पाकिस्तान में इमरान ख़ान को सत्ता से हटाने की विपक्ष की कवायद में कितना दम

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- Author, शुमाएला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
आजकल पूरी दुनिया की निगाहें रूस और यूक्रेन की जंग पर हैं. उधर पाकिस्तान में राजनीतिक घटनाक्रम तेज़ी से बदल रहा है. पाकिस्तान के विपक्षी दलों ने इमरान ख़ान सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी कर ली है.
सरकार पर नकारेपन और बदइंतज़ामी के आरोप लगाते हुए विपक्षी दलों ने अपने हमले तेज़ कर दिए हैं. लेकिन इसकी काट के लिए इमरान ख़ान ने पेट्रोल और बिजली के दाम घटा दिए हैं.
लेकिन सवाल यह है कि क्या इमरान ख़ान विपक्ष के राजनीतिक हमले से अपनी सरकार बचा पाएंगे.
ऐसे माहौल में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के कम आय वाले लोगों के एक इलाक़े में शहज़ाद पटरी पर लगी अपनी दुकान में फलों को सजा रहे हैं.
दिन का काफ़ी वक़्त बीत चुका है. ग्राहकों का इंतज़ार किया जा रहा है, लेकिन अभी तक बहुत कम ही ग्राहक आ रहे हैं.
शहज़ाद कहते हैं, ''धंधा पहले कभी इतना मंदा नहीं हुआ था. लोग पहले फ़ुटपाथ के नज़दीक अपनी कार रोक कर फल खरीदा करते थे. लेकिन अब ये इतने महंगे हो गए हैं कि ज़्यादातर लोगों की पहुंच से बाहर हैं.''
शहज़ाद कभी इमरान ख़ान के कट्टर समर्थक और वोटर हुआ करते थे, लेकिन अब उनका उनसे मोहभंग हो चुका है.
वो कहते हैं, ''मैंने पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) को वोट दिया था. इमरान ख़ान से हमें बड़ी उम्मीदें थीं. लेकिन अब हालात देखिए, ज़िंदगी बेहद मुश्किल हो गई है. उन्होंने हमें नाउम्मीद किया है. सत्ता में आने से पहले वो दावा करते थे कि ग़रीबों के साथ हैं. लेकिन उन्होंने हमारे लिए कुछ नहीं किया.''

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विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव
पाकिस्तान में इन दिनों महंगाई अपने चरम पर है. इसके साथ ही इमरान ख़ान की लोकप्रियता में भी उतार-चढ़ाव हो रहा है.
विपक्षी पार्टियां इमरान ख़ान को सत्ता से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने का एलान कर चुकी हैं. अविश्वास प्रस्ताव की अगुआई विपक्षी दलों का गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) कर रहा है.
लाहौर में कुछ सप्ताह पहले हुई अपनी एक बैठक के बाद पीडीएम के मुखिया मौलाना फ़ज़लुर्रहमान ने एलान किया था, ''पीडीएम में शामिल सभी पार्टियां इस अवैध शासक के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने पर सहमत हो गई हैं.''
उन्होंने कहा, ''इसके लिए हम गठबंधन सरकार में शामिल सभी पार्टियों से संपर्क करेंगे. उनसे दरख़्वास्त करेंगे कि वे जनता पर रहम करें और सरकार को समर्थन देना बंद कर दें.''
अविश्वास प्रस्ताव लाने के एलान के बाद विपक्षी दलों ने सत्ताधारी पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ पार्टी को समर्थन दे रहे गठबंधन के सहयोगियों से संपर्क करना शुरू कर दिया.
दरअसल विपक्षी दलों के पास अविश्वास प्रस्ताव पारित कराने के लिए पर्याप्त वोट नहीं है. इसलिए सरकार के सहयोगी दलों को अपने पाले में लाने की कोशिशें की जा रही हैं.
पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक़, अविश्वास प्रस्ताव पारित कराने के लिए सिर्फ़ साधारण बहुमत की ही ज़रूरत होती है.
पाकिस्तान की संसद नेशनल असेंबली में 342 सांसद हैं. इसका मतलब यह हुआ कि अविश्वास प्रस्ताव पारित कराने के लिए सिर्फ़ 172 सांसदों को प्रस्ताव के पक्ष में वोट देना होगा.
इमरान ख़ान की सत्ताधारी पार्टी के पास 155 सीटें हैं. वह सहयोगी दलों के साथ मिल कर सरकार चला रही है. एक आम धारणा है कि ये सभी दल सेना के क़रीबी हैं.

