष्ट होने के बाद कई घंटों तक टहलते रहे थे.
अल ज़हरा की यादें

वह उन पक्षियों की आवाज को याद करते हैं, जो तब आती थी जब वह अपने परिवार के अपार्टमेंट की इमारत की छत से पड़ोस में देखते थे.
याह्या व्हाट्सएप के माध्यम से कहते हैं, "उन सभी चीजों ने हमें खुशी का अनुभव कराया."
अब, वह कभी-कभी व्हाट्सएप चैट अचानक बंद कर देते हैं. उन्होंने एक संदेश में कहा, "क्या मैं अब जा सकता हूं क्योंकि वहां मेरे पास में बम पड़ा है."
याह्या अल-ज़हरा से दो बैगों के साथ निकले, जिसमें एक आईपैड, दस्तावेज़, एक हुडी, एक पानी की बोतल, उनका पासपोर्ट, चॉकलेट और एक प्राथमिक चिकित्सा किट थी. उन्हें बहुत कठिनाई से तैयारी की गई डिजाइन, अपने कपड़ों, कपड़े और स्कर्ट को वही छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा.
वो कहते हैं, "और सिलाई मशीनें और ढेर सारी खूबसूरत यादें."
अल ज़हरा में क्या क्या छोड़ आए हैं?

उनके चचेरे भाई 28 साल के अली और 25 साल के मोहम्मद भी शहर में युवा उद्यमी हैं. वे क्रमशः पेस्ट्री शेफ और कैफे मालिक के रूप में अल-ज़हरा में नौकरी करते थे. दोनों 19 और 20 अक्टूबर को नष्ट हुई इमारतों में रहते थे.
उन्होंने वहां जीवन को संवारने में बहुत सारा पैसा निवेश किया था. अली की शादी इस साल की शुरुआत में हुई थी. उन्होंने नए फर्नीचर पर 6,000 डॉलर खर्च किए. उसे उनके परिवार के घर में रखा गया था, जहां वह और उनकी गर्भवती पत्नी रह रही थीं.
उनका परिवार हमास और इज़राइल के बीच 2014 के युद्ध के दौरान ग़ज़ा शहर से यहां आया था. वे यह सोचकर कि यहां आए थे कि यह सबसे सुरक्षित जगह है.
पिछले महीने उन्होंने दो जोड़ी कपड़ों से बैग तैयार किए थे. वो कहते हैं, "एक बैग मेरी मां के लिए, एक बैग मेरे भाई के लिए, एक बैग मेरी पत्नी के लिए था."
19 अक्टूबर को उनके परिवार ने उन बैगों को उठाया और सबकुछ वहीं छोड़कर वहां से निकल गए. अली कहते हैं कि जब उनकी इमारत पर बम गिरे तो सारा नुकसान दोगुना हो गया, उनके माता-पिता की संपत्ति के साथ-साथ उनका और उनकी पत्नी का नया फर्नीचर भी नष्ट हो गया. दो फ्रिज, दो वॉशिंग मशीनें और दो सोफे.
मोहम्मद कहते हैं कि उनके पिता ने हाल ही में अपने पारिवारिक घर का अंतिम भुगतान किया था, उन्होंने भी उसी रात घर खाली कर दिया था. वो कहते हैं, ''उन्होंने फ्लैट का पूरा भुगतान किया और अब फ्लैट चला गया.''
वह अब अपने दिन पानी की तलाश में बिताते हैं. आराम के लिए उनके पास समय नहीं है.
उन्हें उस कैफे की याद आती है जिसे वो विश्वविद्यालय के मैदान में चलाते थे, जिसमें पूल टेबल और दीवार पर अमेरिकी रैपर टुपैक शकूर की पेंटिंग थी. वह हर दिन जिम जाना मिस करते हैं. लेकिन सबसे ज्यादा उन्हें अपने दोस्तों की याद आती है. वो कहते हैं, "हम मज़ाक करेंगे, हँसेंगे. हम आधी रात तक एक साथ बैठे रहेंगे."
महंगाई और सामान की किल्लत

पत्रकार अब्दुल्ला अल-खतीब कहते हैं कि उनके पूरे परिवार ने इन हमलों में चार घरों को खो दिया है.
वो कहते हैं कि उनका बेटा पूछता रहता है कि वह कब घर जा सकेगा और कब पार्क में अपने दोस्तों के साथ खेल सकेगा. लेकिन वह शायद कभी वापस नहीं लौट पाएगा.
वो कहते हैं, "हमारा घर अब सड़क है. सब कुछ नष्ट हो गया."
दंत चिकित्सक महमूद, जिन्होंने अपने पड़ोसियों को निकालने की अपील की थी, वो अब मध्य गाजा के एक चिकित्सा केंद्र में स्वयंसेवा कर रहे हैं.
वह कहते हैं, "मुझे सबसे भयानक गंध आ रही है. आप कपड़े नहीं धो रहे हैं और आपके साथ 130 लोग हैं."
महमूद खुद को भाग्यशाली मानते हैं कि उनके पास रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ी हुई कीमतों के लिए पर्याप्त पैसा है. महमूद का एक करीबी दोस्त अल-ज़हरा के एक विला में रह रहा है,. उन्होंने हाल ही में उसके लिए आटा भेजा है, ताकि वह रोटी बना सके. लेकिन उन्हीं वस्तुओं की आपूर्ति लगातार कम होती जा रही है.
वो कहते हैं, "आज मैं दाल की तलाश में सभी दुकानों में गया. मैं बढ़ा-चढ़ाकर कर नहीं कह रहा है, मैंने कम से कम 40 दुकानों में दाल की तलाश की, लेकिन मुझे कहीं दाल नहीं मिली. एक दुकानदार ने मुझसे कहा, 'अपना समय बर्बाद मत करो'."
वापस अल ज़हरा लौटने की उम्मीदें

महमूद कहते हैं कि युद्ध ख़त्म होने के बाद उन्हें अल-ज़हरा वापस जाने की उम्मीद है. वो कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि भगवान हमें जीवित रहने देंगे और फिर हम चीजों को ठीक करने की कोशिश करेंगे."
आईडीएफ का कहना है कि हमास ने ग़ज़ा पट्टी के पार से काम करना जारी रखा है. उसका कहना है, "आतंकवादी संगठन हमास को खत्म करने के आईडीएफ के मिशन के हिस्से के रूप में, आईडीएफ ग़ज़ा पट्टी में सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है. सैन्य लक्ष्यों पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रासंगिक प्रावधानों के अधीन है, इससे जनहानी को कम करने के लिए संभावित सावधानी बरतना भी शामिल है."
हाना आखिरी बार पांच महीने पहले अल-ज़हरा गई थीं. उन्हें नहीं पता था कि यह आखिरी बार होगा जब वह अपना घर देखेंगी.
वो कहती हैं, "अगर मुझे पता होता, तो मैं...अपने कमरे की दीवारों को अलविदा कह देती, जिनसे मैं प्यार करती हूं और जिन्होंने मेरे जीवन के खुशी और दुख के क्षण देखे हैं.
वो कहती हैं, ''मैंने अपना बहुत सारा सामान ले लिया होता, जिनमें प्यारे पलों की यादें समाई हैं.''
हाना कहती हैं, "उन्होंने हमारे पास कुछ भी नहीं छोड़ा. बिल्कुल कुछ भी नहीं."
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