बहरीन से बड़े फ़ैसले की ख़बर, इसराइल ने दी सफ़ाई

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इसराइल और हमास के बीच पिछले 28 दिनों से चल रहे युद्ध में हर रोज़ कई सौ लोग मारे जा रहे हैं. ग़ज़ा में इसराइल की बमबारी और नाकाबंदी से परेशान अरब के देश काफ़ी नाराज़ हैं.
ईरान एक तरफ़ जहाँ इसराइल को नतीजे भुगतने की चेतावनी और मुस्लिम देशों से एकजुट होने को कह रहा है, वहीं जॉर्डन समेत कई देशों ने अपने राजदूत को इसराइल से वापस बुला लिया है.
अब इस फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है. वह है बहरीन.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ बहरीन ने गुरुवार को बताया कि इसराइल से उसके राजदूत वापस लौट आए थे और इससे कुछ समय पहले इसराइल के राजदूत ने बहरीन छोड़ दिया था.
एजेंसी के मुताबिक़ दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध बने रहेंगे या नहीं, इसे लेकर फ़िलहाल कुछ साफ़ नहीं है लेकिन बहरीन का कहना है कि दोनों देशों के बीच उड़ाने कई हफ्तों के लिए निलंबित कर दी गई हैं.
न्यूज वेबसाइट मिडिल ईस्ट आई के मुताबिक़ गुरुवार को बहरीन की संसद ने अपनी वेबसाइट पर एक बयान प्रकाशित किया.
इस बयान में बहरीन ने अपने राजदूत को वापस बुलाने की घोषणा की है. हालांकि बयान में यह साफ़ नहीं है कि क्या राजदूत ने इसराइल छोड़ दिया है या नहीं.
वेबसाइट के मुताबिक़ बहरीन की संसद के निचले सदन के प्रवक्ता ने कहा कि ग़जा पर बमबारी के बीच इसराइल के साथ आर्थिक सहयोग भी रोक दिया जाएगा.

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बहरीन के किंग का ज़िक्र करते हुए बयान में कहा गया है पहले की तरह बहरीन फ़लस्तीन के साथ खड़ा है.
‘मिडिल ईस्ट आई’ के मुताबिक़ फ़िलहाल यह साफ़ नहीं है कि यह क़दम अस्थायी होगा या नहीं. इसके अलावा बहरीन के विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
इस मामले में इसराइल के विदेश मंत्रालय ने भी बयान जारी किया है. मंत्रालय ने कहा, “हम स्पष्ट करना चाहेंगे कि बहरीन सरकार और इसराइल सरकार ने देशों से राजदूतों को वापस भेजने के लिए कोई फ़ैसला नहीं किया है. इसराइल और बहरीन के बीच बीच संबंध स्थिर हैं.”
इसराइल का कहना है कि अगर राजनयिक और आर्थिक संबंधों को तोड़ा जाता है तो यह उसके लिए एक बड़े झटके की तरह होगा.

अरब के देश कितने ईमानदार?
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे टीएस तिरूमूर्ति ने इसराइल-हमास की जंग पर भारत के रुख़ को लेकर अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू में लिखा है, ''भारत ने हमेशा से इसराइल-फ़लस्तीन संकट का समाधान द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत में देखा है. इसराइल के भीतर आतंकवादी हमले से भारत का चिंतित होना भी लाजिमी है.''
''जब अरब वर्ल्ड इसराइल के साथ संबंध सामान्य कर रहा था तो भारत ने भी इस लाइन की उपेक्षा नहीं की. I2U2 ग्रुप (इंडिया, इसराइल, यूएई और यूएस) इसी लाइन की पुष्टि करता है. भारत के लिए यह अहम है कि न उसे केवल आतंकवाद के ख़िलाफ़ होना चाहिए बल्कि ग़ज़ा में मानवीय त्रासदी के ख़िलाफ़ भी डटकर खड़ा होना चाहिए.''
टीएस तिरूमूर्ति ने लिखा है, ''इसराइल-फ़लस्तीन संकट में पश्चिम को उनके पाखंड और दोहरे मानदंड के लिया घेरा जा सकता है लेकिन क्या अरब इस मामले में दूध का धुला है? क्या फ़लस्तीनियों को किनारे करने के लिए अरब के देश ज़िम्मेदार नहीं हैं? इसराइल से रिश्ते सामान्य करने की रेस में अरब के देश फ़लस्तीनियों के मुद्दे पर बात करते हुए कहते हैं कि इसराइल अब फ़लस्तीन के किसी और इलाक़े को अपने में नहीं मिलाने पर सहमत हो गया है. हालांकि इसराइल ठीक इसके उलट करता रहा है.''
''इसराइल के प्रधानमंत्री की कोशिश रहती है कि पश्चिम एशिया में मुद्दा ईरान को बनाया जाए न कि फ़लस्तीन को. अभी इसराइल को लेकर अरब देशों की जो प्रतिक्रिया है, वह सड़कों पर फ़लस्तीनियों के समर्थन में विरोध-प्रदर्शन को रोकने के लिए है. क्या खाड़ी के देश ग़ज़ा पर इसराइली हमले को रोकने के लिए अपने तेल को हथियार नहीं बना सकते थे? फ़लस्तीनियों के हक़ों की उपेक्षा कर इसराइल से रिश्ते सामान्य करने से उन्हें सुरक्षा नहीं मिलेगी, वो भी तब जब खाड़ी के देशों में उदार सरकार बनाने की बात हो रही है.''

