इसराइल-फ़लस्तीनी संघर्ष: ‘ख़ान यूनस का कसाई’ याह्या सिनवार, जिन पर इसराइल ने लगाया निशाना

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- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
“जंग किसी के हित में नहीं है. हमारे हित में तो बिल्कुल भी नहीं. परमाणु ताक़त से लैस देश का गुलेल से सामना भला कौन करना चाहेगा? सच तो यह है कि जंग से कुछ हासिल नहीं होता. आप वॉर रिपोर्टर हैं. क्या आपको जंग पसंद है?”
एक बार में भरोसा करना मुश्किल होगा कि ऐसा कभी उस शख़्स ने कहा था जिसे दुश्मन खेमे में ‘ख़ान यूनस का कसाई’ कहा जाता हो.
फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास के नेता याह्या सिनवार ने साल 2018 में इतालवी अख़बार ‘ला रिपब्लिका’ की रिपोर्टर फ़्रैंचेस्का बोरी को दिए एक इंटरव्यू में ये बातें कही थीं.
यह शायद पहली और आख़िरी बार था जब घोर कट्टरपंथी माने जाने वाले इस हमास नेता ने इसराइल के साथ जंग से फ़लस्तीनियों के अहित की बात खुलकर कही थी.
गज़ा में चल रहे मौजूदा संघर्ष के बीच इसराइली सेना ने हाल ही में हमास के कई प्रमुख नेताओं के ठिकानों पर निशाना साधा.
इसराइल डिफ़ेंस फ़ोर्सेज़ (आईडीएफ़) ने एक बयान जारी कर कहा कि इन हमलों में याह्या सिनवार के घर को भी नष्ट कर दिया गया. हालाँकि बयान में यह नहीं बताया गया कि हमले के समय याह्या सिनवार घर में थे या नहीं और उन्हें कोई नुक़सान पहुँचा है या नहीं.
इस ख़बर के बाद से अंतरराष्ट्रीय मीडिया में याह्या सिनवार को लेकर चर्चा तेज़ हो गई है.

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कौन हैं याह्या सिनवार?
59 वर्षीय याह्या इब्राहिम हसन सिनवार गज़ा पट्टी में फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास के राजनीतिक विंग के प्रमुख हैं. वो साल 2017 से हमास पोलित ब्यूरो के सदस्य भी हैं.
यूरोपियन काउंसिल ऑफ़ फ़ॉरेन रिलेशन्स से संबद्ध वेबसाइट ‘मैपिंग पैलेस्टीनियन पॉलिटिक्स’ के अनुसार याह्या सिनवार हमास के पोलित ब्यूरो को इसके सैन्य विंग इज्ज़ अल-दीन अल-क़सम ब्रिगेड्स (आईक्यूबी) से जोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं.
इसके अलावा उनकी साल 1988 में हमास के आंतरिक सुरक्षाबल ‘अल-मजीद’ की स्थापना में भी बड़ी भूमिका रही.
याह्या सिनवार को इसराइल के प्रति उनके ‘अति-विरोधी’ रवैये के कारण जाना जाता है.
इसराइल-फ़लस्तीनी मामलों के जानकारों के मुताबिक़ याह्या ऐसे किसी भी व्यक्ति को नहीं बख़्शते जो इसराइल के साथ समझौते की बात करता है.
अमेरिका ने साल 2015 में उन्हें ‘स्पेशियली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट्स’ (एसटीजीटी) की सूची में शामिल किया था.

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शरणार्थी कैंप में जन्म और इसराइल में 24 सालकी जेल
याह्या सिनावर का जन्म साल 1962 में मौजूदा दक्षिणी गज़ा पट्टी में स्थित ख़ान यूनस के एक शरणार्थी कैंप में हुआ था. उस समय इस इलाके पर मिस्र का आधिपत्य था.
इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ गज़ा से अरबी भाषा में ग्रैजुएशन की पढ़ाई करने वाले याह्या को इसराइली सुरक्षाबलों ने पहली बार साल 1982 में राजनीतिक उठा-पटक की कोशिशों में तब गिरफ़्तार किया था जब इसराइल ने लेबनान पर हमला किया था.
गिरफ़्तारी के बाद उन्हें कई महीने जेल में बिताने पड़े और वहाँ उनकी मुलाकात कई फ़लस्तीनी आंदोलनकारियों से हुई.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में वेस्ट एशियन स्टडीज़ में अध्यापक और अरब-इसराइल मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर आफ़ताब कमाल पाशा बताते हैं कि इसी जेल से याह्या सिनवार ने अपना जीवन फ़लस्तीनियों के लिए समर्पित करने का फ़ैसला किया.
अमेरिकन-इसराइली कोऑपरेटिव एंटरप्राइज़ (एआईसीई) से जुड़ी ‘जूइश वर्चुअल लाइब्रेरी’ की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, याह्या ने 1985 में हमास की सिक्योरिटी विंग की स्थापना की.
सिक्योरिटी विंग का एक काम उन फ़लस्तीनियों को सज़ा देना भी था, जिन पर इसराइल से मिले होने का संदेह या आरोप हो. कहा गया कि याह्या सिनवार इसराइल की मदद करने वाले संदिग्ध फ़लस्तीनियों की हत्या कर दिया करते थे. यही वजह थी कि इसराइल में उन्हें ‘ख़ान यूनस का कसाई’ कहा जाने लगा.
साल 1988 में याह्या को दो इसराइली सैनिकों के अपहरण और हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. इस बार उन्हें दोषी ठहराते हुए चार उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई.
इसके बाद उन्होंने इसराइल की एक जेल में लगभग 24 साल बिताए.

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अपनी ही रिहाई का किया विरोध
1988 के बाद याह्या को साल 2011 में एक ‘प्रिज़नर एक्सचेंज प्रोग्राम’ के तहत जेल से रिहा किया गया.
दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपनी इस रिहाई का ख़ुद विरोध किया था.
समझौते के तहत हमास 1,000 फ़लस्तीनी बंदियों की रिहाई के बदले सिर्फ़ एक इसराइली सैनिक को रिहा करने पर राज़ी हुआ था और इसराइल भी इसके लिए तैयार था.
एक्सचेंज प्रोग्राम के मुताबिक़ हमास ने साल 2006 में अपहरण किए गए इसराइली सैनिक गिलाद शालित को रिहा किया और बदले में 1,000 फ़लस्तीनियों को रिहा करवाया.
1,000 फ़लस्तीनियों के बदले सिर्फ़ एक इसराइली सैनिक की रिहाई के मद्देनज़र किसी को भी लगेगा कि यह समझौता हमास के पक्ष में था लेकिन याह्या सिनवार ऐसा नहीं सोचते थे.
यरुशलम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार और इसराइल-फ़लस्तीनी मामलों के जानकार हरेंद्र मिश्रा ने बीबीसी को बताया, “याह्या सिनवार का मानना था कि इसराइली सैनिक को छोड़ना हमास के लिए ठीक नहीं है. एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने ख़ुद अपनी ही रिहाई का विरोध किया था.”
इसराइल को लेकर लगातार बदलती रणनीति
रिहा होकर वापस आने के बाद याह्या सिनवार ने साल 2017 में हमास की राजनीतिक शाखा का चुनाव जीता.
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं कि तब से लेकर अब तक इसराइल को लेकर उनकी रणनीतियों में लगातार कुछ न कुछ बदलाव देखने को मिले हैं. हालाँकि कुल मिलाकर उनका रवैया आक्रामक ही रहा.
एके पाशा बताते हैं, “चुनाव जीतने के बाद उन्होंने फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास के विचारों से खुलकर असहमति जताई. याह्या ने साफ़ कहा कि हमास इसराइल के साथ किसी भी तरह की शांति प्रक्रिया के लिए तैयार नहीं है.”
