पाकिस्तान: हिंदू ज़मींदार परिवार को कोर्ट से कब्ज़ा, पर हथियारबंदों ने फिर छीनी ज़मीन

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- Author, मोहम्मद ज़ुबैर ख़ान
- पदनाम, बीबीसी उर्दू के लिए, इस्लामाबाद से
"पूरा सिंध जानता है कि हम ख़ानदानी ज़मींदार हैं. क़ंबर शाहदादकोट में हमारी ज़मीन हैं. जिन पर साल 1963 में क़ब्ज़ा कर लिया गया था. सुप्रीम कोर्ट में भी केस जीत चुके हैं. लेकिन हमें हमारी ज़मीन वापस नहीं मिल रही है. वे कहते हैं कि तुम हिंदू हो. चुप रहो नहीं तो हालात के लिए आप ख़ुद ज़िम्मेदार होंगे.
ये कहना था सिंध प्रांत के क़ंबर शहदाद जिले की रहने वाली महिला सूरी बी का, जो पीपुल्स पार्टी के लॉन्ग मार्च के मौक़े पर अपने परिवार के साथ इस्लामाबाद पहुंच कर प्रदर्शन कर रही थी. इस प्रदर्शन में उनके बेटे कैलाश कुमार भी शामिल थे.
सूरी बी का कहना है, "देश की सबसे बड़ी अदालत ने एक बार नहीं बल्कि दो बार हमारे पक्ष में फ़ैसला सुनाया है कि हमारी ज़मीनें हमें दी जाएं. लेकिन जब मैं अपने बेटों और देवर के साथ ज़मीनों पर जाती हूं, तो वहां अधिकारी कहते हैं कि क़ब्ज़े के काग़ज़ात पर हस्ताक्षर कर दो और फिर हथियारबंद लोग धमकियां देकर हमें वहां से निकाल देते हैं."
कैलाश कुमार और उनकी मां सूरी बी दशकों से अपनी ज़मीनों का क़ब्ज़ा हासिल करने के लिए इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन अभी तक उन्हें इसमें कोई ख़ास सफलता नहीं मिली है.
"हमारे पूर्वज, उपमहाद्वीप के विभाजन के दौरान हिंदू होने के बावजूद, पाकिस्तान और सिंध को छोड़ कर नहीं गए थे. इसकी हमें इतनी कड़ी सज़ा मिल रही है कि मेरे बच्चे ग़रीब होने के साथ-साथ एक-एक पैसे के मोहताज हो गए हैं. जान को ख़तरा होने की वजह से अलग अलग इलाक़ों में छिपते फिर रहे हैं."
सूरी बी के विरोधी पक्ष इम्तियाज़ ब्रोही का दावा है कि उन्होंने ये ज़मीन कैलाश के दादा-दादी के साथ एक समझौते के तहत ली थी. इस पर पचास साठ वर्षों से उनका क़ब्ज़ा है और "इसपर हमारा अधिकार है न कि कैलाश कुमार का."
वह इस बात से इनकार करते हैं कि उन्हें हिन्दू होने की वजह से नफ़रत और भेदभाव का निशाना बनाया जा रहा है. इब्राहिम कहते हैं, "क़ंबर कोट शाहदाद में बड़ी संख्या में हिंदू हैं. उनके साथ हमारे अच्छे संबंध हैं, हम उनका सम्मान करते हैं. कैलाश और उसका परिवार सिर्फ़ आरोप लगा रहे हैं. पाकिस्तान में हिंदुओं सहित सभी के अधिकारों की रक्षा की जाती है."

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ये भूमि विवाद क्या है?
सूरी बी के बड़े बेटे कैलाश कुमार कहते हैं, "यह घटना हमारे पैदा होने से भी पहले की है. हमारे पास क़ंबर जिले के इलाक़े में क़रीब 238 एकड़ कृषि भूमि थी. उस समय हमारे दादा के पास काम करने वालों ने धोखे से इस ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया था. हम अल्पसंख्यक और कमज़ोर थे. हमारे दादाजी को न केवल डराया धमकाया गया, बल्कि जाली दस्तावेज़ बनाकर दीवानी अदालत में एक मुक़दमा भी किया गया."
