बद्रीनाथ में भाजपा की हार उत्तराखंड बीजेपी के लिए कितना बड़ा झटका है

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

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    • Author, राजेश डोबरियाल
    • पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तराखंड विधानसभा की दो सीटों के लिए हुए उपचुनावों के नतीजों को राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा है.

बीजेपी हरिद्वार की मंगलौर और चमोली की बद्रीनाथ दोनों सीटें कांग्रेस से हार गई है. मंगलौर सीट पर भाजपा अपने प्रदर्शन को ठीक बता रही है लेकिन बद्रीनाथ की हार की समीक्षा की बात कर रही है.

सोशल मीडिया पर लोग इसे अयोध्या की हार से जोड़कर देख रहे हैं और विपक्षी ये कह रहे हैं कि 'भगवान' ने भाजपा का साथ छोड़ दिया है.

वहीं, कांग्रेस का कहना है कि "पहले भगवान राम ने भाजपा को सज़ा दी है, फिर बद्रीनाथ में नारायण ने और अब बाबा केदार की बारी है."

आवाज़ें पार्टी के अंदर से भी उठने लगी हैं और एक वरिष्ठ नेता ने इस हार की वजह प्रत्याशियों के चयन को बताया है.

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मंगलौर में 'जीत' का दावा

मंगलौर विधानसभा उपचुनाव जीतने पर क़ाज़ी निज़ामुद्दीन को बधाई देते प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष करन माहरा

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मंगलौर में हार को भाजपा के नेता अपनी जीत बता रहे हैं.

सोमवार को देहरादून में हुई भाजपा की विस्तारित कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी नेताओं ने कहा कि मंगलौर विधानसभा में हारे नहीं, जीते हैं.

यहां पार्टी तीसरे स्थान पर रहती थी लेकिन इस उपचुनाव में उसने कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी है और दूसरे स्थान पर रही है.

बता दें कि मंगलौर में कांग्रेस प्रत्याशी क़ाज़ी निज़ामुद्दीन ने भाजपा के करतार सिंह भड़ाना को 422 मतों से हराया है. क़ाज़ी तीसरी बार मंगलौर से विधायक बने हैं.

मंगलौर विधानसभा का गणित ऐसा है कि यह भाजापा के लिए अभेद्य क़िला रहा है. यहां 50 फ़ीसदी से ज़्यादा मतदाता मुस्लिम और करीब 30 फ़ीसदी दलित हैं.

परंपरागत रूप से इसे बसपा का गढ़ माना जाता रहा है और उसे कांग्रेस से टक्कर मिलती रही है.

करतार सिंह भड़ाना

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इस बार बसपा तीसरे स्थान पर खिसक गई है और भाजपा दूसरे पर आ गई है.

मंगलौर से उपचुनाव जीतने वाले क़ाज़ी इस सीट से चौथी बार विधायक बनने जा रहे हैं. कांग्रेस संगठन में राष्ट्रीय सचिव क़ाज़ी राजस्थान कांग्रेस के सह प्रभारी हैं.

उन्होंने 2002 में हुए उत्तराखंड राज्य के पहले चुनाव में मंगलौर से बसपा के टिकट पर जीत हासिल की थी और फिर 2007 का चुनाव भी बसपा से ही लड़ा और जीता था.

साल 2012 का चुनाव वह कांग्रेस के टिकट पर लड़े और बसपा के हाजी सरवत करीम अंसारी से हार गए.

साल 2017 में उन्होंने कांग्रेस को मंगलौर से जीत दिलवाई और तीसरी बार विधायक बने.

साल 2022 में फिर हाजी जीते. उनकी मौत के बाद खाली हुई इस सीट पर बसपा ने उनके बेटे उबेदुर रहमान को टिकट दिया था तो भाजपा हरियाणा के करतार सिंह भड़ाना को मैदान में लेकर आई थी. भड़ाना बसपा प्रत्याशी को पीछे धकेलकर दूसरे स्थान पर रहे.

'प्रत्याशी चयन ठीक नहीं हुआ'

भाजपा में शामिल होने के बाद गृह मंत्री अमित शाह के साथ राजेंद्र भंडारी

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सोमवार को देहरादून में भाजपा की विस्तारित प्रदेश कार्यसमिति की बैठक थी.

इसमें आमतौर पर बद्रीनाथ उपचुनाव को लेकर ख़ामोशी रही लेकिन पूर्व सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री रहे तीरथ सिंह रावत ने कहा कि इनमें प्रत्याशियों का चयन ठीक नहीं हुआ.

उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में पार्टी कार्यकर्ताओं को पूरा सम्मान नहीं मिल रहा है. केदारनाथ में होने वाले उपचुनाव में प्रत्याशी चयन में समझदारी दिखानी होगी.