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अब्राहम अकॉर्ड को झटका
इसराइल के विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ मौजूदा समय में 29 देशों के साथ उसके राजनयिक संबंध नहीं हैं, जिसमें ईरान, सऊदी अरब, पाकिस्तान, इराक, मलेशिया और अफग़ानिस्तान जैसे कई इस्लामिक देश शामिल हैं.
कुछ साल पहले तक इस फेहरिस्त में बहरीन का नाम भी शामिल था, लेकिन साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इसराइल के साथ एक ऐतिहासिक समझौता किया, जिसे ‘अब्राहम अकॉर्ड’ कहा जाता है.
इस समझौते के तहत यूएई और बहरीन ने इसराइल के साथ अपने रिश्तों को सामान्य किया था और राजनयिक रिश्ते कायम कर लिए थे.
इस समझौते के लिए इसराइल ने वेस्ट बैंक की बस्तियों को इसराइल से जोड़ने की अपनी योजना को भी स्थगित कर दिया था.
इसराइल और अरब के देशों के बीच रिश्तों को सामान्य करने में अब्राहम अकॉर्ड का बहुत बड़ा योगदान है. इसकी मदद से मध्य-पूर्व में अमेरिका ने अपनी स्थिति को भी मज़बूत करने का काम किया था.
जानकारों का मानना है कि इसे आगे बढ़ाते हुए ही अमेरिका सऊदी अरब और इसराइल के बीच में रिश्तों को शुरू करने के लिए कई तरह के प्रयास कर रहा था, लेकिन इसराइल-ग़ज़ा युद्ध ने इन सभी कोशिशों पर विराम लगा दिया है.
इसकी वजह है कि सऊदी अरब, इसराइल को एक देश के रूप में नहीं मानता. उसका मानना है कि उसने फ़लस्तीनियों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है.
ऐसे में इसराइल के साथ बहरीन के राजनयिक संबंधों का ख़राब होना, उस पूरी कोशिश को भी एक बड़ा झटका है, जिसके चलते अरब के देश अपने मतभेदों को भूलते हुए इसराइल के क़रीब आए थे.
न्यूज़ वेबसाइट अल-जज़ीरा के मुताबिक़ पिछले बहरीन में लोगों ने फ़लस्तीनियों के समर्थन में इसराइली दूतावास के बाहर प्रदर्शन किए हैं और रिश्तों को सामान्य बनाने वाले समझौते को रद्द करने की मांग की है.

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अरब-इसराइल संबंध
सवाल है कि ग़ज़ा में हो रही लड़ाई का इसराइल और उसके अरब साझीदारों के संबंधों को लंबे समय में कैसे प्रभावित करेगा?
इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि ये संघर्ष कितना लंबा खिंचेगा और क्या हताहतों की संख्या यूं ही बढ़ती रहेगी.
जिन अरब देशों ने इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य किए हैं, उन्हें ये पता है कि इस नई दोस्ती से उन्हें काफ़ी कुछ हासिल होने वाला है, ख़ासकर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि अरब देश घरेलू मोर्चे पर असंतोष बढ़ने की क़ीमत पर ये फ़ायदा चाहेंगे.
फ़िलहाल के लिए वे किसी ऐसे देश के साथ क़रीबी रिश्ते नहीं दिखाना चाहेंगे जो फ़लस्तीनी लोगों की जान ले रहा हो, भले ही इसके लिए हमास ने उसे उकसाया हो.
व्यवहार में इसका मतलब यही हुआ कि द्विपक्षीय बातचीत बंद दरवाज़ों के बीच जारी रहेगी, जैसा कि ये सालों से होता आया है. लेकिन साथ फोटो खिंचाने, प्रेस कॉन्फ्रेंस संबोधित करने के दिन शायद फ़िलहाल के लिए ख़त्म हो गए हैं.
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