हालाँकि इसके कुछ ही समय बाद उन्होंने महमूद अब्बास से बातचीत शुरू कर दी. इतना ही नहीं उन्होंने गज़ा में बनाई गई प्रशासकीय समिति को भी भंग कर दिया.
एके पाशा के मुताबिक़, महमूद अब्बास से बातचीत के बाद याह्या के सुर थोड़े नर्म पड़ते नज़र आने लगे थे.
वो बताते हैं, “उस वक़्त याह्या ने हमास के नेता मोहम्मद दीफ़ की उस रणनीति को ख़ारिज़ कर दिया था जिसमें दीफ़ ने भूमिगत सुरंगों के ज़रिए हमास के सदस्यों को इसराइल भेजे जाने का प्रस्ताव रखा था. याह्या ने कहा था कि ऐसा करना ख़ुदकुशी जैसा होगा.”

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‘ग्रेट मार्च ऑफ़ रिटर्न’ और चौंकाने वाला इंटरव्यू
इन सबके ठीक बाद याह्या सिनवार ने अपनी नर्म होती नीति से बिल्कुल उलट फ़ैसला किया. उन्होंने ‘ग्रेट मार्च ऑफ़ रिर्टन’ नाम के एक प्रदर्शन का ऐलान किया.
इसके तहत याह्या ने फ़लस्तीनियों से बड़ी संख्या में जुटकर हर हफ़्ते जुमे की नमाज़ के बाद गज़ा सीमा पर प्रदर्शन करने और चिल्लाने को कहा- हम यहाँ लौट रहे हैं, यह हमारी ज़मीन है.
यह प्रदर्शन इतने बड़े स्तर पर हुआ कि इसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में कवरेज मिली.
इसके बाद फिर याह्या के सुर एक बार फिर बदलते नज़र आए और साल 2018 में उन्होंने इतालवी अख़बार ‘ला रिपब्लिका’ की रिपोर्टर को वो इंटरव्यू दिया, जिसका ज़िक्र लेख की शुरुआत में किया गया है.
शायद यह पहला मौका था जब उन्होंने किसी पश्चिमी मीडिया संस्थान को इंटरव्यू दिया था.
इस इंटरव्यू में याह्या ने कहा था कि हमास अब ‘अहिंसक विरोध’ का रास्ता अपनाएगा और वो इसराइल से बातचीत के लिए तैयार है.
उनके इस इंटरव्यू की ख़ूब चर्चा हुई और इसे लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाते रहे मगर इसका कोई ठोस परिणाम निकलकर नहीं आया.
प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं कि याह्या की नर्मी के पीछे दरअसर क़तर और मिस्र का प्रभाव था.
उन्होंने बताया, “जब हमास नेता और फ़लस्तीन के पूर्व कार्यकारी प्रधानमंत्री इस्माइल हनिया क़तर गए तब याह्या पर भी क़तर का प्रभाव बढ़ा.”
प्रोफ़ेसर पाशा के मुताबिक़, “क़तर और मिस्र ने उनके कट्टरपंथी रवैये को थोड़ा नर्म करने की कोशिश की और उन्हें समझाया कि हमास का सशस्त्र विरोध कामयाब होना मुश्किल है और इसराइल के साथ बातचीत ज़रूरी है.”
तेज़ याददाश्त और ‘लोगों का ख़याल रखने वाले’ नेता
इस साल मार्च में हमास की शुरा काउंसिल के लिए हुए चुनाव में याह्या सिनवार ने एक बार फिर जीत हासिल की और अगले चार साल के लिए हमास के राजनीतिक विंग के प्रमुख बन गए.
यरुशलम में मौजूद पत्रकार हरेंद्र मिश्रा ने इस चुनाव के दौरान गज़ा के स्थानीय लोगों से बात की थी और याह्या के बारे में उनकी धारणा समझने की कोशिश की थी.
