अमेरिका क्या इसराइल-फ़लस्तीन का मुद्दा हल कर सकता है? – दुनिया जहान

जो बाइडन और विदेश मंत्री ब्लिंकन

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इमेज कैप्शन, ताज़ा संकट के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन दोनों ने इसराइल का दौरा किया.

अमेरिकी राष्ट्रपति का सीधे किसी युद्ध क्षेत्र में पहुंच जाना कोई आम बात नहीं है. लेकिन इसराइल में हमास के हमले में 1,400 इसराइली और अन्य विदेशी नागरिकों की मौत के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन इसराइल पहुंचे.

इस दौरे पर उन्होंने अमेरिका की इसराइल के प्रति दशकों से चली आ रही प्रतिबद्धता को फिर ज़ाहिर करते हुए कहा कि संकट की इस घड़ी में अमेरिका इसराइल के साथ खड़ा है.

राष्ट्रपति बाइडन की इसराइल यात्रा से पहले और बाद में भी कई वरिष्ठ अमेरिकी कूटनीतिक और रक्षा अधिकारियों ने इसराइल का दौरा करके दोनों देशों के बीच एकता का स्पष्ट संकेत दिया था. मगर दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के समर्थन के बावजूद इसराइल के ख़िलाफ़ हमास के हमले को टाला नहीं जा सका.

कई दशकों से अमेरिका के नेतृत्व में ‘टू नेशन थियोरी’ यानी इसराइल के साथ एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के गठन को अंजाम देने के लिए हो रहे कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं हो पाए हैं.

इसका उद्देश्य था कि मध्य पूर्व की समस्या का हल निकालने के लिए इसराइली और फ़लस्तीनियों के लिए दो अलग देश हों. मगर कोई हल नहीं निकल पाया.

इस हफ़्ते हम दुनिया जहान में जानने की कोशिश करेंगे कि मध्य पूर्व में अमेरिकी कूटनीति क्या हासिल कर सकती है?

जो बाइडन और बेंजामिन नेतन्याहू.

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इमेज कैप्शन, 18 अक्टूबर, 2023 को तेल अवीव में इसराइल की युद्ध कैबिनेट की बैठक में शामिल अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू.

संकट में कूटनीति

न्यूयॉर्क टाइम्स के वॉशिंगटन संवाददाता डेविड सैंगर का मानना है कि जो बाइडन की इसराइल यात्रा की तीन वजहें थीं.

पहली वजह थी सार्वजानिक तौर पर यह संदेश देना कि अमेरिका इसराइल के साथ खड़ा है और स्पष्ट करना कि यह एक आतंकवादी हमला है जिसने इसराइल को वैसे ही झकझोर दिया है, जिस प्रकार 9/11 के हमले ने अमेरिका को झकझोर दिया था.

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“दूसरी वजह यह कि वो बिन्यामिन नेतन्याहू को यह समझाना चाहते थे कि दुनिया में युद्ध को लेकर धारणाएँ बदल चुकी हैं. साथ ही उन्हें गज़ा के उन फ़लस्तीनी निवासियों के मुश्किल हालात के बारे में भी याद दिलाना चाहते थे जो ग़ज़ा से बाहर नहीं जा पाए हैं.”

यानी इसका उद्देश्य इसराइल को संयम बरतने और ग़ज़ा में मानवीय सहायता पहुंचाने में बाधा न डालने के लिए राज़ी करना और किसी भी सैनिक कार्यवाही में अंतरराष्ट्रीय नियमों को ध्यान में रखने के लिए प्रेरित करना था.

डेविड सैंगर ने कहा, “वो चाहते थे कि एक त्रासदी की प्रतिक्रिया स्वरूप दूसरी त्रासदी ना पैदा हो जाए. वो विस्तार से इस बात पर बात करना चाहते थे कि हमास का ख़ात्मा करना ज़रूरी है, ताकि भविष्य में ऐसा हमला दोबारा ना हो. लेकिन जो निरपराध फ़लस्तीनी हमास का समर्थन नहीं करते उन्हें सैनिक कार्यवाही के परिणामों से बचाना भी ज़रूरी है, और यह दोनों उद्देश्य कैसे पूरे किए जाएं.”

