प्रशांत किशोरः ममता से लेकर स्टालिन तक, राजनेताओं को चुनाव जिताने वाले शख़्स

प्रशांत किशोर

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    • Author, सौतिक बिस्वास
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रशांत किशोर कोई साधारण राजनीतिक रणनीतिकार नहीं हैं.

प्रशांत किशोर ख़ुद ये कहते हैं कि वो न टीवी पर समाचार देखते हैं और न ही अख़बार पढ़ते हैं. वो न ईमेल लिखते हैं और न ही नोट्स लेते हैं. बीते एक दशक से उन्होंने लैपटॉप तक का इस्तेमाल नहीं किया है.

उन्होंने मुझे बताया कि वो सिर्फ़ एक ही गैजेट का इस्तेमाल करते हैं और ये उनका फ़ोन है.

प्रशांत किशोर के ट्विटर पर पाँच लाख के क़रीब फॉलोवर हैं और वहाँ उन्होंने बीते तीन सालों में सिर्फ़ 86 ट्वीट किए हैं.

वो कहते हैं, ''मेरा पेशे और जीवन के बीच संतुलन के सिद्धांत में कोई यक़ीन नहीं है और अपने काम के बाहर मेरी कोई ज़िंदगी नहीं है.''

प्रशांत किशोर

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नेटफ़्लिक्स, डिज़्नी और शाहरुख़ ख़ान तक से आया ऑफ़र

प्रशांत किशोर को भारत का सबसे चर्चित राजनीतिक सलाहाकार और रणनीतिकार कहा जाता है. हालाँकि वो इस विवरण को पसंद नहीं करते हैं.

उन्हें ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है, जिन्होंने चुनाव जीतने और लोगों की राय को प्रभावित करने में महारत हासिल कर ली है और नेता जिनकी मुट्ठी में रहते हैं.

साल 2011 के बाद से प्रशांत किशोर और उनकी राजनीतिक सलाह देने वाली फ़र्म ने नौ चुनावों में अलग-अलग पार्टियों के लिए काम किया है. इनमें से आठ में उन्होंने जीत हासिल की है.

उनके पास अपने जीवन पर फ़िल्म बनवाने के लिए डिज़्नी, नेटफ़्लिक्स और यहाँ तक कि बॉलीवुड के सुपरस्टार शाहरुख ख़ान की तरफ़ से प्रस्ताव आए हैं, लेकिन उन्होंने सभी को इनकार किया है.

प्रशांत किशोर सभी रंगों और विचारों के राजनीतिक दलों को अपनी सेवाएँ दे चुके हैं. साल 2014 में वो नरेंद्र मोदी के साथ थे और हाल ही में उन्होंने मोदी की चिर प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में जीत हासिल करने में मदद की.

प्रशांत किशोर

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'हो सकता है कुछ ऐसा करूँ जिसका राजनीति से कोई वास्ता न हो'

प्रशांत किशोर के समर्थक कहते हैं कि वो ऐसे व्यक्ति हैं, जो जहाँ हाथ रखते हैं कामयाबी मिलती है. वहीं, उनके आलोचकों का तर्क है कि वो बहुत सावधानी से अपने ग्राहक चुनते हैं और ऐसे दलों को ही अपने सेवाएँ देते हैं, जिनके जीतने की संभावना अधिक होती है.

मई में 44 वर्षीय प्रशांत किशोर ने कहा था, ''मैं जो कर रहा हूँ, अब बहुत हो गया, अब मैं कुछ अलग करूँगा.''

लेकिन हाल के दिनों में वो फिर से सुर्ख़ियों में हैं. उन्होंने विपक्ष के मुख्य नेताओं से मुलाक़ात की है, जिनमें कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी शामिल हैं. इन मुलाक़ातों के बाद ये कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रशांत किशोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ विपक्ष को एकजुट कर रहे हैं. उनके कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के कयास भी लगाए गए हैं.

हालाँकि प्रशांत किशोर कहते हैं कि ये सब कयास ही हैं.

