हथौड़ा गैंग: कहानी कराची की सड़कों पर दहशत फैलाने वाले गैंग की

हथौड़ा गैंग

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    • Author, जाफ़र रिज़वी और रियाज़ सुहैल
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू, कराची से

"उसने पिस्तौल निकाल ली थी... लेकिन मेरे बगल में खड़े अफ़सर ने कुल्हाड़ी से उस कार का शीशा तोड़ दिया... और हमने उसे क़ाबू में कर लिया."

कर्नल (सेवानिवृत्त) सईद ने इस महत्वपूर्ण गिरफ़्तारी का नक़्शा खींचते हुए हमें बहुत ही जोशीले अंदाज़ में बताया.

पाकिस्तान सेना के स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) के पूर्व अधिकारी कर्नल सईद, जो सिंध और बलूचिस्तान पुलिस में डीआईजी के पद भी संभाल चुके हैं, अब काफ़ी बूढ़े हो चुके हैं, लेकिन इस उम्र में भी उनकी याददाश्त कमाल की है.

कर्नल सईद मुझे जिस गिरफ़्तारी के बारे में बता रहे थे, उसने कराची में ख़ौफ़ और दहशतगर्दी की डरावनी घटनाओं की एक भयानक श्रृंखला 'हथौड़ा गैंग' का ख़ात्मा कर दिया था.

साल 1985-86 में पैदा हुई डर और आतंक की यह कहानी एक से दो साल के समय में दर्जनों मौतों की ऐसी कहानी है, जिसे याद करके कराची के लोग आज भी कांप जाते हैं.

और कर्नल सईद मुझे जो बता रहे थे, वह किसी 'मामूली गिरफ़्तारी' के बारे में नहीं था.

यह "हथौड़ा गैंग" के "मुख्य और अंतरराष्ट्रीय किरदार" की गिरफ़्तारी का विवरण था.

लेकिन कर्नल सईद के खुलासे से पहले पाकिस्तान के सामने ज़ाहिरी तौर पर 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद' की इस पहली घटना के बारे में यह जानना ज़रूरी है, कि आख़िर यह 'हथौड़ा गैंग' क्या था और स्थानीय आतंकवाद समझी जाने वाली इस दहशतगर्दी का वैश्विक स्थिति से क्या संबंध था ?

कराची का लॉ एंड ऑर्डर

कराची शहर

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उस दौर में पाकिस्तान के अख़बारों और पत्रिकाओं में प्रकाशित रिपोर्टों से अंदाज़ा होता है कि उस समय देश और क्षेत्र की राजनीति में उथल-पुथल के बावजूद कराची में सामान्य क़ानून-व्यवस्था दूसरी जगहों की तुलना में होती थी.

5 जुलाई 1977 को, जनरल ज़िया-उल-हक़ ने तत्कालीन निर्वाचित प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का तख़्ता उलट कर देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया था. जिसकी वजह से जनता के विरोध ने सैन्य सरकार के लिए बहुत सारी मुश्किलें पैदा कर दी थीं.

लेकिन 1985 तक, देश में प्रधानमंत्री मोहम्मद ख़ान जुनेजो की सरकार बन चुकी थी, जो जनरल ज़िया के शासनकाल में भी बड़ी मुश्किल से काम कर रही थी.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे हालात के कारण पाकिस्तान की इस सरकार के अंतरराष्ट्रीय समुदाय, ख़ासकर अमेरिका के साथ बहुत अच्छे संबंध थे.

पड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान में भी गंभीर राजनीतिक अस्थिरता थी, जहां रूसी सेना ने 24 दिसंबर, 1979 को सशस्त्र हस्तक्षेप किया था, जो लगभग दस साल तक यानी 15 फरवरी, 1989 तक चलता रहा.

अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में रूस के बल प्रयोग का कड़ा विरोध किया और अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद प्रतिरोध करने वाले समूहों को वित्तीय और सैन्य सहायता देने की ठान ली. पाकिस्तान अमेरिका के इरादों का मुख्य चरण बना, जिसने इन अफ़ग़ान प्रतिरोध समूहों को सैन्य उपकरण और सैन्य प्रशिक्षण के साथ साथ लड़ाके उपलब्ध कराने में भी अहम भूमिका निभाई.

पाकिस्तान का यह फ़ैसला जहां एक तरफ़ अमेरिका को ख़ुश करने का ज़रिया बना, वहीं दूसरी तरफ़ रूसी अधिकारियों ने इसे विरोध और पक्षपात कहा.

अफ़ग़ानिस्तान में रूसी सैन्य हस्तक्षेप का पाकिस्तान पर एक प्रभाव ये भी पड़ा कि लगभग 30 लाख अफ़ग़ान शरणार्थी सीमावर्ती क़बायली क्षेत्रों के माध्यम से पाकिस्तान में दाख़िल हुए. लेकिन ये शरणार्थी अपने कैंप्स या बस्तियों तक सीमित रहने के बजाय, बड़ी संख्या में रोज़गार की तलाश में आर्थिक केंद्र कराची पहुंच गए.

उस समय, इस क्षेत्र के अन्य देशों में भी राजनीतिक उथल-पुथल चल रही थी.