रावत ने कहा कि सबसे राय मशविरा करके प्रत्याशी का चयन करना होगा, थोपना नहीं है.

दरअसल, इन उपचुनावों मे भाजपा ने दोनों ही प्रत्याशी 'बाहरी' उतारे थे.

करतार सिंह भड़ाना तो हरियाणा से लाए ही गए थे लेकिन बद्रीनाथ से भाजपा ने राजेंद्र भंडारी को प्रत्याशी बनाया था, जो लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे.

वह गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र की 14 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के अकेले विधायक थे.

राजेंद्र भंडारी के चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी

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राजेंद्र या राजू भंडारी उस समय इसलिए भी चर्चा में आए थे क्योंकि 17 मार्च को भाजपा में शामिल होने से 24 घंटे पहले ही उन्होंने दावा किया था कि वह कभी कांग्रेस छोड़कर नहीं जाएंगे लेकिन 16 जून को जिन कपड़ों में उन्होंने यह बयान दिया था उन्हीं में वह दिल्ली में भाजपा में शामिल हो गए.

उनके इस्तीफ़ा देने के बाद बद्रीनाथ सीट खाली हुई थी और भाजपा ने वादे के अनुसार भंडारी को अपने टिकट से मैदान में उतारा था लेकिन यह दांव उलटा पड़ा.

राजेंद्र भंडारी ने छात्र जीवन से राजनीति शुरू की थी और ज़िला पंचायत से विधानसभा तक पहुंचे थे. चमोली में वह ख़ासे मजबूत माने जाते थे.

साल 2022 के विधानसभा चुनावों में उनकी जीत इसका सबूत है जब उन्होंने न सिर्फ़ तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट को हराया था बल्कि गढ़वाल संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस का परचम लहराने वाले अकेले विधायक भी बने थे.

लेकिन दल बदलकर बद्रीनाथ में दोबारा चुनाव करवाना उनके लिए भारी पड़ गया. वे जिस सीट से कांग्रेस के विधायक थे, उसी सीट पर बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर हार गए.

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'कार्यकर्ताओं पर भरोसे ने जिताया'

बद्रीनाथ विधानसभा उपचुनाव में जीत हासिल करने वाले कांग्रेस के लखपत बुटोला

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भाजपा के विपरीत कांग्रेस ने मंगलौर और बद्रीनाथ दोनों जगह अपने पुराने नेताओं पर भरोसा किया.

क़ाज़ी तो कांग्रेस से दो चुनाव पहले भी लड़ चुके थे (एक बार विधायक भी बने) लेकिन बद्रीनाथ से जीतने वाले लखपत बुटोला का यह पहला चुनाव था.

इस उपचुनाव से पहले लखपत बुटोला को कोई बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं मिली थी लेकिन इस जीत ने उन्हें देश भर में पहचान दिला दी है.

चमोली के चौंडी गांव के लखपत बुटोला कांग्रेस के ज़मीनी कार्यकर्ता हैं. वह एक बार बद्रीनाथ से ज़िला पंचायत अध्यक्ष रहे हैं और कांग्रेस के प्रवक्ता भी.

हालांकि बद्रीनाथ में कांग्रेस का चेहरा राजू भंडारी ही थे.

बद्रीनाथ में कांग्रेस की जीत का जश्न मनाते पार्टी कार्यकर्ता

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लोकसभा चुनाव के ठीक पहले जब भंडारी ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा तो पार्टी ने बद्रीनाथ विधानसभा सीट पर ज़मीनी नेताओं की तलाश शुरू की, जो लखपत बुटोला तक पहुंची.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा कहते हैं कि यह दो साल की मेहनत का नतीजा है.

वह कहते हैं कि उन्होंने पार्टी में नेताओं की नाराज़गी भी झेली लेकिन युवाओं को संगठन के पदों पर मौका दिया और वह बहुत उत्साह से काम कर रहे हैं.

माहरा यह भी कहते हैं कि इसके अलावा पार्टी के सभी नेताओं ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा और इसका फ़ायदा इन उपचुनावों में मिला है.

वह यह भी कहते हैं कि भाजपा ने बाहर से लाकर चुनाव लड़वाने के लिए बाहरियों को चुना इससे पार्टी के ज़मीन से जु़ड़े कार्यकर्ता बेहद नाराज़ थे.

दशकों से संघ, जनसंघ और भाजपा के लिए काम करने वाले लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे हैं.

बीजेपी कार्यकर्ता भी नहीं थे साथ

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राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर योगेश धस्माना कहते हैं कि राजू भंडारी के ख़िलाफ़ बीजेपी कार्यकर्ताओं में भी असंतोष था हालांकि वह इसे खुलकर व्यक्त नहीं कर पा रहे थे, आप इसे अनुशासन भी कह सकते हैं और डिक्टेटरशिप भी लेकिन उन्हें साथ खड़े दिखना था.