वो कहते हैं, ''मैं निश्चित तौर पर वो तो नहीं करूंगा, जो मैं पहले कर रहा था. मेरे पास कुछ विकल्प हैं लेकिन मैंने अभी तक निर्णय नहीं लिया है. ऐसा हो सकता है कि मैं ऐसा काम करूँ, जिसका राजनीति से कोई वास्ता ही न हो. जैसे ही मैं किसी निर्णय पर पहुँच जाऊँगा, इसकी औपचारिक जानकारी दूँगा.''

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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'बीजेपी को 2024 में हराना असंभव नहीं'

भारत में आम चुनाव अभी तीन साल दूर हैं और विपक्षी दल प्रधानमंत्री को कोई ख़ास चुनौती देते नहीं दिख रहे हैं.

प्रशांत किशोर कहते हैं कि बीजेपी उतना ताक़तवर राजनीतिक दल नहीं है, जितना उसे माना जाता है.

वो कहते हैं, ''किसी राजनीतिक दल के लिए, चाहे वो नया हो या पुराना, अकेले या दूसरे दलों के साथ मिलकर बीजेपी को चुनौती पेश करने की जगह मौजूद है.''

80 के दशक के बाद से कांग्रेस का पतन हो रहा है. उसकी सीटें कम हो रही हैं और वोट शेयर भी.

2019 के आम चुनावों में कांग्रेस को 20 प्रतिशत वोट ही मिले थे और पार्टी सिर्फ़ 52 सीटें ही जीत पाई थी. ये आम चुनावों में कांग्रेस की लगातार दूसरी हार थी. लेकिन पार्टी के पास अभी भी संसद के दोनों सदनों में क़रीब 100 सांसद और देश की अलग-अलग विधानसभाओं में 880 विधायक हैं. ये भारत में बीजेपी के ख़िलाफ़ सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है.

वीडियो कैप्शन, NRC पर क्या बोले प्रशांत किशोर?

प्रशांत किशोर कहते हैं, ''मैं टिप्पणी करने वाला कोई नहीं हूँ कि कांग्रेस पार्टी में क्या ग़लत हो रहा है. लेकिन मुझे लगता है कि पार्टी के चुनावी प्रदर्शन से जो दिख रहा है, समस्या उससे कहीं अधिक गंभीर है. पार्टी की समस्याएँ उसके ढाँचे को लेकर अधिक हैं.''

एक नया दल बनाने की बात करना आसान है, लेकिन बनाना मुश्किल. प्रशांत किशोर कहते हैं, ''विपक्ष का तीसरा मोर्चा बनाना न ही संभव है और ना ही टिकाऊ क्योंकि एक टूटा-फूटा गठबंधन कुछ ऐसा नया नहीं करेगा, जिसे जनता पहले से ही ख़ारिज न कर चुकी हो.''

इस सबको बावजूद प्रशांत किशोर को लगता है कि 2024 में तीसरी बार सत्ता में आने का प्रयास करने वाली बीजेपी को हराना असंभव नहीं है.

वो कहते हैं, ''विकल्प और पर्याप्त उदाहरण मौजूद हैं, जो दिखाते हैं कि सही रणनीति और प्रयासों से बीजेपी को हराया जा सकता है.''

पश्चिम बंगाल

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ऐसे काम करती है प्रशांत किशोर की टीम

प्रशांत किशोर कहते हैं कि भारत में चुनाव जीतने वाले दल भले ही वो कितने लोकप्रिय ही क्यों ना हो, आमतौर पर 40-45 फ़ीसदी से अधिक वोट हासिल नहीं करते हैं. 2019 चुनावों में बीजेपी ने 38 प्रतिशत वोट हासिल करके 300 से अधिक सीटें जीत ली थीं.

वो कहते हैं, ''दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के सात प्रांतों की 200 सीटों में से बीजेपी 40 से अधिक सीटें नहीं जीत सकी है क्योंकि यहाँ क्षेत्रीय दलों ने बीजेपी को मज़बूत नहीं होने दिया है.''

प्रशांत किशोर का मानना है कि बाक़ी बची 340 सीटें देश के उत्तर और पश्चिमी क्षेत्र में हैं, जहाँ बीजेपी प्रभावशाली है.

वो कहते हैं, ''बीजेपी को चुनौती देने वाले दल को यहाँ 150 सीटों का चयन करके बीजेपी की संख्या को कम करना होगा.''