मगर यह एक ऐसा सवाल है जिसका पेचीदा और लगातार बदलती स्थिति में कोई भी आसानी से जवाब नहीं दे सकता. जहां एक ओर भारी संख्या में इसराइली लोग हताहत हुए हैं, वहीं ग़ज़ा में हमास द्वारा नियंत्रित स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि सात अक्तूबर के बाद से आठ हज़ार से अधिक फ़लस्तीनी मारे जा चुके हैं.

आशंका है कि यह संघर्ष ग़ज़ा और इसराइल के परे भी फैल सकता है. इसीलिए अमेरिका ने क्षेत्र में अपने विमान वाहक युद्धपोत भेज दिए हैं और कई सैनिक दस्तों को तैनाती के लिए तैयार रहने के आदेश दे दिए हैं.

डेविड सैंगर ने बताया, “अमेरिका ने क्षेत्र में विमान वाहक यूएसएस जेराल्ड फ़ोर्ड और यूएसएस ड्वाइट आइसनहॉवर युद्ध नौका समूहों को तैनात कर दिया है ताकि क्षेत्र की दूसरी ताक़तों को युद्ध में कूदने से रोका जा सके. और अगर क्षेत्र में दूसरा मोर्चा खुलता है तो ये नौकाएं जवाबी हमला कर सकती हैं. बाइडन सरकार को आशंका है कि अगर इसराइली सेना ग़ज़ा में उलझ जाए तब लेबनान स्थित चरमपंथी गुट हिज़बुल्लाह इसराइल के ख़िलाफ़ हमले शुरू कर सकता है. हिज़बुल्लाह को ईरान का समर्थन प्राप्त है.”

पिछले कई सालों में दो अलग राष्ट्रों की स्थापना से हट कर अमेरिका ने इसराइल और सऊदी अरब के बीच संबंध सामान्य करने पर ध्यान दिया. उसकी सोच थी कि अगर सऊदी अरब इसराइल को मान्यता देता है तो इसराइल को स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र के गठन की ओर कदम उठाने के लिए राज़ी किया जा सकता है.

बहरहाल यह दोनों उद्देश्य हासिल नहीं हो पाए हैं. और फ़िलहाल मध्यपूर्व संकट में अमेरिका के शामिल होने को लेकर राय इसलिए बंटी हुई है क्योंकि लोग नहीं चाहते कि अमेरिका दूर देशों में लड़े जा रहे एक और युद्ध में शामिल हो. इसी विषय पर राष्ट्रपति बाइडन ने हाल में राष्ट्र को संबोधित किया था.

डेविड सैंगर का कहना है, “ओवल ऑफ़िस से दिए गए भाषण में राष्ट्रपति बाइडन ने यूक्रेन को आज़ाद रखने और इसराइल की सुरक्षा पर बात की. उन्होंने कहा कि इन लड़ाइयों में जहां रूस एक देश है और हमास एक आतंकवादी गुट है, मगर दोनों ही लोकतंत्र को नष्ट करना चाहते हैं.”

लोकतंत्र को मज़बूत करने में विश्व का नेतृत्व करना बाइडन सरकार की कूटनीति का अहम हिस्सा है, मगर सवाल है कि क्या अमेरिका अपने बल पर यह कर पाएगा? जहां तक इसराइल का संबंध है अमेरिका के दोनों दल इसराइल को समर्थन देते रहने के पक्ष में हैं.

गज़ा बॉर्डर पर तैनात इसराइली सैनिक

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इमेज कैप्शन, ग़ज़ा बॉर्डर पर तैनात इसराइली सैनिक

अमेरिका और इसराइल के विशेष संबंध

अमेरिका और इसराइल के संबंधों की गहराई को समझने के लिए हमने बात की स्टीवन कुक से, जो नीति निर्धारण संबंधी एक थिंक टैंक मिडल ईस्टर्न स्टडीज़ एट दी काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस में वरिष्ठ शोधकर्ता हैं.

उनकी राय है कि अमेरिका में लोगों की इसराइल के साथ घनिष्ठता सांस्कृतिक और धार्मिक बुनियाद पर बनी है.

