पीएम मोदी ने 2024 चुनाव पर 'ज्ञानियों' को दी बोलने की चुनौती, प्रशांत किशोर का आया जवाब

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पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद अब अटकलें अगले चुनाव पर लगने लगी हैं जिनमें सबसे ज़्यादा चर्चा 2024 के आम चुनाव की हो रही है जब दिल्ली की सत्ता के लिए सियासी संग्राम छिड़ेगा. और ये चर्चा बस कोरी अटकलबाज़ी नहीं, एक गंभीर विमर्श में बदल गई है क्योंकि स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुद्दे को छेड़ दिया है और राजनीतिक पंडितों को चुनौती तक दे डाली है.
उनमें से एक बड़े राजनीतिक पंडित ने प्रधानमंत्री को उसका जवाब भी दिया है. जाने-माने चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कहा है कि प्रधानमंत्री ने जो बयान दिया है वो उनकी एक चालाक कोशिश है.
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प्रधानमंत्री ने क्या कहा था
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार शाम को दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय में पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने नतीजों के बाद भाषण दिया.
वहाँ उन्होंने कहा, "2019 के चुनाव नतीजों के बाद, कुछ पॉलिटिकल ज्ञानियों ने कहा था. जब हम दोबारा जीतकर आए तो कुछ ज्ञानियों ने कहा था, कि भई 2019 की जीत में क्या है, ये तो 2017 में ही तय हो गई थी क्योंकि 2017 में यूपी का रिज़ल्ट आया था. मैं मानता हूँ कि इस बार भी ये ज्ञानी ज़रूर कहने की हिम्मत करेंगे कि 2022 के नतीजों ने 2024 के नतीजे तय कर दिए हैं."
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प्रधानमंत्री के इस भाषण के अलावा नतीजों के दिन पार्टी के कई दिग्गज नेताओं ने खुलकर 2024 के चुनाव को लेकर दावे करने शुरू कर दिए.
पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने 2024 के चुनाव की भूमिका तैयार करनी शुरू कर दी है.
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई ने नतीजे आने के बाद गुरुवार को ही कहा, "पांच राज्यों में से चार राज्यों में बीजेपी की सरकार बनने वाली है, ये स्पष्ट है कि पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी 2024 में सरकार बनाने जा रही है. मुझे विश्वास है कि हम 2023 में कर्नाटक की सत्ता में वापसी करेंगे."
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केंद्रीय मंत्री आर के सिंह ने भी गुरुवार को नतीजे आने के बाद कहा, "उत्तर प्रदेश में योगी जी की सरकार ने ईमानदार शासन दिया और गुंडागर्दी बंद हो गई. लोगों को ईमानदार विकल्प मिल गया है. स्पष्ट है कि 2024 में क्या होगा. नरेंद्र मोदी जी और बीजेपी के सामने और कोई है ही नहीं."
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असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा ने भी प्रधानमंत्री मोदी की 2024 के चुनाव वाली टिप्पणी को ट्वीट किया है.
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केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने भी एक टीवी चैनल से कहा, "बीजेपी के लिए हर चुनाव, वो चाहे म्युनिसिपल चुनाव हो या ज़िला पंचायत चुनाव या विधानसभा का चुनाव - हर चुनाव को नरेंद्र मोदी के लिए एक लिटमस टेस्ट की तरह पेश किया जाता है, उनके नेतृत्व को 2014 में भारी समर्थन मिला, 2019 में भी उन लोगों की आशाएँ टूट गईं जब मोदी की वापसी हुई, और 2024 में भी हम यही चर्चा करेंगे कि कैसे मोदी का जादू चला और कैसे वो एक बार फिर प्रधानमंत्री बने."
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प्रशांत किशोर ने किया सावधान - साहेब जानते हैं!
2022 के यूपी के नतीजे को दिल्ली के 2024 के चुनाव से जोड़ने के पीएम मोदी के इस बयान के अगले दिन प्रशांत किशोर ने एक ट्वीट किया है.
प्रशांत किशोर ने इस ट्वीट में लिखा है, "भारत की लड़ाई 2024 में लड़ी जाएगी और उसका फ़ैसला तभी होगा, प्रादेशिक चुनावों में नहीं. साहेब ये जानते हैं! और इसलिए ये प्रदेश के चुनावों के इर्द-गिर्द एक ऐसा उन्माद खड़ा करने का चालाक प्रयास है जिससे कि विपक्ष के ऊपर एक निर्णायक मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली जाए. इस फ़र्ज़ी अफ़साने के चक्कर में ना फँसें."
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प्रशांत किशोर ने इससे पहले इस साल जनवरी में भी 2024 के चुनाव की चर्चा करते हुए इसी तरह की बात की थी.
जनवरी में टीवी चैनल एनडीटीवी के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "ये बहुत मुमकिन है कि बीजेपी (विधानसभा चुनाव के) इस राउंड में सब जीत जाए और फिर भी 2024 का चुनाव हार जाए. 2012 में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश जीता था, कांग्रेस ने उत्तराखंड और मणिपुर, अकाली दल ने पंजाब, मगर 2014 के चुनाव में नतीजे बिल्कुल अलग आए."
इस इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि 'दक्षिण भारत में नाम मात्र का अस्तित्व था और बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी उनकी उपस्थिति बहुत कम थी जहाँ लोकसभा की लगभग 200 सीटें हैं.'

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उन्होंने इस इंटरव्यू में कहा कि ''कांग्रेस अगर अपने आपको फिर से एकजुट करती है, और अपने संसाधनों और रणनीति में नई जान डालती है, तो वो या पार्टियों का गठबंधन, अभी जो हालत है उसके हिसाब से भी 250-260 सीटों तक पहुँच सकते हैं.''
उन्होंने साथ ही कहा था कि इसके लिए विपक्षी पार्टियों को उत्तर और पश्चिम में 100 सीटें जीतनी पड़ेंगी.
मगर प्रशांत किशोर ने साथ ही सावधान भी किया था कि विपक्षी पार्टियों का केवल एक साथ जुट जाना ही काफ़ी नहीं होगा.
उन्होंने कहा था- "आपके पास एक नैरेटिव होना चाहिए, और एक सामंजस्य वाला संगठन."
प्रशांत किशोर ने पिछले साल दिसंबर में कांग्रेस की प्रासंगिकता को लेकर भी एक ट्वीट किया था.
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तब उन्होंने कहा था, "कांग्रेस जिस विचार और जगह का प्रतिनिधित्व करती है, वो एक सशक्त विपक्ष के लिए ज़रूरी है. मगर कांग्रेस नेतृत्व किसी व्यक्ति का दैवीय अधिकार नहीं है, ख़ास तौर पर तब जबकि पार्टी पिछले 10 सालों में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा चुनाव हार चुकी है. विपक्ष का नेतृत्व कौन करेगा, इसका फ़ैसला लोकतांत्रिक तौर पर होने दीजिए."
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