प्रशांत किशोर जिस तरह काम करते हैं, उससे भारत में राजनीतिक सलाहकारों के काम की झलक मिलती है. उनकी कंपनी आईपैक (इंडियन पॉलीटिकल एक्शन कमेटी) में चुनावों के समय 4,000 तक लोग काम कर रहे होते हैं. ये जिस पार्टी के लिए काम करते हैं, एक तरह से उसी में घुस जाते हैं.

प्रशांत किशोर कहते हैं, ''हम एक तरह से पार्टी की ताक़त बढ़ाने वाले फ़ैक्टर के रूप में काम करते हैं. एक पार्टी को चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए जो भी करना ज़रूरी होता है, हम उसमें मदद करते हैं. हमारे काम से कुछ फ़र्क तो पड़ता है लेकिन ये कितना होता है, इसकी सटीक गणना करना मुश्किल है.''

प्रशांत किशोर एक दशक से राजनीतिक सलाहकार के रूप में काम कर रहे हैं. वे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के लिए काम कर चुके हैं. इस समय वे अमरिंदर सिंह के लिए काम कर रहे हैं.

उन्होंने यह समझा है कि राजनीतिक रैली में भारी भीड़ का मतलब ये नहीं होता कि नतीजे भी अच्छे होंगे. चुनावों का ख़र्च बढ़ रहा है जिसकी वजह से राजनीति में प्रवेश भी अब आसान नहीं रह गया है. भारत अब एक राजनीतिक समाज बन गया है, जहाँ लोगों का ध्रुवीकरण हो रहा है.

बिहार की महिला वोटर

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'राजनीति मेरा मज़बूत पक्ष नहीं'

भारत में 80 करोड़ से अधिक मतदाता हैं, उनके मतदान विकल्पों से क्या पता चलता है?

इस सवाल के जवाब में प्रशांत किशोर कहते हैं, ''कल्याणकारी योजनाओं के लाभ, पहचान, सशक्तीकरण, संसाधनों तक पहुँच और कई दूसरी सीधे न नज़र न आने वाली चीज़ें. मैं सही अनुमान नहीं लगा सकता हूँ.''

वो कहते हैं, ''मैं कभी भी मतदाताओं का दूसरा अनुमान लगाने का प्रयास नहीं करता हूं. मैं सिर्फ़ ऐसा सिस्टम विकसित करता हूँ, जिससे ये पता चल सके कि लोग क्या बात कर रहे हैं. लोगों को सुनने से जो नई जानकारियाँ मिलती हैं, वो हमें हमेशा चौंकाती हैं और हमें विनम्र बनाती हैं.''

साल 2015 में उनकी टीम बिहार के 40 हज़ार गाँवों तक पहुंची थी ताकि ये पता लगाया जा सके कि लोगों की समस्याएँ क्या हैं. बिहार भारत के सबसे ग़रीब राज्यों में से एक है और प्रशांत किशोर की जन्मभूमि भी है.

वो बताते हैं, ''बिहार में सबसे बड़ी समस्या ख़राब नालियाँ थीं. थानों में हर पाँचवीं शिकायत नाली से शुरू हुए विवाद को लेकर थी.''

पिछले साल पश्चिम बंगाल के चुनावों के दौरान प्रशांत किशोर ने एक हेल्पलाइन शुरू करवाई, जहाँ लोग अपनी शिकायत सुना सकते थे. इस हेल्पलाइन पर 70 लाख लोगों ने फ़ोन किया.

उनके मुताबिक़ अधिकतर शिकायतें जाति प्रमाण पत्र और दूसरे प्रमाण पत्रों के मिलने में देरी और इससे जुड़े भ्रष्टाचार को लेकर थीं. इन शिकायतों पर कार्रवाई करते हुए सरकार ने छह सप्ताह के भीतर 26 लाख प्रमाण पत्र जारी किए.

अपनी कामयाबी के बावजूद प्रशांत किशोर को लगता है कि राजनीति उनका मज़बूत पक्ष नहीं है. वो कहते हैं, ''मैं राजनीति को बहुत अच्छे से नहीं समझता हूँ. मेरी सबसे बड़ी ताक़त व्यावहारिक बुद्धि है और ध्यान से सुनना है. मुझे दबाव में काम करना पसंद है.''

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