11 फरवरी 1979 को अयातुल्लाह रूहुल्लाह ख़ामेनई के नेतृत्व में पकिस्तान के पड़ोसी देश ईरान में, शाह रज़ा शाह पहलवी का तख़्ता उलट दिया गया था और ईरान में 'क्रांति' का दौर चल रहा था. इसके अलावा पड़ोसी देश इराक़ के साथ क़रीब आठ साल तक चला ईरान-इराक़ युद्ध भी पूरे ज़ोरों पर था.

उस समय का कराची कैसा था?

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इमेज कैप्शन, अल्लाह वसाया के आस पास लेटे दो लोगों की 'हथौड़ा गैंग' ने हत्या कर दी थी, और वो खुद गंभीर रूप से घायल थे.

उस समय तक, कराची में प्रशासनिक रूप से केवल तीन, यानी पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी ज़िले थे, अब मध्य कहलाने वाला पूरा ज़िला उस समय पश्चिमी जिले का हिस्सा था.

कुछ समृद्ध क्षेत्रों को छोड़कर, कराची में ज़्यादातर मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग की पुरानी बस्तियाँ और प्राचीन मोहल्ले थे.

इन बस्तियों में सब लोग पूरे मोहल्ले के एक-एक व्यक्ति से परिचित होते थे और आस पड़ोस के साथ बहुत ही अपने-पन और मेल-जोल का माहौल था. सरल और साधारण जीवन था, न टीवी चैनल थे, न इंटरनेट, न सोशल मीडिया और न ही मोबाइल फ़ोन.

हथौड़ा गैंग का उदय

और कराची के इस शांतिपूर्ण माहौल में अचानक एक हथौड़ा गैंग पैदा हो गया.

यह अप्रैल 1985 की बात है. मुल्तान के रहने वाले अल्लाह वसाया उस रात ही ख़ैबर मेल से कराची पहुंचे थे और क्लिफ़्टन के पास अपने रिश्तेदारों के यहां जा रहे थे. रात ज़्यादा होने की वजह से उन्होंने पुल के नीचे ही रात बिताने का फ़ैसला किया.

वह सोये तो पुल के नीचे थे लेकिन जब उन्हें होश आया तो वह ख़ून से लथपथ थे और सिर में लगी गंभीर चोट से ख़ून बह रहा था. अल्लाह वसाया के आसपास लेटे दो अन्य लोगों की इसी तरह की चोट से मौत हो गई थी. 2 अप्रैल 1985 को हुई यह घटना कराची में हथौड़ा गैंग के हमले की पहली घटना थी.

इस घटना के केवल दो दिन बाद, क्लिफ़्टन ब्रिज से कुछ किलोमीटर की दूरी पर काला पुल के पास पीर बुख़ारी शाह उर्फ़ ज़िंदा पीर की दरगाह के परिसर में दो शव और मिले, जिनकी इसी तरह सिर कुचल कर हत्या की गई थी. ये दोनों व्यक्ति मज़ार के पीछले हिस्से में सोए हुए थे, जहां महफ़िल की व्यवस्था की जाती थी.

कुछ हफ़्ते बाद, 21 अप्रैल को, सिटी स्टेशन पर तीन लोगों की हत्या की गई थी, ये तीनों रात में प्लेटफ़ॉर्म नंबर एक और चार पर सोये हुए थे. उनमे एक मलंग और एक कुली भी शामिल था, लेकिन सिर्फ़ कुली की पहचान हो सकी थी. उसी रात करसाज़ और एयर फ़ोर्स हॉल्ट के बीच रेलवे ट्रैक पर भी एक लाश मिली, जिसकी मौत सिर पर गंभीर चोट लगने से हुई थी. 24 अप्रैल तक, इस तरह से मरने वालों की संख्या नौ हो चुकी थी.

सुनसान इलाक़ों और रेलवे लाइन के बाद इस तरह की घटनाओं ने आबादी वाले क्षेत्रों और गली मोहल्लों में भी दहशत फैला दी.

इसके बाद पुराने गोलिमार इलाक़े में ल्यारी नदी के किनारे हसन ओलिया गांव में घटी एक घटना ने तत्कालीन सरकार और प्रशासन को झकझोर कर रख दिया. इस घटना में एक ही परिवार के बच्चों समेत सात लोगों की उसी तरह सिर पर कोई भारी और मोटी चीज़ मार कर मौत के घाट उतार दिया गया था.

इस घटना में पूर्व पार्षद अब्दुल ग़नी की दो सालियां और एक भांजी की मौत हुई थी. अब्दुल ग़नी के मुताबिक़ घटना रात में किसी समय हुई और जब रोज़ की तरह सुबह दरवाज़ा नहीं खुला तो पड़ोसियों को चिंता हुई. उन्होंने अंदर कूद कर देखा तो लाशें पड़ी थीं.

एक अन्य रिश्तेदार एहसान ने बताया कि तीन शव एक कमरे में और चार शव दूसरे कमरे में थे. मरने वालों में एक बच्चा भी शामिल था, जबकि एक बच्चा सोते सोते सोफ़े के नीचे चला गया था. इसलिए उसपर हत्यारों की नज़र नहीं पड़ी और वह बच गया.

हथौड़ा गैंग

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फिर कुछ कुछ समय के बाद इस तरह की घटनाएं पूरे शहर में होने लगीं.

घर के बाहर, सड़क पर या फ़ुटपाथ पर सोते लोग, मज़दूर, भिखारी, रोज़गार की तलाश में कराची आने वाले परदेसी, दुकानों और छोटे होटलों के कर्मचारी लगातार ऐसी भयावह घटनाओं के शिकार होने लगे.