धस्माना कहते हैं कि बीजेपी कार्यकर्ता खुद भंडारी को हरवाना चाहते थे और जो उनके साथ प्रचार में दिख भी रहे थे उन्होंने खुद ही भंडारी को वोट नहीं दिया.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट भी यह मानते हैं कि भाजपा के वोटर्स ने इस बार पार्टी का साथ नहीं दिया.

बीबीसी हिंदी से बात करते हुए उन्होंने कहा इन उपचुनावों में 14 प्रतिशत मतदाम कम हुआ है. हालांकि इसके लिए 'कांग्रेस के कुप्रचार' को ज़िम्मेदार बताते हैं.

वह कहते हैं कि अगर हमारा वोटर साथ आता तो हम इस सीट को आठ से दस हज़ार वोट से जीतते.

भट्ट यह भी कहते हैं कि इस बार कांग्रेस ने बीजेपी का मुकाबला अकेले नहीं किया. वामपंथी दल, उत्तराखंड क्रांति दल सब साथ मिलकर बीजेपी से लड़ रहे थे और इसका भी असर परिणाम पर हुआ है.

हालांकि इस के साथ वह कहते हैं कि चुनाव परिणामों की समीक्षा की जाएगी और उनके आधार पर आगे की रणनीति बनाई जाएगी.

वीडियो कैप्शन, उत्तराखंड : निष्पक्ष चुनाव कराना कितना चुनौतीपूर्ण ?

डॉक्टर योगेश धस्माना ने चुनाव के पहले ही यह आशंका जता दी थी कि बद्रीनाथ के परिणाम अयोध्या जैसे हो सकते हैं.

आठ जुलाई को एक फ़ेसबुक पोस्ट में उन्होंने लिखा था कि जैसे अयोध्या नगरी को तोड़कर गरीबों का निवाला छीना गया, उसी तरह बद्रीनाथ धाम को पर्यटकों की सैरगाह बनाने के लिए उजाड़ दिया गया है.

उन्होंने बाहरी प्रत्याशियों के चलते स्थानीय संगठन में नााराज़गी के साथ ही ब्राह्मण मतदाताओं की अहमियत बढ़ने की बात भी कही थी.

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश जुयाल हालांकि इस बात से सहमत नहीं हैं.

वह कहते हैं भंडारी की जीत का अंतर 5000 वोटों से ज़्यादा है और यह सिर्फ़ ब्राह्मण वोटों से नहीं आ सकता. जनता नाराज़ थी और उसमें सभी वर्गों के लोग शामिल थे जिन्होंने दल-बदल और मनमानी के ख़िलाफ़ वोट दिया है. इसके अलावा बीजेपी के कार्यकर्ता भी राजेंद्र भंडारी के साथ नहीं थे.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट भी दावा करते हैं कि ब्राह्मण मतदाता पार्टी के साथ रहे हैं. वह कहते हैं कि भले ही उतने वोट न पड़े हों जितने पहले पड़े थे लेकिन बूथों के विश्लेषण से पता चल रहा है कि ब्राह्मण वोटर भाजपा के साथ हैं.

स्थानीय लोगों की नाराज़गी

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डॉक्टर योगेश धस्माना कहते हैं कि विकास के नाम पर स्थानीय लोगों के हक़ छीने जा रहे हैं और अब यह बात बीजेपी के नेताओं को भी समझ आने लगी है.

वह कहते हैं कि केदारनाथ की पूर्व विधायक शैला रानी रावत (जिनका नौ जुलाई को ही निधन हो गया है) हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिली थीं और केदारनाथ में स्थानीय लोगों के बजाय दुकानें बाहर वालों को आवंटित करने पर आपत्ति जताई थी.

धस्माना कहते हैं कि यही बद्रीनाथ में भी हो रहा है. दुकानें और व्यापारिक प्रतिष्ठान बाहर के पैसे वाले लोग ले रहे हैं और सड़क किनारे स्थानीय सामान बेचने वाले लोगों के लिए जगह ही नहीं बच रही है.

वह कहते हैं कि अयोध्या से बद्रीनाथ तक कहानी एक ही है. स्थानीय निवसियों की ज़मीन, हक़ छीनकर बाहरी कारोबारियों को दे दिए गए जो फिर उससे पैसे कमा रहे हैं और स्थानीय लोग ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और हालात नहीं सुधरे तो पार्टी केदारनाथ की सीट भी हार सकती है.

यहां उपचुनाव की तारीख का एलान नहीं हुआ है लेकिन शैली रानी रावत के निधन के चलते यहां भी जल्द चुनाव होने वाले हैं.

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