इमरान ख़ान की सरकार गिरी तो भारत पर क्या होगा असर?

इमरान खान

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    • Author, सारा मिश्रा
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ विपक्ष दलों के अविश्वास प्रस्ताव लेकर आने से वहां राजनीतिक तनाव बढ़ गया है. अब तो सत्ता में बैठे कई सहयोगी भी इमरान ख़ान का साथ छोड़ रहे हैं.

इमरान ख़ान ने 27 मार्च को सत्तारुढ़ पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) पार्टी की एक ऐतिहासिक सभा का आयोजन किया. इसमें उन्होंने अपना मज़बूत चेहरा दिखाने की कोशिश की.

रैली में उन्होंने आरोप लगाया कि "पाकिस्तान में विदेशी धन के सहारे सरकार गिराने की कोशिश की जा रही है." हालांकि विपक्ष ने इमरान ख़ान के बयान को सिरे से ख़ारिज कर दिया.

अब सारा ध्यान पाकिस्तान के निचले सदन नेशनल असेंबली पर चला गया है, जिसके एजेंडे में इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव है. इस प्रस्ताव को 28 मार्च को पेश किया गया. उम्मीद है कि इस प्रस्ताव पर इस हफ़्ते के अंत तक मतदान होगा.

इस बीच, भारत के जानकारों का मानना है कि ख़ान सरकार के ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का नतीजा चाहे जो हो, पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध तनावपूर्ण बने ही रहेंगे.

घरेलू कारणों के कारण, न तो नई दिल्ली और न ही इस्लामाबाद की नीति में कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना दिखती है.

पाकिस्तान के विपक्षी दलों के नेता

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पाकिस्तान के तेज़ी से बदलते घटनाक्रम

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली का यह सत्र 28 मार्च को शुरू हुआ. और तब इमरान ख़ान की सरकार के ख़िलाफ़ पहले से इंतज़ार किए जा रहे अविश्वास प्रस्ताव को पेश किया गया.

विपक्ष के नेता शहबाज़ शरीफ़ ने इस प्रस्ताव को पेश करने का अनुरोध किया. इसके पक्ष में निचले सदन के 161 सांसदों के वोट मिले. उसके बाद सदन के उपाध्यक्ष क़ासिम ख़ान सूरी ने घोषणा की कि इस प्रस्ताव पर बहस 31 मार्च को शुरू होगी.

पाकिस्तान के संविधान के अनुसार, एक बार अविश्वास प्रस्ताव लाने के बाद उसे 14 दिनों के भीतर नेशनल असेंबली में ज़रूर पेश करना होता है. हालांकि नेशनल असेंबली के अध्यक्ष तय समयसीमा के भीतर इस प्रस्ताव को पेश करने में विफल रहे. उसके बाद आलोचना के बावजूद बैठक को 31 मार्च तक स्थगित करने का फ़ैसला किया.

पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, यह प्रस्ताव पेश होने के बाद सरकार मतदान के लिए 'अधिकतम' यानी सात दिनों का वक़्त लेगी.

प्रस्ताव पेश होने के बाद, जम्हूरी वतन पार्टी ने सत्तारूढ़ गठबंधन का साथ छोड़ने का फ़ैसला लिया. उसके बाद संसद के निचले सदन के कुल 342 सदस्यों में सत्तारूढ़ गठबंधन के सदस्यों की संख्या 178 तक कम हो गई.

पाकिस्तान के प्रमुख अख़बार डॉन के अनुसार, विपक्षी दलों पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ (पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के पास अब 163 सांसदों का समर्थन हो गया है.

सत्ता में बने रहने के लिए इमरान ख़ान की सरकार को कम से कम 172 सांसदों का समर्थन चाहिए. वहीं विपक्ष को भी अविश्वास प्रस्ताव पारित कराकर सरकार गिराने के लिए भी 172 सांसद चाहिए.

नरेंद्र मोदी

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'भारत को बदलाव से ज़्यादा निरंतरता की ज़रूरत'

भारत के कई जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो, जब तक पाकिस्तानी सेना का सत्ता में दख़ल होगा, दिल्ली के साथ इस्लामाबाद के रिश्ते तनावपूर्ण बने रहने की संभावना ज़्यादा है.

भारत के जाने-माने थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फ़ॉर डिफ़ेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस (IDSA) के सीनियर फ़ेलो डॉक्टर अशोक बेहुरिया ने पाकिस्तान की राजनीतिक परिदृश्य को 'म्यूज़िकल चेयर का खेल' क़रार देते हुए कहा है कि भारत के लिए मौजूदा स्थिति में शायद ही कोई बदलाव होगा.

उन्होंने कहा कि विपक्षी पीएमएल-एन और पीपीपी के सत्ता में आ जाने पर 'सेना को ख़ुश करने' की मजबूरी में उन्हें भारत के प्रति अधिक कठोर रुख़ अपनाना होगा इसलिए दिल्ली के प्रति उनके रुख़ में नरमी की संभावना बहुत कम है.

हालांकि, पाकिस्तान की राजनीति के जानकार सुशांत सरीन का मानना है कि जब तक इमरान ख़ान सत्ता में रहेंगे, भारत और पाकिस्तान के बीच सामान्य और सभ्य बातचीत की संभावना बिल्कुल नहीं है. वो कहते हैं कि यदि इमरान ख़ान को सत्ता से हटा देने पर दोनों देशों के रिश्ते कई कारकों पर निर्भर करेंगे.