साल 1986 की शुरुआत में इसी तरह की एक और बड़ी घटना के बाद, ख़ुफ़िया एजेंसियों के भी कान खड़े हो गए.

पत्रकार तनवीर बेग के मुताबिक़, ये घटना फ़ेडरल बी एरिया की मज़दूर बस्ती मूसा कॉलोनी में हुई थी, जहां गली में सो रहे आठ मज़दूरों की भारी हथियार से वार करके हत्या की गई थी.

यह वह समय था जब असेंबली के निर्वाचित सदस्यों ने भी असेंबली में इस मुद्दे को उठाया और जांच के लिए पुलिस सहित क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों की भी एक विशेष टीम का गठन किया गया.

अलाउद्दीन ख़ानज़ादा उस समय उर्दू अख़बार जसारत के क्राइम रिपोर्टर थे.

वो बताते हैं, कि ''अच्छे समय के सबसे ख़ूबसूरत शहर कराची में अपराधी भी सक्रिय थे. घरों के बाहर सोने या पड़ोसियों के साथ गपशप करने की प्रथा तो शहर के पुराने हिस्से, यानी ओल्ड सिटी एरिया की कई पुरानी बस्तियों में अभी भी प्रचलित है, और तब भी घर के बाहर चौपाल लगाई जाती थी. लोग देर तक जागते थे और बेफ़िक्र होकर वहीं सो भी जाते थे. मोहल्ले में ये सोते जागते लोग असल में उन अपराधियों की राह में सबसे बड़ी रुकावट थे. अधिकांश पुलिस अधिकारियों का मानना था कि सिर कुचल कर हत्या करने की ये वारदातें इनही अपराधियों का काम है, ताकि शाम होते ही मोहल्ले की चहल-पहल ख़त्म हो जाए और उन्हें आसानी से डकैती और लूटपाट करने का मौक़ा मिल सके."

अलाउद्दीन ने बताया कि एक घटना ल्यारी इलाक़े में भी हुई जहां पुरुषों और महिलाओं सहित नौ लोगों की हत्या की गई थी.

तनवीर बेग का कहना है कि चारों तरफ़ फैलती इन घटनाओं का शिकार क़रीब सौ लोग हुए.

उस समय प्रकाशित होने वाली ख़बरों से पता चलता है कि कुछ उर्दू अख़बारों ने ये अनुमान भी लगाना शुरू कर दिया था, कि 'हत्यारे' अपने शरीर पर तेल या ग्रीस लगाकर आते हैं, ताकि अगर कोई उन्हें पकड़ने की कोशिश भी करे, तो वे पकड़े न जाएं और आसानी से फ़रार हो सकें.

सिंध पुलिस के एक पूर्व आईजी अफ़ज़ल शिगरी का कहना है कि पंजाब के कुछ हिस्सों में पहले भी इस तरह की मिलती जुलती घटनाएं हो चुकी थीं, लेकिन वे किसी संगठित अपराध का हिस्सा नहीं थीं.

अफ़ज़ल शिगरी साल 1988 में कराची पुलिस के प्रमुख थे, जबकि साल 1993 में उन्हें आईजी सिंध के रूप में तैनात किया गया था.

अफ़ज़ल शिगरी ने बीबीसी को बताया, "पहले रावलपिंडी में एक भयानक घटना हुई थी. फिर इसी तरह की घटनाएं झेलम और फिर कश्मीर और इसके बाद हज़ारा डिवीज़न में हुईं. मुर्री रोड (रावलपिंडी) पर कमेटी चौक के पास महिलाओं और बच्चों समेत एक पूरे परिवार की हत्या कर दी गई थी, जिससे बहुत ज़्यादा डर और दहशत फैल गयी थी.

वह बताते हैं, "फिर मेरा तबादला हो गया, लेकिन एक आरोपी पकड़ा गया था. वह एक साइको 'सीरियल किलर' था, जो वारदात के बाद महिलाओं का यौन शोषण तो नहीं करता था, लेकिन शरीर के निचले हिस्से से कपड़े उतार कर साथ ले जाता था. पकड़े जाने पर उसने दो और घटनाओं को भी स्वीकार किया. लेकिन इसका कराची के हथौड़ा गैंग से कोई संबंध नहीं था."

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हथौड़ा गैंग नाम कैसे पड़ा?

26 अप्रैल 2015 को प्रकाशित पाकिस्तान के अंग्रेज़ी अख़बार 'डॉन' में नदीम फ़ारूक़ पराचा के एक लेख के अनुसार, साल 1985 में दक्षिण जिले के बर्न्स रोड के फ़ुटपाथ पर सो रहे एक भिखारी पर हमला होने तक पुलिस इस मामले को किसी एक व्यक्ति या सीरियल किलर का अपराध समझती रही.

लेकिन हमले में बचने वाले भिखारी ने पुलिस को बताया, "वह सो रहा था, तभी सड़क पर कार के पहियों के रगड़ने की आवाज़ से उसकी नींद खुल गई. कार में से सफ़ेद कपड़े पहने चार लोग उतरे उन्होंने अपने चेहरे को काले कपड़े से ढका हुआ था. गाड़ी से उतरकर वो उसके पास आये और उनमें से एक ने हथौड़े से उसके सिर पर ज़ोर से वार किया, जिससे वह बेहोश हो गया."

लेख में आगे लिखा है, कि हमलावर उसे मृत समझकर भाग गए. बाद में घायल भिखारी की चीख-पुकार पर स्थानीय लोगों ने उसे अस्पताल पहुंचाया.

