अमेरिका ने क्या अपने दोस्त इसराइल के साथ 'आर-पार' का मन बना लिया है?

इमेज स्रोत, Reuters
- Author, जेरेमी बोवेन
- पदनाम, बीबीसी इंटरनेशनल एडिटर
चार हफ़्तों से ये संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और उनके प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का ग़ज़ा में जारी इसराइली कार्रवाई को लेकर सब्र टूटता जा रहा है.
इसराइल के प्रति अपनी नाखुशी ज़ाहिर करने के लिए ये नेता दिन-ब-दिन कड़े शब्दों के इस्तेमाल को बढ़ा रहे हैं.
इस बीच ग़ज़ा में तुरंत संघर्ष विराम लागू करने की मांग वाला प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में पारित हुआ है.
इस प्रस्ताव पर हुई वोटिंग में अमेरिका ने हिस्सा नहीं लिया लेकिन उसका ये क़दम इसराइल को नागवार गुज़रा है.
प्रतिक्रिया स्वरूप में इसराइल ने अपने प्रतिनिधिमंडल की अमेरिका की प्रस्तावित यात्रा को रद्द कर दिया है. इसराइल की नाराज़गी का कारण इस प्रस्ताव पर हुए मतदान में अमेरिका का वीटो न लगाना रहा है.
लेकिन हालिया घटनाक्रम ने ये सवाल ज़रूर खड़ा कर दिया है कि क्या हमेशा दोस्ती निभाते दिखने वाले अमेरिका और इसराइल के बीच सबकुछ ठीक चल रहा है?
अमेरिका के फ़ैसले के मायने
यूएनएससी में सीज़फ़ायर पर प्रस्ताव को पारित होने देना ये दिखाता है कि राष्ट्रपति बाइडन अब तय कर चुके हैं कि सिर्फ़ कड़े शब्द नाकाफ़ी हैं.
साथ ही इससे व्हाइट हाउस और इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू के बीच तनातनी वाली स्थिति भी उजागर हो गई.
नेतन्याहू ने इसराइल के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी पर तीखी प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने इस प्रस्ताव को वीटो न करने के लिए अमेरिका की निंदा की. नेतन्याहू ने कहा कि इससे युद्ध में उसके प्रयासों और 7 अक्टूबर को हमास द्वारा बंधक बनाकर ले जाए गए लोगों को छुड़ाने के लिए हो रही कोशिशों को नुकसान पहुंचा है.
जो बाइडन और उनके अन्य शीर्ष अधिकारी इस बयान को नाशुक्री से जोड़ सकते हैं.
राष्ट्रपति बाइडन इसराइल के काफ़ी करीब हैं. वो खु़द को यहूदीवादी (ज़ायनिस्ट) कहते हैं. बीती सात अक्टूबर को हमले के बाद उन्होंने इसराइली लोगों को सैन्य और कूटनीतिक मदद के साथ ही इमोशनल सपोर्ट भी दिया है.
बाइडन बंधकों की रिहाई के साथ ही ये भी चाहते हैं कि हमास का ख़ात्मा हो. लेकिन बाइडन चाहते हैं कि इसराइल ये काम 'सही तरीके' से करे.
इसराइल को बाइडन का साथ

इमेज स्रोत, Reuters
इसराइल और हमास के बीच जंग के शुरुआती सप्ताहों में राष्ट्रपति बाइडन ने इसराइल को चेताया था कि वह बदले की आग में अंधा न बने, जैसा अमेरिका 11 सितंबर 2001 को अल-क़ायदा के हमले के बाद हुआ था.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने हमास के हमले के बाद इसराइल का दौरा किया और सभी पीड़ितों के परिवार से मिले और नेतन्याहू को गले लगाया. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि नेतन्याहू के साथ बाइडन के रिश्ते कभी उतने आसान नहीं रहे.
जो बाइडन और सात अक्टूबर के बाद से अब तक सात बार इसराइल जा चुके अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन, लगातार इसराइल से अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानूनों का सम्मान करने को कह रहे हैं, जिसमें आम लोगों की सुरक्षा का कर्तव्य भी शामिल है.
युद्ध की शुरुआत में इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने अपने देश की जनता से वादा किया कि वे हमास के हमले का 'बदला' लेंगे.
तब से अब तक इसराइल के हमलों में 30 हज़ार से अधिक फ़लस्तीनियों की मौत हो चुकी है, जिनमें अधिकांश आम लोग थे. इसराइल ने जिन हथियारों से हमले किए, उनमें से अधिकतर अमेरिका के ही दिए हुए थे.
बाइडन की नाराज़गी की वजह?
ग़ज़ा में बर्बादी, फ़लस्तीन के लोगों पर बढ़ते भुखमरी के ख़तरे और दक्षिणी ग़ज़ा के रफ़ाह में इसराइली कार्रवाई में और मौतों की आशंका को देखते हुए, ये माना जा रहा है कि राष्ट्रपति बाइडन ने ये मान लिया है कि अब इसराइल ने उनकी सलाह को नज़रअंदाज़ करने की सीमा पार कर दी है.
इसराइल ये दावा करता है कि उसने युद्ध के कानूनों का हमेशा पालन किया है. इसराइल ने ग़ज़ा के लोगों के लिए मानवीय सहायता को रोकने के आरोपों को भी ख़ारिज किया है.
लेकिन अब ऐसे सबूतों का अंबार लग गया है जो ये बताते हैं कि इसराइल सच नहीं कह रहा. इसराइल और मिस्र में मौजूद खाने-पीने के भंडारों से महज़ कुछ किलोमीटर दूर छोटे-छोटे बच्चे भूख से दम तोड़ रहे हैं.
अमेरिकी और बाकी दुनिया संयुक्त राष्ट्र और अन्य सहायता एजेंसियों की ओर से पेश किए गए उन सबूतों को देख सकते हैं, जिसके अनुसार ग़ज़ा भुखमरी की कगार पर खड़ा है.
अमेरिकी सेना ये मदद एयरड्रॉप कर रही है, वहीं ज़रूरी सामानों की आपूर्ति समुद्र के रास्ते ग़ज़ा तक की गई है. जबकि इसराइल उत्तरी ग़ज़ा से आधे घंटे की दूरी पर स्थित अशदोद पोर्ट से बहुत कम मात्रा में ये मदद आगे जाने दे रहा है.
अपनी छवि सुधारने की कोशिश?

