अमेरिका और ब्रिटेन के हवाई हमलों के बाद भी क्यों बेख़ौफ़ हैं यमन के हूती विद्रोही

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- Author, सेलिन गेरिट
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
यमन में हूती विद्रोहियों पर अमेरिका और ब्रिटेन की कार्रवाई से इलाके में तनाव और तेल की कीमतें बढ़ने का खतरा है. यह अनुमान विशेषज्ञों ने लगाया है.
अमेरिका का कहना है कि हवाई और समुद्री हमले में हूतियों के 16 ठिकानों को निशाना बनाया गया. इसमें कमांड सेंटर, हथियार डिपो और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने कहा है कि लाल सागर में जहाजों पर हूतियों के हमलों के हफ्तों बाद किए गए. उन्होंने हूतियों पर हमले को आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई बताया.
हूतियों को ईरान का समर्थन हासिल हैं. यमन में दरअसल सरकार भी उन्हीं की चल रही है. वे अभी भी निडर बने हुए हैं.
सेना के प्रवक्ता याहया सारिया ने कहा कि अमेरिकी और ब्रितानी हमला करने वालों को जबाव दिया जाएगा और उन्हें दंडित किया जाएगा.
हूती नेता अब्देल मालेक अल हूती का कहना ने भी कहा है कि इसराइल से जुड़े जहाजों पर हमले करने के लिए वो अब अधिक दृढ हैं.
हूती कब से कर रहे हैं जहाजों पर हमला

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हूती पिछले साल नवंबर से लाल सागर से होकर गुजर रहे कंटेनर शिपों पर हमले कर रहे हैं.
उनका कहना है कि वो यह काम हमास के समर्थन में कर रहे हैं, जिसने इसराइल पर सात अक्टूबर को हमला किया था. इस हमले में 1200 से अधिक लोग मारे गए थे. हमले के बाद 240 से अधिक लोगों को बंधक बना लिया गया था.
सात अक्टूबर के बाद इसराइल ने ग़ज़ा पट्टी में जवाबी कार्रवाई शुरू की. इस कार्रवाई में अब तक 23 हजार से अधिक लोग मारे गए हैं.
दुनिया के करीब 20 फीसदी कंटेनर शिप अब लाल सागर से होकर जाने से परहेज कर रहे हैं. यह रास्ता स्वेज नहर और भूमध्यसागर से होते हुए यूरोप तक जाता है. इसकी जगह अब वे अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से होकर जा रहे हैं.
जहाजों का वैकल्पिक रास्ता

बीबीसी के इंटरनेशनल एडिटर जेरमी बोवेन का कहना है कि इस बात की संभावना नहीं है कि हवाई हमले के एक दौर से हूतियों का हमला बंद हो जाएगा.
वो कहते हैं, '' सऊदी अरब ने 2015 से युद्धविराम लागू होने से एक साल पहले तक हूतियों पर बमबारी की. इसलिए ऐसा नहीं है कि वो बमबारी से डर जाएंगे.''
उनका कहना है कि ग़ज़ा युद्ध अब बड़े इलाके में फैल चुका है. बोवेन का कहना है कि अगर हूतियों को रोक भी दिया गया तो इराक और सीरिया में ईरान समर्थक मीलिशिया को अमेरिका पर हमले के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है.
एडम क्लेमेंट्स यमन में अेरिकी सेना के अताशे रह चुके हैं. वो कहते हैं कि वे इस बात से निराश हैं कि यमन पर हमले का उद्देश्य हूतियों के हमले को रोकना है.
वो कहते हैं, '' हूती सउदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन से लंबी लड़ाई लड़ रहे है. इससे उन्होंने अपनी आपूर्ति और जोखिम को कम करने की क्षमता हासिल कर ली है.''
अमेरिका-ब्रिटेन के हमलों का असर क्या होगा?

रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (आरयूएसआई) के उप महानिदेशक मैल्कम चाल्मर्स कहते हैं कि उन्हें इस बात पर आश्चर्य होगा जब इन हमलों के बाद हूती जवाबी कार्रवाई नहीं करेंगे. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि इससे इलाके में 'जैसे को तैसा' वाली स्थिति पैदा हो सकती है.
हूती पर अमेरिका और ब्रिटेन के हमले ने इसराइल-ग़ज़ा युद्ध में ईरान के सीधे शामिल होने को लेकर भी चिंता बढ़ा ही है.
बीबीसी पारसी सेवा के कायवन होसनेई कहते हैं कि पिछले हफ्ते जब ब्रिटेन ने हूतियों पर हमला करने की मंशा जताई तो ईरानिन रिवोल्यूशनरी गार्ड्स से समर्थक मीडिया ने लाल सागर में ईरानी युद्धपोत की तैनाती की खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया.
उन्होंने कहा, ''लेकिन इसे एक वास्तविक खतरे की जगह एक प्रतीकात्मक खतरे के रूप में देखा गया.''
उनका कहना है कि लाल सागर में ईरान और अमेरिका-ब्रिटेन गठबंधन के बीच किसी बड़े स्तर के तनाव की आशंका बहुत कम है.
तनाव का तेल की कीमतों पर क्या असर होगा?

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हालांकि इस इलाके में तनाव बढ़ने की आशंका में तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं.
इस साल पहली बार ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं.
हूती अभी तक लाल सागर में ही हमला कर रहे हैं, लेकिन विश्लेषकों को आशंका है कि अगर यह तनाव होर्मुज जलडमरूमध्य तक फैला तो ऊर्जा की कीमतों और तेल की आपूर्ति पर इसका तगड़ा प्रभाव पड़ेगा.

आईएनजी बैंक से जुड़े एक विश्लेषक के मुताबिक करीब दो करोड़ बैरल तेल प्रतिदिन होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर जाता है. यह पूरी दुनिया में तेल की खपत का करीब 20 फीसदी है.
इसके अलावा शिपिंग कंपनियों को रास्ता भी बदलना पड़ेगा, उन्हें जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप होकर भेजना पड़ेगा. यह करीब 6000 किमी लंबा है. इससे यात्रा का समय 10-14 दित तक बढ़ जाएगा.
ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि जहाजों का रास्ता बदलने से एशिया से यूरोप की हर यात्रा पर 10 लाख डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.इससे बीमा की लागत भी बढ़ेगी और यात्रा में अधिक समय लगने से आपूर्ति प्रभावित होगी और लागत में बढोतरी होगी.
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