जब पुलिस ने यह बयान दर्ज किया, तो एक तो पुलिस और ख़ुफ़िया जांच एजेंसियों का ये नज़रिया बदला कि ये घटनाएं किसी एक साइको (मानसिक रूप से बीमार प्रकार) 'सीरियल किलर' का काम नहीं है, बल्कि एक की संगठित गैंग की सोची समझी और सुनियोजित साज़िश हैं.

दूसरा ये कि अख़बारों ने इस संगठित गैंग को "हथौड़ा गैंग" का नाम दे दिया.

ज़ाहिर है, इससे पहले भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी थीं. बस फिर क्या था? जल्दी ही उर्दू अख़बारों की 'चटपटी' और 'मसालेदार' ख़बरों से हत्या की ये अंधी लेकिन बहुत ही भयावह घटनाएं 'हथौड़ा गैंग' की कार्रवाई में ढलकर भय और आतंक का प्रतीक बन गईं.

जल्दी ही, उर्दू अख़बारों ने क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति के संदर्भ में इन घटनाओं का संबंध काल्पनिक ख़बरों में रूसी ख़ुफ़िया एजेंसी 'केजीबी' और अफ़ग़ान ख़ुफ़िया एजेंसी 'खाद' से जोड़ने के क़िस्से बयान किये, तो किसी ने अपनी सत्ता को बढ़ाने के लिए जनरल ज़िया के सैन्य शासन का कारनामा बताया.

लेकिन किसी भी तरह से सरकारी स्रोत, अफ़सर या अथॉरिटी या गंभीर राजनीतिक हलकों ने कभी भी ऐसी किसी ख़बर की पुष्टि नहीं की.

डॉन के अनुसार, एक अंग्रेज़ी पत्रिका तो इसे एक "शैतानी संप्रदाय" के (कथित) "ख़ुफ़िया क्लब" से जोड़ना चाहती थी.

उस समय मज़हर अब्बास डॉन ग्रुप के दोपहर को प्रकाशित होने वाले अंग्रेज़ी अख़बार 'स्टार' के क्राइम रिपोर्टर थे.

मज़हर अब्बास कहते हैं, ''आज पीछे मुड़कर देखने पर ऐसा लगता है कि कराची के राजनीतिक महत्व को देखते हुए एक विशेष 'योजना' के तहत भय का माहौल 'बनाए रखने' की यह प्रवृत्ति कई दशकों से चली आ रही है. नहीं तो 'हथौड़ा गैंग' जैसा ऑपरेशन अचानक शुरू होकर अचानक कैसे ख़त्म हो सकता है? और निशाने पर कौन था? मज़दूर वर्ग, बेघर लोग, सड़कों पर सोने वाले, उन्हें निशाना बनाने की कोई वजह समझ में नहीं आती है. तो फिर यह क्या था?"

क्योंकि इन घटनाओं में किसी की गिरफ़्तारी भी नहीं हुई थी.

मज़हर अब्बास ने कहा, कि यह सब पाकिस्तान के दूसरे शहरों में भी हुआ. लेकिन सरकार या किसी सरकारी एजेंसी की तरफ़ से कभी भी कोई वैज्ञानिक या अत्याधुनिक जांच सामने नहीं आ सकी. अगर आप उस समय के पुलिस अधिकारियों को ढूंढ कर अब इस मामले की पड़ताल कर सकें तो शायद आपको कुछ डिटेल मिल सके कि आख़िर यह पूरा मामला क्या था.'

यहां तक कि कहानी वास्तव में 'आधिकारिक तौर पर' कोई नहीं जानता था कि इस 'हथौड़ा गैंग' की वास्तविकता क्या थी.

इस बारे में उस समय के बहुत से पुलिस और कुछ सिविल (गैर-सैन्य) ख़ुफ़िया एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बातचीत से पता चलता है, कि उनमें से कई लोगों को असलियत का पता है और पूरी सच्चाई जानते तो ज़रूर हैं, लेकिन कुछ कारणों से, अभी भी खुले तौर पर कुछ भी कहने से हिचकते हैं.

इन्हीं तथ्यों का पता लगाने के लिए मैंने सबसे पहले सिंध पुलिस के पूर्व आईजी आफ़ताब नबी से संपर्क किया. आफ़ताब नबी कराची पुलिस के प्रमुख (DIG) भी रहे और संघीय जांच एजेंसी (FIA) के संयुक्त निदेशक भी.

वह कराची में हथौड़ा गैंग की घटना के समय जुलाई 1984 से जून 1985 तक पाकिस्तान के सिविल इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के राजनीतिक विभाग में तैनात थे.

आफ़ताब नबी ने कहा, "जब ये घटनाएं शुरू हुईं और बेघर लोगों को निशाना बनाया जाने लगा और आम नागरिकों का जीवन ख़तरे में पड़ गया, तो हम भी दूसरी सभी क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों के अधिकारियों की तरह बहुत दबाव में थे."

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"राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गवर्नर, मुख्य सचिव सभी के यह 'आदेश' थे, कि पता करो ये कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है?"

"ये सारी घटनाएं रात के अंधेरे में दो से पांच बजे के बीच होती थीं और आमतौर पर सुबह रोशनी होने पर इनके बारे में पता चलता था कि रात में किसी ने, सिर कुचल कर किसी की हत्या कर दी है."