वो कहते हैं कि अमेरिका में शुरुआत से ही प्रोटेस्टंट मिशनरी, यहूदियों की मातृभूमि की धारणा में विश्वास रखते थे. दूसरे महायुद्ध की समाप्ति के तीन साल बाद उनका यह सपना साकार हो गया. अरब राष्ट्रों के विरोध के बावजूद संयुक्त राष्ट्र ने यहूदियों को फ़लस्तीन में मातृभूमि देने का फ़ैसला किया. अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमन पहले विदेशी नेता थे, जिन्होंने मई 1948 में नव गठित राष्ट्र इसराइल को मान्यता दी.

“राष्ट्रपति ट्रूमन के लिए यह इंसाफ़ का मामला था. उन्होंने कई शरणार्थी कैंपों को दौरा किया था और देखा था कि यहूदियों ने क्या झेला है. वो ख़ुद भी प्रोटेस्टंट थे और प्रोटेस्टंट चर्च यहूदी राष्ट्र का समर्थन करता है.”

जब विश्व में वर्चस्व के लिए अमेरिका और सोवियत संघ में खींचतान चल रही थी तब अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में इसराइल एक अच्छा सहयोगी बन गया था. इसे अमेरिका में पसंद भी किया जा रहा था. कई राज्यों में यहूदी बड़ी संख्या में थे और समृद्ध हो रहे थे. यहूदी समुदाय चुनावी दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था.

वहीं सोवियत संघ समर्थित कई अरब देशों ने इसराइल को मान्यता देने से इनकार कर दिया था. ऐसे में राष्ट्रपति ट्रूमन के कई सलाहकार विदेश नीति में इसराइल और अरब देशों की बीच संतुलन चाहते थे. बाद में राष्ट्रपति आइज़नहावर की सरकार ने भी यह संतुलन बनाए रखने की कोशिश की. इस दौरान अमेरिका ने इसराइल को आर्थिक और सैनिक सहायता देना जारी रखा.

मगर 1960 में जॉन एफ़ कैनेडी के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका और इसराइल के संबंध नई ऊंचाई पर पहुंच गए. दरअसल पहली बार राष्ट्रपति कैनेडी ने ही अमेरिका और इसराइल संबंध को परिभाषित करते हुए उसे विशेष संबंध करार दिया था. साथ ही इस नीति के ज़रिए अमेरिका इसराइल की फ़्रांस की सहायता से परमाणु हथियार बनाने की आकांक्षा पर भी नज़र रखना चाहता था.

स्टीवन कुक कहते हैं कि इसराइल को जो चाहिए था वो मिल गया. वो अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध कायम करने में कामयाब हो गया.

1963 में राष्ट्रपति कैनेडी की हत्या हो गयी. उनके बाद सत्ता में आए राष्ट्र्पति लिंडन जॉनसन ने इसराइल के साथ संबंध अधिक प्रगाढ़ करना शुरू किया. इसराइल के लिए यह परिवर्तन सही समय पर आया.

1967 में इसराइल और पड़ोसी अरब देश सीरिया, मिस्र और जॉर्डन के बीच छह दिन तक चले युद्ध में इसराइल ने जीत हासिल की. इतना ही नहीं बल्कि इसराइल ने पूर्वी यरूशलम पर कब्ज़ा कर लिया.

आपको पता होगा यरूशलम में वो धार्मिक स्थल हैं जो इसाइयों, यहूदियों और मसलमानों के लिए पाक हैं. इसराइल ने पश्चिम तट जो पहले जॉर्डन का हिस्सा था, उसे भी हथिया लिया. साथ ही उसने मिस्र को ग़ज़ा पट्टी से खदेड़ दिया, जिसके चलते वहां के हज़ारों फ़लस्तीनी लोग इसराइली प्रशासन के अधीन हो गए.

स्टीवन कुक मानते हैं कि जिस प्रकार इसराइल ने आसानी से सोवियत संघ समर्थित अरब देशों को रणभूमि में हराया, उसके बाद ये सोचा जाने लगा कि इसराइल इस क्षेत्र में काफ़ी काम आ सकता है.

जहां अरब इसराइल युद्ध के बाद इसराइल और अमेरिका और नज़दीक आ गए, वहीं फ़लस्तीनियों में इसराइल के ख़िलाफ़ गुस्सा और बढ़ गया और दुनिया के एक सबसे लंबे संघर्ष में हिंसा और कूटनीतिक दांव-पेंचों का नया अध्याय शुरू हुआ.