कैलाश कुमार का कहना है, ''इस मुक़दमे का फ़ैसला साल 1980 में हमारे पक्ष में आया.जिस पर हमारे विरोधी पक्ष ने सेशन कोर्ट में अपील कर दी. सेशन कोर्ट में की गई अपील का फ़ैसला साल 1999 में उनके पक्ष में आया. जिस पर हम हाईकोर्ट गए. साल 2000 में हाई कोर्ट ने हमारे पक्ष में फ़ैसला सुनाया, तो वे सुप्रीम कोर्ट चले गए.''
कैलाश कुमार बताते हैं कि 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया था. "जिसके बाद, हमें वित्त विभाग में फ़ैसले के अनुसार काग़ज़ात को सही कराने और इसे अपने नाम पर स्थानांतरित कराने में दो साल लग गए थे. दो साल बाद जब हम ज़मीन पर क़ब्ज़ा लेने गए, तो वहां हथियारबंद लोग मौजूद थे. जिन्होंने हमें डराया धमकाया."
कैलाश कुमार का दावा है कि हालात इस हद तक पहुंच गए हैं कि उन्हें अपना गृह जिला भी छोड़ना पड़ा, जबकि उनके चाचा जवाहरलाल को पाकिस्तान छोड़ कर जाना पड़ा. वो कहते हैं कि साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने हिंदू ज़मीन पर क़ब्ज़े पर स्वत: संज्ञान से एक्शन लिया था. कैलाश का दावा है कि साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ज़मीनों पर क़ब्ज़ा दिलाने का आदेश दिया था.
वो कहते हैं, "हमें प्रशासन और पुलिस वहां लेकर गई, ज़मीनों का क़ब्ज़ा दिलाया गया. प्रशासन ने हम से क़ब्ज़ा लेने के काग़ज़ात पर हस्ताक्षर कराये. लेकिन कुछ दिनों बाद एक बार फिर ज़बरदस्ती हमें ज़मीनों से बाहर करके और जमीनों पर क़ब्ज़ा करके अदालत में कोई और मुक़दमा कर दिया गया."

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कैलाश कुमार का दावा है कि उन्होंने अपनी सुरक्षा और धमकियों के ख़िलाफ़ याचिकाएं दायर की हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.
साल 2018 में सिंध पुलिस के पास दायर की गई एक याचिका पर पुलिस की तरफ़ से की गई जांच में कहा गया है कि क़ंबर शाहदादकोट की पुलिस ने अदालत के आदेश के बावजूद क़ानून पर उचित तरीक़े से अमल नहीं किया.
जांच में तत्कालीन डीएसपी और एसएचओ के ख़िलाफ़ कार्रवाई की सिफ़ारिश की गई थी. सिफ़ारिशों में कहा गया था कि जिला पुलिस अधिकारी पीड़ित परिवार से संपर्क करके, उन्हें हर संभव कानूनी सहायता और सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया जाना चाहिए. जांच में यह भी कहा गया था कि पीड़ित परिवार की शिक़ायतों पर उचित कार्रवाई नहीं की गई थी.
एसएसपी क़ंबर शाहदादकोट से संपर्क किया गया. उनके पास मैसेज भी भेजा गया था, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
इम्तियाज़ ब्रोही का दावा है कि इस पूरे मामले को ग़लत तरीक़े से पेश किया जा रहा है. "हमने कभी किसी को धमकी नहीं दी है. हम मामले को कोर्ट में लेकर गए हैं. कैलाश कुमार को आरोप लगाने की बजाय कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए. यह ज़मीन हमारे पूर्वजों ने कैलाश कुमार के दादा-दादी से समझौते के तहत ख़रीदी थी.
प्रशासन क्या कहता है?
क़ंबर के डिप्टी कमिश्नर शहज़ाद जावेद नबी खोसा के मुताबिक़, "प्रशासन पूरे मामले को काफ़ी गंभीरता से ले रहा है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रशासन ने कैलाश कुमार के परिवार को ज़मीन का क़ब्ज़ा दिला दिया था. इसके बाद दूसरे पक्ष ने सेशन जज की अदालत में क़ब्ज़े का कोई मुक़दमा दायर कर दिया है."
उन्होंने कहा, "हमने फ़ैसला कर लिया है कि जब तक अदालत का फ़ैसला नहीं आता, तब तक सरकार इन ज़मीनों को अपने क़ब्ज़े में रखेगी. इन ज़मीनों पर जो भी फ़सल होगी वह सरकार के नियंत्रण में होगी."