"इतना भयानक माहौल बन गया था जिसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता है. और ऐसा नहीं है कि कहीं कोई एक आधा हो जाए, कहीं तीन हो रहे हैं, कहीं चार हो रहे हैं, कहीं दो, कहीं एक. जिन लोगों की हत्या की जाती थी, उनके सिर में इतनी गंभीर चोटें होती थीं, ऐसा लगता था जैसे कि उन्हें किसी बहुत मोटी और भारी चीज़ से मारा गया हो. ज़्यादातर घटनाएं दक्षिणी ज़िले, केंट रेलवे स्टेशन, सिटी रेलवे स्टेशन या कोरंगी में हुईं, जहां मज़दूर वर्ग और बेघर लोग रहते थे."

"कुछ पता ही नहीं चला कि कौन करता था. बहुत ज़्यादा डर और ख़ौफ़ फैला हुआ था. यह एक ऐसी समस्या बन गई थी, जिसे आप आतंकवाद भी कह सकते हैं. उस समय आम अपराध भी होते थे, लेकिन इन घटनाओं से जो डर, ख़ौफ़ और दहशत फैली थी इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था.फिर मैंने भी रात को तीन-तीन बजे तक पेट्रोलिंग करनी शुरू कर दी. लेकिन चूंकि इन्वेस्टिगेशन अथॉरिटी तो पुलिस होती है, तो काम तो पुलिस का था, हम तो आईबी में थे. हमारा काम तो संबंधित कार्यालयों को अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध कराना था."

उन्होंने कहा कि फिर सिंध पुलिस को कुछ सफलता मिली थी. और इसका सुराग़ भी लगा लिया था.

उन्होंने दावा किया कि उस दौर तक भी नतीजे बिलकुल ख़ुफ़िया रखे गए, यहां तक कि सरकारी तौर पर हमें तक भी नहीं बताया गया कि कौन था, क्या था, और फिर अचानक ये वारदातें बंद हो गईं.

सिंध के पूर्व आईजी अफ़ज़ल शिगरी ने बताया, "जब कराची में 'हथौड़ा गैंग' की ये घटनाएं शुरू हुईं, तो उस समय तक पंजाब में एक 'साइको सीरियल किलर' की घटनाएं हो चुकी थीं. इसलिए हमने (सिंध पुलिस और अन्य एजेंसियों के साथ) नोट्स कंपेयर किए."

वह कहते हैं, "अगर यह संभावना है कि 'हथौड़ा गैंग' किसी दुश्मन देश का ऑपरेशन है जो डर और ख़ौफ़ फैलाकर आतंकित करना चाहता था, तो यही संभावना हो सकती है कि पंजाब की घटनाओं से इतना डर फैल गया था, कि कराची में डर फैलाने के लिए भी यही तरीक़ा इस्तेमाल किया जा सकता था."

"हथौड़ा गैंग" ने भी सोचा होगा कि डर फैलाने का सबसे आसान तरीक़ा तो यही है, इसलिए उन्होंने कराची में भी इसे ही अपना लिया.

दोस्त अली बलोच कराची पुलिस की एंटी टेररिस्ट विंग (एटीडब्ल्यू) के प्रमुख रह चुके हैं.

वह कराची पुलिस के ख़ुफ़िया विभाग स्पेशल ब्रांच के प्रमुख (एसएसपी) भी रहे.

चाहे वह 12 नवंबर, 1997 को अमेरिकी ऊर्जा एजेंसी यूनियन टेक्सास के चार अमेरिकी कर्मचारियों की हत्या हो या 23 जनवरी, 2002 को अमेरिकी पत्रिका वॉल स्ट्रीट जर्नल के अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के अपहरण और हत्या की घटना. दोस्त अली बलोच वर्षों तक कराची में आतंकवाद की लगभग हर घटना की जांच, आतंकवाद और गिरफ्तारियों के हर चरण से सीधे तौर पर जुड़े रहे हैं.

जब हथौड़ा गैंग की घटनाएं शुरू हुई थीं, उस समय वह कराची पुलिस की स्पेशल ब्रांच में नए नए शामिल हुए थे.

'हथौड़ा गैंग' की सच्चाई

दोस्त अली बलोच बताते हैं, "जब एटीडब्ल्यू को संगठित किया गया था, तो हमने सेवानिवृत्त 'वरिष्ठ ऑपरेटरों' को फिर से एंगेज या नियुक्त किया था. उनकी सीधी बातचीत और एसएसपी स्पेशल ब्रांच के रूप में मेरी नज़रों से जो रिकॉर्ड गुज़रे, उससे पता चला कि किसी एजेंसी ने लंबे समय तक निगरानी के बाद, 'पाक लीबिया होल्डिंग' नामक इन्वेस्टमेंट वेंचर (दोनों देशों के बीच निवेश के लिए स्थापित किये गए संयुक्त फंड या संस्था) से जुड़े हुए एक ऐसे व्यक्ति को 'प्राइम सस्पेक्ट' के तौर पर लिस्ट डाउन (सूचीबद्ध) किया है जो लीबियाई नागरिक था."

"पाक-लीबिया होल्डिंग एक तरह का निवेश बैंक था. उस समय जिस तरह शेख़ ज़ायद प्रशासन ने शेख़ ज़ायद फ़ाउंडेशन बनाया था या कुवैत फंड की स्थापना की गई थी, पाक-सऊदी इन्वेस्टमेंट बनी थी, इसी तरह पाक-लीबिया होल्डिंग भी व्यावसायिक आधार पर स्थापित की गई संस्था थी."