जॉर्डन, सऊदी अरब, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र के विदेश मंत्रियों के साथ जॉर्डन की राजधानी अम्मान में शनिवार को हुई बैठक के दौरान अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन.

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इमेज कैप्शन, जॉर्डन, सऊदी अरब, क़तर, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र के विदेश मंत्रियों के साथ जॉर्डन की राजधानी अम्मान में शनिवार को हुई बैठक के दौरान अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन. इस बैठक में पीएलओ की कार्यकारी समिति के महासचिव हुसैन अल-शेख भी शामिल हुए.

शांति की तलाश

अमेरिका स्थित थिंक टैंक, स्टिमसन सेंटर की वरिष्ठ शोधकर्ता एमा रैशफ़र्ड की राय है कि इसराइल और अरब देशों के बीच पिछले दशकों में कई लड़ाइयां हुईं, लेकिन 1967 और 1973 के युद्ध क्षेत्र का भविष्य निर्धारित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं.

अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने शांति स्थापित करने लिए क्षेत्र के कई कूटनीतिक दौरे किए और अमेरिका को मध्य पूर्व की कूटनीति में एक बड़े नेता की भूमिका दिलाई. हालांकि अमेरिका साफ़तौर पर इसराइल के समर्थन में था.

“अमेरिका ने इसराइल को हथियार दिए और उसके परिणामस्वरूप अरब देशों ने उसे तेल निर्यात करने पर प्रतिबंध लगा दिया. इसके बाद अमेरिका ने इसराइल और अरब देशों को लेकर अपनी कूटनीति में थोड़ा संतुलन लाया.”

1973 का अरब इसराइल युद्ध समाप्त तो हो गया, लेकिन इससे फ़लस्तीनियों के जीवन और आकांक्षाओं पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा. मगर पांच साल बाद अमेरिका के कूटनीतिक प्रयासों का फल ज़रूर मिला. अमेरिका ने कैंप डेविड समझौता करवाया, जिसके तहत मिस्र को सिनाई रेगिस्तान की उसकी ज़मीन वापस मिल गयी और बदले में उसने इसराइल को मान्यता दे दी.

एमा रैशफ़र्ड का कहना है कि, “उस समय तक अरब देश इसराइल के अस्तित्व को मानने से ही इनकार कर रहे थे. ऐसे में मिस्र का फ़लस्तीनी मुद्दे को नज़रअंदाज़ कर के ज़मीन के बदले इसराइल को मान्यता देना एक महत्वपूर्ण क़दम था.”

मगर 1979 में ईरान में शाह की सरकार के गिरने के बाद मध्य पूर्व में स्थिति फिर बदल गयी. यानी ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद अमेरिका से उसके संबंध खटाई में पड़ गए.

एमा रैशफ़र्ड कहती हैं कि ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद लेबनान में हिज़बुल्लाह जैसे चरमपंथी गुट मज़बूत हो गए. यह इसराइल और अमेरिका के लिए चिंता का विषय तो था ही, लेकिन यह मुद्दा आतंकवाद से भी जुड़ गया.

अस्सी के दशक में इसराइल और अमेरिका लेबनान में सैनिक कार्यवाही में शामिल हो गए. साथ ही फ़लस्तीन के पश्चिम तट और ग़ज़ा में इसराइली कब्ज़े के ख़िलाफ़ विद्रोह यानी इंतिफ़ादा आंदोलन शुरू हुआ. लेकिन शांति को एक मौका तब मिला जब अमेरिका ने इसराइल और फ़लस्तीनी संगठन पीएलओ के बीच सितंबर 1993 में ओस्लो शांति समझौता करवाया, जिसके तहत दो स्वतंत्र राष्ट्र यानी इसराइल के साथ स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र की स्थापना पर सहमति हुई.

एमा रैशफर्ड ने बीबीसी को बताया, “लेकिन दोनों ही पक्षों ने इस समझौते को लागू करने के लिए ईमानदारी से प्रयास नहीं किए. यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इस समझौते के विफल होने के लिए दोनों पक्ष ज़िम्मेदार थे.”

इस विफलता के बाद 75 साल पुरानी इस समस्या के समाधान के लिए अमेरिका को सफलता नहीं मिली है.

