ओवैसी की रैलियों में भीड़ वोटों में तब्दील क्यों नहीं हुई?

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- Author, कुमारी स्नेहा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में काफ़ी ज़ोर लगाया था, मगर चुनाव आयोग के आँकड़ों के मुताबिक़ उनकी पार्टी को महज़ 0.49% वोट मिले है, जो कि नोटा को मिले वोटों - 0.69 प्रतिशत - से भी कम है.
ओवैसी के ज़्यादातर उम्मीदवारों को पाँच हज़ार वोट भी नहीं मिले हैं. ऐसे में साफ़ समझा जा सकता है कि ओवैसी की पार्टी को प्रदेश में मुसलमानों का भी वोट नहीं मिला.
ओवैसी की पार्टी ने कुल 100 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे. उन्होंने कोशिश की थी कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में दलित-मुसलमान समीकरण बन सके लेकिन ऐसा लग रहा है कि उनकी ये कोशिश कामयाब नहीं हो पाई.
हालांकि, उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले 2020 में ओवैसी की पार्टी ने पड़ोसी राज्य बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया था. बिहार के सीमांचल इलाके में 24 सीटें हैं और इनमें से एआईएमआईएम पांच सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही, जिसके बाद ये क़यास लगने लगे कि उनकी पार्टी बिहार-यूपी जैसे प्रदेशों में मुस्लिम वोटरों को एक नया नेतृत्व दे सकती है.
वैसे बिहार के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में भी ओवैसी सुर्खियों में रहे, लेकिन जनता ने वहाँ उन पर भरोसा नहीं किया.
यूपी विधानसभा के नतीजे के बाद ओवैसी ने कहा, ''उत्तर प्रदेश की जनता ने बीजेपी को सत्ता सौंपी है और हम इसका सम्मान करते हैं. हमारी पार्टी के लोगों ने यूपी चुनाव में जो कड़ी मेहनत की, उनको धन्यवाद देता हूँ. उत्तर प्रदेश के जिन लोगों ने हमें वोट किया, उनके प्रति आभार जताते हैं. जो भी नतीजे आए हैं, वे हमारी चाहत के हिसाब से नहीं हैं. लेकिन हमारी कोशिश जारी रहेगी.''
राज्य में भाजपा की जीत पर शिव सेना नेता संजय राउत ने ओवैसी पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, ''मायावती और ओवैसी ने भाजपा की जीत में भूमिका निभाई. इसलिए उन्हें पद्म विभूषण और भारत रत्न दिया जाना चाहिए.''
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जबकि, बिहार के एआईएमआईएम विधायक अख्तरूल ईमान ने ट्वीट किया, '' हम ओवैसी साहब और एआईएमआईएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. इंशा अल्लाह, हम समाज के वंचित, कमजोर और अल्पसंख्यक वर्ग के लिए काम करते रहेंगे.''