हालांकि, ख़ुफ़िया एजेंसियों की नज़रों में आने के बाद भी इस संदिग्ध को तुरंत नहीं पकड़ा गया. बल्कि एक लंबे समय तक निगरानी करने और उनके ख़िलाफ़ बहुत से सबूत जमा करने के बाद उन्हें लाइव डिटेन (ज़िंदा गिरफ्तार) किया गया.

दोस्त अली बलोच की इस तरह की बातचीत से पहला संकेत मिलने के बाद, एक बहुत ही उच्च स्तरीय सरकारी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर और मेरे आग्रह पर केवल इतना कहा, कि 'मैं आपकी केवल इतनी मदद कर सकता हूं, जिस अधिकारी ने आरोपी को गिरफ़्तार किया उनका नाम बता सकता हूँ, उन तक पहुंचने का काम आपको ख़ुद करना होगा. और वो नाम है कर्नल सईद.'

पुलिस अधिकारी

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कर्नल सईद कौन है?

कर्नल सईद 'हथौड़ा गैंग' के उन आरोपियों की गिरफ़्तारी के लिए पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों के संयुक्त ऑपरेशन के मुख्य किरदार थे.

वह अक्टूबर 1961 में सेना की बलोच रेजिमेंट में शामिल हुए, लेकिन जल्द ही उन्हें सेना के स्पेशल सर्विस ग्रुप (एसएसजी) में शामिल कर लिया गया. एसएसजी कर्मियों और अधिकारियों को विशेष ट्रेनिंग दी जाती है जिसे आमतौर पर 'कमांडो ट्रेनिंग' कहा जाता है.

सोमवार 15 अप्रैल 1985 को जब सर सैयद गर्ल्स कॉलेज की छात्रा बुशरा ज़ैदी की एक यातायात दुर्घटना में मौत के बाद भड़की हिंसा बेकाबू हो गई और इससे निपटने में कराची पुलिस की खामियां स्पष्ट हो गईं, तो पुलिस की बेहतर ट्रेनिंग और पुनर्गठन की कड़ी ज़रुरत महसूस हुई. इसके बाद पुलिस और राज्य के अधिकारियों ने संयुक्त रूप से सेना से अनुरोध किया कि सिंध पुलिस को ट्रेनिंग देने के लिए, सेना के कुछ (एसएसजी प्रशिक्षित) अफ़सरों को भेज दिया जाए.

उन तीन चयनित सैन्य अधिकारियों में से एक कर्नल सईद थे, जिनकी सेवाएं सिंध पुलिस को सौंप दी गईं और उन्हें पुलिस प्रशिक्षण केंद्र सईदाबाद का प्रमुख नियुक्त किया गया.

इसके बाद कर्नल सईद को डीआईजी सिंध रिज़र्व पुलिस (एसआरपी) के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्होंने कलात बलूचिस्तान पुलिस में डीआईजी के तौर पर भी सेवाएं दीं.

कर्नल सईद ने मुझे बताया कि जब 'हथौड़ा गैंग' की घटनाएं शुरू हुईं, तो सिंध के तत्कालीन आईजी आग़ा सआदत अली शाह ने मुझे बुलाया और कहा कि आपको यह गिरफ़्तारी करनी है, क्योंकि सिंध पुलिस में किसी भी अधिकारी की सेना के एसएसजी जैसी ट्रेनिंग नहीं थी.

कर्नल सईद ने कहा, कि 'सआदत अली शाह का आदेश सुनने के बाद मैंने साफ़ मना किया था कि मैं ऐसा नहीं करूंगा. यह मेरा काम नहीं है. जिस देश में प्रधानमंत्री को फांसी हो गई, वहां मैं अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर कैसे काम कर सकता हूं? न ये मेरी ड्यूटी है और न ही मैं ये करूँगा. जब आईजी ने ज़ोर दिया, तो मैंने उनसे कहा कि आप सरकार की किसी हाई अथॉरिटी से कहें की वो मुझे आदेश दें."

"जब मैं सआदत अली शाह को मना करके वापस आ गया तो आईबी के तत्कालीन प्रमुख ब्रिगेडियर नेक मोहम्मद ने मुझसे संपर्क किया और कहा कि ये गिरफ़्तारी करनी है. मैंने ब्रिगेडियर नेक मुहम्मद से भी कहा कि सर! आप एक सैन्य अधिकारी हैं और मैं इस समय सिंध पुलिस में हूं. आप मेरे कमांडर नहीं हैं. आईजी सिंध मेरे कमांडर हैं, मैं सीधे तौर पर आपका आदेश कैसे मान लूं? गड़बड़ हो गई तो कोई साथ नहीं देता."

उन्होंने दावा किया, "उसके बाद मुझे सिंध के तत्कालीन गवर्नर और डीएमएलए (डिप्टी मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर) जनरल जहांदाद ख़ान ने बुलाया. उन्होंने भी मुझे यही कहा कि लीबियाई आरोपी को गिरफ़्तार करना है. मैंने कहा, "सर, मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं. मैं दायरे से बाहर जाकर कैसे काम कर सकता हूं, अगर कुछ ऊंच नीच हो गई तो?" जिस पर जनरल जहांदाद ख़ान ने मुझसे कहा 'इन दि इंटरस्ट ऑफ़ दि नेशन (देश के व्यापक हित में) आप मेरी ज़िम्मेदारी पर कर दें, मैं तुम्हारे पीछे खड़ा हूं. फिर मैंने हाँ कर दी."