जावेद नबी खोसा का कहना है कि पुलिस ने कैलाश कुमार के परिवार को सुरक्षा भी मुहैया कराई है. उन्होंने कहा, "अगर उन्हें लगता है कि उनको दी गई सुरक्षा कम है, तो वे इसके लिए आवेदन कर सकते हैं. हम उनकी सुरक्षा बढ़ाने के लिए तैयार हैं. क़ानून में उन्हें जिस भी मदद की ज़रूरत होगी, वह उन्हें मिलेगी."
कैलाश कुमार के चाचा जवाहरलाल कहते हैं, ''ज़मींदार होते हुए भी हिंदू होना हमारा गुनाह है. हम हाथ जोड़कर कहते हैं, कि हमारे हाल पर रहम करो. हम बहुत सज़ा भुगत चुके हैं. अब इससे ज़्यादा परेशानी बर्दाश्त करना हमारे बस में नहीं है."
इम्तियाज़ ब्रोही कहते हैं, कि "हमारे जिले में हिंदू होने की वजह से किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता है. हम ऐसा सोच भी नहीं सकते और हम शांति और धार्मिक सहिष्णुता में विश्वास रखने वाले लोग हैं."
"मैं दामन फ़ैला कर कहती हूं हमारे ऊपर रहम करो"
कैलाश कुमार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के पक्ष में आए फ़ैसले ने और मुश्किलें खड़ी कर दी थीं. उन्होंने कहा, "क़ंबर शाहदादकोट शहर में जो हमारा घर था वो तो हम मुक़दमे के ख़र्च पूरा करने के लिए पहले ही बेच चुके हैं. पहले हम जैकबाबाद और फिर लड़काना चले गए, लेकिन जब यहां आ कर भी धमकियां आना बंद नहीं हुई तो हमें कराची आना पड़ा."
उनका दावा है कि उनकी ज़मीन की वार्षिक आय कम से कम भी जोड़े तो 3 करोड़ है. "मैं ख़ुद मजबूरी में 30 हज़ार रुपए महीने की सैलरी पर शिक्षक हूं.दो छोटे भाइयों को एक कारख़ाने में 12 हज़ार और 10 हज़ार रुपये प्रति माह पर एक फ़ैक्ट्री में लगाया है. उनकी पढ़ाई ख़त्म हो चुकी है."
कैलाश कुमार का कहना है कि उनके लिए जॉब जारी रखना संभव नहीं है. "हमें सार्वजनिक रूप से धमकियां मिलती हैं. हमें कहा जाता है कि हम हिंदू हैं, हम किसी का कुछ नहीं कर सकते. मैं जवाब देता हूं कि मैं भी पाकिस्तानी और सिंधी हूं. अपने देश और ज़मीन से प्यार भी करता हूं."
जवाहरलाल कहते हैं, ''मुझे इतनी धमकी दी गई कि मजबूरी में मुझे पाकिस्तान छोड़ना पड़ा. पाकिस्तान छोड़ने के बाद और भी बेइज्ज़ती और बदनामी हुई. सुप्रीम कोर्ट से जब फ़ैसला आया तो एक उम्मीद जगी कि शायद अब मुश्किलें दूर हो जाएंगी. लेकिन हमें हमारी ज़मीन दिखाई गई और फिर वापस ले ली गई. हम अभी भी इस ज़मीन के लिए लड़ रहे हैं."
सूरी बी कहती हैं, "मैं दामन फैला कर भीख मांगती हूं, हम पर रहम करो. हमारे साथ इंसाफ़ करो हमारा कोई जुर्म नहीं है. सिवाय इसके कि हम हिंदू हैं. हिन्दू होना हमारे लिए अपराध हो गया है."
इम्तियाज़ ब्रोही का कहना है, "उत्पीड़ित बन कर हमारी ख़रीदी गई ज़मीन को हथियाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.हमारे क्षेत्र में हिंदुओं के साथ ऐसा कुछ नहीं है. इनकी गिनती क्षेत्र के ताक़तवर समुदाय में होती है, उत्पीड़ित बनने की कोशिश करने के बजाय उनको क़ानूनी लड़ाई लड़नी चाहिए."
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