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ट्विटर पर एआईएमआईएम के प्रदर्शन और ओवैसी को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. एक ओर उनके समर्थक भविष्य में भी उनके साथ बने रहने की बात कर रहे हैं जबकि एक वर्ग मजाक भी बना रहा है.
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वहीं, राज्य में भाजपा को मिली जीत पर अभिनेता व ट्रेड एनालिस्ट कमाल आर खान ने ओवैसी पर आरोप लगाते हुए कहा, '' मैं सभी भारतीय मुस्लिमों के लिए फिर से यह बात दोहराना चाहता हूं कि ओवैसी भाजपा के एजेंट हैं. वह बीजेपी के पेरोल पर हैं. इसलिए उनके चक्कर में बेवकूफ न बनें.''
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ट्विटर पर तारीक़ खान नाम के एक यूजर ने लिखा, '' यूपी में मुसलमानों को राजनीतिक रूप से संगठित करने के लिए असदुद्दीन ओवैसी को बधाई. कई मुसलमान ओवैसी के साथ खड़े थे, लेकिन बीजेपी की जीत के डर से सपा को वोट दिया. उनका दिमाग ओवैसी और अन्य अल्पसंख्यक राजनीतिक संगठनों के साथ है.''
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वहीं, नरेन मुखर्जी नाम के एक यूजर ने लिखा, ''असदुद्दीन ओवैसी के एआईएमआईएम को 0.49 प्रतिशत वोट मिले. यहां तक कि नोटा को भी उनसे ज्यादा 0.69 प्रतिशत मत मिले. कई रैलियों के बाद भी 100 में से 99 उम्मीदवारों की जमानत ज़ब्त हो गई.''
भीड़ वोट में क्यों नहीं बदली
ओवैसी रैलियों में लोगों की भीड़ आने लेकिन इसके वोट में तब्दील होने के पीछे की वजह बताते हुए उर्दू डेली जदीद खबर के संपादक मासूम मुरादाबादी ने कहा, ''ओवैसी की रैलियों में बड़ी संख्या में लोग आ रहे थे और इन वोटर्स को ओवैसी से हमदर्दी भी थी. क्योंकि ओवैसी जो मुद्दे उठा रहे थे उस पर कोई सेक्युलर पार्टी बात नहीं कर रही थी. मिसाल के तौर पर, धर्म संसद का मामला था या घृणा वाले बयानों का. इस पर ओवैसी के अलावा किसी ने बात नहीं की. अखिलेश यादव भी इससे दूरी बनाए हुए थे और मायावती ने तो इस पर बिल्कुल बात नहीं की.''
उन्होंने कहा कि मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा का है और जो कुछ पिछले पांच साल के दौरान हुआ है उत्तर प्रदेश में वह सबको मालूम है. ओवैसी ने इस पर बातें की. इसकी वजह से उनकी बातों के प्रति लोग आकर्षित तो थे और लोग उन्हें सुनने भी आते थे. लेकिन मतदाता जब बूथ पर गए तो उन्होंने यह देखा कि जीतने वाला उम्मीदवार कौन है.
मुरादाबादी ने कहा,"एआईएमआईएम को अभी इस प्रदेश में जमीन पर संगठन मजबूत करने की जरूरत है. इनके पास पार्टी का जो ढांचा चाहिए वह इतनी जल्दी नहीं बनता है. ओवैसी के पास संगठन की मशीनरी की कमी है. संगठन बनाने में वर्षों लगते हैं और इसकी कमी की वजह से पार्टी वोटर को आश्वस्त नहीं कर पाई कि उनका उम्मीदवार जीतने वाला उम्मीदवार है.''

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थित वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिज़वी का कहना है कि प्रदेश के मुसलमानों को लग रहा था कि उन्हें परेशान किया जा रहा है और इसलिए वो एक मज़बूत विकल्प की तरफ देख रहे थे, जो कि समाजवादी पार्टी थी, ना कि ओवैसी की पार्टी.''
उन्होंने कहा, ''इसे अफ़वाह मानिए या सच्चाई मुसलमान यह भरोसा नहीं कर पाए कि ओवैसी मुस्लिम नेतृत्व दे पा रहे हैं. इससे उलट मुसलमान यह मानता रहा कि वह भाजपा को फायदा पहुंचाने और मुसलमानों को बांटने के लिए चुनाव में हैं.''
शादाब कहते हैं कि चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि ओवैसी स्वतंत्र रूप से जिस मुस्लिम नेतृत्व की बात कह रहे थे, उसका उभार नहीं हुआ, और इस बात की संभावना भी कम लगती है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में वो बड़ा करिश्मा कर पाएंगे.
ऐसे में आगे चलकर मुसलमान वोटरों का रूझान किस दल के साथ रहेगा?
शादाब रिज़वी कहते हैं, "मुसलमान बहुजन समाज पार्टी के साथ कई बार रहे हैं लेकिन यह पार्टी भी अब कमज़ोर हो गई है. मुसलमानों ने सपा को वोट किया, मगर बहुत मुमकिन है कि अगले लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियाँ भी कमज़ोर होंगी और कांग्रेस मुख्य लड़ाई में आएगी.''
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