मामला कैसे खुला?

कर्नल सईद ने दावा किया कि "ख़ुफ़िया जानकारी के अनुसार, लीबिया होल्डिंग (बैंक) का प्रभारी 'अम्मार' नामक आरोपी था और 'हथौड़ा गैंग' का सबकुछ वही था."

इस सवाल पर कि लीबिया तो पाकिस्तान का मित्र देश है, उसे पाकिस्तान में आतंकवाद से क्या फ़ायदा हो सकता था? कर्नल सईद ने बताया, "उस समय अमेरिका के साथ हमारे संबंध बहुत अच्छे थे और वे इसे पसंद नहीं करते थे."

दोस्त अली बलोच ने स्पष्ट करते हुए बताया कि अधिकारियों की राय में, यह लीबिया की आधिकारिक नीति नहीं थी.

कुछ अन्य अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान में रूसी सैन्य हस्तक्षेप के ख़िलाफ़ अमेरिका और अफ़ग़ान विरोधियों के प्रति सहानुभूति रखता था और यह रूसी समर्थक अफ़ग़ान सरकार सहित कई खिलाड़ियों को पसंद नहीं था.

दोस्त अली बलोच ने दावा किया कि उस समय का "सोवियत साम्राज्य" भी उन्हें भर्ती करके इस्तेमाल कर सकता था. संबंधित व्यक्ति को "स्लीपर सेल" के रूप में यहां पहुंचाया गया और फिर उन्होंने नेटवर्क को व्यवस्थित किया.

उस समय लोगों को इन्वेस्टमेंट के लिए भी डिप्लोमैटिक वीज़ा मिल जाता था.

उन्होंने कहा कि "हथौड़ा गैंग एक अलग तौर पर कुछ नहीं था. यह एक बड़े रहस्य का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य रातों-रात परिणाम हासिल करना भी नहीं हो सकता था. जैसे जब आप संगीत सुनते हैं, तो कई वाद्ययंत्र ढोल, तबला, सितार, बांसुरी बज रहे होते हैं. अगर आप इन्हें अलग-अलग सुनते हैं तो कुछ भी समझ में नहीं आता है, लेकिन अगर आप उन सभी को एक साथ ताल में सुनते हैं, तो समझ में आता है कि यह तो एक धुन है. इसी तरह, अगर आप आतंकवाद की घटनाओं को अलग-अलग करके देखेंगे, तो आपको कुछ समझ में नहीं आता, लेकिन अगर सारे लिंक जोड़ लिए जाएं, तो समझ में आता है कि यह तो एक बड़े खेल का हिस्सा हैं."

पत्रकार मज़हर अब्बास ने बताया, "मुझे 2009 में एआरवाई टीवी के लिए दिए गए एक इंटरव्यू में (जो यूट्यूब पर उपलब्ध है) आईएसआई के पूर्व प्रमुख जनरल हमीद गुल ने बताया था, कि सोवियत संघ के शासक गोर्बाचोव का एक प्रतिनिधि पाकिस्तान आया था, जिसने पाकिस्तान सरकार पर ज़ोर दिया था कि रूसी नेतृत्व चाहता है कि (फिलहाल) अगले आम चुनाव को स्थगित कर दिया जाये."

वह कहते हैं, "शायद इसका भी इस सबसे कुछ संबंध हो सकता है. क्योंकि यह सब उस समय हो रहा था जब अफ़ग़ान शरणार्थियों की आमद जारी थी और पाकिस्तान के लोग पहली बार हेरोइन जैसे ड्रग और कलाश्निकोव जैसे हथियारों से परिचित हो रहे थे."

इसलिए कराची, एक बड़ी आबादी के रूप में, हथियारों और नशीले पदार्थों दोनों के लिए एक प्रमुख बाज़ार भी बन सकता था. इसलिए हो सकता है, कि हथौड़ा गैंग से किसी ऐसे नेटवर्क का कोई संबंध हो.

हथौड़ा गैंग

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हथौड़ा गैंग के काम करने का तरीक़ा

कर्नल सईद ने दावा किया कि इस "संगठित नेटवर्क" में पाकिस्तानी भी शामिल थे. "जो यहां थे वो भी और जो लीबिया में थे वो भी."

दोस्त अली बलोच ने भी पुष्टि की कि "ज़ाहिर है कि स्थानीय 'इंफ्रास्ट्रक्चर' तो मौजूद होता ही है. सारा नेटवर्क तो बाहर से नहीं आता है."

कर्नल सईद के मुताबिक़, ''ख़ुफ़िया जानकारी के अनुसार लीबिया में रहने वाले हमारे (पाकिस्तानी) लोगों को पाकिस्तान लाया जाता था. यहां आईबी के ही एक अधिकारी (इंस्पेक्टर लतीफ़) के साथ मिली-भगत की वजह से, उन्हें एयरपोर्ट पर भी हर संभव सुविधा मुहैया कराई जाती थी. शाम को लीबिया से फ्लाइट आती थी, रात में वे लोगों की हत्या करने की वारदातों को अंजाम देते थे और रात को ही वापस लौट जाते थे. ये लोग कराची या पाकिस्तान में जिस इलाक़े के भी रहने वाले होते थे, वहीं यानी स्थानीय इलाक़े में वारदात करते थे."