इसराइल के हमले के बाद ग़ज़ा में हुई तबाही.

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भविष्य में कूटनीति की दिशा

मध्य पूर्व में स्थिति और भी बदतर हो गयी है और मध्य पूर्व में एक शांतिपूर्ण भविष्य की संभावना धुंधली पड़ती जा रही है.

शांति प्रयासों के लिए जर्मनी, फ़्रांस, यूके और कई दूसरे देश प्रयास तो कर रहे हैं, मगर हमारे चौथे एक्सपर्ट ब्रायन कटूलिस मानते हैं कि इसमें प्रमुख भूमिका अमेरिका की ही होगी. ब्रायन कटूलिस मिडल ईस्ट इंस्टिट्यूट के उपाध्यक्ष हैं.

ब्रायन कटूलिस ने कहा, “ऐसा नहीं है कि पिछले कुछ सालों में इसराइल की सैनिक और आर्थिक क्षमता बहुत बढ़ गयी है और इसराइलियों और फ़लस्तीनियों के बीच असंतुलन बढ़ गया है. मगर क्षेत्र की दूसरी ताक़तें जैसे कि ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अपने हितों के लिए आवाज़ उठाने और प्रभाव बढ़ाने लगे हैं.”

इस वजह से क्षेत्र में अमेरिका की कूटनीतिक भूमिका को चुनौती मिल रही है. इसी दौरान चीन ने मध्यस्थता कर के सऊदी अरब और ईरान के बीच वार्ताएँ शुरू करवायीं.

ब्रायन कटूलिस का कहना है कि चीन ने क्षेत्र में अपनी आर्थिक और कूटनीतिक गतिविधियां बढ़ा दीं जिसकी वजह से बाइडन सरकार मध्य पूर्व में और अधिक सक्रिय हो गयी है.

ट्रंप प्रशासन के दौरान इसराइल, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को के बीच संबंध सामान्य हो गए थे. उसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए बाइडन सरकार इसराइल और सऊदी अरब के बीच भी संबंध सामान्य करने की कोशिश कर रही है, ताकि ईरान और उसके समर्थन से चलने वाले हिज़बुल्लाह की कार्यवाहियों पर अंकुश लगाया जाए और उन्हें ग़ज़ा में इसराइल के साथ नए संघर्ष में कूदने से रोका जाए.

ब्रायन कटूलिस का मानना है कि अमेरिका की कोशिश होगी कि दोबारा ध्यान इसराइल और फ़लस्तीन की समस्या की ओर केंद्रित किया जाए.

ब्रायन कटूलिस ने कहा, “पिछले जितने भी समझौते हुए उनमें से किसी में भी फ़लस्तीन के प्रश्न को हल नहीं किया गया है. ताज़ा संघर्ष में दोनों ही ओर कई लोगों की जानें गयी हैं और नुक़सान हुआ है. लेकिन इस संकट में आशा कि एक हल्की सी किरण यह हो सकती है कि दोबारा रचनात्मक तरीक़े से फ़लस्तीन के मुद्दे पर बात हो सकती है. और विश्व के नेताओं को याद दिलाया जा सकता है कि एक ऐसा समझौता किया जाए जिसमें फ़लस्तीन के मूल प्रश्न को हल किया जाए.”

आइए लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर कि अमेरिकी कूटनीति मध्य पूर्व में क्या हासिल कर सकती है.

हमारे विशेषज्ञों ने कहा कि पिछले दशकों में समस्या के समाधान के लिए कुछ समझौते हुए और आशा बंधी लेकिन वो लागू नहीं हो पाए और हिंसा के दौर आते रहे.

मौजूदा संघर्ष में अमेरिका की कूटनीति दोनों ओर जान-माल का नुक़सान कम करने और संघर्ष को बढ़ने से रोकने के अलावा ख़ास कुछ नहीं कर सकती. लेकिन यह उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में ऐसा समय आए जब दूरदर्शी नीतियां अपनायी जाएं और एक नयी विश्व व्यवस्था बने जिसमें केवल अमेरिका की नहीं बल्कि दूसरे देशों की भी बात सुनी जाए.

मगर उन सभी के सामने मध्य पूर्व के इस 75 साल पुराने राजनीतिक विवाद का शांतिपूर्ण हल निकालने की चुनौती होगी.

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