उन्होंने बताया, “आम लोगों के बीच याह्या सिनवार की छवि एक ईमानदार, जनता का ख़याल रखने वाले, सादगीपूर्ण और फ़लस्तीन के लिए समर्पित नेता की है.”
हालाँकि हरेंद्र यह भी कहते हैं कि कुछ लोगों ने दबी ज़ुबान में इस पर नाराज़गी भी जताई कि गज़ा में ज़मीनी हालात इतने ख़राब होने के बावजूद हमास ने लोगों की फ़िक्र न करके सिर्फ़ अपनी सैन्य ताक़त बढ़ाने की परवाह की.
प्रोफ़ेसर एके पाशा के मुताबिक़ याह्या सिनवार हमास के लोकप्रिय और बेहद शातिर नेता माने जाते हैं. बताया जाता है कि उनकी याददाश्त बहुत तेज़ है और वो बरसों पहले हुई बातचीत की छोटी-छोटी डीटेल्स भी याद रखते हैं.
याह्या के ‘हमशक्ल’ और एक ही नंबर की कारें
इसराइली सेना ने याह्या सिनवार के घर पर हमला करके उसे नष्ट करने की बात तो कही है लेकिन हमले के बाद उनका क्या हाल है, इस बारे में अभी कुछ भी पता नहीं चल पाया है.
हमास ने भी याह्या सिनवार के बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं दी है.
हमास से वाकिफ़ जानकारों का कहना है कि काफ़ी मुमकिन है कि याह्या बच गए हों.
एके पाशा कहते हैं, “अगर कोई मरा भी होगा तो हो सकता है कि वो याह्या सिनवार का डमी (हमशक्ल) होगा.”
हरेंद्र मिश्रा बताते हैं कि हमास के लगभग सभी बड़े नेताओं के हमशक्ल हैं जो इसराइली सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी को चकमा देने के लिए एक ही नंबर प्लेट वाली अलग-अलग कारों में चलते हैं.

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अगर याह्या सिनवार मारे गए तो ?
हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि अगर याह्या सिनवार इसराइली हमले में मारे जाते हैं तो यह निश्चित तौर पर हमास के लिए एक झटका होगा.
वो कहते हैं, “याह्या सिनवार एक ऐसे शख़्स हैं जिनकी हमास के सैन्य विंग पर भी उतनी ही मज़बूत पकड़ है जितनी राजनीतिक विंग पर. ऐसे में उनका जाना हमास को नुक़सान पहुँचाएगा.”
हालाँकि एके पाशा का मानना है कि याह्या के जाने के बाद हमास की कमर टूट जाएगा, ऐसा भी नहीं है.
उन्होंने कहा, “हमास का अपना पोलित ब्यूरो है. कई प्रशिक्षित कमांडर हैं जो किसी भी वक़्त नेतृत्व अपने हाथ में लेने के लिए तैयार रहते हैं.”
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सचमुच मारे गए हैं हमास के कई बड़े नेता?
इसराइली सेना बीते हफ़्ते से हमास के कई बड़े नेताओं को मारने का दावा कर रही है. हालाँकि इस सूची में याह्या सिनवार का नाम नहीं है.
हरेंद्र मिश्रा कहते हैं, “आम तौर पर इसराइल अगर हमास के किसी नेता के मारे जाने का दावा करता है और वो ख़बर झूठी होती है तो हमास किसी न किसी तरीके से उसका खंडन कर देता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ है.”
इस बार हमास ने इसराइल के उन दावों पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है जिनमें उसके कई बड़े नेताओं को मारने का दावा किया गया है.
इसकी वजह से ऐसा अंदेशा जताया जा रहा है कि शायद इसराइली हमले में सचमुच उनकी मौत हो गई हो.
हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में अपने नेताओं को खोना हमास के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है.
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