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मार्च और बैठकों का सिलसिला जारी
पाकिस्तान मुस्लिम लीग क़ायदे-ए-आज़म (पीएमएल-क्यू) और मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) इमरान ख़ान सरकार के प्रमुख सहयोगी दल हैं.
दोनों ही पार्टियां पहले सार्वजनिक तौर पर इमरान सरकार के ख़िलाफ़ अपना असंतोष ज़ाहिर कर चुकी हैं. उनका कहना है कि उन्हें सरकार में वाजिब हक़ और अहमियत नहीं मिल रही.
अविश्वास प्रस्ताव को कामयाब बनाने के लिए विपक्षी दलों के पास इमरान सरकार की समर्थक पार्टियों को अपने पाले में करने के अलावा कोई चारा नहीं है. लिहाज़ा ये पार्टियां मौजूदा हालात में किंग मेकर बनी हुई हैं.
पीएमएल-एन के नेता शहबाज़ शरीफ़ ने 14 साल बाद पीएमएल-क्यू के नेतृत्व से मुलाक़ात की है. हालांकि सरकार में शामिल सहयोगी दल असमंजस में हैं. उनकी ओर से अभी तक साफ़ संकेत नहीं मिल रहे हैं.
एक तरफ़ वे इमरान ख़ान को भरोसा दे रहे हैं कि उन्हें समर्थन देना जारी रहेगा, दूसरी ओर विपक्षी दलों को भी वे मिला-जुला संकेत दे रहे हैं.
पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को पीडीएम से पहले हटा दिया गया था, लेकिन अब इसे दोबारा मोर्चे में शामिल कर लिया गया है.
बिलावल भुट्टो ने इमरान सरकार को हटाने के लिए कराची से पीपल्स मार्च निकाला और 10 दिन बाद वो इस्लामाबाद पुहंचे. उन्होंने कहा कि इमरान ख़ान सत्ता छोड़ दें, वरना उन्हें गद्दी से उतार दिया जाएगा.
पीडीएम ने 23 मार्च को महंगाई मार्च का एलान किया है ताकि इमरान सरकार पर सत्ता छोड़ने का दबाव बनाया जा सके.

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सरकार बेपरवाह?
इमरान ख़ान सरकार का कहना है कि विपक्षी दलों के एलान का उन पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है.
सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि यह 13वीं बार है, जब विपक्षी पार्टियां इमरान सरकार को हटाने की कोशिश कर रही हैं.
उन्होंने दावा किया कि पीटीआई अब इस तरह की धमकियों से 'इम्यून' हो चुकी है.
हालांकि, विपक्षी दलों के एलान के बाद से पीएम इमरान ख़ान समेत पीटीआई के नेतृत्व ने अपने सहयोगी दलों से मिलकर उनका समर्थन बरक़रार रखने की कोशिशें तेज़ कर दी हैं.
इसके अलावा, उन्होंने आसमान छूती महंगाई का सामना कर रही जनता के लिए राहत पैकेज का भी एलान किया है.
प्रधानमंत्री ने बिजली और पेट्रोल-डीज़ल के दाम घटाने के भी एलान किए हैं. साथ ही, सामाजिक कल्याण की अपनी प्रमुख योजना 'एहसास' के तहत और अधिक सब्सिडी देने का भी वादा किया है.
प्रमुख मीडिया संस्था 'डॉन' की एक स्तंभकार आरिफ़ा नूर का कहना है कि सरकार बुरी तरह हिल गई है.
वो कहती हैं, ''परसेप्शन की लड़ाई विपक्ष जीतता हुआ लग रहा है. इसकी बहुत साधारण-सी वजह है. सरकार जिस तरह से प्रतिक्रिया कर रही है, उससे लोगों के बीच यह धारणा मज़बूत हुई है कि विपक्षी दल यूं ही हवा में तीर नहीं चला रहे. विपक्षी दल अपने मक़सद में कामयाब होने के नज़दीक हैं.''