सुशांत सरीन ने बीबीसी को बताया, "इमरान ख़ान को यदि हटा दिया जाता है, तो जो हो सकता है वो ये कि दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की पूर्ण बहाली हो जाए, 'ट्रैक टू' के लेवल पर बातचीत पर कोई गतिविधि शुरू हो जाए, धीरे-धीरे व्यापार फिर से खोल दिया जाए. हालांकि दोनों के रिश्तों में किसी मौलिक बदलाव की संभावना नहीं है."

मशहूर न्यूज़ चैनल एनडीटीवी की एंकर निधि राज़दान ने अपने प्राइम-टाइम शो में 28 मार्च को कहा कि पाकिस्तान में इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ कई चीज़ें काम कर रही हैं. इस शो में उन्होंने यह भी चर्चा की इमरान ख़ान कैसे पाकिस्तानी सेना के 'डार्लिंग' अब नहीं रहे हैं.

उन्होंने आगे कहा, "पाकिस्तान के मौजूदा घटनाक्रम को भारत गौर से देख रहा होगा. इमरान ख़ान के साथ संबंध ठंडे हो गए हैं. सेना वैसे भी भारत पर गोलियां चलाती है और हमेशा ऐसा करती रहेगी. आगे जो होने वाला है, उससे पाकिस्तान अराजकता, अस्थिरता और अनिश्चितता के चक्रव्यूह में फंसता चला जाएगा."

सैन्य मामलों के जानकार एयर मार्शल (रिटायर्ड) वीके वर्मा ने कहा कि पाकिस्तान के गठन के बाद से ही उसकी सेना देश की 'रीढ़' बनी रही है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में सरकार के बदलने से न तो उसके लोगों और न ही भारत के लिए कुछ बदलेगा.

वहीं रिसर्च करने वाले प्रतीक जोशी का कहना है कि पाकिस्तान की पार्टियों और सेना के बीच इस बात पर 'मौन सहमति' है कि भारत से जुड़े मामलों पर अंतिम फ़ैसला सेना ही करेगी. इसलिए उनके अनुसार, कश्मीर या व्यापार से जुड़े मुद्दों पर बोलने के सिवा पार्टियों से ज़्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती.

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान यूक्रेन संकट का सहारा लेकर रूस और अमेरिका के साथ बेहतर सौदेबाज़ी करना चाहता है, क्योंकि दोनों अपना-अपना गुट बनाना चाहते हैं.

इमरान ख़ान

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इमरान ख़ान ने भारत की तारीफ़ क्यों की?

इस्लामाबाद में चल रहे राजनीतिक दाव-पेच के बीच, हाल में इमरान ख़ान ने यूक्रेन संकट को लेकर भारत की 'आज़ाद विदेश नीति' की काफ़ी प्रशंसा की.

उन्होंने 20 मार्च को कहा, "रूस पर लगे वैश्विक प्रतिबंधों के बावजूद भारत उससे तेल ख़रीद रहा है, क्योंकि उनकी नीति जनता की भलाई के लिए है."

हालांकि, पाकिस्तान के कई लोगों ने भारत की तारीफ़ करने के लिए अपने पीएम की काफ़ी आलोचना की. पाकिस्तान के पत्रकार कामरान शाहिद ने 21 मार्च को ट्विटर पर लिखा कि इमरान ख़ान 'भारत के मीडिया के डार्लिंग' हैं.

भारत को लेकर उनका यह बयान उनकी मौजूदा विदेश नीति से अलग है, जो मुख्यत: कश्मीर मुद्दे पर केंद्रित रही है. उनकी सरकार ने कश्मीर को लेकर भारत से कोई बातचीत न करने का फ़ैसला किया था.

इस बारे में विश्लेषक डॉ. अशोक बेहुरिया ने कहा, "भारत कई मसलों पर बातचीत करना चाहता है, लेकिन पाकिस्तान का ध्यान केवल कश्मीर पर रहा है. पाकिस्तान की इस मामले में खेल बिगाड़ने वाले की भूमिका रही है."

इमरान ख़ान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं. वो ट्विटर पर अक्सर भारत के पीएम और सरकार को निशाना बनाते रहे हैं.

इमरान ख़ान ने इस साल 10 जनवरी को एक ट्वीट में कहा था, "भाजपा और मोदी सरकार की चरमपंथी विचारधारा के तहत, भारत के सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को हिंदुत्व संगठनों ने निशाना बनाया है. मोदी सरकार का चरमपंथी एजेंडा हमारे इलाक़े में शांति के लिए वास्तविक और मौजूदा ख़तरा है."

भारत के कुछ मीडिया संस्थानों ने यह भी कहा कि इमरान ख़ान ने भारत की 'अचानक प्रशंसा' इसलिए की क्योंकि 'पाकिस्तानी सेना उन्हें सत्ता से हटा रही है.'

भारत के एक न्यूज़ चैनल टाइम्स नाउ ने 25 मार्च को अपनी वेबसाइट पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की. इसमें कहा गया, "इमरान ख़ान साफ़तौर पर पाकिस्तानी सेना को निशाना बना रहे हैं, जो उन्हें संकट की इस घड़ी में डंप करने के मूड में है."

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