हथौड़ा गैंग

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गिरफ़्तारी कैसे हुई?

कर्नल सईद का कहना है, कि आईबी द्वारा दी गई ख़ुफ़िया जानकारी के अनुसार, पाक-लीबिया होल्डिंग्स के प्रमुख (कथित तौर पर हथौड़ा गैंग के सरगना) अम्मार का ठिकाना कराची के डिफ़ेन्स इलाक़े की फ़ेज-फाइव की 23वीं स्ट्रीट के पास था. वह अपने ठिकाने तक पहुंचने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे.

वह बताते हैं, "फिर मैंने 23 वीं स्ट्रीट पर रिकॉन्सेन्ज़ (सेना की तर्ज़ पर ख़ुफ़िया निगरानी या जासूसी) की. अम्मार नाम का ये आरोपी 48 से 50 साल के बीच का क्लीन शेव आदमी था जो अपने ड्राइवर के साथ आवाजाही करता था. इसलिए हमने उसे उस जगह पर नियंत्रण करने की योजना बनाई."

"वहां से रास्ते तीन अलग-अलग दिशाओं में मुड़ जाते थे. मैंने सुबह से ही तीनों सड़कों पर नाकाबंदी करा दी. वे नीले रंग की रॉयल सैलून कार में सवार थे. जैसे ही वो वहां से निकले तो मैंने उनको रोका. जैसे ही गाड़ी रुकी तो पिस्तौल तो उसने निकाल लिया था. मेरे बगल में एक अधिकारी कुल्हाड़ी लिए खड़ा था, जिसने कुल्हाड़ी से कार की खिड़की को तोड़ दिया और दरवाज़ा खोलते ही उसको कार से बाहर खींच लिया."

उस पर काबू पाते ही, हमने उसे अपनी कार में बिठा लिया. वहां पर (आस-पास के घरों के) कई चौकीदार वगैरह भी थे. वे भी देख रहे थे, लेकिन हम उन्हें कार में बिठाकर ले गए और उन्हें आईबी के अधिकारियों को सौंप दिया.

बाद में इन्वेस्टिगेशन में उन्होंने अपराध क़बूल कर लिया और यह भी बताया कि पाकिस्तान का एक आईबी अधिकारी भी उनसे मिला हुआ था, क्योंकि वही उन्हें हवाई अड्डे से आने जाने में उनकी मदद करता था. जांच में जब उस अधिकारी का भी नाम आया तो संबंधित अधिकारियों ने उससे भी पूछताछ की, तो वो काग़ज़ जिस पर (आरोपी सरगना) अम्मार ने कुबूलनामा दिया था उस इंस्पेक्टर ने उस बयान को अधिकारीयों के सामने ही मुंह में डाला और खा गया."

लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी का तो क्या होना था? जब कहानी खुलने पर, लीबियाई नागरिकों के ख़िलाफ़ ही न कोई क़ानूनी कार्रवाई हुई और न ही उनके ख़िलाफ़ कोई मुक़दमा दर्ज किया गया. बल्कि इसके बजाय, उन्हें नापसंदीदा व्यक्ति क़रार देकर लीबिया निर्वासित कर दिया गया. क्योंकि उनके डिप्लोमेट वीज़ा होने के कारण उनको डिप्लोमेट इम्यूनिटी थी.

हथौड़ा गैंग

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कर्नल सईद ने दावा किया कि 'उन व्यक्तियों की गिरफ़्तारी और निर्वासन के बाद देश में "हथौड़ा गैंग" की कोई घटना नहीं हुई थी.

उन्होंने कहा कि "मैं ये नहीं बता सकता कि वो ये सब कुछ किसके कहने पर कर रहे थे."

दोस्त अली बलोच ने कहा, ''जब असली आरोपी गिरफ़्तार हो गए तो स्थानीय जाल भी तोड़ दिया गया.''

दोस्त अली बलोच ने बताया कि जिस रात वारदात की जाती थी "हथौड़ा गैंग" के सदस्यों को उसी रात लीबिया वापस भेजने की व्यवस्था होती थी. उन दिनों कैमरा वगैरह तो होते नहीं थे, कम्युनिकेशन भी इतना तेज़ नहीं था. ये तो बाद में पता चला कि किसी ने हमें अपना दुश्मन चुन लिया था, लेकिन हमें पता ही नहीं था.

बीबीसी अपनी पेशेवर ज़िम्मेदारी समझता है कि इस मुद्दे पर लीबिया, रूस या अफ़ग़ान सरकारों का पक्ष भी लिया जाये, ताकि पाकिस्तानी अधिकारियों के दावों का जवाब लिए जा सकें.

हथौड़ा गैंग

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लेकिन न तो अब लीबिया में (उस समय के शासक) कर्नल गद्दाफ़ी ज़िंदा हैं और न ही उनकी सरकार बची है.

न रूस अब सोवियत संघ की हैसियत से बाक़ी रहा है, न ही सोवियत कार्रवाइयों का बचाव करने या उनके ख़िलाफ़ संभावित आरोपों का जवाब देने के लिए कोई आधिकारी या एजेंसी है.

और न अफ़ग़ानिस्तान में रूस समर्थक बबरक कारमल या डॉक्टर नजीब की सरकार बची है, और न ही उनका कोई अधिकारी पाकिस्तानी अधिकारियों के दावों का जवाब देने या उनका खंडन करने के लिए मौजूद है.

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