दलबदलुओं का क्या होगा?
सरकार ने प्रेसिडेंशियल रेफ़रेंस सौंपते हुए संविधान के अनुच्छेद 63-A के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट से चार मूल सवालों पर निर्देश मांगे हैं.
ये सवाल हैं, ''क्या दल बदल करने वालों की संसदीय सीट छीनी जी सकती है? अगर पार्टी बदलने वालों को अयोग्य करार दिया जाता है, तो वे अगला चुनाव लड़ पाएंगे या नहीं?
क्या अनुच्छेद 63-A के तहत दल बदलू सांसद अपनी पूरी ज़िंदगी के लिए संसद की सदस्यता के अयोग्य हो जाएंगे? अगर कोई सांसद अपनी पार्टी की नीति के ख़िलाफ़ वोट देता है, तो क्या वह मान्य होगा?''
बहरहाल, नेशनल अंसेंबली के स्पीकर ने विपक्ष की मांग पर 25 मार्च को सत्र बुलाया है ताकि इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जा सके.
विपक्षी दलों ने इस फ़ैसले को ग़ैर संवैधानिक क़रार दिया है क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव के लिए नोटिस देने के 14 के अंदर असेंबली सत्र बुलाना होता है. विपक्षी दल इस मामले को कोर्ट में ले गए हैं.

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हितों के टकराव
कई जानकारों का मानना है कि सेना और इमरान ख़ान के रिश्ते अब पहले जैसे मधुर नहीं रहे. ख़ासकर जब से आईएसआई के डीजी के नॉमिनेशन को इमरान ख़ान ने लटकाया, तब से इस बात को और हवा मिली है.
इस पद के लिए लेफ़्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम की नियुक्ति में इमरान ख़ान के देर करने के बाद यह बात फैलने लगी कि सेना और इमरान ख़ान में खटपट है. नदीम अंजुम की सिफ़ारिश सेना ने ही की थी.
पाकिस्तान में इस वक़्त इमरान ख़ान की लोकप्रियता में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. साथ ही, जिस सेना पर उन्हें सत्ता में लाने के आरोप लगे, उस सेना से भी इमरान ख़ान के रिश्ते ठीक नहीं दिख रहे.
ऐसे में विपक्षी दलों को उनके ख़िलाफ़ हमले का यह सही मौक़ा दिख रहा है. विपक्षी दलों को लग रहा है कि लोहा गर्म है, चोट कर दी जाए.
लेकिन राजनीति विज्ञान के जानकार सलमान ख़ान का मानना है कि विपक्षी दलों में न तो एकता है और न ही उनके पास कोई एजेंडा या रणनीति है. उनके अपने-अपने स्वार्थ हैं. उनके हित आपस में टकरा रहे हैं.
वो कहते हैं, ''अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए काफ़ी बैठकें और बातचीत हो रही है. लेकिन मेरा मानना है कि यह जनता को ख़्वाब दिखाने के लिए है. विपक्ष ईमानदारी से कोशिश करता नहीं दिखता. हालांकि मीडिया में इसका ख़ूब शोर है.''
आरिफ़ा नूर भी इससे इत्तेफाक रखती हैं.
वो कहती हैं, ''अविश्वास प्रस्ताव को लेकर शोर अपने चरम पर है. लेकिन अंदरखाने जो बात हो रही है उससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई है. जब सवाल पूछे जाएंगे तो यह उत्साह ज़्यादा नहीं टिकेगा. सवाल ये है कि इस अविश्वास प्रस्ताव का निशाना है कौन. इसके समर्थन में वोट कौन देगा. सबसे बड़ी बात ये कि इसके बाद होगा क्या. अभी भी बहुत कुछ साफ़ नहीं है. इसी से अविश्ववास प्रस्ताव को लेकर उत्साह कम हो जाता है.''
हालांकि वो मानती हैं कि इन तमाम पहलुओं के बावजूद आगे होगा क्या, ये बता पाना काफ़ी मुश्किल है. ऐसा इसलिए कि पाकिस्तान में राजनीति, किसी महामारी के वैरिएंट से भी ज़्यादा अनिश्चित है.
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