चार्ल्स शोभराज: तिहाड़ जेल तोड़ने से लेकर बेख़ौफ़ नेपाल जाने तक

चार्ल्स शोभराज

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नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने फ़्रांस के सीरियल किलर चार्ल्स शोभराज को छोड़ने का आदेश दिया है.

बीबीसी नेपाली के मुताबिक़ ये फ़ैसला उनकी उम्र के आधार पर लिया गया है. शोभराज 78 साल के हैं और दिल की बीमारी से पीड़ित हैं.

शोभराज 2003 से दो अमेरिकी सैलानियों के हत्या के दोष में नेपाल की जेल में बंद हैं.

कोर्ट ने छोड़े जाने के 15 दिनों के अंदर उनके प्रत्यर्पण के आदेश दिए हैं.

'द सर्पेंट' और 'बिकनी किलर' जैसे उपनामों से प्रसिद्ध रहे चार्ल्स शोभराज छह अप्रैल 1944 को वियतनाम के साइगॉन में पैदा हुए थे. उनकी मां वियतनाम की नागरिक थीं और पिता भारतीय थे. पिता ने उन्हें अपनाने से इनकार कर दिया था.

उस वक़्त वियतनाम पर फ़्रांस का क़ब्ज़ा था. फ़्रांसीसी उपनिवेश में पैदा होने की वजह से उन्हें फ़्रेंच नागरिकता हासिल हो गई थी.

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भेष बदलने में माहिर चार्ल्स शोभराज पर्यटकों और युवा महिलाओं को निशाना बनाते थे. चार्ल्स शोभराज पर भारत, थाईलैंड, नेपाल, तुर्की और ईरान में हत्या के 20 से ज़्यादा आरोप लगे. उन्हें सीरियल किलर कहा जाने लगा लेकिन अगस्त 2004 के पहले उन्हें ऐसे किसी मामले में दोषी नहीं ठहराया गया.

एक अपराधी के तौर पर शोभराज या तो चकमा देकर जेल से बाहर आते रहे या फिर अधिकारियों को रिश्वत देकर जेल में सुविधाएं हासिल करते रहे.

माना जाता है कि शोभराज भारत के अलावा अफ़ग़ानिस्तान, ग्रीस और ईरान की जेलों से भी चकमा देकर बाहर आ चुके हैं.

फ्रांस के पर्यटकों को ज़हर देने के मामले में उन्होंने भारत की जेल में तक़रीबन 20 साल की सज़ा काटी.

जुर्म की दुनिया में एंट्री

ये माना जाता है कि शुरुआती जीवन में शोभराज ने फ़्रांस में छोटे-मोटे अपराध किए लेकिन सीरियल किलर बनने की शुरुआत साल 1963 में तब हुई जब उन्होंने एशिया की यात्रा की.

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जानकारों का कहना है कि आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने का उनका तरीका हमेशा एक सा था. वो ड्रग्स लेने वाले फ्रेंच और अंग्रेज़ी भाषी पर्यटकों से दोस्ती गांठते थे और उनका माल लूटकर फिर उनकी हत्या कर देते थे.

साल 1972 से 1982 के बीच शोभराज हत्या के बीस से ज़्यादा आरोप लगे. इन तमाम मामलों में पीड़ितों को ड्रग्स दिया गया था. उनका गला दबाया गया था. मारा गया था या फिर उन्हें जला दिया गया था.

कहा जाता है कि हिंसा करने की चार्ल्स की ताक़त का मुक़ाबला सिर्फ उनके जेल से भाग निकलने से ही किया जा सकता है.

भारत में वो दो बार जेल तोड़कर भागे. एक बार तो वो तिहाड़ जैसी हाई सिक्योरिटी जेल से भी भाग निकले.

कैसे और क्यों जेल से भागे

1976 में उन्हें 12 साल की जेल की सज़ा सुनाई गई थी लेकिन दस साल बाद ही 1986 में वो तिहाड़ जेल से भाग निकले.

शोभराज ने जेल में जन्मदिन की पार्टी रखी. इसमें कैदियों के साथ गार्डों को भी बुलाया गया था.

पार्टी में बांटे गए बिस्कुट और अंगूरों में नींद की दवा मिला दी गई थी. थोड़ी देर में शोभराज और उनके साथ जेल से भागे चार अन्य लोगों के अलावा बाकी सब निढाल हो गए.

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भारतीय अख़बारों में आई रिपोर्टों के मुताबिक शोभराज बाहर आने को लेकर इस कदर आश्वस्त थे कि उन्होंने जेल के गेट पर तस्वीर भी खिंचाई.

रिचर्ड नेविल की बायोग्राफी में चार्ल्स शोभराज कहते हैं, "जब तक मेरे पास लोगों से बात करने का मौका है, तब तक मैं उन्हें बहला-फुसला सकता हूं."

कहते हैं कि दस साल की जेल की सज़ा के आखिर में वो जान-बूझकर भाग निकले जिससे वो दोबारा पकड़े जाएं और जेल से भागने के लिए उन पर अभियोग चलाया जाए.

ऐसा करके वो थाईलैंड प्रत्यर्पण से बच सकते थे. थाईलैंड में उन पर पांच हत्याओं के आरोप थे और ये लगभग तय था कि उन्हें मौत की सज़ा मिल सकती है.

साल 1997 में जब वो रिहा हुए तब तक बैंकॉक में उन पर मुकदमा चलाने की समय सीमा बीत चुकी थी. भारत ने 1997 में उन्हें फ़्रांस प्रत्यर्पित कर दिया गया.

चार्ल्स शोभराज

नेपाल में गिरफ्तारी

साल 2003 में एक बार फिर चार्ल्स शोभराज नेपाल वापस लौटे और इस बार वो बेख़ौफ़ तरीक़े से आए जबकि पुलिस वहां पर उन्हें गिरफ़्तार कर सकती थी और उन्होंने इस बार प्रेस से भी बात की. लेकिन नेपाल की राजधानी काठमांडू के एक कसीनो से उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.

उनके ख़िलाफ़ नेपाल ने तक़रीबन 28 साल पुराना मामला वापस खोला जिसमें उन पर फ़र्ज़ी पासपोर्ट के ज़रिए यात्रा करने और कनाडा के एक नागरिक और अमेरिका की एक महिला की हत्या का आरोप था.

शोभराज ने आरोपों से इनकार किया लेकिन पुलिस ने दावा किया कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं. साल 2004 में उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी.

बीते साल अप्रैल में चार्ल्स शोभराज फिर चर्चा में तब आए जब उन्होंने नेपाल की जेल से विदेशी मीडियो को इंटरव्यू दिया. ये सवाल उठने लगे थे कि जेल के एक क़ैदी ने आख़िर मीडिया से कैसे बात की?

ब्रिटेन की दो पत्रिकाओं में शोभराज की क़ैद और उनकी भविष्य की योजनाओं के बारे में इंटरव्यू पर आधारित रिपोर्ट छपी थी.

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