इमेज स्रोत, Reuters
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कई असफल कोशिशों के बाद सोमवार को ग़ज़ा में युद्धविराम की मांग वाला प्रस्ताव पास हो गया. ये प्रस्ताव इसलिए पारित हो सका क्योंकि अमेरिका ने इसे वीटो नहीं किया, जो पूर्व में अपनाए उसके रुख से अलग था.
अमेरिका ने सोमवार को हुए मतदान में भाग भी नहीं लिया. यह प्रस्ताव चीन लेकर लाया था.
लेकिन इसराइल की नाराज़गी का कारण इस प्रस्ताव पर हुए मतदान में अमेरिका का वीटो न लगाना रहा.
हालांकि व्हाइट हाउस ने कहा है कि मतदान प्रक्रिया में भाग न लेना, अमेरिका की नीति में बदलाव होना नहीं है.
व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने यह भी कहा कि अमेरिका इसराइल से उसके इस फैसले पर बात करेगा.
रमज़ान सीज़फ़ायर रिज़ॉल्यूशन पर वीटो न करने से अमेरिका ने इसराइल की गतिविधियों के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार ठहराए जाने संबंधी आरोपों से छुटकारा पाने की कोशिश की है.
बाइडन प्रशासन की ओर से मध्य पूर्व के इस संकट का हल निकालने के प्रस्ताव को बिन्यामिन नेतन्याहू द्वारा ठुकराए जाने के बाद सुरक्षा परिषद में अमेरिका ने ये फ़ैसला किया है.
अमेरिकी ये दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय दबाव से इसराइल को मिली छूट की भी एक सीमा है.
आमतौर पर ये माना जाता है कि सुरक्षा परिषद से पास हुए प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय कानूनों के प्रति बाध्य होते हैं. अब इसराइल को ये तय करना होगा कि वह इस प्रस्ताव का सम्मान करेगा या नहीं, जिसका हमास और यूएन में फ़लस्तीनी प्रतिनिधियों ने स्वागत किया है.
नेतन्याहू की गठबंधन सरकार यहूदी धुर राष्ट्रवादी चरमपंथियों के समर्थन पर निर्भर है, जो नेतन्याहू से प्रस्ताव को नज़रअंदाज़ करने के लिए कहेंगे. अगर नेतन्याहू ऐसा करते हैं तो अमेरिका को जवाब देना पड़ेगा.

इमेज स्रोत, Getty Images
लेकिन राष्ट्रपति बाइडन के पास जो सबसे बड़ी ताकत है वो इसराइल को हथियारों की आपूर्ति है. युद्ध में इस्तेमाल किए गए हथियारों की बड़ी-बड़ी खेप अमेरिका से ही इसराइल पहुंची है. साथ ही इसराइल इसी के सहारे रफ़ाह तक युद्ध को विस्तार देने की अपनी योजना के साथ आगे बढ़ रहा है.
अमेरिका-इसराइल के बीच गहरे संबंध साल 1948 से हैं, जब तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इसराइल को स्वतंत्र देश के तौर पर उसके गठन के 11 मिनट बाद ही मान्यता दे दी थी. लेकिन दोनों के संबंध कई मौकों पर खटास भरे भी रहे.
संकट तब-तब खड़ा हुआ जब इसराइल ने अमेरिकी राष्ट्रपतियों की इच्छाओं के विरुद्ध काम किया और उनकी नज़र में इसराइली हितों को नुकसान पहुंचाया.
ये पहली बार नहीं जब बिन्यामिन नेतन्याहू ने किसी अमेरिकी राष्ट्रपति को नाराज़ किया हो.
साल 1996 में नेतन्याहू जब पहली बार पीएम बने थे, वह तबसे ही ऐसा करते आ रहे हैं.
लेकिन उनका अमेरिका का विरोध करना कभी भी उतने लंबे समय तक नहीं खिंचा, इतना खटास भरा नहीं रहा, या अमेरिका इसराइल के संबंधों में कोई भी संकट इतना गहरा नहीं रहा, जैसा ग़ज़ा युद्ध के पिछले छह महीनों में देखने को मिला है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















